2025-03-13 12:31:35
कपिल देव
बोधगया, बिहार। महाबोधि महाविहार मंदिर को ब्राह्मणों के कब्जे से मुक्त करने और इसे पूरी तरह से बौद्ध समुदाय को सौंपने की मांग को लेकर पिछले 1 महीने से बौद्ध भिक्षु आमरण अनशन पर बैठे हुए संघर्ष कर रहे हैं। पूरी दुनिया में इस मुद्दे पर समर्थन मिल रहा है और बिहार विधान सभा के बाद यह मुद्दा बुधवार को संसद में उठाया गया।
नगीना से सांसद चन्द्रशेखर उर्फ रावण ने संसद में सरकार को चेतावनी देते हुए कहा कि अगर सरकार महाबोधि मंदिर को ब्राह्मणों से मुक्ति कराने और बीटी एक्ट को रद्द नहीं करती है तो बौद्ध समाज बड़ा आंदोलन करने को मजबूर हो जायेगा। उन्होंने आगे कहा कि भारत एक धर्म निरपेक्ष राष्ट्र है लेकिन मैं ऐसा समझता हूं कि यहां जिनकी सरकार है सिर्फ उन्हीं की बात होगी मुसलमानों की, जैनों की, सिखों की, रविदासियों की और बौद्धिस्टों की जो आंदोलन कर रहे हैं और पुलिस लाठी मार रही है उनकी नहीं सुनी जायेगी। उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि मैं समय रहते चेतित कर रहा हूं सरकार को चिंता करनी चाहिए कि बौद्धिस्टों का अपमान ज्यादा दिन बौद्धिस्ट बर्दाश्त नहीं करेंगे, महाबोधि महाविहार हमारा हक है और वो देना पड़ेगा।
वहीं महाबोधि मुक्ति आंदोलन का नेतृत्व कर रहे आॅल इंडिया बुद्धिस्ट फोरम के प्रमुख नेता आकाश लामा ने चेतावनी देते हुए कहा कि अगर बिहार सरकार उनकी मांगों पर ध्यान नहीं देती है, तो बुद्ध पूर्णिमा तक प्रतीक्षा की जाएगी। उसके बाद देश के कोने-कोने से 1 करोड़ बौद्ध बोधगया में एकत्र होंगे और एक विशाल आंदोलन शुरू किया जाएगा। आकाश लामा ने कहा कि अभी तक लाखों लोग सड़कों पर उतर चुके हैं, लेकिन अगर बिहार सरकार नहीं सुनती है, तो जल्द ही करोड़ों लोग बोधगया में आंदोलन करेंगे। आंदोलन में पूरे देश से बौद्ध इसमें शामिल होंगे।
समुदाय की तीन प्रमुख मांगें
<महाबोधि महाविहार का प्रबंधन पूरी तरह से बौद्ध समुदाय को सौंपने।
<बोधगया टेंपल एक्ट, 1949 को तुरंत रद्द करने।
<बौद्ध धार्मिक मामलों में राज्य के हस्तक्षेप को समाप्त करना शामिल है।
वहीं आमरण अनशन पर बैठे भिक्षुओं ने मंदिर प्रबंधन पर गंभीर आरोप लगाए हैं। उन्होंने कहा कि बुद्ध की सबसे बड़ी विरासत बोधगया मंदिर में दुनिया भर से आने वाले करोड़ों रुपये के डोनेशन का उपयोग बुद्ध धम्म के प्रचार और ज्ञान, करुणा और मैत्री के कार्यों में खर्च करने की बजाय अधिकारियों, मंत्रियों और राज्यपालों की आवभगत में अनर्गल व्यय किया जा रहा है।
महाराष्ट्र के आचार्य प्रज्ञाशील, जो बोधगया टेंपल मैनेजमेंट कमेटी में 6 साल तक सचिव के रूप में कार्यरत रहे हैं, ने कहा कि दुनिया भर से आने वाला डोनेशन बुद्ध के धम्म, करुणा और मैत्री के कार्यों जैसे शिक्षा और अस्पताल बनाने में खर्च नहीं किया जा रहा है, बल्कि इसे पाप कर्मों में लगाया जा रहा है। जिस पैसे से गरीब बच्चों के लिए स्कूल, कालेज, जरूरतमंदों के इलाज के लिए अस्पताल में धन खर्च करना चाहिए वो अफसरों की पगार, यहाँ आने वाले मंत्रियों , गवर्नर, नेताओं पर खर्च हो रहा है। मैं 6 साल इसमें सचिव रहा हूँ, मुझे जानकारी है कि कमेटी कैसे कार्य करती है। आचार्य प्रज्ञाशील ने कहा कि आज हम इतने दिनों से आंदोलन कर रहे हैं, लेकिन सरकारी मीडिया इस बात को दबाने का प्रयास कर रहा है। हालांकि, हमारे पास सोशल मीडिया है, और आज दुनिया भर को पता चल गया है कि बोधगया में क्या हो रहा है।
बिहार विधानसभा में उठा मामला
वहीं 7 मार्च को यह मामला बिहार विधानसभा में भी उठा गया था। बिहार विधानसभा में राष्ट्रीय जनता दल के विधायक सतीश कुमार दास ने बीटी एक्ट को निरस्त करने का प्रस्ताव रखा। उन्होंने पुरजोर तरीके से न सिर्फ इस मुद्दे को उठाया, बल्कि कई चुभते सवाल भी छोड़ दिये, जिससे हिन्दू धर्म के ठेकेदारों को मिर्ची लग गई है। मकदूमपुर विधानसभा से विधायक सतीश कुमार ने बौद्ध समाज की मांग को बिहार विधानसभा में उठाते हुए बीटी एक्ट को खत्म करने की वकालत की और आर्टिकल 26 के तहत बौद्धों को धार्मिक स्वतंत्रता देने की वकालत की। इस बीच सतीश कुमार के उस बयान के बाद बिहार विधानसभा में हंगामा मच गया, जब उन्होंने राम मंदिर में भी बौद्धों, मुस्लिमों और जैनों को अधिकार देने की बात कर दी।
क्या है मामला?
बोधगया के महाबोधि मंदिर का मामला कोई नया नहीं है। आजादी से पहले 1922 में गया में आयोजित कांग्रेस के अधिवेशन में भी यह मुद्दा उठाया गया था। इसके बाद पूर्व राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद समेत कई नेताओं के दखल के बाद 1948 में बोधगया टेंपल बिल बिहार विधानसभा में पेश किया गया। कानून बनने के बाद 1949 में इसे लागू कर दिया गया। चार साल बाद 1953 में मंदिर का कार्यभार बोधगया टेंपल मैनेजमेंट कमेटी को सौंप दिया गया।
क्या है बीटी एक्ट?
बीटी एक्ट के प्रावधान के मुताबिक बोधगया टेंपल मैनेजमेंट कमेटी में कुल आठ सदस्य होते हैं जिनमें से चार बौद्ध और चार हिंदू होते हैं। कमेटी के अध्यक्ष डीएम होते हैं। अगर डीएम हिंदू नहीं होते हैं तो किसी हिंदू सदस्य को ही अध्यक्ष बना दिया जाता था। हालांकि 2013 में इस एक्ट में संशोधन किया गया और डीएम के हिंदू होने के प्रावधान को खत्म कर दिया गया। बौद्धों का कहना है कि इस कमेटी में हिंदुओं का कोई काम नहीं है। उनका कहना है कि हिंदू पुजारी उनके तीर्थस्थल पर कब्जा कर रहे हैं। भगवान बुद्ध की प्रतिमा का भी भगवाकरण किया जा रहा है।
2300 साल पुराना है मंदिर
बोधगया में बोधि वृक्ष (पीपल का पेड़) के नीचे ही महात्मा बुद्ध को ज्ञान प्राप्त हुआ था। वहीं जब सम्राट अशोक ने बौद्ध धर्म स्वीकार किया तो उन्होंने तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व मंदिर बनवाया। 13वीं शताब्दी तक यह मंदिर बौद्धों के ही हाथ में था। 16वीं शताब्दी में घमंड गिरी नाम के पुजारी ने इस मंदिर में पूजा पाठ शुरू किया। तब से मंदिर को बौद्धों को लौटाने मांग हो रही है।
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