




2026-03-14 17:10:26
संवाददाता
नई दिल्ली। मोदी-भाजपा शासन को करीब 12 वर्ष चुके हैं और मोदी सरकार की विफलताओं का दौर आज भी जारी है। अमेरिका-इजराइल की ईरान से जंग की वजह से देशभर में एलपीजी की भारी किल्लत हो गई है। गैस एजेंसियों के बाहर लम्बी लाइनें हैं। गैस सिलेंडर की कालाबाजारी और जमाखोरी भी जमकर हो रही है। कई जगहों पर 2 हजार का कॉमर्शियल सिलेंडर 4 हजार में बिक रहा है। वहीं पंजाब में लोग सिलेंडर लेकर भागते नजर आ रहे हैं। केरल में करीब 40% रेस्टोरेंट बंद होने की कगार पर है। होटल-रेस्टोरेंट में गैस का स्टॉक खत्म होने से बिजनेस ठप होने लगे हैं। कई जगह ताले भी लटकने लगे हैं। वहीं कोटा समेत कई शहरों में हॉस्टल मेस और ढाबों में मजबूरी में लकड़ी, कोयले और इलेक्ट्रिक चूल्हों पर खाना बनाया जा रहा है। कई शहरों में एजेंसियों पर सुबह 5 बजे से ही लंबी लाइनें लग रही हैं और सिलेंडर न मिलने पर लोगों की पुलिस से झड़प तक हो रही है।
मोदी काल की विफलताएँ
नोटबंदी: मोदी ने 8 नवम्बर 2016 को रात के 9 बजे टीवी पर आकर एक संघी षड्यंत्र के तरह 500 और 1000 के नोटों को बंद करने की घोषणा की थी जिसके कारण देशभर के बड़े बाजारों और गली मौहल्ले की आम दुकानों पर भारी असर पड़ा था। बैंकों और बाजारों में आमजनों की लंबी-लंबी कतारें लगी थी। यहाँ तक की प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी बूढ़ी माँ जिसकी उम्र करीब 93 वर्ष के लगभग थी को बैंक की लाइन में खड़ा करके जनता से प्रसिद्धि पाने के लिए नौटंकी की थी। मोदी संघी सरकार का नोटबंदी के पीछे तर्क था कि इससे काले धन पर लगाम लगेगी, आतंकियों के मंसूबे कमजोर होंगे, लेकिन इसके विपरीत न तो आजतक आतंकी हमले कम हुए और ना ही काला धन वापस आया।
कोविड-19 और लॉकडाउन: कोविड महामारी देश में मोदी काल में ही आई। जिसका कुप्रबंधन देश और दुनिया की जनता ने अपनी खुली आँखों से देखा, अपने गांवों और शहरों से बाहर व्यवसाय और नौकरी करने गए लोगों को आवागमन के लिए भारी मुसीबतों का सामना करना पड़ा। अपने गांवों और कस्बों को छोड़कर जो मजदूर वर्ग के लोग दूसरे शहरों में काम के लिए गए थे उन्हें भारी मुसीबतों का सामना करते हुए 1500-2000 किमी. की यात्रा पैदल ही तय करनी पड़ी। मजदूर वर्ग के लोग अपने बच्चों, पत्नी और बूढ़े माता-पिता के साथ कई-कई दिन भूखे चलकर ही अपने गंतव्य स्थान तक पहुँच पाये। मोदी-संघी सरकार ने उनके लाने-ले-जाने के लिए किसी भी प्रकार का यातायात का प्रबंधन नहीं किया था। इस तरह की अव्यवस्था को झेलते हुए सैंकड़ों लोगों ने अपनी जान रास्ते में ही गंवा दी, कई गर्भवती महिलाओं ने अपने बच्चों को जन्म रास्ते में ही दिया। जनता ने यह भारी संकट तब झेला जब देश में मोदी की तानाशाही सरकार चल रही थी और उसके अंधभक्त और गोदी मीडिया जनता में ड़िंगे मारकर कह रहे थे सबकुछ ठीक चल रहा है। कोविड के कुप्रबंधन पर विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी प्रश्न खड़े किए थे, विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार अकेले उत्तर प्रदेश में 5 लाख से अधिक कोविड से मृत्यु हुई थी। लेकिन इस आंकड़े को केंद्र और राज्य की सरकार ने नकारा था। पूरे विश्व ने सेटेलाइट के यत्रों से देखा था कि हरिद्वार से लेकर बिहार में गंगा नदी में हजारों की संख्या में मृत शरीर बह रहे थे। साथ ही जनता ने ऐसे शवों को भी देखा था जो गंगा नदी के दोनों किनारों की रेती में दबे मिले थे। मोदी-योगी सरकार ने इन सब आंकड़ों और तस्वीरों को झूठा करार दिया था। लेकिन ये सभी आंकड़े पूर्णत: सत्य थे। झूठ बोलना और जनता में झूठ फैलाना संघियों की सदियों पुरानी रीत और संस्कृति रही है इसलिए वे झूठ के आधार पर सत्यता को दबाने और ढकने का काम करते हैं।
बेरोजगारी और आर्थिक मुद्दे: जब से मोदी देश के पीएम बने हैं तभी से वे जनता के बीच जाकर जोर-जोर से वायदे कर रहे हैं कि देश में हर वर्ष लोगों को 2 करोड़ रोजगार देंगे, परंतु वास्तविकता इसके विपरीत ही निकली। मोदी ने अपना यह वायदा तो पूरा नहीं किया बल्कि अपने वायदे के उलट जिन सरकारी संस्थानों, कंपनियों आदि में रोजगार पाने के अवसर मिलते थे मोदी सरकार ने उन सभी का निजीकरण करके रोजगार पाने के अवसर खत्म कर दिये। आज की स्थिति यह है कि मोदी ने अपने 12 वर्षों के शासन में करीब 25 करोड़ देश के नवयुवकों को स्थायी रूप से बेरोजगार बना दिया है। चूंकि इनमें से बहुत सारे युवकों की रोजगार पाने की उम्र भी पार हो चुकी है। आज देश में बेरोजगारी चरम पर है, रोजगार पाने के अवसर मोदी सरकार ने कम किए हैं आर्थिक क्षेत्र में मोदी सरकार ने कोई भी सुधारात्मक कार्य न करके देश की जनता को आर्थिक संकट में धकेला है। मोदी जब 2014 में देश के पीएम बने थे तब देश के ऊपर वैश्विक ऋण 55 लाख करोड़ रुपये था जो मोदी-संघी शासन में बढ़कर 214 लाख करोड़ हो गया है। लेकिन फिर भी मोदी जी ‘सब चंगा सी’ कहकर जनता को छलावामयी ढंग से चकमा देते रहते हैं। एलपीजी का सिलेन्डर पूर्व पीएम मनमोहन सिंह की सरकार में जनता को 400 रुपए में मिल रहा था जिसकी आज मोदी संघी सरकार में सरकारी कीमत 913 रुपए निर्धारित है, पेट्रोल जो मनमोहन सिंह की सरकार में करीब 60-65 रुपए लीटर था वह अब 100 रुपए लीटर है, परंतु उसपर भी अब संकट के बादल दिखाई दे रहे है।
गिरता बुनियादी ढांचा: मोदी-संघी सरकार का मुख्य फोकस देश में बनी बनाई इमारतों को तोड़ना और उन्हें पुन: निर्मित करना है। साथ ही देश में राष्ट्रीय राजमार्गों और बीजेपी के आलीशान कार्यालयों का निर्माण करना रहा है। देश की आम जनता ने अपनी नंगी आँखों से देखा है कि उनके कुछेक निमार्णाधीन इमारतों का उद्घाटन होने से पहले ही या उद्घाटन के बाद वे स्वत: ही ध्वस्त हो गर्इं। ऐसी घटनाएँ बिहार और गुजरात में अधिक देखने को मिली है जहां पर पिछले 20-25 वर्षों से भाजपा संघी सरकार का शासन है। अभी कुछ दिन पहले गुजरात के गांधी नगर में पानी की टंकी का निर्माण हुआ जो स्वत: ही उद्घाटन से पहले ही गिर है। बिहार में भी पीछे 25 वर्षों से जेडीयू और भाजपा की साझी सरकार है, जहां पर निमार्णाधीन पुल अधिक संख्या में गिरे हैं। जो यह दर्शाता है कि इन निमार्णों की सामग्री में भ्रष्टाचार का बड़ा खेल हुआ है, जिसमें वहाँ की स्थानीय और राज्य सरकारें भी शामिल रही हैं। देश की साधारण से साधारण जनता भी यह जानती है कि जिन सरकारों में सिविल वर्क के कामों पर अधिक जोर होगा वहाँ-वहाँ पर भ्रष्टाचार भी उसी अनुपात में अधिक बढ़ेगा। मोदी संघी सरकार का पिछले 12 वर्षों से अंधाधुंध इमारतों के निर्माण, राष्ट्रीय राजमार्गों के निर्माण, पुलों के निर्माण व देश की राजधानी की सभी अच्छे-अच्छे भवनों को तोड़कर उनके स्थान पर नए भवनों का निर्माण करना, यहाँ तक की नए संसद का निर्माण कराना भी संघी सरकार के भष्टाचार की ओर इशारा करता है।
सामाजिक और आंतरिक सुरक्षा: देश के सभी समुदायों ने अपनी नंगी आँखों से देखा है कि मोदी संघी शासन में देश की आंतरिक और सामाजिक सुरक्षा कमजोर हुई है। आए दिन देश के विभिन्न प्रदेशों में महिलाओं, दलित, अल्पसंख्यक व उपेक्षित वर्गों के ऊपर अत्याचार और शोषण की घटनाएँ बढ़ी है। मोदी संघी शासन के दौरान देश की आम जनता ने यह भी देखा कि मणिपुर में महिलाओं को नंगा करके सड़क पर घुमाया गया और 100 से अधिक गिरजाघरों को उपद्रवियों द्वारा तोड़ा गया। अयोध्या में राम मंदिर निर्माण के लिए हिन्दू-मुस्लिम का राग अलापकर सामाजिक सौहार्द को कमजोर किया गया। संघी हठधर्मिता के कारण बिना पुरातात्विक तथ्यों के अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण कराया गया। जिसे लेकर देश भर में सांप्रदायिक दंगे भड़काए गए, हजारों की संख्या में लोग मारे भी गए, लोगों के साथ लिंचिंग भी हुई। देश में सामाजिक वैमनष्यता मोदी शासन में इतनी सक्रिय की गई कि आज एक संप्रदाय का व्यक्ति दूसरे संप्रदाय के व्यक्ति के ऊपर विश्वास नहीं कर पा रहा है। दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय का जुनैद नाम का छात्र जो 15 अक्टूबर 2016 से लापता है, जुनैद की माँ अदालत में गुहार लगाकर थक चुकी है, आज तक न जुनैद मिला है और न उनकी माँ को इंसाफ मिला है, जो देश में कानून के शासन की भयावहता को प्रदर्शित करता है।
विवादास्पद कानून: किसान विरोधी तीन काले कानूनों को लंबे संघर्ष और प्रदर्शन के बाद मोदी संघी सरकार ने वापस लिया। किसान आंदोलन के संघर्ष में करीब 700 किसानों की मौतें हुई, लेकिन फिर भी मोदी के कान पर जूं तक नहीं रेंगी। यही नहीं इसके अलावा देश की महिला पहलवानों का आंदोलन भी लंबा चला जिसे मोदी शासन के पुलिस कर्मियों ने बड़ी क्रूरता के साथ अपने जूतों के नीचे कुचला और महिला पहलवानों की मांग पर कोई विचार नहीं किया गया।
घुसपैठ: मोदी और शाह देश की जनता में घुसपैठिया शब्द को बड़े जोर से प्रचारित करते हैं, लेकिन जनता ने पहली बार यह देखा कि लद्दाखी क्षेत्र में चीनी सेना ने भारत की लगभग 38000 वर्ग किमी पर नियंत्रण कर लिया है जो गुजरती जोड़ी को दिखाई नहीं दे रहा है। जिसे विपक्ष के नेता बार-बार संसद में उठा चुके हैं। देश की सीमाओं की रक्षा का दायित्व गुजराती जोड़ी के ऊपर है लेकिन फिर भी अपने कर्तव्य और दायित्व से नजरें चुराकर उससे बचने की लगातार कोशिश कर रहे हैं।
मोदी काल में आतंकी हमले
पहलगाम हमला: पहलगाम में 22 अप्रैल, 2025 को एक बड़ा आतंकवादी हमला हुआ था। हमलावरों ने पहलगाम में घुसकर लोगों से उनका धर्म पूछा और 26 पर्यटकों की हत्या कर दी।
पुलवामा अटैक: 14 फरवरी 2019 को पाकिस्तान के आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद से जुड़े आतंकियों ने पुलवामा में सीआरपीएफ जवानों को ले जा रहे काफिले पर हमला बोला था। इस घटना में भारत के 40 जवानों की जान चली गई थी।
अमरनाथ यात्रियों पर हमला: 10 जुलाई 2017 को अमरनाथ जा रहे श्रद्धालुओं पर अनंतनाग जिÞले में एक चरमपंथी हमला हुआ। इस हमले में 7 लोग मारे गए थे।
उड़ी हमला: 18 सितंबर, 2016 को जम्मू-कश्मीर के उड़ी सेक्टर में नियंत्रण रेखा के पास स्थित भारतीय सेना के कैम्प पर हमला किया गया था। इस हमले में 19 जवान मारे गए थे।
पठानकोट हमला: 2 जनवरी 2016 को चरमपंथियों ने पंजाब के पठानकोट एयरबेस पर हमला किया था। इसमें 7 सुरक्षाकर्मी मारे गए थे जबकि 20 अन्य घायल हुए थे।
गुरदासपुर हमला: 27 जुलाई 2015 को पंजाब के गुरदासपुर के दीनापुर में हमलावरों ने बस पर फायरिंग की और इसके बाद पुलिस थाने पर हमला कर दिया। हमले में एसपी समेत चार पुलिसकर्मी और तीन नागरिक मारे गए।
कश्मीर घाटी में अशांति
सत्ता में आने से पहले बीजेपी के दो सबसे बड़े हथियार थे कश्मीर मुद्दा और पाकिस्तान। इन दो मुद्दों में से एक कश्मीर में मोदी सरकार की लगातार कोशिश के बावजूद भी पिछले लंबे समय से जारी अशांति और हिंसक माहौल अब भी जारी है। कांग्रेस की सरकार से अगर तुलना करें तो मोदी सरकार के कार्यकाल में घाटी की हालत बद से बदत्तर है। लगातार पत्थरबाजी और अशांत माहौल का मोदी सरकार ने सामना किया है। घाटी में शांति कायम करने में मोदी सरकार विफल रही है। यह नाकामी और भी बड़ी इसलिए हो जाती है क्योंकि जम्मू-कश्मीर में पीडीपी के साथ गठबंधन कर बीजेपी सरकार में हैै।
विफल विदेशी कूटनीति: मध्य एशिया संकट दिनों-दिन गहराता जा रहा है। ईरान-इजराइल युद्ध पूरे जोर पर है, मोदी ने हाल ही में इजराइल की यात्रा की और जिस दिन वे वहां से लौटे उसी दिन इजराइल ने ईरान पर हमला कर दिया था। इस युद्ध के दौरान में ईरान के सर्वोच्च धार्मिक नेता अली हुसैनी खामेनेई की हत्या कर दी गई। वहीं 28 फरवरी 2026 को दक्षिणी ईरान के मीनाब शहर में एक लड़कियों के स्कूल (शजरेह तय्यबेह) पर हवाई हमले में 170 से अधिक लोगों, मुख्य रूप से 7 से 12 वर्ष की स्कूली छात्राओं और कर्मचारियों की मौत हो गई थी। अभी तक ईरान में 1500 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी है। लेकिन इन हत्याओं पर आजतक ना तो मोदी ने और ना ही उनके किसी मंत्री ने अफसोस जताया है। यह संघीयों की निलर्जता और अहसान फरामोशी को दर्शाता है।
जब ईरान ने दिया भारत का साथ: 1994 में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग के जेनेवा सत्र में ईरान ने भारत को एक बहुत बड़े राजनयिक संकट से बचाया था। यह भारतीय विदेश नीति के इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण और सफल घटनाओं में से एक मानी जाती है। 1990 के दशक की शुरूआत में कश्मीर में उथल-पुथल अपने चरम पर थी। पाकिस्तान ने इस मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उछालने के लिए जेनेवा में वठउऌफ के सामने एक प्रस्ताव रखा। इस प्रस्ताव का उद्देश्य भारत को कश्मीर में मानवाधिकारों के उल्लंघन के लिए दोषी ठहराना और भारत पर आर्थिक प्रतिबंध लगवाना था।
पाकिस्तान को इस्लामी सहयोग संगठन और कई पश्चिमी देशों का समर्थन प्राप्त था। नियमों के अनुसार, किसी भी प्रस्ताव को सर्वसम्मति से पेश किया जाना जरूरी था। जब जेनेवा में मतदान का समय आया, तो ईरान ने अंतिम क्षण में प्रस्ताव का समर्थन करने से इनकार कर दिया। ईरान के प्रतिनिधि ने तर्क दिया कि भारत और पाकिस्तान दोनों उनके मित्र हैं और इस मुद्दे को द्विपक्षीय बातचीत से सुलझाया जाना चाहिए, न कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर। ईरान के पीछे हटते ही ओआईसी की सर्वसम्मति टूट गई। पाकिस्तान के पास प्रस्ताव वापस लेने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा। इस तरह बिना मतदान हुए ही पाकिस्तान का प्रस्ताव गिर गया।





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