




2026-01-24 15:42:13
प्रकाश चंद<br />
नई दिल्ली। आरटीई (RTE) की फुल फॉर्म ‘राइट टू एजुकेशन’ है, जिसका हिंदी में अर्थ ‘शिक्षा का अधिकार’ है; यह भारत सरकार का एक अधिनियम (शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009) है जो 6 से 14 वर्ष के बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा प्रदान करता है, जिसे संविधान के अनुच्छेद 21ए के तहत एक मौलिक अधिकार बनाया गया है। इसी प्रावधान के तहत निजी स्कूलों में 25 प्रतिशत सीटें कमजोर वर्गों के लिए आरक्षित हंै। इस कानून का इरादा तो नेक है परंतु क्या हमारे सामाजिक ताने-बाने में इसकी समावेशीता और उससे फायदा उठाने में समाज सक्षम है। किसी भी नीति का मूल्यांकन उसके नेक इरादों से नहीं बल्कि उसके अंतिम परिणाम से होना चाहिए, शिक्षा में परिणाम का मतलब है कि क्या वह बच्चा वास्तव में कुछ सीख रहा है? क्या वह बच्चा स्कूल में टिक पा रहा है? और क्या उसकी क्षमताएं उसे भविष्य के प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार कर रही है?
शिक्षा तंत्र: समस्या यह है कि हम अक्सर शिक्षा को केवल ‘सीट’ या ‘फीस’ की बहस तक सीमित कर देते हैं। हम मान लेते हैं कि फीस माफ हो गई, तो शिक्षा मुफ्त हो गई जबकि शिक्षा की कीमत सिर्फ स्कूल की फीस तक सीमित नहीं है, इसे पाने के लिए बच्चे के परिवार को सीखने की अन्य लागत भी चुकानी पड़ती है, इसमें पैसा, समय, मानसिक तनाव और जोखिम सब शामिल है।
बजट के बाहर होते खर्च: निजी स्कूलों में दाखिला मिलने पर भी एक गरीब परिवार पर कई प्रत्यक्ष आर्थिक बोझ आ जाते हैं जैसे किताबें, यूनिफोर्म, स्टेशनरी, प्रोजेक्ट्स का सामान और ट्रांसपोर्ट आदि का खर्च। इन सबका हिसाब लगाने पर यह सब खर्च 3-5 हजार रुपये प्रति माह तक पहुंचा जाता है। देश में दिहाड़ी मजदूर या कर्मचारी की मासिक आय का यह 50-60 प्रतिशत हिस्सा हो जाता है। शिक्षा के क्षेत्र से जुड़े लोगों को और नीति निर्माताओं को सोचना यह चाहिए कि जिन वर्गों के लिए 25 प्रतिशत शिक्षा में आरक्षण के आधार पर दाखिला पाने का प्रावधान किया गया है क्या वे सभी लोग इस खर्च को उठाने में सक्षम है? किसी भी नीति निर्माता को समाज के धरातल पर आकर पूरी सोच और समाज के साथ नीतियों का निर्माण करना चाहिए। देखने में तो यह व्यवस्था बहुत आकर्षित और उचित लगती है परंतु सरकार के स्तर पर इसे चला पाना पर्याप्त नहीं है।
बच्चों पर मनोवैज्ञानिक दबाव: इस प्रावधान के अंतर्गत दाखिला पाने वाले बच्चों का पारिवारिक परिवेश क्या इस व्यवस्था का पूरा फायदा उठाने में सक्षम हैं? साथ ही दाखिला पाने वाले बच्चों के साथ जो छिपे हुए खर्चे हैं क्या बच्चे का परिवार उन्हें मुहैया कराने के लिए सक्षम है? स्कूल केवल शैक्षणिक केंद्र नहीं होता, बल्कि वह सूक्ष्म समाज भी होता है। जहां बच्चों के बीच खाने के टिफिन, कपड़े, ब्रांडेड जूते, मोबाइल और यहाँ तक कि अंग्रेजी बोलने के लहजे को लेकर भी अदृश्य प्रतिस्पर्धा चलती है। जन्मदिन की पार्टियां या स्कूल ट्रिप जैसी रिचुअल्स भागीदारी की ऊंची कीमत होती है। जब एक गरीब बच्चा रोज स्कूल में ऐसी व्यवस्था देखकर यह महसूस करता है कि वह सहपाठियों से अलग है तो उसकी सीखने की उत्पादकता गिरना स्वाभाविक है। कक्षा में वह बच्चा मौजूद तो रहता है परंतु मनोवैज्ञानिक स्तर पर अपने आपको अलग महसूस करता है जिसके कारण उसमें हीनता का भाव स्वत: ही पैदा हो जाता है।
समाधान के रास्ते: अगर हम आज से 40-50 वर्ष पीछे जाते हैं तो उस समय सभी स्कूल सरकारी थे और निजी स्कूलों का नामात्र भी हिस्सा नहीं था, तब के सभी सरकारी स्कूलों में सभी वर्गों के बच्चे एक-साथ स्कूल जाते थे, उन सभी का स्कूल बैग एक जैसा ही होता था, सभी के पहनने के कपड़े एक जैसे ही होते थे, लंच टिफिन भी एक जैसा ही होता था, सभी को एक साथ बैठाकर उनका अध्यापक पढ़ाता था और उन सभी में शिक्षण उत्पादकता भी एक जैसी ही होती थी। किसी में भी मनोवैज्ञानिक स्तर का बेमतलब का दबाव पैदा नहीं होता था। इसे देखकर साधारण समझ का व्यक्ति भी यह आंकलन कर सकता है कि उस समय की शिक्षा पद्धति और उसका वातावरण आज के आधुनिक शिक्षा जगत से कहीं अधिक बेहतर और समाज की जरूरत के हिसाब से बहुत ही सटीक था, उस समय के पढ़ने वाले बच्चे 5वीं कक्षा तक पहुँचकर बेहतर तरीके से हिन्दी लिखना-पढ़ना और बोलना सीख जाते थे। साथ ही गणित के साधारण सवाल जैसे जोड़ना, घटाना, गुणनफल, भागफल आदि में दक्ष बन जाते थे। 5वीं तक के सभी बच्चे 40 तक पहाड़े सुनाने में दक्ष रहते थे। इसके सापेक्ष आधुनिक शिक्षा पद्धति में आज कक्षा 8 से 10 तक के बच्चों को न ठीक से लिखना आ रहा और न ठीक से पढ़ना आ रहा है। पढ़ाई का स्तर दिनों-दिन गिर रहा है अगर हम 50 साल पहले शिक्षा के स्तर का आंकलन करके देखे तो करीब 80-90 प्रतिशत शिक्षा का स्तर गिरा हुआ नजर आता है। इसी के साथ मनुवादी मानसिकता की सरकारें अपनी डींगे मारने से बाज नहीं आ रही है, और अपने प्रचार के माध्यम से जोर-शोर से प्रचार कर रही कि हमने शिक्षा के क्षेत्र में बहुत सुधार किए है, जबकि उनका यह दावा जमीनी हकीकत के एकदम ही विपरीत है।
निजी शिक्षण संस्थानों को मिल रहा बढ़ावा: मनुवादी सरकारों का निजीकरण पर अधिक जोर है जिसका मुख्य कारण शिक्षा को बेहतर करना नहीं बल्कि अपने व्यापारी मित्रों के द्वारा निजी स्कूल और अन्य शिक्षण संस्थानों को खुलवाना है।
सरकारी माध्यम से उन्हें सस्ती जमीन व सभी सरकारी सहायता मुफ्त में देना है, ये सभी प्रकार की निजी शिक्षण संस्थानों को दी जा रही सहायताएं जनता के टैक्स द्वारा दिये गए पैसे से ही मुहैया कराई जाती है और जनता को मूर्ख बनाने के लिए उनके बच्चों को 25 प्रतिशत के आरक्षण में दाखिला देकर उन्हें प्रतिस्पर्धात्मक स्थिति से बाहर कर दिया जाता है चूंकि वे मनोवैज्ञानिक दबाव के चलते इतने योग्य ही नहीं बन पाते कि वे किसी भी प्रकार की प्रतिस्पर्धा में खरे उतर सकें।
विदेशों में पढ़ रहे पुजारियों व नेताओं के बच्चे: वर्तमान समय में मंदिरों में बैठे सभी पुजारियों के बच्चे और राजनैतिक क्षेत्र में उतरे राजनैतिक नेताओं के बच्चे विदेशों में जाकर उच्च कोटी की शिक्षा प्राप्त करके प्रतिस्पर्धात्मक बन रहे हैं और वे या तो विदेशों में ही बस रहे हैं या फिर देश में वापस लौटकर मनुवादी सरकारों के संरक्षण से सरकार में उच्च पदो पर स्थापित होकर सत्ता की पूरी मलाई खा रहे हैं। देश में गरीब विशेषकर एससी, एसटी, अति पिछड़े समाज के बच्चे अधिकांशत: मौजूदा शिक्षा व्यवस्था में प्रतिस्पर्धात्मक न रहकर स्कूल छोड़ देते हैं और वे फिर बिना किसी काम के सड़कों या गंदे नालों के किनारे बैठकर अपना समय व्यतीत करते हैं, जहां के दूषित वातावरण में रहकर वे प्राय: नशे के आदि बन जाते हैं। इस तरह की शिक्षण व्यवस्था पाकर आज का समाज आगे बढ़ने के बजाय मनुवादी मानसिकता के अनुरूप पीछे ही धकेला जा रहा है, जो वर्तमान समाज के अधिकांश लोगों को दिखाई नहीं देता।
स्वयं के स्कूल स्थापित करने का संकल्प लेना होगा: वर्तमान शिक्षा व्यवस्था को देखकर लगता है कि भारत के एससी, एसटी व अति पिछड़े समाज को अपने स्वयं के शिक्षण संस्थान स्थापित करने चाहिए और इन सभी संस्थानों में अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा पद्धति को स्थापित करना होगा तभी हमारे देश के एससी, एसटी व अति पिछड़े समाज के बच्चे प्रतिस्पर्धा में उत्कृष्ट बन पाएंगे। हमें यहाँ याद रखना चाहिए कि कम संसाधनों के बावजूद भी अगर इरादा नेक और ईमानदारी से आगे बढ़ाया जाये तो वह अंतत: सफल ही होता है। इसका हमारे सामने सबसे श्रेष्ठ उदाहरण माता सावित्रीबाई फुले और महात्मा ज्योतिराव फुले का है। जिनके पास न संपत्ति थी, न कोई धन था और न समाज की सहायता थी उन्होंने सिर्फ अपने आंतरिक बौद्धिक बल से यह निष्कर्ष महसूस किया था कि शिक्षा विहीनता ही सभी प्रकार की बीमारियों व प्रताड़नाओं का मूल कारण है। जिसको उन्होंने अपने वाक्यों में निम्न प्रकार व्यक्त किया।
विद्या बिना मति गई, मति बिना गति गई,
गति बिना नीति गई, नीति बिना वित्त गई
वित्त बिना शूद्र चरमराये,
इतना सारा अनर्थ एक अविद्या से हुआ
महात्मा ज्योतिबा फुले व उनकी पत्नी माता सावित्रीबाई फुले ने संकल्प लिया था कि हम इस देश के अछूत व गरीब परिवारों के बच्चों को शिक्षित करने के लिए आवश्यक स्कूलों की स्थापना करेंगे और उसमें शिक्षा व्यवस्था सभी के लिए सुनिश्चित करेंगे। उन्होंने अपने इस संकल्प को पूरा करने के लिए मनुवादी संस्कृति के लोगों की बहुत सारी अमानवीय प्रताड़नाएं झेली परंतु वे अपने संकल्प पथ से न हटे, न डिगे, न रुके। अपने संकल्प के अनुसार उन्होंने अपने जीवन काल में 48 स्कूलों की स्थापना की और उन सभी स्कूलों को इस तरह से कारगर और उत्कृष्ठ बनाया कि जिसकी प्रशंसा उस समय की ब्रिटिश सरकार भी कर रही थी। लॉर्ड मैकाले की शिक्षा नीति ने भी उन्हें सराहा और उनके शिक्षा संघर्ष में उनको सहारा दिया। महात्मा ज्योतिबा फुले और माता सावित्रीबाई फुले ने ब्राह्मण संस्कृति से संक्रमित लोगों के बच्चों को भी अपने स्कूल में पढ़ाया। मनुवादी-ब्राह्मणी संस्कृति से संक्रमित लोग जो महिलाओं को शिक्षा देना धर्म विरुद्ध मानकर प्रताड़ित कर रहे थे उनकी बेटियों को भी शिक्षा देने में कोई भेदभाव नहीं किया।
विद्या की देवी आखिर कौन? माता सावित्रीबाई फुले हमारे देश में विद्या की देवी हैं चूंकि उन्होंने सर्वप्रथम महिलाओं में शिक्षा का प्रचार-प्रसार किया और देश की वह पहली महिला शिक्षिका बनीं। अकल के अंधे व अतार्किक ब्राह्मणी संस्कृति से संक्रमित लोगों से जनता को पूछना चाहिए कि आपकी विद्या की देवी सरस्वती ने इस देश में कितने स्कूल खोले और महिलाओं को शिक्षा दिलाने के लिए क्या प्रयास किए? हिन्दुत्व की वैचारिकी के अनुसार, महिलाओं को शिक्षा देना धर्म विरुद्ध बताया जाता है जिसका पूरा विवरण हिन्दुत्व की वैचारिकी और उनके धर्म शास्त्रों में मिलता है। आज जो महिलाएं-बालिकाएँ हिन्दुत्व की वैचारिकी के प्रभाव में अंधे होकर हिन्दू धर्म को श्रेष्ठ मान रहे हैं उनसे विनम्र आग्रह है कि वे पहले हिन्दू शास्त्रों में दिये गए महिला व शिक्षा विरोधी प्रावधानों की समीक्षा और पड़ताल कर ले और फिर स्वयं के आंकलन पर बाकी जनता को भी बताएं कि हिन्दुत्व की वैचारिकी में वंचित वर्ग और महिलाओं के लिए कितना जहर भरा हुआ है और क्या इस तरह की व्यवस्था को जानकर हम सभी को उसी जहर को पीते रहना चाहिए?
शिक्षा व्यवस्था का सटीक इलाज: भारत की शिक्षा व्यवस्था को मनुवादी ब्राह्मणी संस्कृति के जाल से निकालकर आजाद करना होगा। सभी शिक्षण संस्थाओं से संबंधित अध्यापक, कर्मचारी व अधिकारियों को जिनकी मानसिकता मनुवादी ब्राह्मणी संस्कृति से संक्रमित है उन्हें चिन्ह्त करके सभी शिक्षण संबंधित व्यवस्थाओं से निष्काशित करना होगा और शिक्षा के क्षेत्र में एक स्वस्थ्य समतावादी, समानतावादी और बिना किसी भेदभाव का वातावरण पैदा करना होगा। ताकि सभी बच्चे अपनी मान्यताओं और विचारों के अनुसार शिक्षा पर स्वतंत्र रूप से ध्यान दे सकें और अपने आपको आधुनिक जगत में वैश्चिक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बना सकें।
वंचित वर्ग एससी, एसटी, ओबीसी से आग्रह है कि वे बसंत पंचमी जैसे पर्वों पर संयुक्त रूप से यह संकल्प लें कि विद्या की देवी ‘माता सावित्रीबाई फुले’ है ना कि तथाकथित काल्पनिक व पौराणिक कथाओं पर आधारित ‘सरस्वती‘ देवी है।
(लेखक सीएसआईआर से सेवानिवृत वरिष्ठ वैज्ञानिक हैं)





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