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भारतीय समाज के इतिहास में सदियों तक एक ऐसा तंत्र हावी रहा, जिसने धर्म, आस्था, और अनुष्ठान के नाम पर बहुजन समाज (दलित, पिछड़े, और वंचित वर्ग) को मानसिक रूप से गुलाम बनाए रखा। जन्म से लेकर मृत्यु तक, गृह-प्रवेश से लेकर नए व्यापार के शुभारंभ तक—हर छोटे-बड़े अवसर पर पंडे-पुजारियों और कर्मकांडीय व्यवस्था के हस्तक्षेप को अनिवार्य घोषित कर दिया गया। इस व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य समाज के एक बहुत बड़े वर्ग को यह विश्वास दिलाना था कि उनके जीवन का कोई भी शुभ कार्य तब तक सफल या पवित्र नहीं हो सकता जब तक कि उसमें किसी तथाकथित उच्च जातीय पंडित का प्रवेश न हो और उसे भारी दान-दक्षिणा न दी जाए। हाल ही में उत्तर प्रदेश के ग्राम भैड़ापुर में घटी घटना इस सदियों पुरानी व्यवस्था की नींव को हिलाने वाली एक ऐतिहासिक मिसाल बनकर सामने आई है। वहाँ एक नई मशीनिंग यूनिट के उद्घाटन के अवसर पर सभी धार्मिक कर्मकांडों, हवन-पूजन और पंडितों को पूरी तरह दरकिनार करते हुए, गाँव के ही सबसे शोषित समझे जाने वाले वाल्मीकि (भंगी) समाज के एक बुजुर्ग श्रमजीवी के हाथों बटन दबवाकर उद्योग की शुरूआत कराई गई। यह केवल फीता काटने या मशीन चालू करने की बात नहीं थी, बल्कि यह बहुजन समाज के स्वाभिमान, चेतना, और मानसिक आजादी का एक शंखनाद था। आज समय की मांग है कि पूरा बहुजन समाज भैड़ापुर के इस क्रांतिकारी कदम से प्रेरणा ले और यह संकल्प करे कि वे अपने किसी भी शुभ या अशुभ अवसर पर पाखंडी पंडे-पुजारियों को धन और दान देना पूरी तरह बंद करेंगे। इसके बजाय, वह धन अपने ही समाज के अत्यंत गरीब, शोषित, और अंतिम पंक्ति में खड़े लोगों—जैसे वाल्मीकि-भंगी और अन्य मेहनतकश वर्गों—की आर्थिक स्थिति सुधारने और बच्चों की शिक्षा में लगाएंगे।
धर्म के नाम पर लूट और सामाजिक भेदभाव: संसार का कोई भी देश या समाज केवल विचारों से मजबूत नहीं होता, उसकी रीढ़ उसकी आर्थिक स्थिति होती है। बहुजन समाज की गरीबी, शैक्षणिक पिछड़ेपन और राजनीतिक लाचारी का एक बड़ा कारण यह है कि उनकी गाढ़ी कमाई का एक बहुत बड़ा हिस्सा मंदिरों, चढ़ावों, कांवड़ यात्राओं, श्राद्ध, सत्यनारायण कथाओं, और वास्तु-पूजन जैसे आडंबरों में बह जाता है। बहुजन समाज का व्यक्ति दिन-रात शारीरिक श्रम करता है, ईंटें ढोता है, खेतों में पसीना बहाता है, और नालियों-सड़कों की सफाई करता है। लेकिन जब उसके पास कुछ पैसे इकट्ठा होते हैं, तो वह सदियों से थोपी गई मानसिक गुलामी के कारण उस पैसे को पंडितों के चरणों में उड़ेल देता है। विडंबना देखिए कि जिस वर्ग के हाथों (वाल्मीकि/शोषित समाज) सफाई न हो तो शहर और गाँव में महामारी फैल जाए, उसी वर्ग के इंसान को छूना भी तथाकथित धर्म के ठेकेदारों को अपवित्र लगता है। परंतु उसी समाज की गाढ़ी कमाई से दिया गया पैसा या दान लेने में पंडितों को कोई छुआछूत महसूस नहीं होती। यदि वही पैसा, जो हम किसी पंडित को दक्षिणा के रूप में देते हैं या मंदिरों के दानपात्रों में फेंकते हैं, अपने समाज के किसी गरीब भाई, किसी वाल्मीकि परिवार के बच्चे की फीस, किसी असहाय के इलाज, या किसी छोटे हुनरमंद के रोजगार के लिए दिया जाए, तो बहुजन समाज की भावी पीढ़ियाँ अपने पैरों पर खड़ी हो सकेंगी।
इतिहास: जहाँ धराशाई हुए मंत्र, तंत्र और तथाकथित चमत्कार
ब्राह्मणवादी व्यवस्था ने बहुजनों के मन में यह खौफ पैदा किया कि यदि पंडित पूजा-पाठ नहीं करेगा या मंत्र नहीं पढ़ेगा, तो ईश्वर का कोप टूटेगा या कोई अनिष्ट हो जाएगा। लेकिन भारत का संपूर्ण इतिहास इस बात का गवाह है कि जब-जब देश पर वास्तविक संकट आया, जब-जब विदेशी आक्रमणकारियों ने देश और मंदिरों को लूटा, तब ये मंत्र, तंत्र, हवन और पूजा-पाठ पूरी तरह निष्फल साबित हुए।
सोमनाथ मंदिर का विनाश: इतिहास का सबसे ज्वलंत उदाहरण गुजरात के प्रसिद्ध सोमनाथ मंदिर का है। जब महमूद गजनवी ने सोमनाथ मंदिर पर आक्रमण किया, तब वहाँ के हजारों पंडितों और पुजारियों ने राजा और जनता को लड़ने से रोक दिया। पुजारियों का दावा था कि सोमनाथ देव स्वयं अपनी अलौकिक शक्ति से गजनवी की सेना को भस्म कर देंगे। पुजारियों ने क्षत्रियों और सैनिकों को शस्त्र उठाने के बजाय मंदिर के भीतर बैठकर मंत्रोच्चार, जप और हवन करने की सलाह दी। परिणाम यह हुआ कि गजनवी की सेना ने बिना किसी बड़े सैन्य प्रतिरोध के मंदिर के विशाल द्वार तोड़ दिए, अपार धन-संपत्ति लूटी, मूर्तियों को खंडित किया और हजारों लोगों का कत्लेआम किया। उस दिन न तो कोई चमत्कार हुआ, न ही किसी मंत्र ने गजनवी की तलवार को रोका। पंडित और पुजारी केवल लाचार होकर देश और मंदिर को लुटते हुए देखते रहे या अपनी जान बचाकर भाग खड़े हुए। देश की रक्षा पुजारियों के मंत्रों ने नहीं, बल्कि रणभूमि में खून बहाने वाले योद्धाओं और मजदूरों के दम पर ही संभव थी। इतिहास में ऐसे दर्जनों मामले हैं जहाँ मध्यकाल से लेकर ब्रिटिश काल तक, जब-जब विदेशी शक्तियों ने भारतीय भूभाग पर कब्जा किया, तब तथाकथित सिद्ध पुरुषों और कर्मकांडियों के सभी दावे खोखले साबित हुए:
नादिरशाह का दिल्ली में कत्लेआम (1739): जब नादिरशाह ने दिल्ली पर आक्रमण किया और बेकसूर जनता का खून बहाया तथा तख्त-ए-ताऊस और कोहिनूर हीरा लूटकर ले गया, तब कोई भी यज्ञ, अनुष्ठान या पंडित उस तबाही को नहीं रोक सका।
ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी का कब्जा: अंग्रेजों ने दो सौ सालों तक भारत को गुलाम बनाकर रखा, देश की संपदा को निचोड़ा और यहाँ के लोगों पर अत्याचार किए। उस पूरे दौर में देश की आजादी की लड़ाई तंत्र-मंत्र से नहीं, बल्कि बहुजन समाज के वीरों (जैसे बिरसा मुंडा, उधम सिंह, झलकारी बाई) के खून और त्याग से लड़ी गई।
ये ऐतिहासिक घटनाएँ यह सिद्ध करती हैं कि इस धरती पर न तो कोई अलौकिक चमत्कार होता है और न ही मंत्रों में इतनी शक्ति है कि वे किसी बाह्य संकट को रोक सकें। समाज की असली ताकत उसका विज्ञान, उसकी शिक्षा, उसका पराक्रम और उसका श्रम होता है।
वर्तमान स्थिति: इतिहास के पाठ से सबक न लेने का नतीजा यह है कि आज 21वीं सदी में भी आस्था के नाम पर जनता की जेब काटने का सिलसिला जारी है। हाल के वर्षों में अयोध्या में भव्य राम मंदिर निर्माण के नाम पर देश के कोने-कोने से, विशेष रूप से बहुजन समाज के गरीब लोगों से करोड़ों-अरबों रुपये का चंदा एकत्र किया गया। लेकिन बाद में उसी चंदे के पैसों से जमीन खरीद-बिक्री में भारी घोटालों, भ्रष्टाचार और पैसों की हेराफेरी की खबरें मीडिया और सार्वजनिक मंचों की सुर्खियों में आईं। जिस जनता ने पेट काटकर, पेट की रोटी कम करके धर्म के नाम पर पैसा दिया, उसे बदले में क्या मिला? क्या उन मंदिरों के बनने से बहुजन समाज के बच्चों को मुफ़्त शिक्षा, अच्छे अस्पताल या सम्मानजनक रोजगार मिला? जवाब है—बिल्कुल नहीं। मंदिर का ट्रस्ट, वहाँ की अकूत संपत्ति और प्रबंधन का पूरा नियंत्रण आज भी उसी खास वर्ग के पास है, जबकि बहुजन समाज केवल कतारों में खड़े होकर धक्का खाने और चंदा देने के लिए इस्तेमाल होता है।
बुद्ध का अप्प दीपो भव और बहुजन महापुरुषों का मार्ग
तथागत बुद्ध ने आज से 2500 वर्ष पूर्व ही इस मानसिक गुलामी की काट प्रस्तुत की थी। बुद्ध ने कहा था—अप्प दीपो भव अर्थात अपने दीपक स्वयं बनो। बुद्ध ने सिखाया कि किसी भी बात को केवल इसलिए मत मानो क्योंकि वह किसी ग्रंथ में लिखी है, या किसी ब्राह्मण/पुजारी ने कही है, या परंपरा से चली आ रही है। उस बात को अपनी बुद्धि, तर्क, और विवेक की कसौटी पर परखो।
राष्ट्रपिता जोतिराव फुले और क्रांतिज्योति सावित्रीबाई फुले का संदेश: महात्मा फुले ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक गुलामगिरी में स्पष्ट लिखा था कि ब्राह्मणवादी व्यवस्था ने बहुजनों को विद्याहीन (शिक्षा से वंचित) रखकर ही गुलाम बनाया। उन्होंने पंडे-पुजारियों के बिना सत्यशोधक विवाह की शुरूआत की, जहाँ बिना किसी पंडित और कर्मकांड के विवाह संपन्न कराए जाते थे।
बाबा साहेब डॉ. बी.आर. आंबेडकर का मूलमंत्र: बाबा साहेब ने बहुजन समाज को तीन स्पष्ट निर्देश दिए थे: शिक्षित बनो, संगठित रहो, संघर्ष करो। बाबा साहेब ने साफ कहा था कि जब तक तुम मंदिरों में जाकर पत्थरों के आगे सिर टेकते रहोगे और पुजारियों को दान देते रहोगे, तब तक तुम्हारा समाज आर्थिक और वैचारिक रूप से कभी आजाद नहीं हो सकता।
यदि बहुजन समाज (दलित, आदिवासी, पिछड़े और अल्पसंख्यकों) को वास्तव में अपनी आने वाली पीढ़ियों को स्वाभिमानी, समृद्ध और सशक्त बनाना है, तो उन्हें अपने दैनिक जीवन में निम्नलिखित आर्थिक और सामाजिक बदलाव तुरंत लागू करने होंगे:
शुभ और अशुभ कार्यों से पाखंडियों का बहिष्कार:
=गृह-प्रवेश, दुकान/कारखाने का उद्घाटन, शादी-विवाह, मुंडन, या जन्मदिन जैसे किसी भी शुभ अवसर पर किसी भी पंडित या पंडे-पुजारी को न बुलाएं।
=किसी भी व्यक्ति की मृत्यु (अशुभ कार्य) के बाद किए जाने वाले तेरहवीं, पिंड दान, श्राद्ध और पंडे-भोज जैसी कुरीतियों पर एक भी रुपया खर्च न करें।
अपने लोगों को सम्मान और आर्थिक सहयोग:
=उद्घाटन और मांगलिक कार्यों की शुरूआत अपने घर के बुजुर्गों, माता-पिता, या अपने ही समाज के अत्यंत शोषित, मेहनतकश लोगों (जैसे वाल्मीकि, सफाई मित्र, कुशल कारीगर) के हाथों करवाएं।
=जो पैसा आप पूजा-पाठ, कथा-भागवत या पंडितों की दक्षिणा में खर्च करने वाले थे, उस पूरे पैसे को अपने गाँव या मोहल्ले के किसी गरीब वाल्मीकि/बहुजन परिवार के बच्चे की शिक्षा, किसी की बीमारी के इलाज या किसी गरीब बहन की शादी में आर्थिक मदद के रूप में दें।
काल्पनिक पूजा-पाठ के बजाय शिक्षा पर निवेश:
=अपने बच्चों को कांवड़ उठाने, कांवड़ शिविरों में सेवा करने या मंदिरों के चक्कर लगाने के बजाय पुस्तकालयों और कोचिंग सेंटरों में भेजें।
=मंदिरों में दान देने के बजाय अपने मोहल्लों में सावित्रीबाई फुले पुस्तकालय और आंबेडकर वाचनालय खोलें, जहाँ बच्चे बैठकर यूपीएससी, एसएससी, और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर सकें।
नशामुक्ति और आर्थिक स्वाभिमान:
=समाज का कोई भी व्यक्ति अपनी मेहनत का पैसा शराब और नशे में न लुटाए। नशा और अंधविश्वास—ये दोनों बहुजन समाज की सबसे बड़ी दीमक हैं।
=जातिवादी मानसिकता रखने वाले लोगों के यहाँ कभी भी मुफ्त या बेहद कम दाम पर श्रम न करें। अपनी मेहनत की पूरी कीमत मांगें और स्वाभिमान के साथ जिएं।
श्रम ही पूजा है, इंसानियत ही धर्म है
ग्राम भैड़ापुर ने पूरे देश के बहुजन समाज को एक दिशा दिखाई है। यह घटना हमें याद दिलाती है कि किसी भी काम की असली शुरूआत और सफलता किसी पंडित के श्लोक या हवन के धुएं से नहीं, बल्कि इंसान की नीयत, उसकी बुद्धि और मजदूर के पसीने से तय होती है। जब तक हम अपनी गाढ़ी कमाई को पाखंडी पुजारियों के हाथों में सौंपते रहेंगे, तब तक हम अपनी ही गुलामी के तंत्र को मजबूत करते रहेंगे। जिस दिन बहुजन समाज अपनी कमाई का एक-एक रुपया अपने लोगों, अपने वाल्मीकि भाइयों, अपने मजदूरों और अपने बच्चों की शिक्षा पर लगाना शुरू कर देगा, उसी दिन भारत में एक वास्तविक, समतामूलक और आंबेडकरवादी क्रांति का आगाज हो जाएगा। आइए, आज ही यह संकल्प लें: पाखंड छोड़ेंगे, शिक्षा चुनेंगे; पंडितों को दान नहीं, अपने समाज का आधार बनेंगे।





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