2024-11-02 09:58:15
कपिल देव, बहुजन स्वाभिमान
नई दिल्ली। देश में जहां भी इन मनुवादी ताकतों को मौका मिल रहा है, वे बाबा साहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर की प्रतिमाओं को ध्वस्त करने में लगे हैं, उनपर हमला कर रहे हैं। बाबासाहेब की मूर्ति को तोड़ने का मनुवादी अभियान बिना किसी रोक-टोक के चल रहा है। चाहे वह संसद भवन के प्रागंण में हो या फिर किसी चौक-चौराहे पर, इससे साफ है कि इन ताकतों को सबसे बड़ा खतरा बाबा साहेब और उनकी विचारधारा से ही है। ऐसे मामले पिछले दो-तीन दिन में देखने को मिले हैं जहां उत्तर प्रदेश के कानपुर के सजेती थाना क्षेत्र के नेहुरापारा गांव में मंगलवार को मनुवादियों ने डॉ. भीमराव अंबेडकर की प्रतिमा को खंडित कर दिया। वहीं बिहार के धपरा में प्रखंड की पंचुवा पंचायत के चकमीरा गांव में मनुवादियों ने बुधवार रात संविधान निर्माता बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर की प्रतिमा को क्षतिग्रस्त कर दिया। ऐसी ही घटनाएं बीजेपी शासित प्रदेश राजस्थान व मध्यप्रदेश में भी देखने को मिली हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 10 साल के शासनकाल में सबसे ज्यादा अंबेडकर की मूर्तियां तोड़ी गईं, शासन का हाल यह है कि उनकी मूर्ति को सुरक्षा में रखना पड़ रहा है और उसे भगवा रंग से रंगने की साजिश रची जा रही है। उनके नाम के साथ रामजी जोड़कर उन्हें भगवा खेमे में खड़ा करने की नापाक कोशिशों में बीजेपी व्यस्त नजर आ रही है।
बाबा साहेब के कद से डरे मनुवादी
एक बात और साफ है कि जो कद और सम्मान आज की तारीख में अंबेडकर को हासिल है वह किसी और को नहीं। वह निर्विवाद रूप से देश के सबसे बड़े और प्रभावशाली नेता हैं, जिनका नाम वे ताकतें भी जपने को मजबूर हैं, जिन्होंने अंबेडकर का जीते-जी जमकर विरोध किया और आज भी उनकी विचारधारा को ध्वस्त करने पर उतारू हैं। यानी अंबेडकर की अनदेखी करने का साहस कोई भी दल नहीं कर सकता। उनका यह कद बनाए रखने में अंबेडकर की विचारधारा की प्रासंगिकता और उसे मानने वाले अनुयायियों-अंबेडकरवादियों के बेहद कठिन संघर्ष की बड़ी भूमिका है। आज अंबेडकरवादियों और मनुवादियों के बीच संघर्ष बिल्कुल दूसरे स्तर पर पहुंच चुका है और इसी पर हमारे देश के लोकतंत्र का भविष्य भी टिका हुआ है। मनुवादी एक तरफ जहां संविधान में तब्दीली करने के लिए साम-दाम-दंड-भेद का इस्तेमाल कर रहे हैं, वहीं अंबेडकरवादी और जनपक्षधर ताकतें संविधान की रक्षा के लिए जान पर खेलने को तैयार नजर आ रही हैं।
दलितों में जबर्दस्त आक्रोश
ऐसा नहीं है कि इन घटनाओं लेकर समजा चुप है बल्कि दलित समाज में इस समय जबर्दस्त आक्रोश है। इसकी बानगी 9 अगस्त के महा आंदोलन में दिल्ली के जंतर-मंतर पर देखने को मिली थी। संसद के प्रांगण से बाबा साहेब की प्रतिमा को बिना किसी पूर्व सूचना के हटाने को लेकर बहुजन समाज ने अपनी आवाज को बुलंद तरीके से मोदी-संघी सरकार के सामने उठाया था। बाबा साहेब के द्वारा लंबे संघर्ष के बाद जो हक-अधिकार दलितों ने हासिल किए, उन्हें छीने जाने का डर अब हकीकत में बदल रहा है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा अनुसुचित जाति-जनजाति अत्याचार निवारण कानून में तब्दीली, आरक्षण में वर्गीकरण व अन्य दलित विरोधी फैसलों ने दलितों और वंचितों की आशंकाओं में आग लगा कर रख दी है।
बीजेपी, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और इनके तमाम आनुषांगिक संगठनों के नेतृत्व में जो वर्चस्ववादी जातियों का राजनीतिक प्रभुत्व स्थापित हो रहा है, उसने दलितों और आरक्षण की परिधि में आने वाले समूहों को आक्रांत किया है। पिछले कुछ समय में बीजेपी का स्वरूप घोषित तौर पर मनुवादी ताकतों वाली पार्टी और दंबग जातियों वाली पार्टी के रूप में सामने आया है। इसने दलितों और बैकवर्ड को एकसाथ एकजुट किया है। जातिगत नफरत उफान पर है। सिर्फ इसी वजह से जहां भी इन मनुवादी ताकतों को मौका मिल रहा है, वे अंबेडकर की मूर्ति को ध्वस्त कर रही हैं, उन पर हमला कर रही हैं। इससे यह साफ है कि इन ताकतों को सबसे बड़ा खतरा अंबेडकर और अंबेडकरवादी विचारधारा से दिखाई दे रहा है।
बाबा साहेब भीम राव अंबेडकर सिर्फ दलितों और वंचितों के ही अगुवा नेता नहीं हैं, वह देश के सबसे पहले नारीवादी नेता हैं। उन्होंने गुलामी और पतीत मानसिकता के प्रतीक मनुस्मृति को जलाने का जो साहसिक काम किया, वह उन्हें बिल्कुल अलग दर्जा देता है। उन्होंने जाति और पितृसत्ता के खिलाफ जो ऐतिहासिक लड़ाई लड़ी, वह बेमिसाल है। मनुस्मृति को जलाकर अंबेडकर ने जाति और पितृसत्ता सत्ता के नाश का सपना देखा, वह आज भी अधूरा है। यह सपना न सिर्फ अधूरा है, बल्कि इसे उलटने वाली ताकतों का राजनीतिक वर्चस्व स्थापित हो गया है। आज देश में मनुस्मृति को पाठ्यक्रम में शामिल करने की तैयारी हो रही है। बलात्कारियों के पक्ष में सरकारें, प्रशासन और पूरा तंत्र खड़ा नजर आ रहा है। कानून का राज संकट में हैं। संविधान और लोकतंत्र ही संकट में है। ऐसे में उन सभी तबकों और समूहों के स्वाभाविक नेता भीमराव अंबेडकर बन गए हैं, जो देश के धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक स्वरूप को बचाए रखना चाहते हैं। इस समय मनुवादी, भगवा ताकतों और अंबेडकरवादी-वाम जनपक्षधर लोकतांत्रिक ताकतों के बीच संघर्ष चल रहा है और इस पर ही देश का भविष्य टिका हुआ है।
राज्य सरकारों से लेकर केंद्र सरकार भी आज डॉ. बाबा साहब अंबेडकर की जयंती और परिनिर्वाण दिवस पर कार्यक्रम आयोजित करने का पाखंड कर रही हैं। इस तरह के दिखावे के कार्यक्रम करने की जगह डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर के जीवन-मूल्यों के अनुसार भारत में किसी भी दलित के साथ अन्याय अत्याचार नहीं होना चाहिए। लेकिन देश आजाद होने के बाद 77 साल के बावजूद भारत के सभी प्रदेशों में दलित समुदाय के साथ होने वाले अत्याचारों में कमी आने की जगह और ज्यादा बढ़ोत्तरी हो रही है। समस्त दलित, आदिवासी, महिलाओं से लेकर अल्पसंख्यक समुदायों के लोगों की जान-माल की सुरक्षा से लेकर उनके आत्मसम्मान के रक्षा के लिए विशेष रूप से भारतीय संविधान के अनुसार कारवाई होनी चाहिए।
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