




2026-05-02 14:28:20
नई दिल्ली। भारत 2026 के विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक (वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स) में 180 देशों में 157वें स्थान पर है. यह सूचकांक रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स (आरएसएफ) ने 30 अप्रैल को जारी किया. 2025 में भारत 151वें स्थान पर था, यानी इस बार रैंकिंग में छह स्थान की गिरावट आई है। पत्रकारिता पर नजर रखने वाली यह संस्था, जिसे रिपोर्टर्स सैन्स फ्रंटियर्स (आरएसफ) कहा जाता है, ने बताया कि पिछले 25 सालों में उनके इंडेक्स में शामिल सभी 180 देशों और क्षेत्रों का औसत स्कोर कभी भी इतना कम नहीं रहा है. पहली बार सूचकांक के इतिहास में दुनिया के आधे से अधिक देश अब प्रेस स्वतंत्रता के मुश्किल या बहुत गंभीर श्रेणी में आ गए हैं। इस सूचकांक में शीर्ष स्थान पर नॉर्वे, नीदरलैंड, एस्टोनिया, डेनमार्क और स्वीडन हैं. सबसे नीचे सऊदी अरब, ईरान, चीन, उत्तर कोरिया और इरिट्रिया हैं। आरएसफ के अनुसार, यह विश्लेषण दुनिया के कई हिस्सों में पत्रकारिता की स्थिति में चिंताजनक गिरावट को दिखाता है, भले ही कुछ जगहों पर सीमित सुधार हुए हों. कुल 180 में से 100 देशों में प्रेस स्वतंत्रता के स्कोर में गिरावट आई है. पिछले एक साल में कानूनी सूचकांक में सबसे ज्यादा गिरावट दर्ज की गई है, जो इस बात का संकेत है कि दुनिया भर में पत्रकारिता को बढ़ते हुए अपराध की तरह देखा जा रहा है. अमेरिका महाद्वीप में भी स्थिति नकारात्मक रूप से बदली है -अमेरिका सात स्थान नीचे फिसल गया है और कई लैटिन अमेरिकी देश हिंसा और दमन के चक्र में और गहरे फंसते जा रहे हैं। भारत के लगभग सभी पड़ोसी देश इस इंडेक्स में भारत से ऊपर हैं -पाकिस्तान 153वें स्थान पर, भूटान 150वें पर, नेपाल 87वें पर, श्रीलंका 134वें पर और बांग्लादेश 152वें स्थान पर है. हालांकि, चीन 178वें स्थान पर है। भारत 157वें स्थान पर है, जो फिलिस्तीन से एक स्थान नीचे है; फिलिस्तीन में पिछले दो सालों से इजरायल नरसंहार कर रहा है. 2024 में भारत 159वें स्थान पर था। आरएसएफ ने भारत में प्रेस की आजादी के संकट के पीछे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी पार्टी की भूमिका का जिÞक्र करते हुए कहा कि पत्रकारों के खिलाफ बढ़ती हिंसा, मीडिया स्वामित्व का अत्यधिक केंद्रीकरण और मीडिया संस्थानों का तेजी से किसी खास राजनीतिक विचारधारा की ओर झुकाव -इन सबके कारण दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में प्रेस स्वतंत्रता संकट में है. इस देश पर 2014 से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार है, जो भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेता हैं और हिंदू राष्ट्रवादी दक्षिणपंथी विचारधारा के प्रतीक हैं। यह सूचकांक राजनीतिक, आर्थिक, कानूनी, सामाजिक और सुरक्षा जैसे कई मानकों पर आधारित है, और भारत के इन सभी क्षेत्रों में अलग-अलग स्कोर दिए गए हैं। देश की फैक्ट-फाइल में कहा गया है कि भारत में मीडिया परिदृश्य व्यापक तो है, लेकिन 2014 में नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने और उनकी पार्टी तथा बड़े मीडिया घरानों के बीच निकटता बढ़ने के बाद मीडिया एक अनौपचारिक आपातकाल जैसी स्थिति में आ गया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि, प्रधानमंत्री प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं करते; वे केवल उन्हीं पत्रकारों और यूट्यूबर्स को इंटरव्यू देते हैं जो उन्हें सकारात्मक रूप में दिखाते हैं, और जो लोग उनकी आलोचना करते हैं उनके प्रति कड़ा रुख रखते हैं. भारतीय पत्रकारों को भाजपा-समर्थित ट्रोल्स द्वारा चलाए जाने वाले अभियानों का सामना करना पड़ता है। इसमें यह भी कहा गया है कि सरकारें मीडिया को दबाने के लिए औपनिवेशिक काल के कानूनों -जैसे कि राजद्रोह, मानहानि और राष्ट्र-विरोधी गतिविधियों से जुड़े कानूनों -का इस्तेमाल करने से कभी पीछे नहीं हटी हैं. इसमें यह भी बताया गया है कि आतंकवाद-विरोधी कानूनों का इस्तेमाल भी पत्रकारों के खिलाफ लगातार बढ़ता जा रहा है। आरएसएफ की पड़ताल के अनुसार, चूंकि भारत के मीडिया संस्थानों की कमाई का मुख्य जरिया विज्ञापन से मिलने वाला पैसा है -और इन विज्ञापनों का सबसे बड़ा स्रोत सरकार ही है -इसलिए केंद्र और राज्य, दोनों ही सरकारें मीडिया पर दबाव डालने की स्थिति में होती हैं, और वे ऐसा करती भी हैं, ताकि मीडिया अपने कंटेंट को सेंसर करे या उसे प्रकाशित ही न करे।
न्यूज रूम में विविधता की कमी
रिपोर्ट में न्यूजरूम में विविधता की कमी भी एक बड़ी समस्या बताई गई है. इसमें कहा गया है, पत्रकारिता, खासकर प्रबंधन स्तर पर, अब भी ऊंची जाति के हिंदू पुरुषों का ही वर्चस्व है -जिसका असर खबरों के विषय और दृष्टिकोण पर पड़ता है. उदाहरण के लिए, प्रमुख टीवी डिबेट शो में महिलाओं की हिस्सेदारी 15% से भी कम है। रिपोर्ट कहती है, हिंदू राष्ट्रवादी विचारधारा एक हावी ताकत बन गई है, जो मौजूदा मामलों को आकार दे रही है, राजनीतिक बहसों की रूपरेखा तय कर रही है, और उस जगह को सीमित कर रही है जहां असहमति या अल्पसंख्यकों की आवाज सुनी जा सके। इसमें आगे कहा गया है कि ज्यादातर टीवी मीडिया चैनल, खासकर हिंदी वाले, अपने प्रसारण समय का एक बड़ा हिस्सा धार्मिक खबरों को देते हैं, और कभी-कभी तो खुले तौर पर मुसलमानों के प्रति नफरत को बढ़ावा देते हैं। रिपोर्ट यह भी बताती है कि भारत में हर साल औसतन 2-3 पत्रकार अपने काम के कारण मारे जाते हैं, जिससे यह मीडिया पेशेवरों के लिए दुनिया के सबसे खतरनाक देशों में से एक बन गया है।
सुरक्षा पर दिया गया पैराग्राफ विशेष रूप से गंभीर है:
जो पत्रकार सरकार की आलोचना करते हैं, उन्हें अक्सर आॅनलाइन उत्पीड़न, डराने-धमकाने, जान से मारने की धमकियों और शारीरिक हमलों का सामना करना पड़ता है; साथ ही उन पर आपराधिक मुकदमे भी चलाए जाते हैं और उन्हें मनमाने ढंग से गिरफ्तार भी किया जाता है. वे पुलिस अधिकारियों और राजनीतिक कार्यकतार्ओं के साथ-साथ आपराधिक गिरोहों और भ्रष्ट स्थानीय अधिकारियों की हिंसा का शिकार बन सकते हैं. हिंदुत्व विचारधारा के समर्थक उन आलोचकों के खिलाफ आम लोगों से बदला लेने का आह्वान करते हैं, जिन्हें वे देशद्रोही और राष्ट्र-विरोधी करार देते हैं. सोशल मीडिया पर संगठित नफरत अभियान और हत्या की धमकियां दी जाती हैं -खासकर महिला पत्रकारों को निशाना बनाया जाता है, जिनकी निजी जानकारी सार्वजनिक कर दी जाती है. पर्यावरण या कश्मीर से जुड़ी रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकारों की स्थिति भी चिंताजनक है, जहां उन्हें पुलिस और अर्धसैनिक बलों द्वारा परेशान किया जाता है, और कुछ मामलों में उन्हें लंबे समय तक अस्थायी हिरासत में रखा जाता है.





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