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लोकतंत्र के सबसे बड़े पहरेदार पर गहराया साख का संकट

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ विपक्ष ने बोला देशव्यापी हल्लाबोल
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2026-09-26 14:56:17

नई दिल्ली। देश की चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता और लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वायत्तता को लेकर उपजा असंतोष अब संसद और दफ्तरों से निकलकर सड़कों पर आ गया है। मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार और निर्वाचन आयोग की नीतियों के खिलाफ कांग्रेस पार्टी ने देशव्यापी विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया है। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली से लेकर पटना और देहरादून तक विपक्षी कार्यकतार्ओं ने विरोध मार्च निकाले। देहरादून में कांग्रेस कार्यकर्ता बैरिकेड्स पर चढ़कर नारेबाजी करते दिखे, वहीं पटना में राजभवन मार्च के दौरान सुरक्षाबलों के साथ तीखी नोकझोंक हुई। इसी बीच, कॉकरोच पार्टी ने मुख्य चुनाव आयुक्त को आड़े हाथों लेते हुए अल्टीमेटम दिया है और आगामी 2 अक्टूबर यानी गांधी जयंती से देशव्यापी अनिश्चितकालीन आंदोलन का ऐलान कर दिया है। यह जनआक्रोश किसी एक नीति या तात्कालिक घटना का नतीजा नहीं है। इसके मूल में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के दौरान 13 करोड़ से अधिक मतदाताओं के नाम हटाए जाने, आयोग के डिजिटल सॉफ्टवेयर के संदिग्ध केंद्रीकरण, दो चुनाव आयुक्तों द्वारा आयोग के भीतर दर्ज कराई गई 14 लिखित आपत्तियों, और वर्ष 2023 में बनाए गए विवादित मुख्य चुनाव आयुक्त नियुक्ति कानून को लेकर केंद्र सरकार की संदिग्ध भूमिका जैसे गंभीर सवाल शामिल हैं। आलोचकों और राजनीतिक विश्लेषकों का स्पष्ट मानना है कि देश की सबसे सम्मानित संवैधानिक संस्थाओं में से एक—भारत निर्वाचन आयोग (ईसीआई)—आज अपने इतिहास के सबसे बड़े साख के संकट से गुजर रही है, और केंद्र की मोदी सरकार की कार्यशैली पर इसे एक कठपुतली तंत्र में बदलने के गंभीर आरोप लग रहे हैं।

सड़कों पर फूटा जनाक्रोश: गुरुवार और शुक्रवार को देश के विभिन्न राज्यों में चुनाव आयोग के खिलाफ व्यापक विरोध दर्ज किया गया। कांग्रेस और विपक्षी दलों के नेताओं, युवा विंग और कार्यकतार्ओं ने जंतर-मंतर से निर्वाचन सदन की ओर मार्च करने का प्रयास किया। पुलिस द्वारा लगाए गए कई लेयर के बैरिकेड्स पर कार्यकतार्ओं ने जोरदार प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारियों का आरोप था कि आयोग निष्पक्ष अंपायर की भूमिका छोड़कर सत्ताधारी दल के एक राजनीतिक विंग की तरह व्यवहार कर रहा है। वहीं बिहार की राजधानी पटना में महागठबंधन के घटक दलों ने डाकबंगला चौराहे से राजभवन की ओर कूच किया। प्रदर्शनकारियों ने आरोप लगाया कि एसआईआर का परीक्षण सबसे पहले बिहार की धरती पर किया गया, जहाँ लाखों गरीब, पिछड़े और अल्पसंख्यक मतदाताओं के नाम पहचान की विसंगतियों के नाम पर कागजों से मिटा दिए गए। उधर, उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में कांग्रेस कार्यकतार्ओं और पुलिस के बीच तीखी झड़प देखने को मिली। कार्यकर्ता चुनाव आयोग और केंद्र सरकार के पुतले लेकर सचिवालय और निर्वाचन कार्यालय की ओर बढ़े और बैरिकेड्स पर चढ़कर विरोध दर्ज कराया।

कॉकरोच पार्टी का 2 अक्टूबर का अल्टीमेटम: पार्टी के प्रतिनिधियों ने प्रेस वार्ता आयोजित कर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के तत्काल इस्तीफे की मांग की है। पार्टी ने चेतावनी दी है कि यदि 48 घंटे के भीतर नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए पद नहीं छोड़ा गया, तो 2 अक्टूबर (गांधी जयंती) से देश भर में सत्याग्रह 2.0 शुरू किया जाएगा और आयोग के सभी क्षेत्रीय कार्यालयों का घेराव किया जाएगा।

इस पूरे संकट की जड़ें दिसंबर 2023 में संसद द्वारा पारित किए गए मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और पदावधि) अधिनियम, 2023 में निहित हैं। मार्च 2023 में सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए निर्देश दिया था कि चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए गठित समिति में देश के मुख्य न्यायाधीश को शामिल किया जाए, ताकि चयन प्रक्रिया कार्यपालिका के राजनीतिक दबाव से पूरी तरह मुक्त रह सके। किंतु, मोदी सरकार ने कुछ ही महीनों के भीतर कानून बनाकर भारत के मुख्य न्यायाधीश को उस तीन-सदस्यीय चयन समिति से बाहर कर दिया। नए कानून के तहत समिति में प्रधानमंत्री, प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री, और लोकसभा में विपक्ष के नेता को रखा गया। इसका सीधा अर्थ यह था कि चयन समिति में कार्यपालिका (सरकार) के पास 2-1 का स्पष्ट और स्थायी बहुमत आ गया। जब मार्च 2024 में ज्ञानेश कुमार और सुखबीर सिंह संधू की नियुक्ति हुई, तब तत्कालीन चयन बैठक में विपक्ष के प्रतिनिधि ने पूरी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर गंभीर असहमति दर्ज की थी। इसके बाद फरवरी 2025 में ज्ञानेश कुमार को मुख्य चुनाव आयुक्त बनाए जाने के दौरान भी लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने आधिकारिक असहमति नोट सौंपा था। आलोचकों का कहना है कि जिस आयोग का निर्माण ही कार्यपालिका की मनमानी पर लगाम लगाने के लिए किया गया था, उसके शीर्ष अधिकारियों का चयन सरकार ने अपने पूर्ण नियंत्रण में ले लिया—और आज का संकट उसी राजनीतिक नियंत्रण का स्वाभाविक दुष्परिणाम है।

एसआईआर और वोटबंदी का खेल: विपक्ष और स्वतंत्र विश्लेषकों का सबसे बड़ा आरोप यह है कि स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (एसआईआर) के माध्यम से देश भर में एक बड़े पैमाने पर वोटबंदी को अंजाम दिया गया है।

13 करोड़ से अधिक नाम हटाने का सच: जून 2025 में बिहार से शुरू होकर देश के 30 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में फैलाए गए एसआईआर अभियान के तहत मसौदा मतदाता सूचियों से 13 करोड़ से अधिक मतदाताओं के नाम हटा दिए गए। चुनाव आयोग ने इसे मृतकों, स्थानांतरित मतदाताओं और फर्जी प्रविष्टियों की सफाई बताया, लेकिन जमीनी हकीकत यह रही कि इसके चलते लाखों ऐसे जीवित और पात्र नागरिक मताधिकार से वंचित हो गए जिनके पास दशकों पुराने पहचान पत्र मौजूद थे।

फॉर्म-6 में अवैध संशोधन का विवाद: नए मतदाताओं (विशेषकर 18 वर्ष के युवाओं) के पंजीकरण के लिए उपयोग होने वाले फॉर्म-6 में जुलाई 2026 में चुपचाप एक नया नियम जोड़ दिया गया। इसमें नए आवेदक से यह साबित करने को कहा गया कि क्या उसके माता-पिता या दादा-दादी पिछली एसआईआर सूची में शामिल थे या नहीं। यह एक तरह से नागरिकता सत्यापन जैसी जटिल शर्त थी जिसे बिना किसी विधायी संशोधन के प्रशासनिक आदेश से थोप दिया गया।

पश्चिम बंगाल में 38 लाख अपीलों का रहस्य: पश्चिम बंगाल में लॉजिकल डिस्क्रिपेंसी (तार्किक विसंगति) के नाम पर 60 लाख मतदाताओं को चिन्हित किया गया था। बाद में न्यायिक अधिकारियों ने लाखों नामों को वैध मानकर बहाल किया। किंतु सर्वोच्च न्यायालय में यह चौंकाने वाला तथ्य सामने आया कि आयोग की ओर से लगभग 16 लाख ऐसे नागरिकों के खिलाफ अपीलें दायर कर दी गईं जिन्हें जजों ने सही पाया था। सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी और दो चुनाव आयुक्तों तक को इसकी भनक नहीं थी, तो दिल्ली में बैठकर इन अपीलों को किसने और किसके इशारे पर अधिकृत किया?

आयोग के भीतर आंतरिक विद्रोह: 10 महीने में 14 आपत्तियां: चुनाव आयोग अब तक खुद को एक बहु-सदस्यीय, सामूहिक और सर्वसम्मत संस्था के रूप में प्रस्तुत करता रहा है। लेकिन द इंडियन एक्सप्रेस की खोजी रिपोर्ट ने आयोग के भीतर के गहरे असंतोष और दरार को बेनकाब कर दिया है। आयोग के दो वर्तमान चुनाव आयुक्तों—सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी—ने पिछले 10 महीनों में आयोग के कामकाज, निर्णयों और कार्यशैली पर कम से कम 14 बार औपचारिक और लिखित आपत्तियां दर्ज कराई हैं। कुछ मामलों में तो एक ही दिन में चार-चार आपत्तियां दर्ज की गईं।

सहमति की उपेक्षा: 2023 के कानून की धारा 18 के अनुसार आयोग का कामकाज जहां तक संभव हो सर्वसम्मति से होना चाहिए और किसी भी बड़े नीतिगत संचार को आयोग की औपचारिक मंजूरी मिलनी चाहिए। दोनों आयुक्तों ने संचिकाओं पर कड़े शब्दों में दर्ज किया कि आयोग के नाम से ऐसे कई आदेश और संचार जारी किए जा रहे हैं जो कभी उनके सामने रखे ही नहीं गए।

फॉर्म-6 के बदलाव को अवैध करार देना: चुनाव आयुक्त विवेक जोशी ने मई 2026 में ही फाइल पर लिखकर चेतावनी दी थी कि बिना नियमों में विधायी संशोधन के फॉर्म-6 का प्रारूप नहीं बदला जा सकता। इसके बावजूद जब इसे लागू किया गया, तो अगस्त में चुनाव आयुक्त संधू ने इसे आधिकारिक रूप से अनधिकृत और अवैध करार देते हुए तुरंत वापस लेने की मांग की।

चार महीने तक कोई बैठक नहीं: दोनों आयुक्तों और मुख्य चुनाव आयुक्त के बीच रिश्ते इतने तनावपूर्ण हो चुके थे कि मई से सितंबर 2026 के बीच करीब चार महीने तक आयोग की कोई औपचारिक पूर्ण बैठक तक आयोजित नहीं हो सकी। यह आंतरिक विद्रोह इस बात का अकाट्य प्रमाण है कि मुख्य चुनाव आयुक्त द्वारा आयोग को लोकतांत्रिक तरीके से चलाने के बजाय एकतरफा और केंद्रीकृत व्यवस्था के तहत चलाया जा रहा है।

सॉफ्टवेयर का केंद्रीकरण: भारतीय संविधान और लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 के तहत मतदाता सूची तैयार करने, उसमें संशोधन करने या किसी नाम को जोड़ने-हटाने का कानूनी और वैधानिक अधिकार स्थानीय स्तर पर तैनात निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण अधिकारियों (ईआरओ)—जो सामान्यत: उप-जिलाधिकारी (एसडीएम) स्तर के प्रशासनिक अधिकारी होते हैं—को प्राप्त है। किंतु, आधुनिक डिजिटलीकरण के नाम पर लाए गए केंद्रीकृत सॉफ्टवेयर ईसीआईनेट ने स्थानीय अधिकारियों के संवैधानिक अधिकारों को पंगु बना दिया है।

गोवा का 97 मतदाताओं का शर्मनाक मामला: गोवा में सर्वोच्च न्यायालय के निदेर्शों के अनुसार स्थानीय ईआरओ ने सुनवाई की और दस्तावेजों की जांच के बाद 97 मतदाताओं को पूरी तरह योग्य पाया। लेकिन जब अधिकारी उन्हें मतदाता सूची में वापस जोड़ने गए, तो ईसीआईनेट सॉफ्टवेयर में पहले से हटाए गए नामों को बहाल (रोलबैक) करने का विकल्प ही मौजूद नहीं था।

7 दिनों में 8 ईमेल और दिल्ली का मौन: गोवा के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के दफ्तर ने इस तकनीकी बाधा को दूर करने के लिए दिल्ली स्थित केंद्रीय आयोग और आईटी विभाग को सात दिनों में आठ बार ईमेल व पत्र भेजे। लेकिन अंतिम सूची प्रकाशित होने तक दिल्ली से वह तकनीकी अनुमति नहीं दी गई। नतीजा यह हुआ कि एक स्वतंत्र वैधानिक अधिकारी द्वारा योग्य ठहराए जाने के बावजूद 97 भारतीय नागरिक मतदाता सूची से बाहर कर दिए गए।

आईटी विभाग पर अत्यधिक नियंत्रण के आरोप: चुनाव आयुक्त संधू ने आयोग की आईटी महानिदेशक की भूमिका पर सवाल उठाते हुए संचिका पर लिखा कि वैधानिक अधिकारियों को दिए गए कानूनी अधिकारों को किसी तकनीकी सॉफ्टवेयर या अधिकारी के स्तर पर कैसे रोका जा सकता है? जब स्थानीय स्तर के अधिकारी असहाय हो जाएं और दिल्ली में बैठा एक सर्वर यह तय करने लगे कि कौन वोट देगा और कौन नहीं, तो यह चुनावी प्रक्रिया का खतरनाक केंद्रीकरण है।

मोदी सरकार की संदिग्ध भूमिका और विपक्ष के तीखे आरोप

सड़कों पर उतरे विपक्षी दलों का सीधा हमला केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार पर है। विपक्ष का आरोप है कि केंद्र सरकार ने सुनियोजित तरीके से संवैधानिक संस्थाओं की स्वायत्तता का अपहरण कर लिया है। कांग्रेस, वामपंथी दलों, तृणमूल कांग्रेस और आम आदमी पार्टी का साझा आरोप है कि जब सत्ताधारी दल को जमीनी स्तर पर बेरोजगारी, महंगाई और जनविरोधी नीतियों के कारण जनता के गुस्से का डर सताता है, तो वह चुनावी मशीनरी को अपने पक्ष में मोड़ने की कोशिश करता है। मतदाता सूचियों से थोक के भाव में नाम हटाना और विपक्ष के प्रभाव वाले क्षेत्रों में मतदाताओं को सत्यापन के चक्रव्यूह में उलझाना इसी रणनीति का हिस्सा बताया जा रहा है। विपक्ष ने सवाल उठाया है कि जब चुनाव आयोग के भीतर दो-तिहाई बहुमत (दो आयुक्त) फैसलों पर सवाल उठा रहे हैं, जब सर्वोच्च न्यायालय को बार-बार चुनावी प्रक्रियाओं में हस्तक्षेप करना पड़ रहा है, तब सरकार संसद में इस पर खुली बहस कराने से क्यों भाग रही है? प्रदर्शनकारी नेताओं ने कहा कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव किसी भी लोकतंत्र की जीवनरेखा हैं। यदि जनता का यह विश्वास ही टूट जाए कि उसका वोट सुरक्षित है और उसकी मतदाता सूची से छेड़छाड़ नहीं की जा सकती, तो लोकतंत्र केवल एक खोखला ढोंग बनकर रह जाएगा। सरकार द्वारा चुनाव आयोग को अपनी सुविधानुसार ढालना दरअसल देश को प्रतिबद्ध न्यायपालिका और प्रतिबद्ध नौकरशाही के बाद प्रतिबद्ध चुनाव आयोग की ओर धकेलने जैसा है।

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01 जनवरी : मूलनिवासी शौर्य दिवस (भीमा कोरेगांव-पुणे) (1818)

01 जनवरी : राष्ट्रपिता ज्योतिबा फुले और राष्ट्रमाता सावित्री बाई फुले द्वारा प्रथम भारतीय पाठशाला प्रारंभ (1848)

01 जनवरी : बाबा साहेब अम्बेडकर द्वारा ‘द अनटचैबिल्स’ नामक पुस्तक का प्रकाशन (1948)

01 जनवरी : मण्डल आयोग का गठन (1979)

02 जनवरी : गुरु कबीर स्मृति दिवस (1476)

03 जनवरी : राष्ट्रमाता सावित्रीबाई फुले जयंती दिवस (1831)

06 जनवरी : बाबू हरदास एल. एन. जयंती (1904)

08 जनवरी : विश्व बौद्ध ध्वज दिवस (1891)

09 जनवरी : प्रथम मुस्लिम महिला शिक्षिका फातिमा शेख जन्म दिवस (1831)

12 जनवरी : राजमाता जिजाऊ जयंती दिवस (1598)

12 जनवरी : बाबू हरदास एल. एन. स्मृति दिवस (1939)

12 जनवरी : उस्मानिया यूनिवर्सिटी, हैदराबाद ने बाबा साहेब को डी.लिट. की उपाधि प्रदान की (1953)

12 जनवरी : चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु परिनिर्वाण दिवस (1972)

13 जनवरी : तिलका मांझी शाहदत दिवस (1785)

14 जनवरी : सर मंगूराम मंगोलिया जन्म दिवस (1886)

15 जनवरी : बहन कुमारी मायावती जयंती दिवस (1956)

18 जनवरी : अब्दुल कय्यूम अंसारी स्मृति दिवस (1973)

18 जनवरी : बाबासाहेब द्वारा राणाडे, गांधी व जिन्ना पर प्रवचन (1943)

23 जनवरी : अहमदाबाद में डॉ. अम्बेडकर ने शांतिपूर्ण मार्च निकालकर सभा को संबोधित किया (1938)

24 जनवरी : राजर्षि छत्रपति साहूजी महाराज द्वारा प्राथमिक शिक्षा को मुफ्त व अनिवार्य करने का आदेश (1917)

24 जनवरी : कर्पूरी ठाकुर जयंती दिवस (1924)

26 जनवरी : गणतंत्र दिवस (1950)

27 जनवरी : डॉ. अम्बेडकर का साउथ बरो कमीशन के सामने साक्षात्कार (1919)

29 जनवरी : महाप्राण जोगेन्द्रनाथ मण्डल जयंती दिवस (1904)

30 जनवरी : सत्यनारायण गोयनका का जन्मदिवस (1924)

31 जनवरी : डॉ. अम्बेडकर द्वारा आंदोलन के मुखपत्र ‘‘मूकनायक’’ का प्रारम्भ (1920)

2024-01-13 16:38:05