




2026-10-17 16:10:35
भारत के बाहर बौद्ध धर्म को ले जाने का श्रेय यदि किसी को जाता है, तो वह हैं सम्राट अशोक। चंद्रगुप्त मौर्य के पौत्र सम्राट अशोक ही वह शख्सियत थे, जिन्होंने न केवल बौद्ध धर्म अपनाया बल्कि इसके प्रचार-प्रसार के लिए दुनिया के कई कोनों में भगवान बुद्ध को समर्पित ऐतिहासिक स्मारक स्थापित किए, स्तूप बनवाए और शिलालेख लिखवाए। उनके द्वारा स्थापित स्तूपों और शिलालेखों ने बौद्ध धर्म के इतिहास को समझने में सबसे बड़ी भूमिका निभाई।
बराबर की पहाड़ियों में गुफाओं का निर्माण: बौद्ध धर्म अपनाने के बाद भी अशोक लोक-कल्याणकारी सम्राट के रूप में शासन करते रहे। उन्होंने जन-कल्याण और साधना के लिए कई युगांतरकारी कार्य किए, जिनमें से सबसे प्रमुख है—बराबर की पहाड़ियों में शैलकृत गुफाओं का निर्माण। बिहार के जहानाबाद जिले में स्थित ये पहाड़ियाँ बौद्ध धर्म, पाषाण स्थापत्य और संघ-परंपरा के इतिहास में मील का पत्थर हैं। ईसा पूर्व तीसरी शताब्दी (मौर्य काल) में ठोस ग्रेनाइट चट्टानों को काटकर तराशी गई ये गुफाएँ भारत में रॉक-कट (शैलकृत) वास्तुकला का आदि-केंद्र हैं। बाद के युगों में विकसित हुए अजंता, एलोरा, कार्ले और कन्हेरी जैसे विश्वप्रसिद्ध बौद्ध विहारों और चैत्य गृहों की मूल संरचनात्मक प्रेरणा बराबर की इन्हीं गुफाओं से जन्मी थी।
यह क्षेत्र प्राचीन मगध की पावन भूमि पर, तथागत बुद्ध की ज्ञान-स्थली (बोधगया) से लगभग 40 मील और गया से मात्र 24 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। इन गुफाओं में आज भी सम्राट अशोक के समय के प्राकृत शिलालेख मौजूद हैं। वर्तमान में इन्हें कर्ण चौपड़, विश्व झोपड़ी, सुदामा और लोमश ऋषि के नाम से जाना जाता है।
साधना और वषार्वास का केंद्र: कलिंग युद्ध के उपरांत जब सम्राट अशोक ने बौद्ध धम्म को अंगीकार किया, तब उन्होंने भिक्षु-संघ के संरक्षण और संन्यासियों के साधना-विहार के लिए बड़े पैमाने पर संरचनाओं का निर्माण करवाया। बौद्ध संघ में वर्षा ऋतु के चार महीनों के दौरान भिक्षुओं के एक स्थान पर रहकर ध्यान और धम्म-चर्चा करने (वषार्वास) की अनिवार्य परंपरा थी। बराबर की ये अभेद्य चट्टानी गुफाएँ भिक्षुओं को प्राकृतिक आपदाओं, वन्य जीवों और बाहरी कोलाहल से दूर रहकर विपश्यना व ध्यान साधना करने हेतु आदर्श आश्रय प्रदान करती थीं।
बौद्ध स्थापत्य: बौद्ध स्थापत्य कला में दो मुख्य संरचनाएँ होती हैं—चैत्य (प्रार्थना व ध्यान कक्ष जहाँ स्तूप स्थापित होता है) और विहार (भिक्षुओं का निवास स्थान)। बुद्ध काल और प्रारंभिक मौर्य काल में बौद्ध मठ प्राय: बाँस, घास-फूस और लकड़ी से बनाए जाते थे। बराबर में मौर्य शिल्पियों ने पहली बार लकड़ी की उस वास्तुकला को अमर पाषाण में रूपांतरित किया। सुदामा और लोमश ऋषि गुफाओं का भीतरी कक्ष पूरी तरह गोलाकार और गुंबददार है। यह संरचना ठीक वैसी ही है जैसी आगे चलकर कार्ले और भाजा के बौद्ध चैत्य गृहों में स्तूप के चारों ओर प्रदक्षिणा पथ के रूप में विकसित हुई। बराबर पर्वत समूह की सबसे प्रसिद्ध गुफा लोमश ऋषि गुफा है, जिसका अग्रभाग बौद्ध कला का अमूल्य दस्तावेज है।
हाथियों की वंदना: गुफा के प्रवेश द्वार के अर्धचंद्राकार मेहराब पर हाथियों की एक जीवंत पंक्ति उकेरी गई है, जो दोनों ओर से केंद्र में स्थित पवित्र बौद्ध स्तूप की ओर श्रद्धापूर्वक बढ़ते हुए दिखाई देते हैं। बौद्ध परंपरा में हाथी को बुद्ध के जन्म (मायादेवी के स्वप्न) और धम्म के बल का प्रतीक माना गया है। स्तूप के प्रति हाथियों की यह वंदना दशार्ती है कि यह स्थल तथागत के प्रति समर्पण और ध्यान का प्रमुख केंद्र था।
चैत्य मेहराब : इस गुफा का प्रवेश द्वार घोड़े की नाल के आकार का है। यही प्रारूप आगे चलकर समूचे भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया के बौद्ध रॉक-कट मंदिरों का मानक प्रवेश द्वार बना।
कांच जैसी चमक: इसके आंतरिक कक्ष में जाने पर ऐसा प्रतीत होता है मानो आप किसी कांच के चमकदार महल में आ गए हों। मौर्य पॉलिश की यह दर्पण जैसी चमक 2300 साल बाद भी अक्षुण्ण है।
विपश्यना और ध्यान साधना के अनुकूल ध्वनि-विज्ञान
बौद्ध साधना में चित्त की एकाग्रता और आनापानसति (श्वास-प्रश्वास ध्यान) का केंद्रीय महत्व है। बराबर की गुफाओं की आंतरिक बनावट ध्यान पद्धतियों के पूर्णत: अनुकूल है। आंतरिक ग्रेनाइट सतह को इतना चिकना और चमकदार बनाया गया कि वह नमी और धूल को रोकती थी। साथ ही, बंद गोलाकार कक्षों में ध्यान के दौरान किए जाने वाले त्रिरत्न-वंदना, बुद्ध-वंदना या सुत्त पाठ की ध्वनि अद्भुत रूप से गूंजती है। यह ध्वनि-विज्ञान भिक्षुओं को गहन समाधि में प्रवेश करने में सहायता करता था।
नागाजुर्नी पहाड़ियाँ और जुड़वा गुफाएँ
बराबर पहाड़ियों से लगभग 2 किलोमीटर की दूरी पर नागाजुर्नी पहाड़ियाँ स्थित हैं, जहाँ अशोक के पौत्र दशरथ मौर्य ने तीन गुफाओं का निर्माण कराया था। इन्हें गोपी-का-कुभा, वदिथी-का-कुभा और वापिया-का-कुभा के नाम से जाना जाता है। बराबर की चार और नागाजुर्नी की तीन गुफाओं को मिलाकर स्थानीय रूप से सतघर (सात घर) भी कहा जाता है।
अशोक और दशरथ ने सर्वधर्म समभाव की नीति के तहत इन गुफाओं को आजीवक संप्रदाय के संन्यासियों को भी दान दिया था। साथ ही यहाँ जैन और बौद्ध परंपराओं के संन्यासियों के निवास के ऐतिहासिक साक्ष्य मिलते हैं, जो दशार्ते हैं कि मौर्य शासकों ने श्रमण परंपरा के सभी संप्रदायों को फलने-फूलने का अवसर दिया।
संघाराम और बौद्ध त्रिकोण
मौर्य साम्राज्य के पतन के बाद भी यह स्थल सदियों तक बौद्ध भिक्षुओं और तीर्थयात्रियों का केंद्र बना रहा। बराबर की पहाड़ियाँ बोधगया, राजगीर (गृध्रकूट पर्वत) और नालंदा के ऐतिहासिक बौद्ध त्रिकोण के मध्य स्थित हैं। पहाड़ियों की तलहटी में मिले प्राचीन ईंटों, स्तूप-अवशेषों और संरचनाओं के साक्ष्य सिद्ध करते हैं कि यहाँ केवल गुफाएँ ही नहीं, बल्कि एक सक्रिय बौद्ध संघाराम (मठ परिसर) मौजूद था।
बौद्ध विरासत में बराबर का स्थान
बराबर की गुफाएँ बौद्ध इतिहास की केवल एक पुरातात्विक धरोहर नहीं हैं, बल्कि वे बौद्ध संस्कृति की उस वैचारिक दृष्टि का प्रतीक हैं जिसने कला को सांसारिक विलासिता से हटाकर प्रज्ञा (बुद्धि), करुणा और समाधि का साधन बनाया। यदि बराबर की इन पहाड़ियों पर छेनी और हथौड़ी से कठोर ग्रेनाइट को तराशने का यह पहला सफल प्रयोग न हुआ होता, तो भारत को अजंता के भित्तिचित्रों वाले भव्य बौद्ध चैत्य और एलोरा के विशाल विहार शायद उस रूप में कभी न मिलते। बराबर की गुफाएँ समूचे बौद्ध जगत के लिए शैलकृत पाषाण-शिल्प की आदि-जननी और तथागत के धम्म-मार्ग की एक अमर विरासत हैं।





| Monday - Saturday: 10:00 - 17:00 | |
|
Bahujan Swabhiman C-7/3, Yamuna Vihar, DELHI-110053, India |
|
|
(+91) 9958128129, (+91) 9910088048, (+91) 8448136717 |
|
| bahujanswabhimannews@gmail.com |