




2026-06-13 14:34:02
अयोध्या के राम मंदिर में चढ़ावे और दान राशि में वित्तीय गड़बड़ी के आरोपों के बीच भगवा खेमे में बेचैनी बढ़ गई है. मंदिर का प्रबंधन करने वाले ट्रस्ट ने जिस अस्पष्ट तरीके से इस मामले को संभाला है, उससे अटकलों और संशय को और बढ़ावा मिला है। इस मामले में सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) से जुड़े कम से कम दो लोगों ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से दखल देने की मांग की है, जबकि मंदिर से जुड़े एक प्रमुख हिंदू संत ने उन ट्रस्ट सदस्यों की ईमानदारी पर भी सवाल उठाए हैं जो कथित तौर पर इन आरोपों की जांच कर रहे हैं। उल्लेखनीय है कि सात जून को समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव द्वारा सोशल मीडिया मंच एक्स पर इस संबंध में आरोप लगाए जाने के बाद इस विवाद ने तूल पकड़ लिया. इसके जवाब में श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट ने अपने महासचिव चंपत राय के जरिए सिर्फ एक स्पष्टीकरण जारी किया है।
प्राचीन और मध्यकालीन भारत में मंदिर केवल आस्था के केंद्र नहीं थे, बल्कि वे सबसे बड़े बैंक, सबसे बड़े जमींदार और सबसे बड़े रोजगार प्रदाता थे। राजा-महाराजा अपनी सत्ता को धार्मिक वैधता दिलाने के लिए मंदिरों को हजारों एकड़ जमीन (अग्रहारम) और अपार सोना दान में देते थे। इस अकूत संपत्ति का प्रबंधन पूरी तरह से एक विशिष्ट पुरोहित वर्ग (ब्राह्मणों) के हाथों में होता था। मंदिरों में गैर-सवर्णों (शूद्रों और अति-शूद्रों) के प्रवेश पर पाबंदी केवल छुआछूत या पवित्रता का मामला नहीं था। यह पूरी तरह से एक आर्थिक और सत्तावादी मॉडल था। यदि समाज के निचले तबके (बहुजनों और अछूतों) को मंदिर के भीतर आने और प्रबंधन में हिस्सा लेने की अनुमति मिल जाती, तो इस विशाल संपत्ति और संसाधनों का विकेंद्रीकरण हो जाता। इसलिए, शास्त्रों और अपवित्रता का डर दिखाकर उन्हें इस आर्थिक किले से हमेशा के लिए बाहर रखा गया।
चोरी नहीं, बल्कि धर्म के नाम पर वैध लूट
इतिहास में पुरोहित वर्ग को धन चुराने की आवश्यकता इसलिए नहीं पड़ी क्योंकि व्यवस्था के नियम ही ऐसे बनाए गए थे कि सारा धन वैध तरीके से उनके पास आए। जन्म से लेकर मृत्यु तक के हर संस्कार, सूर्य ग्रहण, चंद्र ग्रहण, और पाप मुक्ति के लिए पुजारियों को दान (गाय, स्वर्ण, भूमि, अन्न) देना अनिवार्य कर दिया गया। जब नियम बनाने वाले और उस नियम का फायदा उठाने वाले एक ही वर्ग के हों, तो उसे चोरी नहीं, बल्कि वैचारिक आधिपत्य कहा जाता है। आम जनता इस शोषण को अपना भाग्य या ईश्वर की इच्छा मानकर चुपचाप सहती रही। यही कारण था कि जब पेरियार, महात्मा ज्योतिराव फुले, श्री नारायण गुरु और डॉ. बी.आर. अंबेडकर जैसे विचारकों ने बहुजन समाज को जगाया, तो उनका एक बड़ा लक्ष्य मंदिरों पर इस एकाधिकार को तोड़ना था।
कालाराम मंदिर सत्याग्रह (1930): जब डॉ. अंबेडकर ने नासिक के कालाराम मंदिर में अछूतों के प्रवेश के लिए सत्याग्रह किया, तो सवर्णों ने भयंकर हिंसा की थी। अंबेडकर जानते थे कि भगवान पत्थर में है, लेकिन मंदिर में प्रवेश का मतलब समान नागरिक और सामाजिक अधिकारों की प्राप्ति था।
वाइकोम सत्याग्रह (1924-25): केरल में मंदिरों की ओर जाने वाली सड़कों पर दलितों के चलने के अधिकार के लिए यह एक ऐतिहासिक आंदोलन था।
आधुनिक युग की सच्चाई: आज के आधुनिक भारत में स्थिति थोड़ी बदल गई है, जिसे समझना जरूरी है: आज तिरुपति, वैष्णो देवी, सिद्धि विनायक और अयोध्या के राम मंदिर जैसे विशाल मंदिरों का जो मुख्य खजाना (दानपेटी) है, उस पर अब केवल पुजारियों का कब्जा नहीं है। आज यह संपत्ति भारत सरकार के नियंत्रण वाले बोर्ड्स और पब्लिक ट्रस्टों के पास है। इन ट्रस्टों में आईएएस अधिकारी, बड़े राजनेता और अरबपति व्यापारी बैठे हैं (यद्यपि इनमें भी सवर्णों का ही वर्चस्व है)। इसलिए, जो 7 करोड़ के गायब होने का वर्तमान आरोप है, वह पारंपरिक पुजारियों की दक्षिणा की चोरी नहीं है, बल्कि यह आधुनिक व्हाइट-कॉलर प्रशासनिक और संस्थागत भ्रष्टाचार का मामला है। धर्म की आड़ में एक विशेष वर्ग ने संसाधनों पर एकाधिकार बनाए रखा और दूसरों को अछूत बताकर बाहर रखा। आज भी पुजारियों के रूप में मिलने वाला वीआईपी रसूख और सीधी दक्षिणा उसी वर्चस्व का हिस्सा है। लेकिन आधुनिक घोटालों में अब केवल पुरोहित नहीं, बल्कि पूरी प्रशासनिक और राजनीतिक मशीनरी शामिल होती है।
श्री राम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र ट्रस्ट के प्रशासनिक अधिकारी
इस ट्रस्ट में कुल 15 सदस्य हैं (जिनमें 12 भारत सरकार द्वारा नामित और 3 अतिरिक्त सदस्य हैं), जिनके पास मंदिर के निर्माण से लेकर दान के प्रबंधन तक की पूरी जिम्मेदारी है।
महंत नृत्य गोपाल दास: अध्यक्ष
चंपत राय: महासचिव - जो ट्रस्ट के दैनिक प्रशासनिक कार्यों और मीडिया के प्रति जवाबदेह हैं।
स्वामी गोविंद देव गिरी जी महाराज: कोषाध्यक्ष - दान, फंड और खातों की मुख्य जिम्मेदारी इनके पास है।
नृपेंद्र मिश्र (पूर्व आईएएस): भवन निर्माण समिति के अध्यक्ष।
डॉ. अनिल मिश्रा: ट्रस्टी (जो अक्सर बैंक और टकसाल के साथ समन्वय की जानकारी मीडिया को देते हैं)।
प्रकाश गुप्ता: राम मंदिर ट्रस्ट के कार्यालय प्रभारी, जिनकी देखरेख में दान पेटियों से जुड़ी कई प्रशासनिक गतिविधियां होती हैं।
अन्य प्रमुख ट्रस्टी: के. परासरन (सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील), विमलेंद्र मोहन प्रताप मिश्र, कामेश्वर चौपाल (दलित प्रतिनिधि), स्वामी वासुदेवानंद सरस्वती, स्वामी विश्वप्रसन्नतीर्थ, युगपुरुष परमानंद जी महाराज, महंत दिनेंद्र दास।
पदेन सदस्य: इसमें केंद्र और राज्य सरकार के अधिकारी शामिल होते हैं, जैसे ज्ञानेश कुमार, अवनीश अवस्थी और अयोध्या के वर्तमान जिलाधिकारी।





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