




2026-08-29 17:31:39
सीनियर वकील कपिल सिब्बल ने हाल ही में कहा कि अगर लोकतंत्र के दो अहम स्तंभ न्यायपालिका और प्रेस सत्ता के गलत इस्तेमाल के आगे झुक जाते हैं तो इससे गणतंत्र अंदर से खोखला हो जाएगा। उन्होंने कहा कि न्यायपालिका और मीडिया का काम नागरिकों को बहुमत की भावनाओं से बचाना है, लेकिन अगर एक संस्था खुद को बचाने की चिंता में लगी हो और दूसरी सरकार के पक्ष में नैरेटिव बनाने में व्यस्त हो तो लोकतंत्र नहीं बचेगा। कपिल सिब्बल एक लेक्चर में ‘लोकतंत्र के दो सबसे मजबूत स्तंभ प्रेस और न्यायपालिका हैं: दोनों हमें निराश कर चुके हैं; क्यों?’ विषय पर बोल रहे थे। न्यायपालिका के बारे में बात करते हुए उन्होंने कहा कि यह संवैधानिक नैतिकता का आखिरी गढ़ है। फिर भी, हाल के उदाहरण- जैसे स्टूडेंट एक्टिविस्ट और जेएनयू स्कॉलर उमर खालिद की लगातार जेल में कैद और सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम की अपारदर्शिता- दिखाते हैं कि यह संस्था अपने ही संस्थागत समझौतों के कारण भारी दबाव में है।
उन्होंने कहा कि ऐसी न्यायपालिका जो नागरिकों की आजादी के बजाय संस्था को बचाने की ज्यादा चिंता करती है, जो खास कानूनों के तहत जमानत को संवैधानिक अधिकार के बजाय एक विशेष कृपा मानती है, और जो लोकतांत्रिक प्रक्रिया की कमियों को उसी राजनीतिक वर्ग पर छोड़ देती है, जिसे उनसे फायदा होता है, वह संविधान द्वारा परिकल्पित मजबूत अंकुश के तौर पर काम नहीं कर पाती। जनता का भरोसा कोई अमूर्त चीज नहीं है; यह न्यायिक अधिकार का एकमात्र आधार है। एक बार जब यह खत्म हो जाता है तो आखिरी गढ़ भी बहुत अनिश्चित जमीन पर खड़ा रह जाता है। सिब्बल ने बताया कि खालिद सितंबर 2020 से हिरासत में हैं; तब से उन्हें जमानत नहीं मिली है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने भी जमानत देने से इनकार किया, जबकि अभी तक ट्रायल शुरू भी नहीं हुआ। उन्होंने न्यायपालिका पर आरोप लगाया कि उसने दिल्ली दंगों के उनके मामले और इसी तरह के दूसरे मामलों में जमानत नियम है, जेल अपवाद है के सिद्धांत को लागू नहीं किया। उन्होंने आगे कहा कि जब ट्रायल से पहले की हिरासत ऐसे कानून के तहत आधे दशक तक खिंच जाती है, जिसका ढांचा ही गलत इस्तेमाल को बढ़ावा देता है तो जांच और सजा के बीच का अंतर खत्म हो जाता है। आजादी कार्यपालिका की सुविधा पर निर्भर हो जाती है।
सिब्बल ने कहा कि खालिद का मामला सबसे स्पष्ट उदाहरण है, लेकिन यह कोई अकेली विफलता नहीं है; गैर-कानूनी गतिविधि (रोकथाम) अधिनियम या मनी लॉन्ड्रिंग रोकथाम अधिनियम के तहत न्याय में देरी और जमानत से जुड़े कड़े नियमों का सिलसिला जारी है; इन कानूनों का इस्तेमाल अक्सर राजनीतिक विरोधियों को निशाना बनाने के लिए किया जाता है। उन्होंने खास तौर पर जमानत की उन दो शर्तों का जिÞक्र किया, जिनके तहत आरोपी को यह साबित करना होता है कि वह दोषी नहीं है और जमानत पर रहने के दौरान उसके कोई अपराध करने की संभावना नहीं है—ये दोनों ही शर्तें निर्दोषता के मूल सिद्धांत के विपरीत हैं।
पूरी तरह से नाकाम साबित हुआ कॉलेजियम
न्यायपालिका के सामने मौजूद बड़े ढांचागत मुद्दों पर बात करते हुए सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम सिस्टम की आलोचना की। उन्होंने कहा कि यह सिस्टम स्वतंत्र जजों को अचानक ट्रांसफर करके और उनकी नियुक्तियों में देरी करके उन्हें निशाना बनाने में मिलीभगत करता है। उन्होंने कहा कि कॉलेजियम सिस्टम, जिसे कभी कार्यपालिका के दखल से न्यायपालिका की आजादी का जरूरी सुरक्षा कवच माना जाता था, अब कई लोगों की नजर में ‘पूरी तरह से नाकाम’ हो चुका है। सिब्बल ने कहा कि बार के सीनियर सदस्य—जिनमें वे लोग भी शामिल हैं, जिन्होंने कभी इसके गठन की वकालत की थी—अब खुलेआम इसे पूरी तरह से नाकाम व्यवस्था बताते हैं। इसकी वजहें हैं—पारदर्शिता की कमी, कार्यपालिका के दबाव का ठीक से विरोध न कर पाना, और कभी-कभी स्वतंत्र जजों को ट्रांसफर या नियुक्ति में देरी के जरिए निशाना बनाने में मिलीभगत। प्रमोशन, कन्फर्मेशन और रिटायरमेंट के बाद मिलने वाले काम की प्रक्रिया पर कार्यपालिका का असर लगातार चिंता का विषय बना हुआ है। जब राजनीतिक कार्यपालिका के पास संसद में मजबूत बहुमत हो और वह जांच एजेंसियों को नियंत्रित करती हो, तो न्यायपालिका के लिए सावधानी बरतने की जरूरत और बढ़ जाती है। उन्होंने न्यायपालिका के अपनी आलोचना के प्रति बढ़ते असहिष्णु व्यवहार पर भी बात की। सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले का जिÞक्र करते हुए, जिसमें 8वीं कक्षा की सिविक्स (नागरिक शास्त्र) की किताब में न्यायपालिका पर एक विवादित चैप्टर लिखने वाले लेखकों को ब्लैकलिस्ट कर दिया गया (बाद में यह फैसला वापस ले लिया गया), सिब्बल ने कहा कि इस फैसले ने समाज में एक परेशान करने वाला संकेत भेजा। सीनियर एडवोकेट ने कहा, सुप्रीम कोर्ट का 2026 की शुरूआत में लिया गया वह फैसला—जिसमें 8वीं कक्षा की सिविक्स किताब के उस चैप्टर पर रोक लगा दी गई, जिसमें न्यायपालिका में भ्रष्टाचार पर चर्चा की गई थी। साथ ही उसके लेखकों को सरकारी फंड वाले कामों से ब्लैकलिस्ट कर दिया गया—संस्थान द्वारा अपनी कमियों की सार्वजनिक जांच के प्रति सहनशीलता के बारे में एक परेशान करने वाला संकेत देता है। जैसा कि मैंने पहले भी कहा है, लोगों का भरोसा कम हो रहा है, क्योंकि न्यायपालिका ने मुश्किल मौकों पर खुद ही यह स्थिति पैदा की है। इसके अलावा, सिब्बल ने दल-बदल विरोधी कानून की व्याख्या में दखल देने को लेकर कोर्ट की हिचकिचाहट का जिÞक्र किया। उन्होंने बताया कि उन्होंने विलय की अवधारणा की व्याख्या को चुनौती देते हुए एक रिट याचिका दायर की, लेकिन कहा कि कोर्ट ने सुधारात्मक कार्रवाई संसद पर छोड़ दी है, जबकि चुनावी जनादेश की अखंडता इसी दसवीं अनुसूची पर टिकी है। उन्होंने कहा कि जुलाई 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने खुद माना कि दसवीं अनुसूची में बहुत बड़ी समस्याएं हैं, जब वे विलय के प्रावधान की मौजूदा व्याख्या को चुनौती देने वाली मेरी व्यक्तिगत याचिका पर सुनवाई कर रहे थे। फिर भी, कोर्ट ने सुधारात्मक कार्रवाई का काम काफी हद तक संसद पर ही छोड़ दिया—वही संस्था जिसके सदस्य यथास्थिति से लाभ उठाते हैं। जब न्यायपालिका किसी ऐसी व्याख्या को सीमित करने से इनकार कर देती है, जिसने दल-बदल विरोधी कानून के मकसद का मजाक बना दिया है, तो लोकतांत्रिक जवाबदेही की संवैधानिक व्यवस्था को नुकसान पहुँचता है। मीडिया, जो कभी वॉचडॉग (निगरानी रखने वाला) था, अब सरकार के नैरेटिव को बढ़ावा दे रहा है आजाद प्रेस के गिरते स्तर पर सिब्बल ने कहा कि इसे कभी वॉचडॉग कहा जाता था, लेकिन अब यह सरकार के नैरेटिव को मैनेज करने तक सीमित रह गया है। इसी के चलते 2026 के वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स में भारत 180 देशों में 157वें स्थान पर है। साथ ही उन्होंने कहा कि स्वतंत्र पत्रकारों को आपराधिक मानहानि के मामलों के जरिए निशाना बनाया जा रहा है। उन्होंने बड़ी कंपनी अडानी एंटरप्राइजेज की शिकायत पर खोजी पत्रकार रवि नायर को सजा सुनाए जाने जैसे मामलों का जिÞक्र करते हुए कहा कि कोर्ट ने माना कि प्रकाशन निष्पक्ष रिपोर्टिंग से आगे निकल गए, उनमें घोषणात्मक और आरोप लगाने वाली भाषा का इस्तेमाल किया गया और कंपनी की नैतिक व व्यावसायिक प्रतिष्ठा को कम किया गया। जनहित के मामलों पर निष्पक्ष टिप्पणी के नायर के बचाव को खारिज कर दिया गया। बाद में अपील करने के लिए सजा को एक महीने के लिए रोक दिया गया, लेकिन दोषसिद्धि का फैसला एक डरावनी मिसाल के तौर पर कायम है: सत्ताधारी व्यवस्था से करीबी तौर पर जुड़े शक्तिशाली कॉपोर्रेट हित अभी भी आलोचनात्मक पत्रकारिता को दंडित करने के लिए आपराधिक प्रक्रिया का इस्तेमाल कर सकते हैं। उन्होंने द वायर के सिद्धार्थ वरदराजन और पत्रकारों करण थापर व अभिसार शर्मा और कई अन्य लोगों के खिलाफ कई एफआईआर दर्ज किए जाने, और अपना काम करने के कारण उन्हें—खासकर महिला पत्रकारों को—झेलने पड़े आॅनलाइन उत्पीड़न और शारीरिक हमलों का भी जिÞक्र किया। सिब्बल ने कहा कि जहाँ एक तरफ आजाद मीडिया को निशाना बनाया जा रहा है, वहीं टेलीविजन और डिजिटल मीडिया का एक बड़ा हिस्सा ऐसे आउटलेट्स में बदल गया, जिन्हें कई लोग खुलेआम गोदी मीडिया कहते हैं। इसके साथ ही एक और गंभीर संकट यह है कि मीडिया का मालिकाना हक ऐसे बिजनेस घरानों और उन लोगों के हाथों में है, जिनके राजनीतिक हित सरकार से जुड़े हैं। सिब्बल ने आगे कहा कि इसका कुल असर सार्वजनिक जीवन में साफ दिखता है। टेलीविजन और डिजिटल मीडिया का एक बड़ा हिस्सा अब ऐसे आउटलेट्स में बदल गया, जिन्हें नागरिक खुलेआम गोदी मीडिया कहते हैं; ये आउटलेट्स सरकारी नैरेटिव को बढ़ावा देते हैं, विपक्ष की आवाज को दबाते हैं और सत्ता की पड़ताल को देशद्रोह जैसा मानते हैं। प्रधानमंत्री ने एक दशक से ज्यादा समय में एक भी खुली, बिना स्क्रिप्ट वाली प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं की है। अधिकारी इस चुप्पी को यह कहकर सही ठहराते हैं कि वे ग्रामीण मतदाताओं से सीधे बातचीत करना पसंद करते हैं—यह तर्क पूरी तरह से गलत और चिंताजनक है। सिब्बल ने पेपर लीक को लेकर छात्रों के हालिया विरोध-प्रदर्शन पर भी बात की और बताया कि कैसे जनता का गुस्सा मीडिया के उन हिस्सों पर भी फूटा, जिन्हें सरकार का करीबी माना जाता है। पत्रकारों पर हुए हमले की निंदा करते हुए सिब्बल ने कहा कि जहाँ एडिटर्स गिल्ड आॅफ इंडिया ने इन हमलों की आलोचना की, वहीं उसे इस परेशान करने वाले सच को भी माननापड़ा कि एकतरफा और पक्षपाती रिपोर्टिंग ने मीडिया की विश्वसनीयता को कम कर दिया। सीनियर एडवोकेट ने कहा कि एडिटर्स गिल्ड आॅफ इंडिया ने हिंसा की सही ही निंदा की और कहा कि जनता का कितना भी गुस्सा क्यों न हो, पत्रकारों पर हमलों को सही नहीं ठहराया जा सकता। साथ ही, गिल्ड को एक कड़वी सच्चाई भी माननी पड़ी: गलत, एकतरफा और साफ तौर पर पक्षपाती रिपोर्टिंग ने मीडिया की विश्वसनीयता को कम किया और इस तरह लोकतंत्र के एक स्तंभ के तौर पर उसके दावे को कमजोर किया। जब टेलीविजन न्यूज का एक बड़ा हिस्सा स्वतंत्र जांच-पड़ताल के मंच के बजाय सरकारी नैरेटिव को फैलाने का जरिया बन जाता है तो जनता उन्हें वॉचडॉग (निगरानी करने वाले) के तौर पर नहीं देखती, बल्कि उन्हें उसी सत्ता-ढांचे का हिस्सा मानने लगती है, जिससे उन्हें सवाल-जवाब करना चाहिए था।
उन्होंने आगे कहा कि यह हमला अचानक नहीं हुआ, बल्कि यह एक संवैधानिक संस्था के तौर पर प्रेस की बड़ी विफलता को दिखाता है। प्रेस कॉपोर्रेट और सरकार की नजदीकियों पर जरूरी रिपोर्टिंग का विरोध करने में नाकाम रहा, या मुख्यमंत्रियों की आलोचना के बाद जब अखबारों के दफ़्तरों में तोड़-फोड़ हुई, तब भी उसने आवाज नहीं उठाई। या फिर ऐसी स्थिति में भी, जहां सरकार को इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी (इंटरमीडियरी गाइडलाइंस एंड डिजिटल मीडिया एथिक्स कोड) अमेंडमेंट रूल्स, 2026 के जरिए कंटेंट हटाने की व्यापक शक्तियां दी गईं। इसलिए जुलाई 2026 में भड़की नफरत सिर्फ अचानक हुई अव्यवस्था नहीं थी; यह उस गहरे संकट का भी लक्षण थी जो तब पैदा होता है, जब प्रेस अपनी संवैधानिक भूमिका छोड़ देता है और नागरिकों की नजर में उसी सत्ता का विस्तार बन जाता है, जिस पर उसे सवाल उठाना चाहिए था।





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