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56 इंच की खुल गई पोल विश्वगुरु का डब्बा गोल

News

2026-11-02 17:40:11

प्रधानमंत्री बहुत परेशान हैं। परेशानी की वजह देश की कोई सामान्य समस्या नहीं है। महँगाई, बेरोजगारी, मणिपुर की सुलगती आग, डॉलर के मुकाबले हाँफता रुपया, ट्रम्प की टैरिफ वाली धमकियाँ—ये सब तो सरकार के रोजमर्रा के मामूली शगल हैं। इनसे निपटने के लिए पूरा मंत्रिमंडल है, दर्जनों सलाहकार हैं, हर शाम टीवी पर गला फाड़ने वाले प्रवक्ता हैं और सबसे बढ़कर चौबीसों घंटे भक्ति में लीन गोदी मीडिया है। परेशानी तो असल में बहुत विकट है और इन सबसे कहीं बड़ी परेशानी है—छप्पन इंच का सीना और उस पर लगी लाल-लाल आँखें! प्रधानमंत्री ने कभी चुनावी रैलियों में दहाड़ते हुए बड़े गर्व से ऐलान किया था कि देश चलाने के लिए छप्पन इंच का सीना चाहिए और वे चीन को लाल आँख दिखाकर बात करेंगे। उस समय भक्तों ने तालियाँ इतनी जोर-शोर से बजाई थीं कि लगा मानो सचमुच सीना कुतुबमीनार जितना चौड़ा हो गया है और आँखों में वेल्डिंग की टार्च जैसी लाल रोशनी भर गई है।

लेकिन अब वही जनता पूछ रही है कि भाई, वह छप्पन इंच कहाँ गुम हो गया और आँखों की वह लालिमा कहाँ चली गई? कोई संकट आए, कोई चुनौती मुँह बाए खड़ी हो, कोई पड़ोसी देश आँख तरेरे—लोग तुरंत पुराना टेप बजाना शुरू कर देते हैं। चीन ने लद्दाख में पैट्रोलिंग पॉइंट पर तंबू तान दिए, अरुणाचल की सीमा पर पक्के गाँव बसा दिए, गलवान में जवानों से झड़प हो गई, उधर भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी) के सुरक्षा आकलन और गश्त को लेकर रिपोर्टें आने लगीं—और जनता झट से पूछने लगती है कि लाल आँख कहाँ है? क्या शी जिनपिंग के साथ झूले झूलते-झूलते आँखों में मोतियाबिंद उतर आया, या फिर लाल आँख दिखाने के बजाय हमने ही आँखों पर काला चश्मा चढ़ा लिया? ऐसा लगता है कि देश की सारी समस्याओं का समाधान प्रधानमंत्री के सीने और पुतलियों में ही बंद है। विदेश नीति का ताला भी वहीं से खुलेगा, राष्ट्रीय सुरक्षा का पासवर्ड भी वहीं है और न कोई घुसा था, न कोई घुसा है का ऐतिहासिक क्लीन चिट वाला मंत्र भी वहीं से फूटेगा। जिस देश में नेता की छाती नीति से बड़ी हो जाए और आँखों का रंग कूटनीति पर भारी पड़ जाए, वहाँ संकट आते ही संसद में बहस नहीं होती, बल्कि फीता लेकर सीना और आई-ड्रॉप लेकर आँखें खोजी जाती हैं।

अब देखिए कि प्रधानमंत्री का सीना कोई रणनीतिक हथियार न हुआ, बल्कि एक सर्वसुलभ झुनझुना हो गया। विपक्ष बजाता है, सोशल मीडिया बजाता है, कार्टूनिस्ट बजाते हैं और अब तो ये मनमौजी जेन जी वाले भी अपने म्यूजिÞकल अंदाज में धुन छेड़ रहे हैं। उन्होंने तो बाकायदा रील बना डाली—छप्पन इंच का छोटा बंदर। दुनिया जानती है कि छप्पन इंच का बंदर छोटा नहीं हो सकता, पूरा पाँच फीट का लंगूर जैसा होगा। मगर जुर्रत देखिए कि उसे बचपन के मगरमच्छ पकड़ने वाले किस्सों से जोड़ रहे हैं। सड़कों-चौराहों पर गा रहे हैं, रील्स में मटक रहे हैं और प्रधानमंत्री के विश्वगुरु वाले आभामंडल को मीम में बदल रहे हैं। राजनीति में सबसे बड़ा हादसा तब होता है, जब सत्ता के गढ़े हुए ब्रांडेड जुमले खुद नेताजी के गले की फाँस बन जाते हैं। प्रधानमंत्री को समझ नहीं आ रहा कि मसला सीने का है, लाल आँख का है या गिरते नैरेटिव का। कभी-कभी उनका मन करता है कि सीधे लालकिले की प्राचीर पर जाएँ और हनुमान जी की तरह सीना चीरकर दिखा दें कि देखो, यह है छप्पन इंच! मगर फिर रुक जाते हैं, घबरा जाते हैं कि अगर किसी सिरफिरे यूट्यूबर ने जेब से इंची टेप निकाल लिया, तो क्या होगा? सीना दिखाने और नपवाने में बहुत बड़ा फर्क होता है। दिखाने में 4के ड्रोन कैमरा, स्लो-मोशन वॉक और सरकारी कैमरामैन काम आता है; नपवाने में बेरहम इंची टेप! कैमरा सरकारी हो तो 32 इंच को भी 56 इंच का बाहुबली दिखा जा सकता है, लेकिन इंची टेप किसी गोदी एंकर की तरह नहीं होता। वह न तो राष्ट्रहित की चापलूसी समझता है, न चुनावी मजबूरी; उसे सिर्फ सच नापना आता है। आखिरकार इस संकट से निपटने के लिए प्रधानमंत्री ने गृहमंत्री और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (एनएसए) को आपातकालीन बैठक के लिए तलब किया। प्रधानमंत्री ने माथे की शिकन गहरी करते हुए कहा, अब पानी सिर से ऊपर जा रहा है। इस छप्पन इंच और लाल आँख वाले तानों को बंद कराओ। सोचो, कैसे निपटा जाए?

गृहमंत्री ने हमेशा की तरह अपनी मूँछों पर ताव दिया। वे हर मर्ज़ की दवा पुलिस की लाठी और कानून की धाराओं में ढूँढते हैं। उन्होंने तुरंत प्रस्ताव रखा, प्रधानमंत्री जी, सबसे सीधा रास्ता है—छप्पन इंच और लाल आँख दोनों शब्दों को गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम (यूएपीए) के तहत प्रतिबंधित कर देते हैं। जो भी सोशल मीडिया पर यह पूछेगा कि चीन को लाल आँख कब दिखाओगे?, उसे सीधे तिहाड़ भेजेंगे। वहाँ पुलिस बाकी का नाप-जोख अपने आप ले लेगी।

प्रधानमंत्री ने पूछा, लेकिन अगर लोग फिर भी मीम्स बनाते रहे? गृहमंत्री बोले, तो जुबान पर ही पाबंदी लगा देंगे। जब आवाज नहीं होगी, तो न छप्पन इंच बचेगा और न आँख का सवाल! प्रधानमंत्री ने सिर पकड़ लिया। वे जानते थे कि ऐसा करने पर संयुक्त राष्ट्र और विदेशी मानवाधिकार वाले छाती पीटने लगेंगे, वाशिंगटन पोस्ट और न्यूयॉर्क टाइम्स में पहले पन्ने पर संपादकीय छप जाएँगे और वैश्विक मंच पर जो विश्वगुरु की छवि गढ़ी है, उस पर बट्टा लग जाएगा। तभी सुरक्षा सलाहकार ने अपनी चतुर भृकुटि तानते हुए रहस्यमयी मुस्कान बिखेरी। वे हर सवाल के पीछे कोई गहरी अंतरराष्ट्रीय साजिश और विदेशी फंडिंग ढूँढने में माहिर हैं। उन्होंने गंभीर स्वर में कहा, प्रधानमंत्री जी, यह सवाल उठाने वाले आम नागरिक नहीं हैं। यह सब अंतरराष्ट्रीय टूलकिट का हिस्सा है। ये जो लोग पूछ रहे हैं कि अरुणाचल में चीन गाँव कैसे बना रहा है या बफर जोन में पेट्रोलिंग क्यों बंद हो गई, इनके पीछे जॉर्ज सोरोस और विदेशी ताकतों का हाथ है। हम इन सभी आंदोलनजीवियों, पत्रकारों और रील्स बनाने वाली जेन जी के पीछे ईडी, सीबीआई और आईटी लगा देते हैं।

हम यह भी जाँच करेंगे कि गाना सुनकर कौन-कौन हँसा था। हँसी भी एक गैर-कानूनी प्रतिक्रिया है, बिना सरकारी मंजूरी के हँसना अनुशासनहीनता है!

गृहमंत्री ने तुनककर बीच में टोका, अरे भाई, किस-किस के पीछे जासूस छोड़ोगे? यहाँ तो पूरा इंटरनेट ही हँस रहा है। अगर सबको जेल में डालेंगे तो देश में बैरक कम पड़ जाएँगी। सारा समय बस सीना और आँख बचाने के मुकदमों में ही बीत जाएगा! माहौल में तनाव बढ़ ही रहा था कि तभी स्वास्थ्य मंत्री ने कमरे में प्रवेश किया। प्रधानमंत्री ने सोचा, चलो अब मेडिकल साइंस की राय भी ले ही लेते हैं। स्वास्थ्य मंत्री ने तीन बार सिर खुजाया और फिर मुस्कुराते हुए एक नायाब नुस्खा पेश किया, साहब, आप व्यर्थ ही परेशान हो रहे हैं। देश यही चाहता है न कि सीना 56 इंच दिखे और आँखें लाल दिखें? इसका सीधा-सा क्लिनिकल समाधान है। हम एम्स के डॉक्टरों का एक बोर्ड बना देते हैं, जो आधिकारिक बुलेटिन जारी कर देगा कि माननीय का सीना ठीक छप्पन इंच का है और आँखें पूर्णत: 100% लाल हैं! प्रधानमंत्री ने झिझकते हुए पूछा, लेकिन अगर डॉक्टर ने सच बोल दिया तो? स्वास्थ्य मंत्री ने कान में फुसफुसाते हुए कहा, अरे साहब, जब चुनाव आयोग, नीति आयोग और सांख्यिकी विभाग अपने हिसाब से जीडीपी और नतीजों का ग्राफ तय कर सकते हैं, तो डॉक्टर क्या चीज हैं? वे लिख देंगे कि यह छप्पन इंच कोई भौतिक माप नहीं, बल्कि यह आत्मिक और पराभौतिक आत्मविश्वास का माप है! और जहाँ तक आँखों का सवाल है, तो कह देंगे कि चीन को देखते ही आँखें इतनी लाल हो जाती हैं कि उस इंफ्रारेड लाइट को सिर्फ भक्त ही देख सकते हैं, आम जनता को वह साधारण दिखती है!

गृहमंत्री ने तुरंत मेज थपथपाई, और हमारा गोदी मीडिया किस दिन काम आएगा? हर शाम प्राइम टाइम पर ग्राफिक्स चलेंगे। एंकर दहाड़ेंगे—देखिए साहेब की लाल आँख से कैसे थर-थर कांपा ड्रैगन! जो सवाल पूछेगा, उसे देशद्रोही और चीनी एजेंट घोषित कर दिया जाएगा। प्रधानमंत्री को लगा कि अब संकट टल गया है। सच वह नहीं होता जो सीमा पर जमीन पर दिखता है; सच वह होता है जो सरकारी आदेश और गोदी मीडिया के स्क्रीन पर मुहरबंद होकर बिकता है। देश चलाने के लिए जमीनी कूटनीति या दिमाग की गहराई की क्या जरूरत? बस सीने का एक जाली सर्टिफिकेट, आँख की काल्पनिक लालिमा, मीडिया का कर्कश प्रोपेगैंडा और एजेंसियों का हल्का सा डर काफी है! प्रधानमंत्री ने राहत की सांस ली ही थी और मन ही मन छप्पन इंच, मजबूत भारत अभियान का ब्लू-प्रिंट तैयार कर रहे थे कि तभी बाहर से शोर सुनाई दिया। सुरक्षा गार्ड ने आकर कांपते हाथों से टैबलेट थमाया। जेन जी ने एक नया वीडियो इंटरनेट पर धकेल दिया था, जो पहले ही मिलियन व्यूज पार कर चुका था। बैकग्राउंड में ढोलक की थाप पर गाना बज रहा था:

लाल आँख पर चश्मा काला,

चीन बना गया सीमा पे ढाबा और साहेब का भाषण निराला...

56 इंच की खुल गई पोल, साहेब का हो गया डब्बा गोल!

प्रधानमंत्री ने बेबसी से सुरक्षा सलाहकार और गृहमंत्री की तरफ देखा। बैठक बिना किसी नतीजे के समाप्त हो गई थी, क्योंकि हुकूमत के पास इंची टेप का कोई तोड़ नहीं था!

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02 अक्टूबर (1869) : महात्मा गांधी जयंती

02 अक्टूबर (1904) : लाल बहादुर शास्त्री जयंती

02 अक्टूबर (1911) : मासूरिया दीन पासी जयंती

03 अक्टूबर (1957) : रिपब्लिकन पार्टी आॅफ इंडिया (आरपीआई) का विधिवत गठन (नागपुर प्रेसीडियम)

05 अक्टूबर (1968) : महाप्राण जोगेन्द्रनाथ मंडल स्मृति दिवस

06 अक्टूबर (1940) : डॉ. एस. पी. सुमनाक्षर जयंती

07 अक्टूबर (1951) : शिड्यूल्ड कास्ट्स फेडरेशन द्वारा प्रथम आम चुनाव हेतु घोषणा-पत्र जारी

09 अक्टूबर (1900) : फातिमा शेख स्मृति दिवस

09 अक्टूबर (2006) : मान्यवर कांशीराम जी का परिनिर्वाण दिवस

09 अक्टूबर (1924) : इमैनुअल सेकरन जयंती

13 अक्टूबर (1935) : नासिक के येवला सम्मेलन में डॉ. अम्बेडकर ने हिन्दू धर्म त्यागने की घोषणा की

14 अक्टूबर (1956) : ऐतिहासिक धम्मदीक्षा दिवस: नागपुर दीक्षाभूमि में बाबा साहब द्वारा लाखों अनुयायियों संग बौद्ध धम्म ग्रहण किया गया।

15 अक्टूबर (1902) : कर्मवीर दादासाहेब भाऊराव कृष्णराव (बी. के.) गायकवाड़ जयंती

15 अक्टूबर (1931) : डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम जयंती

16 अक्टूबर (1956) : चंद्रपुर (महाराष्ट्र) में बाबा साहब डॉ. अम्बेडकर ने अपने अनुयायियों को दी धम्मदीक्षा

19 अक्टूबर (1882) : महात्मा ज्योतिबा फुले द्वारा दलित वर्गों में निरक्षरता के बारे में हंटर कमिशन को दिया ज्ञापन

20 अक्टूबर (2026) : अशोक विजय दशमी

22 अक्टूबर (1947) : जनकवि अदम गोंडवी (रामनाथ सिंह) जयंती

25 अक्टूबर (1800) : लॉर्ड थॉमस बैबिंगटन मैकॉले जन्मदिवस

27 अक्टूबर (1920) : भारत के प्रथम दलित राष्ट्रपति के. आर. नारायणन जयंती

29 अक्टूबर (1912) : इंकलाबी कवि गुरदास आलम जन्म दिवस

31 अक्टूबर (2004) : त्यागमूर्ति आर.एल. चंदापुरी समृति दिवस

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