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जेनजी ने निकाली बीसीआई और सीजेआई की हेकड़ी

सीजेआई का विरोध करने पर नालसार के छात्रों पर लगाया था बैन, दबाव के बाद वापस लिया फैसला
News

2026-08-17 15:38:17

नई दिल्ली/हैदराबाद। देश में वकीलों की सर्वोच्च नियामक संस्था बार काउंसिल आॅफ इंडिया (बीसीआई) को विधि छात्रों के मुखर विरोध और देशव्यापी कानूनी बिरादरी के भारी दबाव के आगे आखिरकार अपने कदम पीछे खींचने पड़े हैं। नालसार यूनिवर्सिटी आॅफ लॉ, हैदराबाद के दीक्षांत समारोह के दौरान तत्कालीन चीफ जस्टिस आॅफ इंडिया (सीजेआई) के समक्ष शांतिपूर्ण असहमति दर्ज कराने वाले छात्रों के खिलाफ बीसीआई ने जो कठोर दंडात्मक रुख अपनाया था, उसे वापस लेते हुए काउंसिल ने अपना फैसला रद्द कर दिया है। इसे कानूनी हलकों में नई पीढ़ी (जेन-जी) की मुखरता और संवैधानिक अभिव्यक्ति की जीत के रूप में देखा जा रहा है।

क्या था पूरा मामला?

पूरा विवाद नालसार यूनिवर्सिटी आॅफ लॉ (नालसार) के वार्षिक दीक्षांत समारोह के दौरान शुरू हुआ था। इस समारोह में सुप्रीम कोर्ट के तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश मुख्य अतिथि के तौर पर शामिल हुए थे। दीक्षांत समारोह के दौरान कुछ छात्रों ने न्यायपालिका से जुड़े कुछ नीतिगत और संवैधानिक मुद्दों को लेकर अपनी असहमति प्रकट की थी।

छात्रों द्वारा शांतिपूर्ण ढंग से तख्तियां दिखाकर या सांकेतिक रूप से विरोध दर्ज कराया गया था। छात्रों का तर्क था कि एक प्रतिष्ठित लॉ यूनिवर्सिटी में कानून के विद्यार्थियों द्वारा शांतिपूर्ण असहमति जताना उनके अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (अनुच्छेद 19(1)(ए)) के तहत आता है। समारोह के बाद बार काउंसिल आॅफ इंडिया ने इस घटना को न्यायपालिका की गरिमा के खिलाफ और अनुशासनहीनता करार दिया। बीसीआई ने कड़ा रुख अपनाते हुए विरोध प्रदर्शन में शामिल छात्रों की पहचान करने और भविष्य में बतौर अधिवक्ता उनके बार काउंसिल में राज्यस्तरीय नामांकन पर रोक लगाने जैसी सख्त कार्रवाई का संकेत दिया। यूनिवर्सिटी प्रशासन से भी स्पष्टीकरण मांगा गया और घटना में शामिल छात्रों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई करने के निर्देश दिए गए। बीसीआई के इस फैसले का सीधा असर इन छात्रों के पूरे कानूनी करियर पर पड़ सकता था, जिससे छात्रों और युवा वकीलों के बीच तीव्र असंतोष फैल गया।

जेन-जी की लामबंदी और चौतरफा विरोध

बीसीआई के इस सख्त रवैये के बाद नालसार ही नहीं, बल्कि देश भर के प्रमुख राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालयों के छात्र, छात्र संगठन, वरिष्ठ अधिवक्ता और पूर्व न्यायाधीश छात्रों के समर्थन में उतर आए। जेन-जी पीढ़ी के विधि छात्रों ने सोशल मीडिया और कैंपस के भीतर एक संगठित अभियान छेड़ा। छात्रों का स्पष्ट कहना था कि असहमति लोकतंत्र और कानून के शासन का मूल तत्व है। यदि कानून की पढ़ाई करने वाले छात्र ही सवाल नहीं उठाएंगे, तो कौन उठाएगा? वहीं सुप्रीम कोर्ट और विभिन्न हाई कोर्ट के कई वरिष्ठ वकीलों ने बीसीआई की कार्रवाई को असंवैधानिक और अत्यधिक असंगत बताया। कानूनी विशेषज्ञों ने कहा कि शांतिपूर्ण विरोध के लिए किसी छात्र का पूरा भविष्य और वकालत का लाइसेंस छीनने की धमकी देना तानाशाही रवैया है।

बीसीआई का यूटर्न: मामला बढ़ते देख और सुप्रीम कोर्ट तक कानूनी चुनौती पहुंचने की संभावनाओं के बीच बीसीआई बैकफुट पर आ गई। काउंसिल ने एक नया प्रस्ताव पारित करते हुए छात्रों पर की जाने वाली कार्रवाई और नामांकन पर रोक के निर्देश को वापस ले लिया। अपने संशोधित रुख में इउक ने स्वीकार किया कि छात्रों के भविष्य को ध्यान में रखते हुए और उनके व्यापक दृष्टिकोण को समझते हुए इस मामले को आगे नहीं बढ़ाया जाएगा।

भविष्य के लिए क्या हैं मायने? इस घटनाक्रम ने भारतीय कानूनी जगत में कई महत्वपूर्ण संदेश दिए हैं। संस्थान और नियामक संस्थाएं युवा पीढ़ी पर केवल अनुशासन के नाम पर अत्यधिक कठोर निर्णय नहीं थोप सकतीं। विश्वविद्यालय और उच्च शिक्षण संस्थान आलोचनात्मक सोच की जगह हैं, जहाँ पद और सत्ता से सवाल पूछना अपराध नहीं है। कानूनी बिरादरी की नई पीढ़ी ने यह साबित कर दिया कि जब बुनियादी अधिकारों पर बात आती है, तो एकजुट होकर बड़े से बड़े नियामक ढांचे को भी अपने फैसलों पर पुनर्विचार करने के लिए मजबूर किया जा सकता है।

मनन मिश्रा पर बढ़ा इस्तीफे का दबाव

नालसार लॉ छात्र विवाद ने तूल पकड़ लिया है। कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के मुख्य प्रवक्ता सौरव दास ने शुक्रवार को बार काउंसिल आॅफ इंडिया के अध्यक्ष मनन कुमार मिश्रा से इस्तीफा मांगा है। सौरव दास का बयान बहुत कड़ा है। उन्होंने एक्स पर लिखा है- नैतिक दायित्व के तहत मनन कुमार मिश्रा को इस्तीफा देना चाहिए। अदालतों के अंदर और बाहर मौजूद कॉकरोचों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि ऐसा हो। विवाद के बाद सीजेआई के नेताओं अभिजीत दीपके और सौरव दास द्वारा उठाए गए सवालों पर बीसीआई अध्यक्ष मनन मिश्रा ने कहा कि वास्तव में छात्रों के हितों को नुकसान पहुँचाने का हमारा कोई इरादा नहीं था। यह निर्णय अचानक लिया गया था, और जैसे ही काउंसिल के संज्ञान में यह आया, इसे तुरंत रोक दिया गया। काउंसिल के सभी वरिष्ठ सदस्यों ने इस पर चर्चा की और सर्वसम्मति से इस निर्णय को पूरी तरह से वापस ले लिया। अब इस मामले में किसी भी प्रकार की जाँच का सवाल ही नहीं उठता। उन्होंने कहा कि चाहे अभिजीत दिपके हों या सौरव दास, मैं उन्हें बताना चाहता हूँ कि जहाँ तक छात्रों के हितों का सवाल है, कोई समस्या नहीं है। छात्रों के हितों की रक्षा करना मेरी, बीसीआई और इसके सदस्यों की जिम्मेदारी है। यदि कोई भ्रम या संवादहीनता रही है, तो मैं स्पष्ट करना चाहता हूँ कि बीसीआई के लिए छात्रों के हित सर्वोपरि हैं। जो अभिजीत दिपके भी चाहते हैं, बीसीआई भी वही चाहती है। इसलिए यहाँ हितों का कोई टकराव नहीं है। वहीं सीजेपी प्रवक्ता सौरव दास ने मनन मिश्रा पर बैठकों और सम्मेलनों में 14 करोड़ रुपये खर्च करने का आरोप लगाया था।

क्या बोले सीजेआई?

भारत के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने कहा कि छात्रों को शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन करने का अधिकार है और उन्होंने इस मामले में बीसीआई की भूमिका पर सवाल उठाया। मुख्य न्यायाधीश ने कहा, बीसीआई बेवजह कार्रवाई कर रहा है। अगर छात्रों के पास विरोध करने का कोई कारण है, तो उन्हें विरोध करने का अधिकार है। छात्र मुझे पत्र भी लिख सकते थे। यह छात्रों और मेरे बीच संवाद है। वे (बीसीआई) कौन होते हैं बेवजह मुद्दा उठाने वाले? यह बिल्कुल अनुचित है। बीसीआई का इससे कोई लेना-देना नहीं है। मुख्य न्यायाधीश ने आगे कहा, मैं खुद छात्र जीवन के दौरान छात्र गतिविधियों में शामिल रहा हूं। वे शांतिपूर्वक अपनी आवाज उठा रहे हैं, उन्हें इसकी अनुमति मिलनी चाहिए। भले ही वे गलत हों, फिर भी उन्हें विरोध करने का अधिकार है। उन्हें कौन रोक सकता है? जब तक वे कानूनी और शांतिपूर्ण तरीके से अपनी आवाज उठा रहे हैं, उनकी बात सुनी जानी चाहिए। बार काउंसिल या कोई अन्य संस्था इसमें हस्तक्षेप क्यों करे? मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने ये टिप्पणियां तब कीं जब वरिष्ठ अधिवक्ता के. परमेश्वर ने मौखिक रूप से बीसीआई अध्यक्ष के निदेर्शों के विरुद्ध दायर एक रिट याचिका का जिक्र किया। परमेश्वर ने बताया कि हालांकि बीसीआई अध्यक्ष ने बाद में निर्देश वापस ले लिए, लेकिन याचिका पर कार्रवाई का आधार अभी भी बना हुआ है।

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01 जनवरी : मूलनिवासी शौर्य दिवस (भीमा कोरेगांव-पुणे) (1818)

01 जनवरी : राष्ट्रपिता ज्योतिबा फुले और राष्ट्रमाता सावित्री बाई फुले द्वारा प्रथम भारतीय पाठशाला प्रारंभ (1848)

01 जनवरी : बाबा साहेब अम्बेडकर द्वारा ‘द अनटचैबिल्स’ नामक पुस्तक का प्रकाशन (1948)

01 जनवरी : मण्डल आयोग का गठन (1979)

02 जनवरी : गुरु कबीर स्मृति दिवस (1476)

03 जनवरी : राष्ट्रमाता सावित्रीबाई फुले जयंती दिवस (1831)

06 जनवरी : बाबू हरदास एल. एन. जयंती (1904)

08 जनवरी : विश्व बौद्ध ध्वज दिवस (1891)

09 जनवरी : प्रथम मुस्लिम महिला शिक्षिका फातिमा शेख जन्म दिवस (1831)

12 जनवरी : राजमाता जिजाऊ जयंती दिवस (1598)

12 जनवरी : बाबू हरदास एल. एन. स्मृति दिवस (1939)

12 जनवरी : उस्मानिया यूनिवर्सिटी, हैदराबाद ने बाबा साहेब को डी.लिट. की उपाधि प्रदान की (1953)

12 जनवरी : चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु परिनिर्वाण दिवस (1972)

13 जनवरी : तिलका मांझी शाहदत दिवस (1785)

14 जनवरी : सर मंगूराम मंगोलिया जन्म दिवस (1886)

15 जनवरी : बहन कुमारी मायावती जयंती दिवस (1956)

18 जनवरी : अब्दुल कय्यूम अंसारी स्मृति दिवस (1973)

18 जनवरी : बाबासाहेब द्वारा राणाडे, गांधी व जिन्ना पर प्रवचन (1943)

23 जनवरी : अहमदाबाद में डॉ. अम्बेडकर ने शांतिपूर्ण मार्च निकालकर सभा को संबोधित किया (1938)

24 जनवरी : राजर्षि छत्रपति साहूजी महाराज द्वारा प्राथमिक शिक्षा को मुफ्त व अनिवार्य करने का आदेश (1917)

24 जनवरी : कर्पूरी ठाकुर जयंती दिवस (1924)

26 जनवरी : गणतंत्र दिवस (1950)

27 जनवरी : डॉ. अम्बेडकर का साउथ बरो कमीशन के सामने साक्षात्कार (1919)

29 जनवरी : महाप्राण जोगेन्द्रनाथ मण्डल जयंती दिवस (1904)

30 जनवरी : सत्यनारायण गोयनका का जन्मदिवस (1924)

31 जनवरी : डॉ. अम्बेडकर द्वारा आंदोलन के मुखपत्र ‘‘मूकनायक’’ का प्रारम्भ (1920)

2024-01-13 16:38:05