




2026-03-21 17:06:59
नई दिल्ली। वर्तमान समय में ईरान, इजराइल और अमेरिका युद्ध चल रहा है। दोनों तरफ से भारी जान-माल का नुकसान हो रहा है। यह सब जानते हैं कि मध्य एशिया के अधिकतर देश तेल और गैस उत्पादन में उत्कृष्ट है, उनके पास तेल और गैस ही मूल्यवान संपत्ति है जो वहाँ से दुनिया के अन्य देशों में निर्यात होती है। युद्ध की शुरूआत ईरान ने नहीं की थी, युद्ध की शुरूआत इजराइल ने अमेरिका के कहने पर की थी। कह सकते है कि ईरान पर यह युद्ध इजराइल और अमेरिका द्वारा थोंपा गया, जिसके कारण विश्वभर में तेल और गैस को लेकर अफरातफरी मच गई है। इस युद्ध में ईरान के सर्वोच्च धर्म गुरु अयातुल्ला अली खामेनेई, इजराइल ने खुफिया एजेंसियों के माध्यम से सटीक जानकारी लेकर मिसाइल के माध्यम से हत्या करा दी, जो इजराइल द्वारा किया गया एक गंभीर अपराध है। ईरान, इजराइल के साथ युद्ध नहीं कर रहा था मगर अमेरिका ने इजराइल को इस्तेमाल करके ईरान पर इस युद्ध को थोंप दिया। जिसका जवाब ईरान भी बहुत ही सटीक और सुलझे हुए तरीके से दे रहा है। मध्य एशिया के जिन-जिन देशों में अमेरिका के एयर स्पैस बने हुए हैं वहाँ-वहाँ पर ईरान ने अपने ड्रोन हमलों के माध्यम से उन पर सटीक निशाना लगाकर ध्वस्त कर दिया। जिसके कारण अब इन देशों में जाना और वहाँ से लौटकर आना अन्य देशों की जनता के लिए कठिन हो रहा है। इस भयावह स्थिति को देखकर अब अमेरिका अपने कदम पीछे खीचता हुआ नजर आ रहा है चूंकि इस युद्ध में नाटो के देश भी अमेरिका का साथ देने से इनकार कर चुके हैं। अमेरिका के सभी नाटो के सदस्य (दोस्त) अमेरिका को साफ-साफ कह चुके हैं कि हम इजराइल और अमेरिका का युद्ध क्यों लड़े, यह हमारा युद्ध नहीं है।
भारत की स्थिति: भारत की स्थिति इस समय साँप के मुंह में छुछंदर जैसी है, चूंकि मोदी और ट्रम्प का मानसिक और कार्मिक चरित्र एक जैसा ही है। दोनों खूब बढ़-चढ़कर झूठ बोलते हैं, दोनों में बड़-बोलापन है, दोनों में ही व्यवहारिक ज्ञान की कमी है, दोनों ही अपने दूसरे देशों के समकक्षों के साथ मिलकर अपने आपको जनता को यह दिखाते हैं कि मैं ही श्रेष्ठ हूँ। भारत में मोदी की स्थिति और भी खराब है, चूंकि मोदी जी अपनी कमियों के कारण आज वैश्विक स्तर पर अलग-थलग पड़े हुए हैं। मोदी सरकार के विदेश मंत्री और मोदी में खुद भारत की स्थापित विदेश नीति को पारंपरिक नीति से विस्थापित कर चुके हैं। यह सब मोदी ने ट्रम्प के कहने के अनुसार किया है। इजराइल ने ईरान पर जिस दिन हमला किया उस दिन मोदी इजराल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू से मिलकर लौट रहे थे तभी इजराइल ने ईरान पर हमला किया जिसका अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर संदेश भारत की विदेश नीति के विरुद्ध गया। युद्ध की स्थिति में ईरान व अन्य देशों से भारत को आने वाला तेल और गैस की आपूर्ति पूरी तरह से प्रभावित हुई। भारत में तेल और गैस के उपभोगताओं की लंबी-लंबी कतारे लगनें लगी और गैस सिलेन्डर मोदी के व्यापारी मित्रों ने जनता को उपलब्ध कराना शुरू कर दिया। एक गैस सिलेन्डर की कीमत 4000 रुपये से लेकर 6000 रुपये तक बाजार में मिलने लगी। लेकिन मोदी सरकार और उसके अंधभक्तों ने कहना शुरू कर दिया कि मोदी जी ने ईरान के मंत्रियों से बात की हैं और तेल व गैस निर्यात यथावत बना रहेगा। मोदी के अंधभक्तों ने देशभर में प्रचार शुरू कर दिया कि यह मोदी जी का मास्टर स्ट्रोक है। भारत की साधारण जनता को और मोदी के अंधभक्तों को इस संदर्भ में ईरान के प्रमुख का बयान अच्छी तरह से पढ़ लेना चाहिए कि उन्होंने तेल और गैस के निर्यात पर भारत के संदर्भ में क्या कहा है? ईरान के नेता के बयान का भावार्थ यह है कि, ‘भारत को तेल और गैस सप्लाई हम भारत की जनता को ध्यान में रखकर खोल रहे हैं, किसी सरकार के दवाब में नहीं चूंकि हम जानते हैं कि भारत और ईरान के संबंध ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और सौहार्दपूर्ण रहे हैं। हम दोनों एक दूसरे के मददगार भी रहे हैं। अब ईरान भारत को तेल और गैस निर्यात अमेरिकी डॉलर में नहीं करेगा, ईरान अब तेल और गैस की सप्लाई चाइनीज करेंसी (युआन) में करेगा।’
मोदी जी के अंधभक्तों ईरान के नेता के बयान के आधार पर देश की भोली-भाली जनता को सत्य से अवगत कराओ। अंधभक्तों और व्यापारी मित्रों के हितों की रक्षा के चक्कर में मोदी जी आज चौहराहे पर हैं। देखकर उन्हें ऐसा लगता होगा की अब किधर जाये? अंधभक्तों अब मोदी जी को उनका रखा हुआ झोला लाकर उनके हाथ में थमा दो; और उन्हें संघ का प्रचारक बनकर काम करने दो। उनमें अब देश संचालन की क्षमता नहीं बची है। भारत सभी जातियों, संप्रदायों व यहाँ पर बसने वाले मतावलंबियों का है, किसी एक का नहीं।
कमजोर पड़ा अमेरिका: ईरान पर अमेरिका-इसराइल द्वारा थोपे गए युद्ध के जल्द खत्म होने की संभावना कम दिखाई दे रही है। अमेरिकी मीडिया के मुताबिक अमेरिकी रक्षा विभाग पेंटागन ने व्हाइट हाउस से करीब 200 अरब डॉलर की अतिरिक्त फंडिंग की मांग की है। क्योंकि अमेरिका मिडिल ईस्ट में और सैनिक तैनात करने की तैयारी कर रहा है। इस युद्ध पर पहले ही अरबों डॉलर खर्च किए जा चुके हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार संघर्ष के पहले 100 घंटों में ही 3.7 अरब डॉलर खर्च हो गए, जबकि एक सप्ताह के भीतर 11 अरब डॉलर से अधिक यूएस टैक्सपेयर्स का पैसा युद्ध में झोंक दिया गया।





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