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पीएम मोदी का जवाबदेही से बचने का पीआर टूल

नीट-यूजी की पुर्नपरीक्षा में सेना की मदद लेने का दावा
News

2026-06-01 16:38:05

संवाददाता नई दिल्ली। 3 मई को आयोजित हुई नीट-यूजी परीक्षा के पेपर लीक होने और 12 मई को इसे रद्द किए जाने के बाद देश के 22 लाख से अधिक छात्र संवाददाता

नई दिल्ली। 3 मई को आयोजित हुई नीट-यूजी परीक्षा के पेपर लीक होने और 12 मई को इसे रद्द किए जाने के बाद देश के 22 लाख से अधिक छात्र मानसिक प्रताड़ना और अनिश्चितता के दौर से गुजर रहे हैं। इस महा-संकट के बीच, केंद्र सरकार आगामी 21 जून को होने वाली पुर्नपरीक्षा को लेकर एक नया नैरेटिव तैयार कर रही है। मीडिया रिपोर्ट्स और सुप्रीम कोर्ट में सरकार के हलफनामे के मुताबिक, अब खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस परीक्षा की व्यक्तिगत रूप से निगरानी कर रहे हैं, और प्रश्नपत्रों के सुरक्षित परिवहन (लॉजिस्टिक्स) के लिए भारतीय थल सेना तथा वायुसेना (आईएएाऊ) की मदद लेने की तैयारी चल रही है।

अखबारों की सुर्खियां और सरकार के बयान इसे एक ‘ऐतिहासिक और कड़ा कदम’ बताकर पेश कर रहे हैं, लेकिन नीतिगत, प्रशासनिक और लोकतांत्रिक दृष्टिकोण से इस कदम की गहरी आलोचना की जानी बेहद जरूरी है। यह कदम देश की सिविल व्यवस्था की घोर विफलता को स्वीकार करने और एक अकादमिक परीक्षा को सैन्य आॅपरेशन में तब्दील कर देने की खतरनाक प्रवृत्ति को दर्शाता है।

एक लोकतांत्रिक और प्रशासनिक व्यवस्था में मेडिकल प्रवेश परीक्षा आयोजित करना पूरी तरह से नागरिक प्रशासन, शिक्षा मंत्रालय और राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी का दायित्व है। प्रश्नपत्रों की छपाई से लेकर परीक्षा केंद्रों तक उनकी सुरक्षित पहुंच सुनिश्चित करने के लिए हमारे पास एक विशाल प्रशासनिक ढांचा, पुलिस बल और खुफिया तंत्र मौजूद है। परीक्षा के लॉजिस्टिक्स के लिए सेना और वायुसेना को मोर्चे पर उतारने का विचार इस बात का खुला प्रमाण है कि सरकार का अपनी ही नागरिक सुरक्षा एजेंसियों, राज्य की पुलिस और डाक विभाग से भरोसा पूरी तरह उठ चुका है। यदि देश की सबसे प्रतिष्ठित परीक्षा के पेपर लीक को रोकने के लिए हमें सुखोई, सी-17 ग्लोबमास्टर या सैन्य ट्रकों की जरूरत पड़ने लगे, तो यह इस बात की आधिकारिक संस्वीकृति है कि देश का सामान्य कानून और प्रशासनिक ढांचा अपराधियों और पेपर लीक माफियाओं के सामने घुटने टेक चुका है।

सॉलिसिटर जनरल ने देश की सर्वोच्च अदालत को बताया कि ‘प्रधानमंत्री व्यक्तिगत रूप से इस प्रक्रिया की निगरानी कर रहे हैं ताकि कोई कमी न रहे।’ पहली नजर में यह बयान छात्रों के प्रति संवेदनशीलता जैसा दिख सकता है, लेकिन प्रशासनिक सिद्धांतों के चश्मे से देखें तो यह एक बड़ी विसंगति है। भारत के पास एक पूर्णकालिक शिक्षा मंत्री, शिक्षा मंत्रालय के सचिव, एनटीए के महानिदेशक और दर्जनों विशेषज्ञ अधिकारियों की फौज है। जब एक स्वायत्त संस्था (एनटीए) फेल होती है, तो जिम्मेदारी तय होनी चाहिए और इस्तीफे होने चाहिए।

इसके विपरीत, पूरी प्रक्रिया को सीधे पीएमओ (पीएमओ) या प्रधानमंत्री की व्यक्तिगत निगरानी के अधीन दिखाकर संस्थागत विफलताओं को छिपाने की कोशिश की जा रही है।

इवेंट मैनेजमेंट की बू: आलोचकों और विपक्षी नेताओं का आरोप है कि इस कदम के जरिए एक घोर प्रशासनिक विफलता और भ्रष्टाचार के मामले को ‘पीएम मोदी द्वारा संकट निवारण’ के एक बड़े इवेंट या पीआर नैरेटिव में बदलने की कोशिश की जा रही है। सवाल यह है कि जब 3 मई को पेपर लीक हो रहा था, तब यह निगरानी और सख्ती कहां थी?

सैन्य बलों का गैर-सैन्य कार्यों में अत्यधिक इस्तेमाल

भारतीय सशस्त्र बल (थल सेना, नौसेना और वायुसेना) देश की सीमाओं की रक्षा, बाहरी खतरों और प्राकृतिक आपदाओं (बाढ़, चक्रवात) के समय आपातकालीन राहत कार्यों के लिए आरक्षित हैं। भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में यह पहली बार होने जा रहा है कि किसी राष्ट्रीय स्तर की प्रवेश परीक्षा के पर्चे ढोने के लिए देश की सेना का औपचारिक इस्तेमाल करने पर विचार किया जा रहा है।

प्रशासनिक विशेषज्ञों का मानना है कि सेना का इस तरह के गैर-सैन्य या नियमित प्रशासनिक कार्यों में उपयोग करना उनके पेशेवर समय का नुकसान है। आज परीक्षा के लिए सेना बुलाई जा रही है, कल को यदि कोई अन्य सरकारी चयन परीक्षा या बोर्ड परीक्षा दांव पर होगी, तो क्या वहां भी सेना तैनात की जाएगी? यह नागरिक कार्यों के सैन्यीकरण की एक ऐसी शुरूआत हो सकती है जो किसी भी स्वस्थ लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं है।

बुनियादी समस्याओं को टालने की सतही कोशिश

पेपर लीक की समस्या लॉजिस्टिक्स की नहीं, बल्कि संस्थागत सड़न और भ्रष्टाचार की है। जांच एजेंसियों (सीबीआई) की अब तक की कार्रवाई से साफ है कि पेपर परीक्षा केंद्रों तक जाते वक्त रास्ते में नहीं लूटे जाते, बल्कि वे छपाई प्रेस (प्रिटिंग प्रेस), मजबूत कमरों या परीक्षा के कर्ता-धतार्ओं की मिलीभगत से अंदरखाने लीक होते हैं। वायुसेना के विमानों से प्रश्नपत्रों को एक शहर से दूसरे शहर ले जाने से वह भ्रष्टाचार नहीं रुक सकता जो डिजिटल स्तर पर, या एनटीए के भीतर बैठे अधिकारियों और निजी वेंडरों के गठजोड़ से होता है। सरकार का यह कदम समस्या के मूल कारण का इलाज करने के बजाय केवल बाहरी लक्षणों पर पट्टी बांधने जैसा है। सुरक्षा का यह दिखावा छात्रों और अभिभावकों के मन में सुरक्षा का भ्रम तो पैदा कर सकता है, लेकिन परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता को भीतर से बहाल नहीं कर सकता।

छात्रों के मानसिक तनाव और लोकतांत्रिक मर्यादा पर चोट

22 लाख से अधिक युवा छात्र पहले ही परीक्षा रद्द होने के सदमे और दोबारा तैयारी करने के भारी मानसिक दबाव से गुजर रहे हैं। जब वे अपनी परीक्षा के चारों ओर सेना, वायुसेना और प्रधानमंत्री के स्तर की सुरक्षात्मक घेरेबंदी देखेंगे, तो परीक्षा कक्ष का माहौल किसी अकादमिक मूल्यांकन केंद्र के बजाय युद्ध क्षेत्र जैसा प्रतीत होगा। यह अत्यधिक दबाव छात्रों के प्रदर्शन को और अधिक प्रभावित कर सकता है। इसके अलावा, इस कदम के जरिए परोक्ष रूप से राज्यों की कानून-व्यवस्था पर भी अविश्वास जताया जा रहा है। चूंकि परीक्षा पूरे देश के विभिन्न राज्यों में होनी है, इसलिए राज्य सरकारों और स्थानीय पुलिस को भरोसे में लेने के बजाय सीधे केंद्रीय सैन्य बलों का सहारा लेना सहकारी संघवाद की भावना के भी विपरीत है।

नीट-यूजी 2026 की पुर्नपरीक्षा को निष्पक्ष और पारदर्शी तरीके से कराना सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए, इसमें कोई दो राय नहीं है। लेकिन इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए अपनाया जा रहा ‘सैन्य-लॉजिस्टिक्स और पीएम-निगरानी’ का मॉडल एक खतरनाक नजीर पेश करता है। यह कदम व्यवस्था की मजबूती का नहीं, बल्कि हमारी लोकतांत्रिक संस्थाओं और सिविल ब्यूरोक्रेसी के खोखलेपन का विज्ञापन है। सरकार को पब्लिसिटी और लोक-लुभावन कदमों से आगे बढ़कर एनटीए के ढांचे में आमूल-चूल सुधार, कड़े तकनीकी नियंत्रण और जवाबदेही तय करने जैसे ठोस कदम उठाने चाहिए, न कि परीक्षा की पवित्रता को सेना की बंदूकों के साये में खोजने का प्रयास करना चाहिए।

मानसिक प्रताड़ना और अनिश्चितता के दौर से गुजर रहे हैं। इस महा-संकट के बीच, केंद्र सरकार आगामी 21 जून को होने वाली पुर्नपरीक्षा को लेकर एक नया नैरेटिव तैयार कर रही है। मीडिया रिपोर्ट्स और सुप्रीम कोर्ट में सरकार के हलफनामे के मुताबिक, अब खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इस परीक्षा की व्यक्तिगत रूप से निगरानी कर रहे हैं, और प्रश्नपत्रों के सुरक्षित परिवहन (लॉजिस्टिक्स) के लिए भारतीय थल सेना तथा वायुसेना (आईएएाऊ) की मदद लेने की तैयारी चल रही है।

अखबारों की सुर्खियां और सरकार के बयान इसे एक ‘ऐतिहासिक और कड़ा कदम’ बताकर पेश कर रहे हैं, लेकिन नीतिगत, प्रशासनिक और लोकतांत्रिक दृष्टिकोण से इस कदम की गहरी आलोचना की जानी बेहद जरूरी है। यह कदम देश की सिविल व्यवस्था की घोर विफलता को स्वीकार करने और एक अकादमिक परीक्षा को सैन्य आॅपरेशन में तब्दील कर देने की खतरनाक प्रवृत्ति को दर्शाता है।

एक लोकतांत्रिक और प्रशासनिक व्यवस्था में मेडिकल प्रवेश परीक्षा आयोजित करना पूरी तरह से नागरिक प्रशासन, शिक्षा मंत्रालय और राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी का दायित्व है। प्रश्नपत्रों की छपाई से लेकर परीक्षा केंद्रों तक उनकी सुरक्षित पहुंच सुनिश्चित करने के लिए हमारे पास एक विशाल प्रशासनिक ढांचा, पुलिस बल और खुफिया तंत्र मौजूद है। परीक्षा के लॉजिस्टिक्स के लिए सेना और वायुसेना को मोर्चे पर उतारने का विचार इस बात का खुला प्रमाण है कि सरकार का अपनी ही नागरिक सुरक्षा एजेंसियों, राज्य की पुलिस और डाक विभाग से भरोसा पूरी तरह उठ चुका है। यदि देश की सबसे प्रतिष्ठित परीक्षा के पेपर लीक को रोकने के लिए हमें सुखोई, सी-17 ग्लोबमास्टर या सैन्य ट्रकों की जरूरत पड़ने लगे, तो यह इस बात की आधिकारिक संस्वीकृति है कि देश का सामान्य कानून और प्रशासनिक ढांचा अपराधियों और पेपर लीक माफियाओं के सामने घुटने टेक चुका है।

सॉलिसिटर जनरल ने देश की सर्वोच्च अदालत को बताया कि ‘प्रधानमंत्री व्यक्तिगत रूप से इस प्रक्रिया की निगरानी कर रहे हैं ताकि कोई कमी न रहे।’ पहली नजर में यह बयान छात्रों के प्रति संवेदनशीलता जैसा दिख सकता है, लेकिन प्रशासनिक सिद्धांतों के चश्मे से देखें तो यह एक बड़ी विसंगति है। भारत के पास एक पूर्णकालिक शिक्षा मंत्री, शिक्षा मंत्रालय के सचिव, एनटीए के महानिदेशक और दर्जनों विशेषज्ञ अधिकारियों की फौज है। जब एक स्वायत्त संस्था (एनटीए) फेल होती है, तो जिम्मेदारी तय होनी चाहिए और इस्तीफे होने चाहिए।

इसके विपरीत, पूरी प्रक्रिया को सीधे पीएमओ (पीएमओ) या प्रधानमंत्री की व्यक्तिगत निगरानी के अधीन दिखाकर संस्थागत विफलताओं को छिपाने की कोशिश की जा रही है।

इवेंट मैनेजमेंट की बू: आलोचकों और विपक्षी नेताओं का आरोप है कि इस कदम के जरिए एक घोर प्रशासनिक विफलता और भ्रष्टाचार के मामले को ‘पीएम मोदी द्वारा संकट निवारण’ के एक बड़े इवेंट या पीआर नैरेटिव में बदलने की कोशिश की जा रही है। सवाल यह है कि जब 3 मई को पेपर लीक हो रहा था, तब यह निगरानी और सख्ती कहां थी?

सैन्य बलों का गैर-सैन्य कार्यों में अत्यधिक इस्तेमाल

भारतीय सशस्त्र बल (थल सेना, नौसेना और वायुसेना) देश की सीमाओं की रक्षा, बाहरी खतरों और प्राकृतिक आपदाओं (बाढ़, चक्रवात) के समय आपातकालीन राहत कार्यों के लिए आरक्षित हैं। भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में यह पहली बार होने जा रहा है कि किसी राष्ट्रीय स्तर की प्रवेश परीक्षा के पर्चे ढोने के लिए देश की सेना का औपचारिक इस्तेमाल करने पर विचार किया जा रहा है।

प्रशासनिक विशेषज्ञों का मानना है कि सेना का इस तरह के गैर-सैन्य या नियमित प्रशासनिक कार्यों में उपयोग करना उनके पेशेवर समय का नुकसान है। आज परीक्षा के लिए सेना बुलाई जा रही है, कल को यदि कोई अन्य सरकारी चयन परीक्षा या बोर्ड परीक्षा दांव पर होगी, तो क्या वहां भी सेना तैनात की जाएगी? यह नागरिक कार्यों के सैन्यीकरण की एक ऐसी शुरूआत हो सकती है जो किसी भी स्वस्थ लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं है।

बुनियादी समस्याओं को टालने की सतही कोशिश

पेपर लीक की समस्या लॉजिस्टिक्स की नहीं, बल्कि संस्थागत सड़न और भ्रष्टाचार की है। जांच एजेंसियों (सीबीआई) की अब तक की कार्रवाई से साफ है कि पेपर परीक्षा केंद्रों तक जाते वक्त रास्ते में नहीं लूटे जाते, बल्कि वे छपाई प्रेस (प्रिटिंग प्रेस), मजबूत कमरों या परीक्षा के कर्ता-धतार्ओं की मिलीभगत से अंदरखाने लीक होते हैं। वायुसेना के विमानों से प्रश्नपत्रों को एक शहर से दूसरे शहर ले जाने से वह भ्रष्टाचार नहीं रुक सकता जो डिजिटल स्तर पर, या एनटीए के भीतर बैठे अधिकारियों और निजी वेंडरों के गठजोड़ से होता है। सरकार का यह कदम समस्या के मूल कारण का इलाज करने के बजाय केवल बाहरी लक्षणों पर पट्टी बांधने जैसा है। सुरक्षा का यह दिखावा छात्रों और अभिभावकों के मन में सुरक्षा का भ्रम तो पैदा कर सकता है, लेकिन परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता को भीतर से बहाल नहीं कर सकता।

छात्रों के मानसिक तनाव और लोकतांत्रिक मर्यादा पर चोट

22 लाख से अधिक युवा छात्र पहले ही परीक्षा रद्द होने के सदमे और दोबारा तैयारी करने के भारी मानसिक दबाव से गुजर रहे हैं। जब वे अपनी परीक्षा के चारों ओर सेना, वायुसेना और प्रधानमंत्री के स्तर की सुरक्षात्मक घेरेबंदी देखेंगे, तो परीक्षा कक्ष का माहौल किसी अकादमिक मूल्यांकन केंद्र के बजाय युद्ध क्षेत्र जैसा प्रतीत होगा। यह अत्यधिक दबाव छात्रों के प्रदर्शन को और अधिक प्रभावित कर सकता है। इसके अलावा, इस कदम के जरिए परोक्ष रूप से राज्यों की कानून-व्यवस्था पर भी अविश्वास जताया जा रहा है। चूंकि परीक्षा पूरे देश के विभिन्न राज्यों में होनी है, इसलिए राज्य सरकारों और स्थानीय पुलिस को भरोसे में लेने के बजाय सीधे केंद्रीय सैन्य बलों का सहारा लेना सहकारी संघवाद की भावना के भी विपरीत है।

नीट-यूजी 2026 की पुर्नपरीक्षा को निष्पक्ष और पारदर्शी तरीके से कराना सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए, इसमें कोई दो राय नहीं है। लेकिन इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए अपनाया जा रहा ‘सैन्य-लॉजिस्टिक्स और पीएम-निगरानी’ का मॉडल एक खतरनाक नजीर पेश करता है। यह कदम व्यवस्था की मजबूती का नहीं, बल्कि हमारी लोकतांत्रिक संस्थाओं और सिविल ब्यूरोक्रेसी के खोखलेपन का विज्ञापन है। सरकार को पब्लिसिटी और लोक-लुभावन कदमों से आगे बढ़कर एनटीए के ढांचे में आमूल-चूल सुधार, कड़े तकनीकी नियंत्रण और जवाबदेही तय करने जैसे ठोस कदम उठाने चाहिए, न कि परीक्षा की पवित्रता को सेना की बंदूकों के साये में खोजने का प्रयास करना चाहिए।

भारतीय सेना सीमाओं की रक्षा के लिए है ना कि पेपर लीक की

भारत में नीट परीक्षा के दौरान पेपर लीक का मामला यहां की मनुवादी संघी मानसिकता से जुड़ा मामला है चूंकि जबसे केन्द्र में मोदी-संघी सरकार आयी है तभी से देश के प्रत्येक शैक्षणिक संस्थानों में मनुवादी संघियों को स्थापित कर दिया गया है। तथा देश की ऐसी सभी प्रतियोगतात्मक परीक्षाओं में मनुवादी संघी व्यक्तियों को ही इनका इनचार्ज बनाया जा रहा है। सरकार में बैठे जो लोग शिक्षा से जुड़े हैं वे भी इस मानसिकता से संक्रमित हैं। 70-80 और 90 के दशक में मनुवादी मीडिया यह प्रचार करता था की आरक्षण के द्वारा बने डॉक्टर सक्षम नहीं हैं, वे मरीज का आॅपरेशन करते समय कैंची या अन्य उपकरण उनके अन्दर ही छोड़ देते हैं। उस समय का यह मनुवादी प्रचार इसलिए था ताकि आरक्षित वर्ग के लोग डॉक्टर ना बन पायें और ना ही इस पेशे में आने की हिम्मत जुटा पायें। चूंकि इस पेशे में अधिकतर लोग ब्राह्मण-बनिया समुदाय से जुड़े ही लोग थे जिसपर वे अपना एकाधिकार रखना चाहते थे। शहरों में अधिकाशत: देखा गया है कि क्लीनिक व नर्सिंग होम आदि के मालिक इसी समुदाय से जुड़े होते हैं। इसी समुदाय से जुड़े लोग अपने बच्चों को पैसे की ताकत से विभिन्न कॉलेजों व विश्वविद्यालयों में दाखिला दिलाकर उन्हें डॉक्टर बना देते हैं, जो वहां से मेडिकल की डिग्री हासिल करके इन मेडिकल नर्सिंग होम व कॉलेजों के मालिक बन जाते हैं और जनता से मन-माना पैसा लूटते हैं। वर्तमान समय में पूंजीवाद और जातिवाद चरम पर है इसलिए जिनके पास पूंजी है वे ही लोग मेडिकल या ऐसे ही दूसरे क्षेत्रों से जुड़े होते हैं जो अपने पैसे की ताकत से डिग्रियां लेकर जनता में आकर उन्हें लूटने का काम करते हैं। नीट पेपर लीक भी इसी ब्राह्मण-बनिया संघी चक्रव्यूह का नतीजा है। सत्ता में बैठे मंत्री-संतरी पेपर लीक में परोक्ष रूप से शामिल हैं। अखबारों में अपने बयान छपवाकर जनता को मूर्ख बनाने के लिए बयान दे रहे हैं कि किसी को बख्शा नहीं जायेगा। देश की जनता सरकार से पूछना चाहती है कि पिछले 12-13 वर्षों में जिन परीक्षाओं के पेपर लीक हुए हैं उनकी जो जांच हुई है उसका परिणाम आजतक क्या रहा है? सरकार को यह परिणाम पारदर्शिता के साथ जनता के सामने रखना चाहिए अन्यथा जनता यही समझेगी की सरकार अपनी विफलता और अपने लोगों को बचाने के लिए बार-बार निरर्थक बयानबाजी करती रहती है।

केन्द्र सरकार के प्रधानमंत्री और मंत्री अपने बयान में कह रहे हैं कि पेपर लीक को रोकने के लिए हम सेना की मदद लेंगे। इन मूर्खों से ये देश जानना चाहता है कि सेना का काम देश के बॉर्डर की सुरक्षा करना होता है, पेपर लीक को सेना कैसे रोक पायेगी? ये सभी नेता ऐसे बयान देकर जनता में भ्रम पैदा कर रहे हैं कि सरकार पेपर लीक के मामले को लेकर चिंतित है और वह सटीक इंतजाम कर रही है। बल्कि ऐसा नहीं है सरकार और सरकार के मंत्री ही इस सारे खेल के लिए जिम्मेदार हैं, चूंकि पेपर लीक के माध्यम से जनता से जो पैसा छिपाकर लूटा जा रहा है वह इस खेल से जुड़े सभी लोगों में अदर्श रूप से बांटा जा रहा है। जिसे सरकार उजागर नहीं करना चाहेगी इसलिए खोखली बयानबाजी और बेमतलब के छलावे जनता को देती रहेगी ताकि कुछ समय बाद पेपल लीक का मामला जनता भूल जाये।

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01 जनवरी : मूलनिवासी शौर्य दिवस (भीमा कोरेगांव-पुणे) (1818)

01 जनवरी : राष्ट्रपिता ज्योतिबा फुले और राष्ट्रमाता सावित्री बाई फुले द्वारा प्रथम भारतीय पाठशाला प्रारंभ (1848)

01 जनवरी : बाबा साहेब अम्बेडकर द्वारा ‘द अनटचैबिल्स’ नामक पुस्तक का प्रकाशन (1948)

01 जनवरी : मण्डल आयोग का गठन (1979)

02 जनवरी : गुरु कबीर स्मृति दिवस (1476)

03 जनवरी : राष्ट्रमाता सावित्रीबाई फुले जयंती दिवस (1831)

06 जनवरी : बाबू हरदास एल. एन. जयंती (1904)

08 जनवरी : विश्व बौद्ध ध्वज दिवस (1891)

09 जनवरी : प्रथम मुस्लिम महिला शिक्षिका फातिमा शेख जन्म दिवस (1831)

12 जनवरी : राजमाता जिजाऊ जयंती दिवस (1598)

12 जनवरी : बाबू हरदास एल. एन. स्मृति दिवस (1939)

12 जनवरी : उस्मानिया यूनिवर्सिटी, हैदराबाद ने बाबा साहेब को डी.लिट. की उपाधि प्रदान की (1953)

12 जनवरी : चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु परिनिर्वाण दिवस (1972)

13 जनवरी : तिलका मांझी शाहदत दिवस (1785)

14 जनवरी : सर मंगूराम मंगोलिया जन्म दिवस (1886)

15 जनवरी : बहन कुमारी मायावती जयंती दिवस (1956)

18 जनवरी : अब्दुल कय्यूम अंसारी स्मृति दिवस (1973)

18 जनवरी : बाबासाहेब द्वारा राणाडे, गांधी व जिन्ना पर प्रवचन (1943)

23 जनवरी : अहमदाबाद में डॉ. अम्बेडकर ने शांतिपूर्ण मार्च निकालकर सभा को संबोधित किया (1938)

24 जनवरी : राजर्षि छत्रपति साहूजी महाराज द्वारा प्राथमिक शिक्षा को मुफ्त व अनिवार्य करने का आदेश (1917)

24 जनवरी : कर्पूरी ठाकुर जयंती दिवस (1924)

26 जनवरी : गणतंत्र दिवस (1950)

27 जनवरी : डॉ. अम्बेडकर का साउथ बरो कमीशन के सामने साक्षात्कार (1919)

29 जनवरी : महाप्राण जोगेन्द्रनाथ मण्डल जयंती दिवस (1904)

30 जनवरी : सत्यनारायण गोयनका का जन्मदिवस (1924)

31 जनवरी : डॉ. अम्बेडकर द्वारा आंदोलन के मुखपत्र ‘‘मूकनायक’’ का प्रारम्भ (1920)

2024-01-13 16:38:05