




2026-08-08 14:00:21
भैड़ापुर। भारतीय समाज में सदियों से यह रूढ़िवादी धारणा गहराई से जड़ जमाए हुए थी कि किसी भी नए काम, व्यापार, भवन निर्माण या मशीन के उद्घाटन का धार्मिक एकाधिकार केवल ब्राह्मणों, पंडे-पुजारियों और तथाकथित उच्च जातियों के पास ही है। सदियों से चली आ रही इस सामाजिक व मानसिक गुलामी की व्यवस्था ने शोषित वर्ग के मन में यह बैठा दिया था कि उनका काम केवल मजदूरी करना है और कोई भी शुभ काम बिना ब्राह्मणवादी अनुष्ठान और पंडे-पुजारियों के हस्तक्षेप के सिद्ध नहीं हो सकता। लेकिन उत्तर प्रदेश के ग्राम भैड़ापुर में एक ऐसी ऐतिहासिक और साहसिक घटना घटी है, जिसने इस सदियों पुरानी व्यवस्था की बुनियाद को हिलाकर रख दिया है।
ग्राम भैड़ापुर में स्थापित की गई एक नई लघु उद्योग मशीनिंग यूनिट के उद्घाटन के अवसर पर किसी भी ब्राह्मण पंडित, पूजा-पाठ या धार्मिक कर्मकांड को पूरी तरह दरकिनार कर दिया गया। इसके विपरीत, गाँव के ही सबसे शोषित और उपेक्षित समझे जाने वाले वाल्मीकि (भंगी) समाज के एक वरिष्ठ और हुनरमंद बुजुर्ग श्रमजीवी के हाथों इस उद्योग का विधिवत उद्घाटन कराया गया। इस अनूठी पहल ने न केवल सदियों पुरानी वर्ण व्यवस्था और पंडे-पुजारियों के एकाधिकार का अंत किया, बल्कि समाज को यह स्पष्ट संदेश दिया कि सच्चा शुभ और पवित्र कार्य किसी जाति विशेष के अनुष्ठान से नहीं, बल्कि मजदूर के पसीने और उसके हुनर से होता है।
ब्राह्मणवादी वर्चस्व को सीधी चुनौती और पाखंड का अंत
आमतौर पर जब भी कोई नया व्यवसाय या कारखाना शुरू होता है, तो लाखों रुपये नारियल, हवन, पंडितों की दक्षिणा और कर्मकांडों में फूंक दिए जाते हैं। यह भ्रम फैलाया गया है कि जब तक कोई ब्राह्मण मंत्रोच्चार नहीं करेगा, तब तक काम सफल नहीं होगा। भैड़ापुर की इस पहल ने इस पाखंडी परंपरा को पूरी तरह खारिज कर दिया।
समारोह में उपस्थित बहुजन स्वाभिमान संघ के अध्यक्ष, प्रकाश चंद ने बेबाक शब्दों में कहा कि तथाकथित उच्च जातियों और पंडे-पुजारियों ने सदियों से धर्म और जाति के नाम पर बहुजन समाज को मानसिक रूप से गुलाम बनाए रखा। उन्होंने समाज को यह सोचने पर मजबूर कर दिया था कि वे स्वयं अछूत या अयोग्य हैं।
लेकिन आज भैड़ापुर में इस मिथक को पूरी तरह ध्वस्त कर दिया गया है। जब एक वाल्मीकि बुजुर्ग ने मशीन की शुरूआत की, तो वह पल सदियों के सामाजिक शोषण के खिलाफ एक मौन क्रांति बन गया। यह इस बात का सीधा ऐलान था कि अब शोषित समाज अपने स्वाभिमान के लिए जागेगा और किसी भी तरह के ब्राह्मणवादी कर्मकांड का मोहताज नहीं रहेगा।
वाल्मीकि समाज के बुजुर्ग को मिला ऐतिहासिक सम्मान
जिस समाज को सदियों से जातिवादी व्यवस्था ने समाज के सबसे निचले पायदान पर धकेला और जिनके हुनर की हमेशा अनदेखी की गई, उसी वाल्मीकि समाज के बुजुर्ग कारीगर को इस कार्यक्रम में मुख्य अतिथि का दर्जा दिया गया। उन्होंने स्वयं अपने हाथों से मशीन क बटन दबाकर उद्योग की शुरूआत की। कार्यक्रम के दौरान आयोजकों ने बुजुर्ग वाल्मीकि के लंबे संघर्ष और गाँव के विकास में उनके योगदान को नमन किया। उन्हें केवल एक मजदूर नहीं, बल्कि समाज का असली निर्माता स्वीकार किया गया। इस अवसर पर आयोजकों ने घोषणा की कि अब से इन्हें केवल राजीव या जातिसूचक उपेक्षा के साथ नहीं, बल्कि पूरे सम्मान के साथ ‘राजीव कुमार शर्मा’ कहकर पुकारा जाएगा। यह नामकरण जातिवादी व्यवस्था के उस दंभ पर एक कड़ा तंज और समानता का प्रतीक था, जो केवल खास जातियों को ही आदरणीय मानती है। प्रकाश चंद जी ने जोर देकर कहा कि किसी भी व्यक्ति का सम्मान उसकी जन्म आधारित जाति से नहीं, बल्कि उसके कर्म, हुनर और उसकी इंसानियत से तय होना चाहिए।
अप्प दीपो भव: बुद्ध के विचारों से अंधविश्वास पर प्रहार
उद्घाटन समारोह केवल फीता काटने या मशीन चालू करने तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह एक सशक्त वैचारिक पाठशाला में बदल गया। मंच से तथाकथित धार्मिक ग्रंथों, कांवड़ यात्रा, मंदिरों में दान-दक्षिणा देने और अंधविश्वास में भटकने की परंपरा पर कड़ा प्रहार किया गया। तथागत बुद्ध के अमर संदेश ‘अप्प दीपो भव’ (अपना दीपक स्वयं बनो) का आह्वान करते हुए वहां पर मौजूद लोगों को समझाया गया कि आप चमत्कार, मंदिरों और काल्पनिक भगवानों के पीछे भागना बंद करें।
प्रकाश चंद जी ने कहा कि भगवान, देवी-देवता या चमत्कार कहीं नहीं हैं। यदि ईश्वर होता, तो इस धरती पर गरीबों और शोषितों पर सदियों तक अत्याचार नहीं होता। इंसान का अपना दिमाग, उसकी बुद्धि और उसकी मेहनत ही उसका सबसे बड़ा देवता है। कांवड़ लेने जाने या मंदिरों में पैसे बर्बाद करने से किसी गरीब का भला नहीं हुआ है। अगर अपने जीवन को बदलना है, तो अपनी बुद्धि का इस्तेमाल करें, वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपनाएं और अपने बच्चों को शिक्षित बनाएं। शिक्षा ही वह एकमात्र औजार है जो जातिवाद और गरीबी की जंजीरों को काट सकती है।
नशामुक्ति, स्वाभिमान और आर्थिक आत्मनिर्भरता का संदेश
सामाजिक परिवर्तन के साथ-साथ इस पहल का एक प्रमुख उद्देश्य ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करना और नशामुक्ति फैलाना भी है। गाँव में ही रोजगार मिलने से युवाओं को रोजगार की तलाश में बाहर भटकना नहीं पड़ेगा।
नशे से मुक्ति: ग्रामीणों से पुरजोर अपील की गई कि वे शराब और अन्य व्यसनों से दूर रहें, क्योंकि नशा गरीब परिवारों को आर्थिक और सामाजिक रूप से पूरी तरह तबाह कर देता है।
मुफ्त श्रम का विरोध: वक्ताओं ने कारीगरों और मजदूरों को जागरूक करते हुए कहा कि जातिवादी मानसिकता वाले लोगों के यहाँ कभी मुफ्त या कम दाम में काम न करें। अपनी मेहनत का पूरा दाम मांगें और स्वाभिमान से जिएं।
स्थानीय रोजगार: गाँव की जमीन पर उद्योग शुरू होने से स्थानीय युवाओं और महिलाओं को गाँव में ही सम्मानजनक काम मिलेगा, जिससे उनका पलायन रुकेगा।
भैड़ापुर की यह घटना केवल एक मशीन के लगने की खबर नहीं है, बल्कि यह बहुजन समाज के आत्म-सम्मान, चेतना और सामाजिक क्रांति की एक नई पटकथा है। सदियों से यह मानसिकता थोपी गई थी कि किसी भी नए या शुभ कार्य की शुरूआत का अधिकार केवल ब्राह्मणों का है, लेकिन एक वाल्मीकि समाज के बुजुर्ग द्वारा नई मशीन का उद्घाटन कराकर इस मानसिक गुलामी की बेड़ियों को हमेशा के लिए तोड़ दिया गया है। डॉ. भीमराव अंबेडकर और महात्मा जोतिराव फुले के समतामूलक भारत के सपने को साकार करने की दिशा में यह एक अत्यंत व्यावहारिक और साहसिक कदम है। जब तक समाज में जातिगत श्रेष्ठता का पाखंड खत्म नहीं होगा और श्रम करने वाले अंतिम पंक्ति के व्यक्ति को सम्मान नहीं मिलेगा, तब तक वास्तविक आजादी अधूरी है। भैड़ापुर गाँव ने आज देश के सामने एक ऐसा क्रांतिकारी उदाहरण पेश किया है, जिसकी गूंज आने वाले लंबे समय तक सामाजिक पुनर्जागरण के रूप में सुनाई देती रहेगी।





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