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लुम्बिनी का नाम लेते ही हमारे सामने शांत मुद्रा में बैठी एक करुणामय मूर्ति का चित्र प्रकट होता है। वह मूर्ति किसी अन्य का न होकर राजसी सुख-सुविधा को त्यागते हुए बुद्धत्व प्राप्त करने वाले राजकुमार सिद्घार्थ गौतम का है, जो छह वर्षों की कठोर तपस्या पश्चात प्राप्त बोधिज्ञान और सत्य, अहिंसा और करुणा के संदेश के कारण विश्व में भगवान बुद्ध के रूप में प्रसिद्ध हुए। जिनके नाम पर फिल्मे बनी, ग्रथ तैयार हुए, और गीत गाए गए।
जब घबराए मन अनमोल, और हृदय हो डाँवाडोल, तब मानव तुम मुख से बोल,
बुद्धम शरणम गच्छामि, धम्मम शरणम गच्छामि, संघम शरणम गच्छामि।
ईशा पूर्व ५६३ में दक्षिण पश्चिम नेपाल की तराई के रूपन्देही जिले के लुम्बिनी नामक एक उद्यान में वैशाख पूर्णिमा के पावन अवसर पर जन्मे, वैशाख पूर्णिमा के पावन दिन पर ही ३५ वर्ष की उम्र में भारत के बिहार राज्य के बोधगया में बुद्धत्व प्राप्त करने और वैशाख पूर्णिमा के पावन दिन पर ही उत्तर प्रदेश राज्य के कुशीनगर में ८० वर्ष की उम्र में महापरिनिर्वाण प्राप्त करने वाले इस शांतिनायक के जीवन में यह सारी उल्लेखनीय घटनाएँ वैशाख पूर्णिमा के दिनों में ही हुईं। अत: इस दिन को आज विश्व भर के लोग बुद्ध पूर्णिमा के रूप में मनाते आ रहे हैं।
लुम्बिनी विश्व भर के लोगों, विशेषकर बौद्ध धर्मावलम्बियों, आध्यात्मिक नेताओं, अध्येताओं एवं विशिष्ट व्यक्तियों के लिए भी आकर्षण का एक महत्वपूर्ण केंद्र बना हुआ है। इतिहास के पन्ने उलटने पर पाँचवी और सातवीं शताब्दी में चीनी यात्री फाहियान और ह्वेन सांगके द्वारा इस पावन स्थल की यात्रा किए जाने का वृत्तांत मिलता है। बुद्धकालीन समय में एक ओर राजगृह के विम्बिसार, और श्रावस्ती के प्रसेन्नजीत जैसे राजाओं और दूसरी ओर आम्बपाली जैसी नगरवधू के द्वारा बुद्ध धर्म को अपनाए जाने और विहारों के निर्माण में भूमिदान किए जाने का उल्लेख मिलता है। इसके अलावा कलिंग की लड़ाई में हुए रक्तपात से विरक्त होकर मौर्य सम्राट अशोक के द्वारा भगवान बुद्ध के महापरिनिर्वाण के २०० वर्ष बाद इस पावन भूमि की यात्रा किए जाने और काठमांडू में अपनी बेटी चारुमति का विवाह एक नेपाली युवक देवपाल के साथ कराए जाने का वृत्तांत मिलता है। अपनी लुम्बिनी यात्रा को चिरस्थायी रूप देने हेतु उनके द्वारा वहाँ १६ फुट ७ ईंच ऊँची एक लौह स्तम्भ की स्थापना कराई गई जो आज भी विद्यमान है और अशोक स्तम्भ के नाम से सुविदित है। इस संबंध में ‘नेपाल अध्ययन: अतीत’ वर्तमान नामक संस्था के द्वारा प्रस्तुत एक कार्यपत्र का उल्लेख यहाँ सान्दर्भिक होता है। इसके अनुसार, सन 1896 के जनवरी 1 तारीख के दिन उस समय के दो सुविख्यात पुरातत्वविद् पश्चिम नेपाल के कमाण्डिंग जनरल खड्गशमशेर जंगबहादुर राणा तथा जर्मनी के डा. आला फ्युहरर ने गौतम बुद्ध के जन्म स्थल का पता लगाया था। नेपाल के दक्षिण पश्चिम के तराई क्षेत्र अवस्थित लुम्बिनी उद्यान ही वह जन्मस्थल है। यह स्थल मात्र उस शताब्दी के लिए न होकर भविष्य के दिनों की दृष्टि से भी विश्व के महानतम आविष्कारों में एक रहा है।
सन 1956 में तत्कालीन राजा महेन्द्र ने इस इलाके की यात्रा की और वहाँ जाने के लिए सड़क मार्ग की समुन्नति और यात्रियों की सुविधा हेतु विभिन्न निर्माण कार्य के लिए दस लाख रूपए प्रदान की। उनकी यात्रा के लगभग एक दशक उपरांत संयुक्त राष्ट्र संघ के तत्कालीन महासचिव उ थांट, जो बौद्ध धर्मावलम्बी थे, ने यहाँ की यात्रा की और इसके विकास के लिए अंतराष्ट्रीय समुदाय से अपील की। फलस्वरूप सन १९७० में संयुक्त राष्ट्र संघ के तत्वावधान में लुम्बिनी विकास के लिए एक अंतर्राष्ट्रीय समिति की गठन की गई। लुम्बिनी के विकास के लिए नेपाल सरकार ने राष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न कार्यक्रमों में समन्वय स्थापित करने हेतु ‘लुम्बिनी विकास समिति’ की स्थापना की। इसे सन 1985 में लुम्बिनी विकास ट्रष्ट का रूप दिया गया।
20 नवंबर 1956 को डॉ. भीमराव अंबेडकर काठमांडू में आयाजित विश्व बौद्ध सम्मेलन में हिस्सा लेने नेपाल गये। तबतक वे बुद्ध धम्म ग्रहण कर चुके थे। डॉ. अंबेडकर ने ‘बुद्ध और कार्ल मार्क्स’ विषय पर अपना शोधगर्भित व्याख्यान दिया। अपने व्याख्यान के आरंभ में डॉ. अंबेडकर ने इस बात पर खेद जताया कि अस्वस्थता के कारण वे सम्मेलन की कार्यवाहियों में सक्रिय रूप से भाग नहीं ले सके। डॉ. अंबेडकर ने उपस्थित प्रतिनिधियों का आह्वान किया कि वे युवाओं के भीतर बौद्ध धर्म और दर्शन के प्रति अनुराग पैदा करें।
इसके समुचित विकास के लिए जापान के स्थापत्य कलविद् प्रो. केन्जो तांगे के द्वारा प्रस्तुत की गई गुरु योजना के अधीन उद्यान के अंदर कई निर्माण कार्य हुए। तदुपरांत वहाँ विभिन्न बौद्ध देशों के लिए विहार बनाने के कार्य किए गए। वहाँ स्थापित शांति स्तूप आज बौद्ध तीर्थयात्रियों के लिए ही नहीं समस्त देशवासियों के लिए एक श्रद्धा का प्रतीक बना है। पावन उद्यान के अंदर शांति क्षेत्र में विचरण करते हुए पंक्तिकार को शांति का जो आभास हुआ उससे लगा कि उसका नाम वैसे ही शांति क्षेत्र नहीं रखा गया। गौतम बुद्ध की जननी माया देवी का मंदिर, जिस स्थल पर सिद्धार्थ गौतम का पृथ्वी पर अवतरण हुआ था, बालक सिद्धार्थ गौतम के पृथ्वी पर अवतरण होने के उपरांत उनके द्वारा स्नान किए गए जलकुण्ड का स्थल और उसके आसपास की विभिन्न संरचनाएँ पर्यटकों को उस काल की याद दिलाती हैं जो अब भग्नावशेष के रूप में होते हुए भी पुरातात्विक महत्व की वस्तुएँ बन गई हैं। पुरातत्व एवं संस्कृतिविद् सत्यमोहन जोशी के एक लेख के अनुसार लुम्बिनी में १६ फुट ७ ईंच ऊँचा अशोक स्तम्भ मिलने पर वहाँ किए गए उत्खननों से एक पक्की तालाव मिली। कहा जाता है कि यह वही तालाब है जहाँ सिद्धार्थ गौतम को जन्म के बाद प्रथम स्नान कराया गया था। विद्वानजन इसे सिद्धार्थ कूप के नाम से संबोधित करते हैं।
तिलौराकोट जहाँ सड़क के बगल में ही एक चारदीवारी के अंदर प्रासादनुमा एक चित्ताकर्षक भवन दिखाई पड़ता है। कपिलवस्तु में शाक्यवंशीय राजा शुद्घोदन की राजधानी थी। राजकुमार सिद्धार्थ के द्वारा अपने जीवन के 21 वर्ष राजसी सुख के साथ बिताए जाने के इस शाही स्थल पर आधुनिक समय में किए गए उत्खननों से बुद्धकालीन कई महत्वपूर्ण सामग्रियाँ अब संग्रहालयों की शोभा बढ़ा रही हैं।
लुम्बिनी के अतिरिक्त कपिलवस्तु, जो लुम्बिनी के निकट ही है, में विदेशी पर्यटकों के रहने के लिए सुविधाजनक आवासगृह और आरामप्रद होटलें हैं। चूँकि यह गोरखपुर से सटा एक नेपाली नगर है, अत: यहाँ तक आने में पर्यटकों को विशेष असुविधा का सामना नहीं करना पड़ता है। नेपाल की राजधानी काठमांडू से आने वाले यात्रियों के लिए सड़क मार्ग की सुविधा तो है ही, हवाई सुविधा भी है। काठमांडू से भैरहवा तक की आधे घण्टे की हवाई यात्रा और आगे लुम्बिनी तक की २२ कि.मी.की बस या कार से की जाने वाली यात्रा पर्यटकों के लिए सुविधाजनक होती है। भैरहवा से सटे सीमावर्ती भारतीय नगर नौतनवा और सोनौली में भी आधुनिक होटले हैं, जहाँ से भी मोटरगाड़ियाँ किराए पर लेकर लुम्बिनी और तिलौराकोट की यात्रा की जा सकती है। वैसे तो यहाँ वर्ष भर ही यात्रा की जा सकती है, पर शरद ऋतु विशेषत: बुद्ध पूर्णिमा के अवसर पर की जाने वाली यात्रा पर्यटकों के लिए अविस्मरणीय होती है।





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