




2026-05-02 15:04:19
Once again in the country: Elections over, inflation begins.
संवाददाता
नई दिल्ली। भारत की राजनीति में पिछले एक दशक से एक अघोषित, अलिखित लेकिन बेहद कड़वा नियम स्थापित हो चुका है—जैसे ही चुनावों की रणभेरी शांत होती है, ईवीएम मशीनों में जनता का वोट कैद होता है, ठीक वैसे ही महंगाई का सायरन बजने लगता है। चुनाव के दौरान जो सरकार जनता के सामने गारंटियों की झड़ी लगा देती है, मुफ्त राशन और सबका साथ, सबका विकास के लुभावने सपने दिखाती है, वही सरकार चुनाव खत्म होते ही अपनी असली मानसिकता आम जनता पर थोप देती है। हाल ही में संपन्न हुए चुनावों के बाद एक बार फिर देश की जनता के साथ वही क्रूर राजनीतिक मजाक दोहराया जा रहा है। अब सवाल यह उठता है कि क्या मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों का पूरा ढांचा केवल चुनाव जीतने के इवेंट मैनेजमेंट तक सीमित रह गया है? जब देश की जनता भावनात्मक मुद्दों पर वोट देकर घर लौटती है, तब उसे इनाम के रूप में रसोई गैस, पेट्रोल-डीजल, दवाइयों और रोजमर्रा के सामानों की बढ़ी हुई कीमतें क्यों मिलती हैं?
इस बार भी चुनाव खत्म होते ही व्यावसायिक एलपीजी सिलेंडर (19 किलोग्राम) 993 रुपए महंगा हो गया है, जिससे दिल्ली में इसकी कीमत 3,071.50 रुपए और मुंबई में 3,024 रुपये हो गई है। इस बड़ी बढ़ोतरी का सीधा असर कारोबारियों की लागत पर पड़ेगा। मार्च में 144 रुपए और अप्रैल में लगभग 200 रुपए की बढ़ोतरी के बाद, यह अब तक की सबसे बड़ी मासिक वृद्धि है। इस मूल्य वृद्धि का सबसे अधिक असर होटल, रेस्टोरेंट, ढाबे और कैटरिंग जैसे व्यवसायों पर पड़ेगा, जिनकी परिचालन लागत में सीधा इजाफा होगा। ऐसी आशंका है कि कारोबारी बढ़ी हुई लागत का बोझ अंतत: उपभोक्ताओं पर डाल सकते हैं, जिससे बाहर खाना, स्नैक्स और फूड डिलीवरी जैसी सेवाएं महंगी हो सकती हैं।
5 किलो वाला सिलेंडर भी 261 रुपए महंगा
एफटीएल सिलेंडर की कीमत 261 रुपए बढ़कर 813.50 रुपए हो गई है। पहले इसकी कीमत 552.50 रुपए थी। 5 किलो घरेलू सिलेंडर के दाम अभी भी 339 रुपए पर स्थिर हैं। एफटीएल सिलेंडर को छोटू सिलेंडर भी कहते हैं जिसे कोई भी बिना एड्रेस प्रूफ के ले सकता है। इनका ज्यादातर इस्तेमाल प्रवासी मजदूर, छात्रों या छोटे दुकानदार करते हैं।
चुनावी राहत का तिलिस्म और नतीजों के बाद का प्रहार
अगर आप पिछले कुछ सालों के राजनीतिक और आर्थिक ग्राफ को करीब से देखें, तो एक बहुत ही स्पष्ट और तार्किक पैटर्न नजर आता है। जब भी देश में लोकसभा या बड़े राज्यों के विधानसभा चुनाव आते हैं, तो अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें बढ़ने के बावजूद देश में पेट्रोल और डीजल के दाम चमत्कारी रूप से स्थिर हो जाते हैं। टोल टैक्स में बढ़ोतरी रोक दी जाती है और आवश्यक वस्तुओं की कीमतों को कृत्रिम तरीके से काबू में रखा जाता है।
यह सब इसलिए किया जाता है ताकि जनता के बीच सरकार के खिलाफ कोई गुस्सा न पनपे। लेकिन जैसे ही चुनाव का अंतिम चरण समाप्त होता है, यह सारा तिलिस्म टूट जाता है। पेट्रोलियम कंपनियां अचानक घाटे का रोना रोने लगती हैं, और रातों-रात पेट्रोल-डीजल और कमर्शियल गैस सिलेंडरों के दाम बढ़ा दिए जाते हैं। नेशनल हाईवे अथॉरिटी तुरंत टोल टैक्स बढ़ा देती है। इसका सीधा असर ट्रांसपोर्टेशन पर पड़ता है, जिससे मंडियों में पहुँचने वाली सब्जियां, फल, दालें और अनाज अचानक महंगे हो जाते हैं।
रसोई से लेकर दवाइयों तक: हर जगह आम आदमी की लूट
आज देश के मध्यम वर्ग, गरीब, और बहुजन समाज के कामगारों की स्थिति यह हो गई है कि उनकी आय तो नहीं बढ़ रही है, लेकिन खर्चे बेलगाम हो चुके हैं।
खाद्य सामग्री: आटा, दाल, चावल से लेकर दूध और दही तक—हर वह चीज जो एक आम इंसान की थाली का हिस्सा है, उसकी कीमतों में बेतहाशा आग लगी हुई है। विश्वगुरु बनने का सपना देख रहे देश में एक दिहाड़ी मजदूर के लिए दो वक्त का पौष्टिक भोजन जुटाना एक जंग बन गया है।
जीवन रक्षक दवाइयां: चुनाव खत्म होते ही आवश्यक और जीवन रक्षक दवाइयों की कीमतों में भी भारी इजाफा देखने को मिलता है। जब एक गरीब इंसान बीमार पड़ता है, तो प्राइवेट अस्पतालों की भारी-भरकम फीस और उसके बाद इन महंगी दवाइयों का खर्च उसे पूरी तरह से कर्ज के दलदल में धकेल देता है।
शिक्षा और घर का बजट: कॉपी, किताबें, स्कूल की फीस और बच्चों के दूध का खर्च लगातार बढ़ रहा है। गृहणियों का बजट पूरी तरह से चरमरा गया है, लेकिन सत्ता के गलियारों में इस माइक्रो-इकोनॉमिक्स (सूक्ष्म अर्थशास्त्र) की कोई चर्चा नहीं होती।
मोदी की गारंटी और 5 ट्रिलियन इकॉनमी का खोखलापन
सरकार के मंत्री दिन-रात टीवी चैनलों पर भारत के 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने और अमृतकाल के स्वर्णिम युग की घोषणाएं करते नहीं थकते। लेकिन यह अर्थव्यवस्था किसके लिए बढ़ रही है? आंकड़े और तार्किक विश्लेषण बताते हैं कि इस आर्थिक विकास का फायदा केवल ऊपर बैठे चंद गिने-चुने उद्योगपतियों और कॉपोर्रेट घरानों को हो रहा है। देश की संपत्ति चंद हाथों में सिमटती जा रही है, जबकि आम इंसान महज एक उपभोक्ता और टैक्सपेयर बनकर रह गया है। अगर देश की अर्थव्यवस्था वाकई इतनी मजबूत है, तो इसका फायदा नीचे के तबके यानी आम नागरिक को क्यों नहीं मिल रहा है? मोदी की गारंटी अगर असल में कोई गारंटी है, तो वह चुनाव के बाद केवल महंगाई बढ़ने और नए टैक्स थोपे जाने की गारंटी क्यों साबित हो रही है?
जीएसटी की मार और कॉपोर्रेट को छूट का विरोधाभास
मोदी सरकार की आर्थिक नीतियों की सबसे बड़ी आलोचना इस बात को लेकर होती है कि यह नीतियां प्रो-कॉपोर्रेट (उद्योगपति समर्थक) और एंटी-पुअर (गरीब विरोधी) हैं। एक तरफ सरकार आटा, पनीर, दूध, और बच्चों की पढ़ाई पर लगने वाली चीजों पर निर्दयता से ॠरळ वसूल रही है। आम आदमी बिस्कुट का एक पैकेट भी खरीदता है तो वह टैक्स देता है। वहीं दूसरी तरफ, बड़े उद्योगपतियों का लाखों करोड़ रुपये का नॉन-परफॉर्मिंग एसेट या तो राइट-आॅफ (बट्टे खाते में डालना) कर दिया जाता है या कॉपोर्रेट टैक्स में भारी छूट दे दी जाती है। यह कैसा न्याय है जहाँ एक रिक्शा चलाने वाला, एक किसान और एक मध्यम वर्गीय कर्मचारी अपनी खून-पसीने की कमाई से टैक्स देकर देश का खजाना भरता है, ताकि उस खजाने से अमीरों को राहत दी जा सके?
मूल मुद्दों से जनता का भटकाव
इस महंगाई का सबसे दुखद पहलू यह है कि सत्ता पक्ष ने जनता को असली मुद्दों से भटकाने की कला में महारत हासिल कर ली है। चुनाव के दौरान कभी भी शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार या महंगाई पर वोट नहीं मांगा जाता। चुनाव आते ही समाज में धर्म, जाति, मंदिर-मस्जिद, मंगलसूत्र और पाकिस्तान जैसे भावनात्मक मुद्दे उछाल दिए जाते हैं। गोदी-मीडिया और आईटी सेल के जरिए एक ऐसा नैरेटिव (विमर्श) तैयार किया जाता है कि लोग अपनी भूख और खाली जेब को भूलकर किसी काल्पनिक खतरे से लड़ने के लिए वोट देने निकल पड़ते हैं। और जब चुनाव का नशा उतरता है, तब उन्हें एहसास होता है कि उनके वोट की कीमत पेट्रोल के बढ़े हुए दामों, टोल टैक्स की पर्ची और महंगी दवाइयों के रूप में वसूली जा रही है।
सवाल पूछने का वक्त?
चुनाव खत्म, महंगाई शुरू का यह दुष्चक्र तब तक नहीं टूटेगा, जब तक देश की जनता, विशेषकर बहुजन, शोषित और मध्यम वर्ग का नागरिक, जागरूक नहीं होगा। लोकतंत्र में जनता जनार्दन होती है, लेकिन जब वही जनता अपने आर्थिक और सामाजिक अधिकारों (रोटी, कपड़ा, मकान, शिक्षा, स्वास्थ्य) के बजाय केवल धार्मिक और भावनात्मक मुद्दों पर भक्त बनकर वोट देने लगती है, तो सरकारें निरंकुश हो जाती हैं। सत्ताधीशों को यह भली-भांति पता है कि जनता कुछ दिन सोशल मीडिया पर महंगाई का रोना रोएगी और फिर से अपने उसी संघर्ष में व्यस्त हो जाएगी। इसलिए, अब समय आ गया है कि देश का आम नागरिक सत्ता से तार्किक सवाल पूछना शुरू करें। जब तक धर्म और दिखावे की राजनीति से ऊपर उठकर अर्थव्यवस्था, रोजगार और महंगाई को वोट का पैमाना नहीं बनाया जाएगा, तब तक हर चुनाव के बाद आम आदमी की नियति सिर्फ ठगा जाना ही रहेगी।
कांग्रेस बोली: पहला वार गैस पर, अगला वार पेट्रोल-डीजल पर
कांग्रेस ने सोशल मीडिया पर एक साझा पोस्ट में लिखा, महंगाई मैन मोदी का चाबुक फिर चला। आज कमर्शियल सिलिंडर 993 रुपए महंगा हुआ। मोदी ने पिछले 4 महीने में कमर्शियल सिलिंडर के दाम इस तरह बढ़ाए। कांग्रेस ने कहा, कमर्शियल सिलिंडर सिर्फ 4 महीने में 1,518 रुपए महंगा हो गया। अभी साल के 8 महीने बाकी हैं। मोदी की वसूली जारी है...। मोदी सरकार सिर्फ वसूली करना जानती है। अब 5 किलो वाला छोटू सिलिंडर भी महंगा कर दिया। पहले आधार कार्ड पर सिलिंडर बांटे, फिर उसका दाम बढ़ा दिया। ये बड़े चालबाज लोग हैं। राहुल गांधी ने सोशल मीडिया पर साझा पोस्ट में लिखा, कह दिया था- चुनाव के बाद महंगाई की गर्मी आएगी। आज कमर्शियल गैस सिलिंडर 993 रुपये महंगा। एक ही दिन में सबसे बड़ी बढ़ोतरी। यह चुनावी बिल है। फरवरी से अब तक 1380 रुपये की बढ़ोतरी हुई और सिर्फ 3 महीनों में 81 प्रतिशत का इजाफा हुआ है। चायवाला, ढाबा, होटल और बेकरी, हलवाई- हर किसी की रसोई पर बोझ बढ़ा और इसका असर आपकी थाली पर भी पड़ेगा। पहला वार गैस पर, अगला वार पेट्रोल-डीजल पर।
Is the common mans destiny in Amrit Kaal merely to bear the burden of taxes and inflation?





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