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डबल इंजन की संघी सरकारों के संरक्षण में पुलिसिया दमन शीर्ष पर

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2026-07-18 16:18:52

बहुजन समाज (एससी/ एसटी/ ओबीसी/ अल्पसंख्यक) के ऊपर वर्तमान संघी सरकार की एजेंसियों का दमन प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप में कई गुना बढ़ा है। बहुजन समाज के जातीय घटक इस पुलिस दमन के कारण बेहद परेशान है। साहित्य अकादेमी पुरस्कार विजेता, जाने माने शायर और इलाहाबाद हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति रहे आनंद नारायण मुल्ला ने 1961 में भारतीय पुलिस व्यवस्था को लेकर एक आलोचनात्मक आदेश लिखा, जिसकी गूंज आज भी सुनाई पड़ती है। जब भी भारतीय पुलिस कहीं गैर संवैधानिक, गैर कानूनी और असभ्य व्यवहार करती है तो सरकार बनाम मोहम्मद नईम (1961) के मामले में माननीय मुल्ला महोदय की टिप्पणी याद आती है, जिसमें उन्होंने कहा था, पूरे देश में ऐसा कोई अराजक समूह नहीं है जिसके अपराध का रिकॉर्ड उस संगठित बल के नजदीक हो जिसे हम भारतीय पुलिस बल कहते हैं। इसके बाद उन्होंने कहा कि अगर मुझे लगता है कि मैं अपने अकेले प्रयास से यह गंदगी, यानी पुलिस बल, की सफाई कर सकता तो मैं अपनी इस लड़ाई को आगे बढ़ाने से न डरता। लेकिन इसी आदेश के बाद उन्होंने आगे कहा कि वैसे तो मैं पुलिस अधिकारियों के विरुद्ध आलोचनात्मक टिप्पणी करता रहता हूं लेकिन पता नहीं क्यों यह टिप्पणी ज्यादा चर्चित हुई। इससे यह भी लगता है कि मेरी टिप्पणियों को ध्यान में रखते हुए कोई सुधार नहीं किया जाता। हमें लगता है कि माननीय मुल्ला जी की टिप्पणियों के असर को बेअसर करने से सरकार और पुलिस प्रशासन में ब्राह्मणवादी संघियों की अधिकता बढ़ गयी है। साथ ही उन्हें मनुवादी सरकार का अदृश्य संरक्षण प्राप्त है।

आज 65 साल बाद लगता है कि भारतीय पुलिस की स्थिति अब ज्यादा ही चिंताजनक हो गई है। या यूं कहा जा सकता है कि समाज की स्थिति अधिक संवेदनहीन हो गई है जहां एकाध बयान तो छोड़िए पुलिस के व्यवहार को लेकर आज सैकड़ों वीडियो डाले जाते हैं और वे वायरल भी होते हैं लेकिन पुलिस के चरित्र में कोई सुधार आता हुआ नहीं दिखता। ऐसा होना मनुवादी संघी सरकार के संरक्षण को उजागर और प्रमाणित करता है।

मेरठ में दलित प्रदर्शनकारियों पर लाठी चार्ज: ताजा घटना मेरठ कलेक्ट्रेट की है जहां पर शहर के कप्तान ‘अविनाश पांडेय’ द्वारा दलित प्रदर्शनकारियों पर लाठी चार्ज और प्रिजन वैन में एक वकील के साथ मार पिटाई करने की घटना ने गंभीर विवाद पैदा किया है। हालाँकि कप्तान महोदय ने हिंसा की कोई जानलेवा कार्रवाई नहीं की लेकिन उनके व्यवहार में पुलिस प्रशासन के दर्प के साथ वर्णव्यवस्था का अहंकार जिस प्रकार परिलक्षित होता दिखा उससे समाज बुरी तरह विभाजित हो गया है। कप्तान महोदय भी अपने पक्ष में वीडियो जारी कर महज भारतीय न्याय संहिता का हवाला दे रहे हैं और अपने अधिकारियों के घायल होने का मनगढ़ंत केस बना रहे हैं, प्रदर्शनकारियों को अपराधी बता रहे हैं। उनके पक्ष में टिप्पणी करने वाले मनुवादी जातिगत नजरिए से टिप्पणी करते हुए उनके व्यवहार को उचित ठहरा रहे हैं। ऐसी टिप्पणी करने वालों का कहना है कि अनुसूचित जाति के लोग इसी लायक हैं। इस तरह की टिप्पणियां समाज विभाजक हैं जो देश की एकता और अखण्डता को खतरे में डालती है। दलित प्रदर्शनकारियों पर कार्रवाई के जवाब में दलित समाज की प्रतिक्रिया में पीड़ा और विद्वेष दोनों है। कहा जा रहा है कि सरकार ऐसे सवर्ण अधिकारियों की नियुक्ति इसीलिए ही करती है ताकि अल्पसंख्यकों और दलितों का दमन भरपूर तरीके से किया जा सके। वर्तमान समय में योगी, मोदी सरकारें ऐसा ही साबित और प्रदर्शन कर रही है।

डबल इंजन की सरकारों का तथ्यात्मक सत्य: एनसीआरबी की रिपोर्ट के आधार पर साफ देखा जा सकता है कि देश में जहां-जहां डबल इंजन की सरकारें हैं, वहाँ-वहाँ पर दलितों, शोषितों, वंचितों व अल्पसंख्यकों के साथ तुलनात्मक दृष्टि से अधिक अपराधिक घटनाएँ हो रही है। जिनमें कुछेक डबल इंजन की सरकारों के आंकड़े इस प्रकार है, जो अपने आप में भाजपा संघी सरकारों की स्पष्ट तरीके से पोल खोल रहे हैं जिन्हें देखकर जनता को अब अपनी आंखे खोल लेनी चाहिए, अंधभक्तों को भारत सरकार के एनसीआरबी द्वारा साल 2024, 2025 और 2026 की विस्तृत अंतिम वार्षिक रिपोर्टों का पूर्ण डेटा पूरी तरह जारी होना अभी शेष है, इसलिए उपलब्ध प्रामाणिक आंकड़ों (2017 से 2023-24 तक) और राष्ट्रीय स्तर की मानवाधिकार रिपोर्ट्स के आधार पर उत्तर प्रदेश की स्थिति का ब्योरा इस प्रकार है:

1. बलात्कार और हत्या के मामलों की सांख्यिकी: एनसीआरबी और सामाजिक संगठनों की हालिया रिपोर्ट्स (जैसे NCDHR 2026 स्टेटस रिपोर्ट) के मुताबिक, पूरे देश में दलितों के खिलाफ होने वाले कुल अपराधों में उत्तर प्रदेश है।

दलित महिलाओं के साथ बलात्कार: उत्तर प्रदेश में दलित महिलाओं और नाबालिग बच्चियों के साथ बलात्कार के मामले औसतन हर साल 500 से 700 से भी अधिक दर्ज होते आए हैं।

बलात्कार के बाद हत्या: हाथरस (2020), लखीमपुर खीरी (2022) जैसी बड़ी घटनाओं सहित बलात्कार के बाद साक्ष्य मिटाने के लिए हत्या या सीधे जातिगत हिंसा में दलित महिलाओं की हत्या के मामले भी हर साल खूब दर्ज होते हैं।

2. साल-दर-साल एनसीआरबी के मुख्य आंकड़े: केवल महिलाओं केंद्रित विशिष्ट अपराधों के साथ-साथ राज्य में दलित समुदाय के खिलाफ दर्ज अपराधिक मामले इस प्रकार है, जिनमें से एक बड़ा हिस्सा महिलाओं के खिलाफ यौन उत्पीड़न और हिंसा से जुड़ा है:

3. दलित महिलाओं से जुड़े अपराधों की प्रकृति: रिपोर्ट्स के अनुसार, दलित महिलाओं और युवतियों के खिलाफ होने वाले कुल अपराधों को मुख्य रूप से तीन श्रेणियों में विभाजित किया गया है:

बलात्कार व सामूहिक बलात्कार: कुल अपराधों का लगभग 40 प्रतिशत से अधिक हिस्सा केवल बलात्कार और यौन उत्पीड़न से संबंधित है।

शीलभंग का प्रयास: दलित महिलाओं को जातिगत और लैंगिक तौर पर नीचा दिखाने के लिए ब्राह्मणवादियों द्वारा उन पर हमले लगातार बढ़ रहे हैं।

नाबालिगों को निशाना बनाना: कुल बलात्कार के मामलों में से लगभग 35 प्रतिशत से अधिक मामले नाबालिग दलित बच्चियों (पोस्को एक्ट के तहत) के दर्ज होते हैं।

4. न्याय की स्थिति: दलित महिला सुरक्षा से जुड़े सामाजिक और कानूनी विश्लेषणों (जैसे IDSN व NCDHR रिपोर्ट्स) में गंभीर चिंताएं जताई गई हैं:

दोषसिद्धि की दर कम: दलित महिलाओं के साथ होने वाले बलात्कार और हत्या के मामलों में अदालत में आरोपियों को सजा मिलने की दर लगभग 25 प्रतिशत से 28 प्रतिशत के आसपास ही रहती है, जबकि 68 प्रतिशत से अधिक मामलों में आरोपी बरी हो जाते हैं। ऐसा होना नयायालयों और अभियोजन से जुड़े व्यक्तियों की ब्राह्मणवादी मानसिकता को परिलक्षित करते हैं।

लंबित मामले: अदालतों और पुलिस जांच में मामलों के लंबित रहने की दर 90 प्रतिशत से अधिक है, जिसके कारण पीड़ितों को न्याय मिलने में कई साल लग जाते हैं। सवाल उठता है कि ऐसा क्यों? अदालतों में अनुपातिक संख्या में उनका ज्यादा का होना। न्यायालयों में बैठे ब्राह्मणवादी मानसिकता के जजों का होना है।

मामले दर्ज न होना: कई जमीनी रिपोर्ट्स यह भी बताती हैं कि सामाजिक दबाव, पुलिस के असहयोग या लोकलाज के डर से बहुत से मामले एफआईआर तक पहुंच ही नहीं पाते। करीब 40-50 प्रतिशत ऐसे मामले पुलिस में दर्ज नहीं होते जिनके सामाजिक व्यवस्था से जुड़े बहुत से कारण है।

हाथरस केस और मेरठ के हालिया ललिता गौतम हत्याकांड (मई-जुलाई 2026) की तरह ही देश को झकझोर देने वाले कुछ प्रमुख मामलों की सूची जानकारी के लिए नीचे दी गई है:

1. हाथरस सामूहिक बलात्कार और हत्या (सितंबर 2020)

घटना: एक 19 वर्षीय दलित युवती के साथ चार सवर्ण जाति के पुरुषों द्वारा सामूहिक बलात्कार और बर्बरता की गई। दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में इलाज के दौरान पीड़िता की मृत्यु हो गई।

विवाद: पुलिस द्वारा रात के अंधेरे में परिवार की सहमति के बिना पीड़िता के शव का अंतिम संस्कार कर देने से देशव्यापी आक्रोश फैला था। सामाजिक दबाव बढ़ने पर मामला बाद में सीबीआई को सौंपा गया, जो एक लीपा-पोती का ही प्रयास है।

2. मेरठ-ललिता गौतम हत्याकांड (मई-जुलाई 2026)

घटना: मेरठ के ट्रासपोर्ट नगर की रहने वाली 20 वर्षीय बीए अंतिम वर्ष की दलित छात्रा ललिता गौतम 15 मई 2026 को परीक्षा देने के लिए घर से निकली थी जो लापता पायी गई। 17 मई को उसका शव रोहटा क्षेत्र के एक गन्ने के खेत से बरामद हुआ।

विवाद: पुलिस ने मुख्य आरोपी (अंकुश) को गिरफ्तार किया, लेकिन पीड़ित परिवार और सामाजिक संगठनों का आरोप है कि इस हत्याकांड में और भी लोग शामिल थे। जुलाई 2026 में इंसाफ की मांग को लेकर मेरठ कलेक्ट्रेट पर हुए शांति पूर्ण प्रदर्शन, लाठीचार्ज और पुलिस अधिकारियों के रवैये के बाद विपक्षी नेताओं ने सवाल उठाए। इसके साथ ही बहुजन समाज के सामाजिक संगठनों में भी इस घटना को लेकर आक्रोश है और वे देश की न्याय और शासन व्यवस्था से ललिता गौतम के मामले में न्याय की मांग कर रहे हैं।

लखीमपुर खीरी-दो सगी बहनों की हत्या (सितंबर 2022)

घटना: लखीमपुर खीरी जिले में दो नाबालिग दलित सगी बहनों (15 और 17 वर्ष) का उनके घर के बाहर से अपहरण करके सामूहिक बलात्कार किया गया और फिर गला दबाकर हत्या कर दी गई। दोनों के शव एक पेड़ से लटके मिले थे। जो योगी सरकार की विफलता को दशार्ता है। साथ ही योगी राज में अपराध अधिक बड़ रहे हैं। योगी का खुद का इतिहास भी अत्यंत अपराधिक रहा है तो फिर प्रदेश, देश का सभ्य समाज उनसे न्याय की उम्मीद कैसे कर सकता है?

5. उन्नाव सामूहिक बलात्कार मामला (2017-2018)

घटना: उन्नाव में एक नाबालिग दलित लड़की के साथ सामूहिक बलात्कार का मामला सामने आया, जिसमें मुख्य आरोपी तत्कालीन भाजपा विधायक कुलदीप सिंह सेंगर था। पीड़िता द्वारा मुख्यमंत्री आवास के सामने आत्मदाह का प्रयास किया जिसके बाद यह मामला राष्ट्रीय स्तर पर जनता की नजर में आया। योगी सरकार में प्रदेश में बढ़ गंभीर मामले जिन पर योगी सरकार ने कोई कोई संज्ञान नहीं लिया।

नतीजा: कोर्ट ने कुलदीप सेंगर को दोषी पाते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई जिसके आधार पर उसे विधानसभा से निष्कासित कर दिया गया। ऐसी स्थिति के बाद भी मनुवादी मानसिकता के भाजपा कार्यकतार्ओं ने कुलदीप सिंह सेंगर जैसे गंभीर अपराधी को छोड़ने की बात अपने जातिवादी समाज में जोर-शोर से फैलाई जो उनके जातीय समाज में चर्चा का मुद्दा बना।

5. उन्नाव- पीड़िता को जिंदा जलाने का मामला (दिसंबर 2019)

घटना: उन्नाव में ही एक अन्य बलात्कार पीड़िता जब अदालत में सुनवाई के लिए जा रही थी, तब जमानत पर बाहर आए आरोपियों ने उस पर केरोसिन डालकर आग लगा दी। जिसके उपरांत दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में पीड़िता ने दम तोड़ दिया था। योगी सरकार को इस गंभीर घटना पर कोई अफसोस या शर्म महसूस नहीं हुई।

6. आजमगढ़- नाबालिग लड़की की हत्या (अगस्त 2020)

घटना: आजमगढ़ के बांसगांव में एक प्रधान और उसके साथियों द्वारा एक 13 वर्षीय दलित बच्ची की पीट-पीटकर हत्या कर दी गई थी, क्योंकि उसने अपने परिवार के साथ हो रहे विवाद का विरोध किया था। इस घटना के बाद इलाके में दबंगों ने पीड़ित परिवारों के विरुद्ध भारी तनाव फैला दिया था।

7. हमीरपुर और बांदा के मामले (2021-2022)

घटनाएं: बुंदेलखंड के हमीरपुर और बांदा जिलों में भी दलित युवतियों के साथ खेतों में काम करने या शौच के लिए जाने के दौरान बलात्कार और उसके बाद पहचान छिपाने के लिए उनकी हत्या की, ऐसी कई गंभीर घटनाएं दर्ज की गईं, योगी राज्य में सुधार नकारात्मक रहा।

प्रशासनिक और कानूनी दृष्टिकोण: योगी सरकार का दावा कि प्रदेश अपराध मुक्त हो गया है यह एक झूठ का पुलिंदा है, जमीनी वास्तविकता इसके विपरीत है दलित, शोषित व वंचित समाज की महिलाओं के विरुद्ध अपराधिक घटनाएँ योगी शासन में सबसे अधिक घटित हो रही है। जिन्हें देखकर दलित समाज को लगता है कि ऐसे सभी अपराधी सकरारी संरक्षण के कारण ऐसा करने में सफल हो रहे हैं। देश की जनता जानती है कि ऐसे मामलों की बताई गई संख्या बहुत अधिक हो सकती है चूंकि आमतौर पर ऐसे मामले लोक लिहाज और शर्मिंदगी महसूस करने के कारण पुलिस तक पहुँच नहीं पाते है और न सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज हो पाते है। वास्तविकता के आधार पर यूपी में महिलाओं के साथ हो रहे ऐसे अपराधों की संख्या 25 प्रतिशत बताई जा रही है जिसकी वास्तविक संख्या 50 प्रतिशत से भी अधिक हो सकती है।

दलित, वंचितों के लिए मुक्ति का रास्ता: देश में डबल इंजन की सरकारों की शासन व्यवस्था को देखकर लगता है कि डबल इंजन की सरकारों राज्य में हाशिये पर खड़े दलित, शोषित व वंचित समाज को न्याय व सुरक्षा देना वर्तमान मनुवादी शासन की नियत में हैं ही नहीं, वे ऐसे अत्याचारों को संरक्षित करके आगे बढ़ाने का ही काम करते हैं और उसी से अपने सजातीय समाज में अपनी ढींगे हाँकते हैं। बहुजन समाज ऐसी शासन व्यवस्था को देखकर अब पूरी तरह से ऊब चुका है और वह सोचने लगा है कि अब ऐसे अन्यायों से मुक्ति पाने के लिए, अपनी बहन-बेटियों की अस्मिता के लिए भीमा कोरे गाँव (1 जनवरी 1818, महाराष्ट्र) जैसा युद्ध हमें लड़ना पड़ेगा। प्रदेश की हर तहसील के अंदर 2-4 फूलन देवी जैसी वीरांगनाओं को प्रशिक्षित करके मैदान में उतारना पड़ेगा।

याद रहे की भीमा कोरे गाँव के युद्ध का कारण भी ऐसा ही था जब पेशवाओं (ब्राह्मणवादी व्यवस्था) से तंग आकर महार व अन्य पिछड़ी जातियों के सैनिकों ने बाजीराव द्वितीय से विनम्रतापूर्वक आग्रह किया था कि हम पेशवाओं के साथ मिलकर अंग्रेजों के खिलाफ युद्ध लड़ना चाहते हैं, लेकिन यदि हम विजय हुए तो आपके राज्य में हमारी जो स्थिति है, हमारे ऊपर जो नियम-कानून आपके राज्य में थोंपे गए हैं, उन सभी से आपको हमें मुक्ति देनी होगी तथा हमारे साथ समता, स्वतंत्रता का व्यवहार करना होगा। बाजीराव द्वितीय ऐसा सुनकर भड़क उठे और उनके साथ अभद्रता भरा व्यवहार किया, साथ में यह भी कहा कि तुम अछूतों ने यहाँ आकर शनिवार वाडे को अपवित्र किया है, मैं आपकी कोई भी मांग नहीं मानूँगा। जैसा व्यवहार तुम्हारे साथ किया जा रहा है वैसा ही आगे भी जारी रहेगा, मेरा व्यवहार इससे भी कठोर हो सकता है। बैठक में आए महार सैनिक वहाँ से वापस चले गए, वापस जाकर उन्होंने मंत्रना की और अपने साथ हुए अपमान का बदला लेने के लिए सभी ने एकजुट होकर संकल्प लिया कि कल सुबह हमारा युद्ध पेशवाओं के विरुद्ध होगा जो हमारे जीवन मरण और भविष्य का फैसला करेगा। अगले ही दिन नियमानुसार युद्ध शुरू हुआ, महार सैनिकों व अन्य पिछड़ी जातियों के सैनिकों ने बड़ी वीरता से युद्ध लड़ा, जिनकी संख्या केवल 500 थी और पेशवा सैनिकों की संख्या 28 हजार थी। इस प्रकार एक महार व वंचित वर्ग के सैनिक के हिस्से में 56 सैनिक आए जिन्हें युद्ध में हार का सामना करना पड़ा था। अब समय आ गया है कि दलितों, शोषितों और वंचितों को इसी प्रकार का संकल्प लेकर मनुवादी संघी प्रत्याशियों को चुनाव में एकता के साथ भारी मतों से हराकर देश की सत्ता से बाहर करना होगा। साथ ही समाज में जो वीरांगनाएँ अपनी सुरक्षा के लिए हथियार उठाती है, समाज को उन्हें भी सुरक्षा और संरक्षण देना पड़ेगा। तभी दलित, शोषित व वंचित समाज इस मनुवादी व्यवस्था में न्याय, बंधुता और स्वतंत्रता के साथ सुरक्षित और सम्मान का जीवन जी पाएगा।

ऐसी ही घटनाएं अगर बढ़ेंगी तो समाज में आक्रोश भी उसी अनुपात में बढ़ेगा। यूपी को अपराध मुक्त करने और अपनी झूठी ढींग मरने वाले मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ देश की बहुजन जनता को यह स्पष्ट रूप से बताने की कृपा करें कि दलित, शोषित व वंचित समाज की महिलाओं के साथ होने वाले ऐसे जघन्य व घृणित अपराध आपके शासन में कब बंद हो पाएंगे? अगर आप ऐसा करने में हिन्दुत्व की मानसिकता के कारण विफल है, तो कृपया करके यूपी को अपराध मुक्त करने की ढींग मारना छोड़े और दलित, शोषित व वंचित समाज को अपनी झूठी बयानवाजी के आधार पर मूर्ख बनाना तत्काल बंद करें।

भारत का संविधान आत्म रक्षा के लिए अधिकार: आत्म रक्षा के लिए हमारा संविधान भी सभी को अधिकार देता है। इतिहास गवाह है मनुवादी संघियों का एक ही इलाज है या तो इन्हें अपनी वोट और एकता की ताकत से सत्ता से बाहर रखो या फिर अपनी एकता के लट्ठो से इन्हें भीमा कोरेगांव की तर्ज पर पीटकर देश की सत्ता से बाहर किया जाये। ये बहुत ही बेशर्म व निर्लज प्रवृति के जन्तु है इनका पूर्ण विनाश देश की एकता अखंडता के लिए आवश्यक है। अपने सम्मान के लिए सबकुछ अर्पण करना सीखों, बहुजन का इतिहास अतीत में शौर्य भरा रहा है, उसे याद करके हम सभी को बिना भय के आगे बढ़ना होगा, और अन्यायों से अपनी मुक्ति खुद पानी होगी! भगवान बुद्ध के उपदेश को सदैव याद रख जीवन में आत्मसात करो। ‘अपना दीपक स्वयं बनो’ दुनिया न कोई भगवान व देवता जो आपकी मुक्ति के लिए आएगा! भगवान या देवी-देवताओं को आपके मस्तिष्क में निरंतरता के भय पैदा रखने के लिए ब्राह्मणवादी संस्कृति ने बनाया हुआ है। बहुजन समाज (एससी, एसटी, ओबीसी, अल्पसंख्यक) का जो व्यक्ति भगवान व देवी-देवताओं में विश्वास करता है और प्रचार करता है वह मूर्ख और ब्राह्मणवादी व्यवस्था का मानसिक गुलाम है।

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01 जनवरी : मूलनिवासी शौर्य दिवस (भीमा कोरेगांव-पुणे) (1818)

01 जनवरी : राष्ट्रपिता ज्योतिबा फुले और राष्ट्रमाता सावित्री बाई फुले द्वारा प्रथम भारतीय पाठशाला प्रारंभ (1848)

01 जनवरी : बाबा साहेब अम्बेडकर द्वारा ‘द अनटचैबिल्स’ नामक पुस्तक का प्रकाशन (1948)

01 जनवरी : मण्डल आयोग का गठन (1979)

02 जनवरी : गुरु कबीर स्मृति दिवस (1476)

03 जनवरी : राष्ट्रमाता सावित्रीबाई फुले जयंती दिवस (1831)

06 जनवरी : बाबू हरदास एल. एन. जयंती (1904)

08 जनवरी : विश्व बौद्ध ध्वज दिवस (1891)

09 जनवरी : प्रथम मुस्लिम महिला शिक्षिका फातिमा शेख जन्म दिवस (1831)

12 जनवरी : राजमाता जिजाऊ जयंती दिवस (1598)

12 जनवरी : बाबू हरदास एल. एन. स्मृति दिवस (1939)

12 जनवरी : उस्मानिया यूनिवर्सिटी, हैदराबाद ने बाबा साहेब को डी.लिट. की उपाधि प्रदान की (1953)

12 जनवरी : चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु परिनिर्वाण दिवस (1972)

13 जनवरी : तिलका मांझी शाहदत दिवस (1785)

14 जनवरी : सर मंगूराम मंगोलिया जन्म दिवस (1886)

15 जनवरी : बहन कुमारी मायावती जयंती दिवस (1956)

18 जनवरी : अब्दुल कय्यूम अंसारी स्मृति दिवस (1973)

18 जनवरी : बाबासाहेब द्वारा राणाडे, गांधी व जिन्ना पर प्रवचन (1943)

23 जनवरी : अहमदाबाद में डॉ. अम्बेडकर ने शांतिपूर्ण मार्च निकालकर सभा को संबोधित किया (1938)

24 जनवरी : राजर्षि छत्रपति साहूजी महाराज द्वारा प्राथमिक शिक्षा को मुफ्त व अनिवार्य करने का आदेश (1917)

24 जनवरी : कर्पूरी ठाकुर जयंती दिवस (1924)

26 जनवरी : गणतंत्र दिवस (1950)

27 जनवरी : डॉ. अम्बेडकर का साउथ बरो कमीशन के सामने साक्षात्कार (1919)

29 जनवरी : महाप्राण जोगेन्द्रनाथ मण्डल जयंती दिवस (1904)

30 जनवरी : सत्यनारायण गोयनका का जन्मदिवस (1924)

31 जनवरी : डॉ. अम्बेडकर द्वारा आंदोलन के मुखपत्र ‘‘मूकनायक’’ का प्रारम्भ (1920)

2024-01-13 16:38:05