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‘मंदिर निर्माण’ की संस्कृति को बढ़ावा दे रही मोदी,संघी सरकार

प्रकाश चंद
News

2026-01-31 15:13:30

देश की वर्तमान संघी सरकार मंदिर संस्कृति को खुलेआम प्रचार करके बढ़ावा दे रही है, जिसके बहुत सारे उदाहरण है। केंद्र सरकार में मोदी ने अपने 11 साल के शासन में और उससे पूर्व गुजरात का मुख्यमंत्री रहते हुए 12 साल के कार्यकाल में मंदिरों के निर्माण और हिन्दू-मुस्लिम के बीच नफरत की खाई को चौड़ा करने के लिए पूरा समर्थन दिया। उसके प्रचार-प्रसार के लिए बड़ी संख्या में अंधभक्तों और व्यापारी मित्रों को निर्मित किया। जिसके द्वारा मोदी और उसके संघी साथियों ने देश की धर्मनिरपेक्ष छवि और संवैधानिक व्यवस्था को नष्ट करने का अक्षम्य अपराध किया है।

प्रधानमंत्री मोदी ने 11 जनवरी, 2026 को सोमनाथ में स्वाभिमान पर्व का उद्घाटन करते हुए घोषणा की कि प्रभास पाटन की मिट्टी का हर कण शौर्य, साहस और वीरता का साक्षी है, और अनगिनत शिव भक्तों ने सोमनाथ के स्वरूप को संरक्षित करने के लिए अपने प्राणों का बलिदान दिया। उन्होंने कहा कि सोमनाथ स्वाभिमान पर्व के अवसर पर, वे उन सभी वीर पुरुषों और महिलाओं को सर्वप्रथम नमन करते हैं जिन्होंने सोमनाथ की रक्षा और पुनर्निर्माण के लिए अपने प्राणों की आहुति दी और भगवान महादेव को अपना सब कुछ अर्पित किया।

पीएम मोदी ने आगे कहा, जब गजनी से लेकर औरंगजेब तक के आक्रमणकारियों ने सोमनाथ पर हमला किया, तो उन्हें लगा कि उनकी तलवारें शाश्वत सोमनाथ पर विजय प्राप्त कर रही हैं, लेकिन वे कट्टरपंथी यह समझने में विफल रहे कि ‘सोम’ नाम में ही अमृत का सार निहित है, विष ग्रहण करने के बाद भी अमर रहने का विचार। उन्होंने आगे कहा कि सोमनाथ में सदाशिव महादेव की चेतन शक्ति निवास करती है, जो दयालु और उग्र प्रचंड तांडव शिव दोनों हैं। उनके भाषण का मतलब बहुत साफ था की सोमनाथ मंदिर के सब रक्षक ‘हिन्दू’ थे और विध्वंसक ‘मुसलमान’।

आरएसएस-भाजपा सरकार के वरिष्ठतम सुरक्षा सलाहकार और प्रधानमंत्री मोदी के बेहद करीबी अजीत डोभाल ने मुस्लिम शासकों के धार्मिक अपराधों का बदला लेने के लिए अपने जोशीले अंदाज में 9 जनवरी, 2026 को दिल्ली में आयोजित ‘विकसित भारत युवा नेता संवाद’ के उद्घाटन समारोह में बोलते हुए कहा, यह स्वतंत्र भारत हमेशा इतना स्वतंत्र नहीं था, जितना अब दिखता है। हमारे पूर्वजों ने इसके लिए महान बलिदान दिए। उन्होंने घोर अपमान सहा, और घोर असहायता के दौर का सामना किया। कई लोगों को फांसी की सजा दी गई (झूठ) हमारे गांवों को जलाया गया। हमारी सभ्यता को नष्ट कर दिया गया। हमारे मंदिरों को लूटा गया और हम मूक दर्शक बनकर बेबस देखते रहे। यह इतिहास हमें एक चुनौती देता है कि आज भारत के हर युवा के भीतर बदला लेने की आग होनी चाहिए। बदला शब्द आदर्श नहीं है, लेकिन बदला अपने आप में एक शक्तिशाली शक्ति है। हमें अपने इतिहास का बदला लेना होगा। हमें इस देश को उस मुकाम पर वापस लाना होगा जहां हम अपने अधिकारों, विचारों और अपनी मान्यताओं के आधार पर एक महान भारत का निर्माण कर सकें।

महामहिम संवैधानिक धर्मनिपेक्षता को पहुंचा रहीं चोट: वर्तमान सरकार और कार्यपालिका की मुखिया महामहिम श्रीमति द्रौपदी मुर्मू जी भी हिन्दू मंदिरों के दर्शन करके संवैधानिक धर्मनिपेक्षता को चोट पहुंचा रही है। हाल ही के वर्षों में देश की महामहिम ने कई हिन्दू मंदिरों के दर्शन किए जो अखबार की सुर्खियों में भी रहा। इससे पूर्व के महामहिम रामनाथ कोविद ने भी हिन्दू मंदिरों में जाकर वहाँ पर पूजा अर्चना करने का आग्रह किया था। लेकिन वहाँ पर बैठे मनुवादी ब्राह्मणी संस्कृति के पंडे-पुजारियों ने उन्हें लाइन में बैठाकर अपमानित किया था। लेकिन हमारे देश के इन महामहिमों ने अपने अपमान से न कोई सबक लिया और न ही संवैधानिक प्रावधानों का पालन किया। देश का राष्ट्रपति, देश का मुखिया होता है और वह देश के संविधान की शपथ लेकर ही महामहिम की कुर्सी पर विराजमान होता है। संविधान में दिये गए धर्मनिरपेक्षता के प्रावधानों का पालन करना और अपनी सरकार द्वारा उसका पालन कराना परम कर्तव्य होना चाहिए। परंतु ये दोनों महामहिम ऐसा करने में विफल रहे हैं जिसके कारण संवैधानिक प्रावधानों और व्यवस्था को स्पष्ट चोट पहुँची है। वर्तमान समय की विडम्बना यह है की ये दोनों की महामहिम अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति से संबन्धित है। ब्राह्मणवादी संघियों की कार्यशैली का एक षड्यंत्रकारी तरीका अतीत से यह ही रहा है कि सरकार में बैठकर जो भी असंवैधानिक, अपमानजनक काम कराने हैं वे सभी कार्य एससी/एसटी समुदायों के पद लोलुप, लालची व कमजोर मानसिकता के लोगों को छाँटकर इन्हीं समुदायों के व्यक्तियों से कराना है। चूंकि अगर समाज के बुद्धि जीवी व जागरूक लोगों द्वारा ऐसे कार्यों की आलोचना और भर्त्सना हो तो वह भी इन्हीं के समाज के लोगों की हो, और उसकी कोई भी परछाई मनुवादी-ब्राह्मणवादियों के ऊपर न पड़ पाये।

पाखंड और अंधविश्वास को बढ़ा रहे मोदी और अंधभक्त: देश में पाखंड और काल्पनिक देवी-देवताओं और भगवानों को जान-बूझकर जनता में परोसा जा रहा है और उन्हें पाखंडी व्यवस्था का अंधभक्त बनाया जा रहा है। ऐसा करने के पीछे मोदी व संघी लोगों की मानसिकता यह है कि मोदी व संघी सरकारों की विफलता से जुडेÞ सवालों को जनता उनके सामने न उठा पाए, वे सिर्फ उनके वोट बैंक बनकर ही रहे। साथ ही देश की गरीब महिलाओं को चुनाव के वक्त मुफ्त की रेवड़ियाँ, और 500 से लेकर 10 हजार तक पैसे देकर उनकी वोटों को खरीदा जा रहा है। चुनाव आयोग जो एक संवैधानिक स्वतंत्र संस्था है, मोदी सरकार ने उसे पंगु बनाकर मानसिक गुलाम बना लिया है। ताकि चुनाव आयोग मोदी सरकार की कार्यशैली, बेईमानी और निष्पक्षता पर सवाल न उठाए। इसी के माध्यम से पिछले 10 वर्षों से इस देश में चुनाव जीते जा रहे हैं और विरोधियों को हराया जा रहा है। देश का चुनाव तंत्र और प्रशासनिक तंत्र पूरी तरह से मनुवादी संस्कृति में बदल चुका है। देश का कोई भी नागरिक अपनी वोट देने के पश्चात पूरी तरह से आश्वस्त नहीं होता है कि जिसे मैंने वोट दिया है वह उसके खाते में गया है या नहीं। ईवीएम मशीनों के द्वारा वोटिंग कराने पर मोदी संघी सरकार आमादा है। ईवीएम के खिलाफ कोई भी साक्ष्य व तर्क सुनने को तैयार नहीं है। विपक्ष ईवीएम मशीनों द्वारा चुनाव कराने पर गड़बड़ी के गंभीर आरोप लगा रहा है। देश की विभिन्न राजनैतिक पार्टियां कह रही है कि जब ईवीएम से चुनाव कराना विदेश के सभी तकनीकी रूप से उन्नत देशों ने छोड़कर बैलेट पेपर को अपना लिया है तो फिर भारत का चुनाव आयोग उसे मानने के लिए तैयार क्यों नहीं है? यह संदिग्घ स्थिति यह दर्शाती है कि चुनाव आयोग मोदी संघी सरकार के साथ मिलकर चुनाव में पूरी धांधली कराने में सक्षम हो रहा है। साथ ही देश की जनता को लग रहा है कि चुनाव निष्पक्ष और पारदर्शी नहीं हो रहे हैं और निकट भविष्य में मोदी सरकार के रहते उसके आसार भी नजर नहीं आ रहे हैं। चुनाव आयोग की ऐसी कार्यशैली से जनता का भरोसा घट रहा है।

समाज से आग्रह है कि अपनी वोट का सही इस्तेमाल करें, उसे चंद पैसों में न बेचें और अपनी वोट की कीमत को पहचाने तथा अपनी वोट को बर्बाद न जाने दे, देश के मतदाताओं जागो और अपनी आने वाली पीढ़ी के भविष्य के लिए जागरूक व सतर्क बनो।

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01 जनवरी : मूलनिवासी शौर्य दिवस (भीमा कोरेगांव-पुणे) (1818)

01 जनवरी : राष्ट्रपिता ज्योतिबा फुले और राष्ट्रमाता सावित्री बाई फुले द्वारा प्रथम भारतीय पाठशाला प्रारंभ (1848)

01 जनवरी : बाबा साहेब अम्बेडकर द्वारा ‘द अनटचैबिल्स’ नामक पुस्तक का प्रकाशन (1948)

01 जनवरी : मण्डल आयोग का गठन (1979)

02 जनवरी : गुरु कबीर स्मृति दिवस (1476)

03 जनवरी : राष्ट्रमाता सावित्रीबाई फुले जयंती दिवस (1831)

06 जनवरी : बाबू हरदास एल. एन. जयंती (1904)

08 जनवरी : विश्व बौद्ध ध्वज दिवस (1891)

09 जनवरी : प्रथम मुस्लिम महिला शिक्षिका फातिमा शेख जन्म दिवस (1831)

12 जनवरी : राजमाता जिजाऊ जयंती दिवस (1598)

12 जनवरी : बाबू हरदास एल. एन. स्मृति दिवस (1939)

12 जनवरी : उस्मानिया यूनिवर्सिटी, हैदराबाद ने बाबा साहेब को डी.लिट. की उपाधि प्रदान की (1953)

12 जनवरी : चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु परिनिर्वाण दिवस (1972)

13 जनवरी : तिलका मांझी शाहदत दिवस (1785)

14 जनवरी : सर मंगूराम मंगोलिया जन्म दिवस (1886)

15 जनवरी : बहन कुमारी मायावती जयंती दिवस (1956)

18 जनवरी : अब्दुल कय्यूम अंसारी स्मृति दिवस (1973)

18 जनवरी : बाबासाहेब द्वारा राणाडे, गांधी व जिन्ना पर प्रवचन (1943)

23 जनवरी : अहमदाबाद में डॉ. अम्बेडकर ने शांतिपूर्ण मार्च निकालकर सभा को संबोधित किया (1938)

24 जनवरी : राजर्षि छत्रपति साहूजी महाराज द्वारा प्राथमिक शिक्षा को मुफ्त व अनिवार्य करने का आदेश (1917)

24 जनवरी : कर्पूरी ठाकुर जयंती दिवस (1924)

26 जनवरी : गणतंत्र दिवस (1950)

27 जनवरी : डॉ. अम्बेडकर का साउथ बरो कमीशन के सामने साक्षात्कार (1919)

29 जनवरी : महाप्राण जोगेन्द्रनाथ मण्डल जयंती दिवस (1904)

30 जनवरी : सत्यनारायण गोयनका का जन्मदिवस (1924)

31 जनवरी : डॉ. अम्बेडकर द्वारा आंदोलन के मुखपत्र ‘‘मूकनायक’’ का प्रारम्भ (1920)

2024-01-13 16:38:05