




2026-10-04 13:23:11
27 सितंबर को दो अलग-अलग राज्यों में शौचालय और सेप्टिक टैंक से निकली जहरीली गैस के चलते छह नागरिकों की जान चली गई। पहली घटना मेघालय के दक्षिण गारो हिल्स जिले के रंगडोक्रम की है, जहां एक भूमिगत सेप्टिक टैंक की मरम्मत करने की कोशिश के दौरान कथित तौर पर जहरीली गैस के संपर्क में आने से असम के चार मजदूरों की मौत हो गई। और उसी दिन मुंबई के गोरेगांव में सार्वजनिक शौचालय से निकली जहरीली गैस से दो युवकों की जान जाना कोई इक्का-दुक्का हादसे नहीं हैं। यह उस व्यवस्थागत उपेक्षा का निरंतर दोहराव है, जहां इंसान की जान की कीमत शून्य मान ली गई है। डिजिटल इंडिया, 5जी नेटवर्क, सेमीकंडक्टर मिशन और अंतरिक्ष अभियानों की उपलब्धियों के दौर में यह कड़वी सच्चाई आज भी बदस्तूर जारी है कि देश के नागरिकों का एक वर्ग जिंदा रहने के लिए दूसरों की विष्ठा और जहरीले सीवर में उतरने को मजबूर है।
भारत में हाथ से मैला उठाने और सीवर-सेप्टिक टैंक की सफाई का पेशा तकनीकी कमी से अधिक गहरी सामाजिक-जातिगत संरचना से जुड़ा है। सीवर, नाले और सेप्टिक टैंक साफ करने वाले 95% से अधिक लोग अनुसूचित जाति (दलित), विशेष रूप से वाल्मीकि, हेला, डोम, मेहतर और मदिगा जैसी उप-जातियों से आते हैं। भूमिहीनता, शिक्षा की कमी और गांवों से शहरों की ओर पलायन के बाद रोजगार के अन्य विकल्पों का अभाव इन परिवारों को ठेकेदारों के शोषण का आसान शिकार बना देता है। कागजों पर छुआछूत खत्म हो चुकी है, लेकिन जब समाज का एक विशेष तबका ही बिना सुरक्षा उपकरणों के सीवर की हाइड्रोजन सल्फाइड, अमोनिया और मीथेन जैसी गैसों के बीच उतरता है, तो यह आधुनिक भारत में संस्थागत अस्पृश्यता का ही प्रमाण है।
पिछले एक दशक के बड़े हादसे: सफाई कर्मचारी आंदोलन और सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, पिछले एक दशक में सैकड़ों सफाईकर्मियों की जान सीवर और सेप्टिक टैंकों में दम घुटने से गई है।
2017 लाजपत नगर, दिल्ली: दिल्ली जल बोर्ड के सीवर में बिना सुरक्षा उपकरण उतरे सफाईकर्मी जहरीली गैस की चपेट में आए जिसमें 3 श्रमिकों की मौत हुई।
2018 मुंडका, दिल्ली: एक आवासीय परिसर के सीवर टैंक की सफाई के दौरान जहरीली गैस का रिसाव। 5 मजदूरों की दम घुटने से मौत।
2019 वडोदरा, गुजरात: दर्शन होटल के सेप्टिक टैंक की सफाई करते समय 4 सफाईकर्मी और उन्हें बचाने उतरे 3 होटल कर्मचारी फंसे। 7 लोगों की एक साथ मौत।
2021 चेन्नई, तमिलनाडु: निजी अपार्टमेंट के सेप्टिक टैंक में उतरे मजदूर दम घुटने से बेहोश हुए, कोई सेफ्टी गियर उपलब्ध नहीं था। 3 श्रमिकों की मौत।
2022 मुंबई उपनगर (गोवंडी/नालंदा): आवासीय बस्तियों में खुले मैनहोल और सेप्टिक टैंक में ठेके पर उतरे 3 मजदूरों की जान चली गई।
2023 गुजरात (राजकोट और भरूच): अलग-अलग घटनाओं में नगर पालिका और निजी ठेकों के तहत बिना उपकरण उतारे गए 5 मजदूरों की मौत।
2024 मेघालय और मुंबई: मेघालय में बिना वेंटिलेशन वाले टैंक में 4 असम के प्रवासी मजदूर और मुंबई के गोरेगांव में शौचालय गैस से 2 की मौत। कुल 6 लोगों की मौत।
सरकारी दावे बनाम जमीनी हकीकत
दावा: देश में मैला ढोने की प्रथा पूरी तरह समाप्त
सरकारी पक्ष: संसद में सरकार ने बार-बार कहा कि 2013 के कानून के बाद देश में मैनुअल स्कैवेंजिंग पूरी तरह समाप्त हो चुकी है। 2021 में संसद में एक प्रश्न के लिखित उत्तर में कहा गया कि सीवर की सफाई के दौरान उपकरणों की कमी/हादसों से मौतें हुई हैं, लेकिन मैनुअल स्कैवेंजिंग से कोई मौत दर्ज नहीं है।
हकीकत: कानूनन मैनुअल स्कैवेंजिंग और सीवर-सेप्टिक टैंक में उतरने की परिभाषा के बीच तकनीकी हेरफेर करके मौतों को दुर्घटना बता दिया जाता है। ठेकेदार बिना आॅक्सीजन मास्क, हार्नेस और गैस डिटेक्टर के मजदूरों को सीधे मैनहोल में उतारते हैं।
दावा: नमस्ते योजना और 100% मशीनीकरण
सरकारी पक्ष: नेशनल एक्शन फॉर मैकेनाइज्ड सैनिटेशन इकोसिस्टम के तहत सभी सीवर और सेप्टिक टैंकों की सफाई को मशीनीकृत करने और सफाईमित्रों को सुरक्षा किट व रियायती ऋण देने की घोषणा।
हकीकत: अधिकांश छोटे शहरों, कस्बों और निजी सोसायटियों में सक्शन मशीनें, जेटिंग मशीनें या रोबोटिक सफाई उपकरण नहीं पहुंचे हैं। निजी घरों के सेप्टिक टैंकों की सफाई पूरी तरह असंगठित और गैर-कानूनी ठेकेदारी पर निर्भर है।
दावा 3: मुआवजा और पुनर्वास
सरकारी पक्ष: सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक आदेश (2014) के तहत प्रत्येक मृतक के परिवार को 10 लाख रुपये (जिसे हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने बढ़ाकर 30 लाख रुपये करने का निर्देश दिया) का मुआवजा देने का प्रावधान।
हकीकत: ठेकेदारी प्रथा के चलते कई मामलों में एफआईआर तक दर्ज नहीं होती या केवल गैर-इरादतन हत्या की हल्की धाराओं में मामला दबा दिया जाता है। परिवारों को मुआवजे के लिए वर्षों तक अदालतों के चक्कर काटने पड़ते हैं।
निष्कर्ष: भारत में वोटिंग मशीन से और सीवर की सफाई हाथों से होती है; जबकि वोटिंग हाथों से और सीवर की सफाई मशीन से होनी चाहिए। चुनाव प्रक्रिया को तेज और त्रुटिहीन बनाने के लिए देश ने अरबों रुपये खर्च करके इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों की व्यवस्था अपनाई, लेकिन लाखों सीवर-सेप्टिक टैंकों को साफ करने के लिए आधुनिक मशीनें और सुरक्षा किट मुहैया कराना आज भी बजट की प्राथमिकता नहीं बन सका। मशीनें महंगी हैं और मजदूर सस्ते। जब तक किसी ठेकेदार या अधिकारी पर हत्या का सीधा मुकदमा नहीं चलता, तब तक मशीन पर 40-50 लाख रुपये खर्च करने के बजाय 500-1000 रुपये की दिहाड़ी पर मजदूर को गटर में उतारना व्यवस्था के लिए सस्ता और आसान बना रहता है। कानून में साफ लिखा है कि किसी भी इंसान को बिना प्रमाणित सुरक्षा उपकरणों के मैनहोल में उतारना गैर-कानूनी और दंडनीय अपराध है। इसके बावजूद जब तक सीवर में किसी भी इंसान के उतरने को गैर-जमानती अपराध मानकर संबंधित अधिकारी और ठेकेदार पर सख्त कानूनी कार्रवाई नहीं होगी, हर नगर निकाय स्तर पर 100% मशीनीकरण को अनिवार्य और आॅडिट योग्य नहीं बनाया जाएगा, और सफाई कर्मियों के बच्चों के लिए विशेष शिक्षा, सम्मानजनक रोजगार और पुनर्वास की ठोस गारंटी नहीं होगी, तब तक स्वच्छ भारत की चमक के पीछे सीवर के अंधेरे में दम घुटने की ये खबरें हर महीने छपती रहेंगी।





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