




2026-06-21 18:52:28
भारत के सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश से कांग्रेस की राज्यसभा उम्मीदवार मीनाक्षी नटराजन के नामांकन पत्र को चुनाव आयोग से रद्द किए जाने को लेकर किसी भी किस्म के हस्तक्षेप से इनकार कर दिया है। इस दौरान मीनाक्षी नटराजन के पक्ष और विपक्ष में सुप्रीम कोर्ट के एम एस गिल (1978), पोन्नुस्वामी (1952) आदि तमाम पुराने निर्णयों को पेश किया गया। लेकिन सुप्रीम कोर्ट अनुच्छेद-329 की अपनी पुरानी व्याख्या पर अडिग रहा और नटराजन को कोई भी राहत देने से इनकार कर दिया। मैं सुप्रीम कोर्ट की समझ और मंशा पर कोई सवाल नहीं उठा रही हूँ लेकिन पिछले कुछ सालों से लगातार न्यायिक स्तर पर ऐसे फैसले हो रहे हैं जिसने नरेंद्र मोदी सरकार की स्थिति को बहुत मजबूत किया है जबकि यह वो सरकार है जिसके अंतर्गत वैश्विक जगत में भारत को ‘इलेक्टोरल आॅटोक्रेसी’ अर्थात चुनावी निरंकुशता वाला देश माना जा रहा है।
नोटबंदी पर सुप्रीम कोर्ट: 2023 के नोटबंदी मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 2016 की नोटबंदी को 4:1 के बहुमत से वैधता प्रदान कर दी थी। जबकि सरकार ने यह फैसला मनमाने ढंग से लिया था जिसकी वजह से भारत को लगभग 2% विकास दर का नुकसान हुआ था। 2019 में अयोध्या भूमि विवाद मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद-142 की अपनी विशेष शक्तियों का इस्तेमाल किया जिसने फैसले को हिंदूवादी रंग से रंग दिया था। यह बात पूरी दुनिया के सामने है कि नरेंद्र मोदी सरकार ने 2024 में प्राण प्रतिष्ठा के नाम पर लोकसभा चुनावों में इस फैसले और राम मंदिर निर्माण का इस्तेमाल किया। 2018 के ‘आधार मामले’ में भी सुप्रीम कोर्ट का झुकाव मोदी सरकार की ओर ही रहा। आरक्षण की सभी पुरानी व्याख्याओं को दरकिनार करके सुप्रीम कोर्ट ने 2022 में मोदी सरकार के आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (ईडब्ल्यूएस) के लिए 10% आरक्षण को संवैधानिक मान लिया, जबकि यह स्पष्ट बात है कि आरक्षण गरीबी निवारण योजना नहीं, बल्कि सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े समुदायों के लिए किया जाने वाला एक संवैधानिक समर्थन और उपाय है।
कोविड महामारी पर सरकार का रवैया: इसी तरह जब पूरा देश कोविड महामारी से जूझ रहा था, हर ओर सिर्फ और सिर्फ मौतें हो रही थीं, पूरी दुनिया में लोग मर रहे थे उस समय भारत सरकार अपने संसाधनों को बचाने की बजाय उन्हें उड़ाने में लगी थी। जब पहली लहर के दौरान लगभग 1 लाख मामले हर दिन आ रहे थे, और दूसरी लहर के दौरान 4 लाख से भी अधिक मामले हर दिन आ रहे थे उस समय नरेंद्र मोदी 20 हजार करोड़ की लागत से सेंट्रल विस्टा प्रोजेक्ट का निर्माण करने में लगे थे। उन्हें पत्थरों से बनी नई संसद चाहिए थी जबकि जिनके लिए संसद बननी थी वो सड़कों पर मर रहे थे, अस्पतालों में लोग बेड की कमी से मर रहे थे लेकिन सरकार मौतों के आँकड़े छिपाने के लिए सुप्रीम कोर्ट में झूठ बोलने में लगी थी। जब सेन्ट्रल विस्टा प्रोजेक्ट को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगाई गई तो सुप्रीम कोर्ट ने सेंट्रल विस्टा के समर्थन में अपना फैसला दिया। राफेल विमान सौदा मामला (2018-2019) उठा तो सुप्रीम कोर्ट ने सौदे में न्यायिक जांच की मांग वाली याचिकाएँ खारिज कर दीं।
पीएमएलए पर सुप्रीम कोर्ट: इसी तरह धन शोधन निवारण अधिनियम (पीएमएलए) मामले में (2022) सुप्रीम कोर्ट ने ईडी की व्यापक शक्तियों को बरकरार रखा। इस तरह एक बार फिर से सुप्रीम कोर्ट ने ऐसा फैसला दिया जिससे मोदी सरकार को फायदा हुआ, क्योंकि यह बात कई तथ्यों से स्पष्ट है कि ईडी का इस्तेमाल विपक्षी दलों के नेताओं को जेल भेजने, उन्हें डराने और विपक्षी दलों की सरकारों को गिराने के लिए किया जा रहा है। फैसले में ईडी के पर कतरने का मतलब था मोदी सरकार के हाथ से अलोकतांत्रिक हथियारों को कुंद करना, जिसे करने से सुप्रीम कोर्ट ने परहेज किया।
अनुच्छेद 370 का उन्मूलन: यदि हाल के वर्षों में कार्यपालिका के किसी फैसले को सुप्रीम कोर्ट द्वारा दी गई सबसे बड़ी मजबूती के रूप में देखना हो, तो वह अनुच्छेद 370 पर आया फैसला था। अगस्त 2019 में मोदी सरकार ने जम्मू-कश्मीर का विशेष दर्जा समाप्त कर उसे दो केंद्र शासित प्रदेशों में विभाजित कर दिया था। दिसंबर 2023 में सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ ने इस फैसले को सर्वसम्मति से अमलीजामा पहना दिया। अदालत ने इस गंभीर सवाल को नजरअंदाज कर दिया कि क्या राष्ट्रपति शासन के दौरान किसी राज्य की विधानसभा की सहमति के बिना उस राज्य के भूगोल और दर्जे को बदला जा सकता है? इस फैसले ने भविष्य के लिए एक खतरनाक मिसाल कायम की कि केंद्र सरकार किसी भी राज्य में राष्ट्रपति शासन लगाकर उसकी सीमाओं और उसकी पहचान को बदल सकती है। यह निर्णय पूरी तरह से मोदी सरकार के एक राष्ट्र, एक विधान के राजनीतिक एजेंडे को न्यायिक संरक्षण देने जैसा था।
अयोध्या भूमि विवाद: अनुच्छेद-142 का विशेष प्रयोग
2019 में अयोध्या भूमि विवाद मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद-142 की अपनी विशेष शक्तियों का इस्तेमाल किया जिसने फैसले को एकतरफा रंग से रंग दिया था। यह बात पूरी दुनिया के सामने है कि नरेंद्र मोदी सरकार ने 2024 में प्राण प्रतिष्ठा के नाम पर लोकसभा चुनावों में इस फैसले और राम मंदिर निर्माण का पूरा राजनीतिक इस्तेमाल किया।
पूजास्थल कानून 1991: जब अयोध्या भूमि विवाद का फैसला देना था तब सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ ने पूजास्थल कानून 1991 की खूब तारीफ की और कहा कि यह कानून संविधान के धर्मनिरपेक्ष मूल्यों के साथ सामंजस्य बनाता है, उनकी रक्षा करता है, साथ ही यह वादा भी करता है कि किसी धार्मिक स्थल का 15 अगस्त 1947 को जो भी चरित्र था उसे बरकरार भी रखता है। पीठ ने अयोध्या विवाद को एक अपवाद के रूप में देखा और अल्पसंख्यक समुदाय ने इस फैसले को खुले हृदय से स्वीकार किया। लेकिन जल्द ही 2022 में सुप्रीम कोर्ट ने शब्दों की बाजीगरी करते हुए सबकुछ उलट दिया। वहीं जस्टिस चंद्रचूड़ जो अयोध्या मामले वाली संवैधानिक पीठ के सदस्य थे उन्होंने 20 मई 2022 को ज्ञानवापी मामले की सुनवाई करते हुए विवादित मस्जिद के सर्वे की अनुमति दे दी। इस बार उनके पास अलग तर्क था। उन्होंने कहा कि किसी स्थल के धार्मिक चरित्र का पता लगाने और उसके धार्मिक चरित्र को बदलने में अंतर है। इस तरह उन्होंने ज्ञानवापी, मथुरा, संभल, अजमेर आदि तमाम विवादों के लिए दरवाजा खोल दिया। जस्टिस चंद्रचूड़ ने पूजास्थल कानून की मूल भावना को ही नष्ट कर दिया। एक्ट की सोच यह थी कि भारत में धार्मिक स्थलों के विवादों को समाप्त कर दिया जाये जिससे देश अन्य महत्वपूर्ण कार्यों में लग सके, और सांप्रदायिक हिंसा और ऐसी धार्मिक उन्माद वाली राजनीति से देश को बचाया जा सके। जब पूजास्थल कानून स्पष्ट कह रहा है कि धार्मिक चरित्र नहीं बदला जाएगा तो इसके चरित्र का निर्धारण किए जाने की आवश्यकता क्या है? क्या यह सिर्फ जानकारी के लिए किया जाएगा? क्या इस जानकारी का कोई राजनैतिक और सांप्रदायिक फायदा नहीं उठाया जाएगा? क्या जस्टिस चंद्रचूड़ यह समझने में नाकाम रहे कि यदि किसी विवादित स्थल के बारे में हिंदुओं को पता चलता है कि वह एक मंदिर है तो क्या बहुसंख्यक हिंदू इस स्थल के चरित्र का पता लगने के बाद उस चरित्र को बदलने की माँग नहीं करेंगे? और जबतक इसका चरित्र नहीं बदल दिया जाता तबतक इस धार्मिक उन्माद और आंदोलन से सरकारें कैसे निपटेंगी? यह सब सोचने का काम एक न्यायाधीश का है, पूरी न्यायपालिका का है। लेकिन ऊपर दिए हर मामले की तरह इस मामले में भी यह नहीं सोचा गया। कुछ ऐसा किया गया जिसका फायदा भारतीय जनता पार्टी और इसकी तमाम राज्य सरकारों को होता रहे।
स्टालिन सरकार बनाम राज्यपाल : आर्थिक और राष्ट्रीय स्तर के राजनीतिक मामलों में जहाँ शीर्ष अदालत ने कार्यपालिका को खुली छूट दी, वहीं राज्यों के संवैधानिक अधिकारों और संघवाद के मसले पर सुप्रीम कोर्ट ने एक बेहद सख्त रुख अपनाकर राजभवन के रास्ते केंद्र के पर कतरने का काम भी किया। इसका सबसे बड़ा उदाहरण अप्रैल 2025 में तमिलनाडु राज्य बनाम राज्यपाल आर.एन. रवि मामले में आया सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक निर्णय है। मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन की चुनी हुई सरकार द्वारा पारित 10 महत्वपूर्ण विधेयकों (जो मुख्य रूप से राज्य के विश्वविद्यालयों में कुलपतियों की नियुक्ति का अधिकार राज्यपाल से लेकर राज्य सरकार को सौंपते थे) को राज्यपाल आर.एन. रवि जनवरी 2020 से दबाकर बैठे रहे। जब मामला अदालत पहुँचा, तो राज्यपाल ने आनन-फानन में उन्हें वापस लौटा दिया। इसके बाद जब तमिलनाडु विधानसभा ने विशेष सत्र बुलाकर उन विधेयकों को दोबारा पारित किया, तो राज्यपाल ने उन्हें मंजूरी देने के बजाय चालाकी से राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के विचारार्थ भेज दिया। जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ ने राज्यपाल के इस आचरण पर जो टिप्पणियां कीं, वे स्वतंत्र भारत के इतिहास में राजभवन को लगी सबसे तीखी फटकार थीं। अदालत ने राज्यपाल की इस कार्रवाई को गैर-कानूनी, त्रुटिपूर्ण और दुर्भावनापूर्ण करार दिया। कोर्ट ने कहा कि राज्यपाल संविधान के अनुसार मित्र, मार्गदर्शक और दार्शनिक के रूप में कार्य करने के लिए हैं, न कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया में रुकावट बनने के लिए। सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के अनुच्छेद 200 की नई और सख्त व्याख्या करते हुए स्पष्ट किया कि भारत में राज्यपाल के पास कोई असीमित या पॉकेट वीटो नहीं है। वे मंत्रिपरिषद की सहायता और सलाह के अनुसार काम करने के लिए बाध्य हैं। कोर्ट ने अपनी असाधारण शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए यह क्रांतिकारी घोषणा की कि इन 10 विधेयकों को मंजूरी मिल चुकी है माना जाए। राष्ट्रपति के पास उन्हें भेजने की राज्यपाल की कार्रवाई को कोर्ट ने पूरी तरह रद्द कर दिया। राजभवनों की राजनीतिक मनमानी को हमेशा के लिए रोकने के लिए कोर्ट ने पहली बार समयसीमा तय कर दी। अब राज्यपाल को सामान्य विधेयकों पर फैसला लेने के लिए अधिकतम 1 से 3 महीने का समय मिलेगा, और यदि विधानसभा किसी बिल को दोबारा पारित करके भेजती है, तो राज्यपाल को 1 महीने के भीतर उस पर दस्तखत करने ही होंगे।
मीनाक्षी नटराजन केस: अब जब मीनाक्षी नटराजन का मामला सामने है तो फिर से यही एहसास हो रहा है। लोकतंत्र में किसी भी संस्था को सुप्रीम ताकत देने की जरूरत नहीं है। यह सही है कि चुनावों के सफल संचालन के लिए, किसी भी रुकावट से बचने के लिए चुनाव आयोग के खिलाफ आए हर मामले को सुनवाई योग्य नहीं समझा जा सकता है। लेकिन जैसा कि मीनाक्षी नटराजन के वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि यदि चुनाव आयोग कह दे कि 2+2 = 6 है तो भी क्या उस पर सवाल नहीं उठाया जा सकता? तो भी क्या देश की सर्वोच्च अदालत इस मामले पर हस्तक्षेप नहीं करेगी?
चुनाव आयोग और एसआईआर विवाद: केंद्रीय निर्वाचन आयोग (ईसीआई) का मामला बहुत ही संवेदनशील मामला है लेकिन अदालत इसे बहुत हल्के ढंग से ले रही है। चुनाव आयोग को यह अधिकार दिया गया है कि वह मतदाता सूची बनाये और उसने एसआईआर के बहाने करोड़ों की संख्या में मतदाताओं को सूची से हटा दिया। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने कुछ नहीं कहा। एसआईआर के बहाने ईसीआई भारत की नागरिकता का पहरेदार बन बैठा और सुप्रीम कोर्ट उसकी हाँ में हाँ मिला रहा है। अब चुनाव आयोग विपक्षी दलों के नेताओं का नामांकन ही रद्द कर रहा है और जिस आधार पर रद्द कर रहा है उसे लेकर न सिर्फ़ सम्पूर्ण विपक्ष असंतुष्ट है बल्कि इस देश के तमाम बड़े विधिवेत्ता भी असंतुष्ट हैं। ऐसे में यदि सुप्रीम कोर्ट हस्तक्षेप नहीं करेगा तो इसका मतलब यह हुआ कि उसने चुनाव आयोग को यह शक्ति भी दे दी है कि वह जब चाहे तब किसी विपक्षी दल के नेता को चुनाव प्रक्रिया में भाग लेने से रोक सकता है और इस तरह उसने यह शक्ति भी अर्जित कर ली है जिसके तहत वो यह तय कर सकता है कि संसद में कौन से लोग बैठेंगे और कौन नहीं! इससे एक झूठे प्रतिनिधित्व पर आधारित संसद तैयार हो जाएगी। मतलब यह कि चुनाव आयोग को यह भी शक्ति भी मिल गई है जिससे वह संसद का स्वरूप, वहाँ पास होने वाले कानून और संवैधानिक संशोधनों तक को तय कर सकता है। और सबसे अहम बात यह कि केंद्रीय निर्वाचन आयोग में कौन कौन सदस्य होंगे यह बात सिर्फ़ और सिर्फ़ नरेंद्र मोदी सरकार तय करती है। इसका मतलब यह हुआ कि नरेंद्र मोदी सरकार मतलब, कार्यपालिका; संविधान का गलत और बेलगाम इस्तेमाल करके संसदीय प्रणाली को नष्ट कर रही है, संसद के औचित्य को समाप्त कर रही है और सुप्रीम कोर्ट सिर्फ़ इसलिए यह सब होने देगा क्योंकि उसे लगता है कि अनुच्छेद-329 के तहत निर्वाचन आयोग को ऐसी स्वतंत्रता प्राप्त है! यदि निर्वाचन आयोग को वाकई इतनी शक्ति देना है कि भारत की नागरिकता तय कर सके, यहाँ का निर्वाचन और नर्वाचक मंडल को तय कर सके तो उसे सरकार से पूरी तरह स्वतंत्र करना होगा अन्यथा संविधान के अभिरक्षक, सुप्रीम कोर्ट, की नाक के नीचे ईसीआई भारत के लोकतंत्र को नष्ट कर देगी और उसे पता भी नहीं चलेगा। क्या चुनाव आयोग को संविधान इतनी शक्ति देता है कि वो एक फाल्स यानी फर्जी प्रतिनिधित्व पर आधारित संसद तैयार कर दे? क्या संविधान सुप्रीम कोर्ट को ऐसी शक्ति प्रदान करता है कि सुप्रीम कोर्ट संविधान की व्याख्या करने के अपने अधिकार का इस्तेमाल कुछ यूँ करे कि खुद भारत का संविधान भारत के लोकतंत्र के लिए भस्मासुर का काम करने लगे? चंडीगढ़ के अनिल मसीह ने जिस तरह लोकतंत्र को खुलेआम कैमरे में नोचा था लगभग वैसे ही इसे हर दिन ईसीआई के द्वारा नोचा जा रहा है और सुप्रीम कोर्ट इसे रोक नहीं रहा है। अपना विरोध दर्ज करने के लिए जब विपक्ष के नेता ईसीआई के पास जाते हैं तो वो मिलने से इनकार कर देता है। ईसीआई को इतनी हिम्मत कहाँ से मिल रही है कि वो भारत में लोकतंत्र के प्रति अविश्वास का माहौल बनने दे रहा है और अपने जवाबों से विपक्ष को संतुष्ट नहीं कर रहा है? उसे तो अविश्वास के माहौल से डरना चाहिए। उसे तो पता होना चाहिए कि लोकतंत्र सत्ता और विपक्ष नाम के दो पहियों पर चलने वाली साइकिल है, जिसमें एक आगे और एक पीछे हो सकता है लेकिन लोकतंत्र को चलाने के लिए इन दोनों की जरूरत होगी। लेकिन ईसीआई जिस तरह का व्यवहार भारत के विपक्ष के साथ कर रहा है, उससे यह साफ है कि भारत में लोकतंत्र की समाप्ति की अनौपचारिक घोषणा हो चुकी है।
राहुल गांधी का प्रतिरोध: अगर सरकार तानाशाही कर रही हो तो यह हमेशा अच्छा होता है कि अन्य प्रमुख संवैधानिक संस्थाएं ध्यान देकर लोकतंत्र के हित में फैसले लें। जिससे आधे से अधिक मतदाताओं के समर्थन वाला विपक्ष यह न कहने पाये कि ‘स्टेट’ निष्पक्ष नहीं है और न ही उसे स्टेट की निष्पक्षता से अब कोई फर्क़ पड़ता है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट और ईसीआई ने मिलकर जो माहौल बनाया है उसने देश के सबसे बड़े विपक्षी नेता राहुल गांधी को कहने पर बाध्य कर दिया है कि कांग्रेस को स्टेट की निष्पक्षता की जरूरत नहीं है। राहुल गांधी अब खुलकर कह रहे हैं कि कांग्रेस संघर्ष और प्रतिरोध की पार्टी है...भारतीय राज्य की संस्थाओं का जितना अधिक गला घोंटा जाएगा, कांग्रेस संविधान की रक्षा के लिए उतनी ही अधिक आक्रामकता और दृढ़ता से संघर्ष करेगी। वो कहते हैं कि अगर राजनीतिक दलों को काम नहीं करने दिया जाता तो फिर क्या काम करता है? प्रतिरोध काम करता है। संघर्ष काम करता है.. अपने अनुभव से कह सकता हूँ कि प्रतिरोध और संघर्ष हमेशा असरदार साबित होते हैं। एक बड़े नेता द्वारा कहने में यह सकारात्मक बात है, इसमें आशा दिखाई पड़ रही है लेकिन असल में यह देश की संस्थाओं के नकारात्मक रवैये से उत्पन्न हुआ गुस्सा है। 21वीं सदी के इस दौर में जब सभी ने यह सोचा कि संविधान को बने हुए 75 सालों से भी अधिक समय गुजर गया है और अब भारत को संवैधानिक संकट, और लोकतांत्रिक अस्तित्व जैसे सवालों से नहीं जूझना पड़ेगा; जब यह लगा कि चुनाव, सत्ता और सत्ता हस्तांतरण अब भारत में बिल्कुल एक लोकतांत्रिक प्रक्रिया के नियम में ही होगा और इसमें किसी अन्य संघर्ष की जरूरत नहीं पड़ेगी, तब यह पता चला कि सबकुछ इसका उल्टा हो रहा है। देश के लोकसभा नेता, विपक्ष राहुल गांधी को कहना पड़ रहा है कि इस देश की संस्थाएं न्यूट्रल नहीं है और प्रतिरोध हमेशा असरदार साबित होता है। मुझे ऐसे आह्वानों में सकारात्मकता नजर आती है पर थोड़ी कम नजर आती है, मुझे इसमें संस्थाओं के बेईमान रवैये से उत्पन्न सार्वजनिक हताशा को रोकने की कोशिश ज्यादा नजर आती है। एक ऐसी कोशिश जिसमें भले प्रतिरोध और संघर्ष का रास्ता अपनाया जाये, लेकिन सार्वजनिक निराशा को भारत के लोकतान्त्रिक पतन का रास्ता न बनने दिया जाये। स्वदेशी जस्टिस के इस दौर में सबसे बड़ी जरूरत संविधान के पहरेदारों पर भारत के लोगों का पहरा है।





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