




2026-01-03 14:52:01
नई दिल्ली। रविवार 21 दिसंबर को बहुजन स्वाभिमान संघ के तत्वाधान में एक विचार गोष्ठी का आयोजन किया गया। जिसका विषय था ‘बढ़ता ब्राह्मणवाद देश की एकता व अखंडता के लिए खतरा’। जहां देश के विख्यात प्रोफेसर, समाजसेवी व बहुजन समाज से जुड़े संगठनों के गणमान्य लोग मौजूद रहे। इसी बीच मेरठ से आये प्रोफेसर सतीश प्रकाश ने भी कार्यक्रम की प्रशंसा करते हुए अपना संबोधन दिया।
उन्होंने कहा कि मैं तमाम आयोजन समिति के वो लोग, जिन्होंने इतना खूबसूरत कार्यक्रम किया। परम पूज्य बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर जी को नमन, तथागत भगवान बुद्ध को नमन, आदरणीय भंती जी को नमन और दलित समाज में तमाम जन्मे महापुरुषों को नमन करता हूं। इस सभागार में उपस्थित तमाम लोग, तमाम बहनें, बच्चे, सब लोगों को नमन करता हूं।
उन्होंने आगे कहा कि, देखिए भारत में दलितों के जो हालात हैं, वो दो तरह के हालात हैं। एक हजार साल पहला दलित और एक आजाद भारत में पनपा दलित। एक बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर जी के विचारों से ओत-प्रोत दलित। उस दलित का मूवमेंट कुछ अलग तरह का है, लेकिन ये दलित कुछ अलग तरीके से लड़ रहा है। लेकिन दोनों में एक समानता है। आधा देश भूखा और आधा देश नंगा है। जिस देश में 84 करोड़ लोग सरकार के द्वारा दिए गए अनाज के ऊपर अपना जीवन जी रहे हों, वो देश क्या है? अभी बीबीसी की जो रिपोर्ट है, कि भारत की 40% जो संपत्ति है, वो भारत के 1% लोगों के पास है। देश आजाद तो हुआ, लेकिन सही मायने में देश कहाँ आजाद हुआ? जो संसाधनों का डिस्ट्रीब्यूशन (बंटवारा) है, वो डिस्ट्रीब्यूशन हुआ किधर? बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर जी ने कहा कि जो एग्रीकल्चर (कृषि) है, उसका राष्ट्रीयकरण हो। क्योंकि, गावों में आज भी साधन क्या है? जमीन है न। अभी भी जो आदिवासी है, अभी एक आदिवासी जो आंदोलन हो रहा था, जिसको बीजेपी ने जानबूझ करके वनवासी कहते हैं। उसको वो आदिवासी कहने में इसलिए दिक्कत हो रही है कि उसकी आइडेंटिटी (पहचान) गड़बड़ है। जो कि सुप्रीम कोर्ट की 2011 में ये टिप्पणी है कि भारत का अगर कोई मूल निवासी हो सकता है, तो वो आदिवासी है।
मैं एक बात जरूर कहता हूँ, ब्राह्मणवाद का विरोध हम जीवन के अंतिम क्षण तक करेंगे। जाति खत्म होगी या नहीं होगी, इसको लेकर के शंका है। क्योंकि जब तक जातीय व्यवस्था के ऊचले पायदान पर बैठा हुआ व्यक्ति जब तक जाति नहीं छोड़ेगा, जातीय व्यवस्था के निचले पायदान का व्यक्ति जाति खत्म नहीं कर सकता। एक काम कर लें न! इस जाति को ही बेकार कर देते हैं। अपनी जाति को इतना उठा दो, अपनी व्यवस्था को इतना उठा दो, अपने ज्ञान को इतना उठा दो, अपने मूवमेंट को इतना उठा दो कि कल ब्राह्मण भी आपके सामने जाकर के नतमस्तक हो जाए।
उन्होंने आगे कहा कि मेरा स्पष्ट मानना है कि जातिवाद का विरोध, दलित मूवमेंट के लिए एक मसाले का काम करता है, इसमें कहीं कोई दो राय नहीं। उस मूवमेंट की ताकत को बढ़ाता है, उसके स्वाद को बढ़ाता है। लेकिन साथ में आपको ये भी ध्यान रखना है, कहीं आप गलती न कर जाएं, कहीं मसाले की सब्जी न बना के बैठ जाएं। क्योंकि मसाले की सब्जी बनाओगे तो आपका पेट खराब होगा। अपने सामाजिक मंचों का उपयोग विरोध के साथ-साथ कुछ सकारात्मक चीजों को भी निकालना पड़ेगा। भारत के दलितों की एक बहुत बड़ी एक सांस्कृतिक लड़ाई भी है। ब्राह्मणवाद ने कुछ नहीं किया, ब्राह्मणवाद ने जो दलितों की, जो बहुजन था, उसकी संस्कृति को कहीं न कहीं तहस-नहस किया। जो उसका खान-पान था, उसको उसने खराब बता दिया। जो उसका रहन-सहन था, उसको उसने खराब बता दिया। लेकिन हमें बदलना है, हमको पलटना है। जो मोटे अनाज कल हम खाते थे, हमारे हिस्से में आते थे, मजबूरी में आते थे, आज वो मोटे अनाज देश का प्रधानमंत्री ये कह रहा है कि मोटे अनाज खाओ, मिलेट्स के नाम पर खाओ। जिस लहसुन-प्याज को लेकर के वो तामसिक कहते थे, हमारे भोजन का हिस्सा था। तुम भोजन में शुद्धता मत ढूंढो। भगवान बुद्ध ने ये खुद कहा है। जब उनसे पूछा गया कि मांसाहार होना चाहिए या नहीं होना चाहिए? जब जैन धर्म पनपा और जैन धर्म ने पूरा का पूरा उसको खत्म किया कि हटाइए, मांस नहीं खाया जाएगा। मूलत: व्यक्ति जो पैदा हुआ वो मांसाहारी है, इसमें कहीं कोई दो राय नहीं है, चाहे किसी भी संस्कृति में चले जाएं। उसने कहा कि भाई क्या होगा ये? तो भगवान बुद्ध ने कहा कि मैं मध्यम मार्गी हूँ। मैं मध्यम मार्गी नहीं हूँ (मतलब अतिवादी नहीं), ये मांसाहार की बात मुझसे नहीं करेंगे। काल और परिस्थितियां ये तय करेंगी कि मुझको क्या स्वीकार करना है। भोजन मेरे लिए कोई स्वाद नहीं है, भोजन मेरे लिए ऊर्जा का स्रोत है। मुझे जिंदा रहना है और जिंदा रहूंगा तो कहीं न कहीं अपने आपको जिंदा रखूंगा।
उन्होंने आगे कहा कि पूरी दुनिया की नजर दलित मूवमेंट के ऊपर है। पूरी दुनिया की नजर इस देश का जो बहुजन है उसके ऊपर है। कि एक आदमी, एक ऐसे लोग जिनके पास साधन नहीं थे... सबसे ज्यादा दुनिया में कोई प्रोग्रेसिव सिद्ध हुआ है, वो इस देश का जो बहुजन है उसने इस देश की व्यवस्था में बहुत मजबूती से अपनी जगह, अपनी उपस्थिति कहीं न कहीं दर्ज की है। फिफ्टी परसेंट (50%) के बावजूद। और ये खून की गर्मी है। विरोध आपके खून में है। जातिवाद का विरोध आप जाकर के देखिए, ढाई हजार साल पहले भी जातिवाद का विरोध हो रहा था। भगवान बुद्ध वहाँ खड़े थे। वहाँ कहीं न कहीं हर्यक वंश खड़ा था, वहाँ कहीं न कहीं नंद वंश खड़ा था, वहाँ कहीं न कहीं मगध आए न, मौर्य से पहले के बाद में मगध भी आया, वहाँ अशोक भी आया।
उन्होंने आगे कहा कि बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर जी का परिवार जन्मजात बुद्धिस्ट था। बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर जी ने बौद्ध धर्म को स्वीकार करने में जीवन के सिर्फ अंतिम चरण में इसलिए लगाया... सोचिए... कि उनको भारत के संविधान में, भारत के प्रतीकों में कहीं न कहीं बुद्ध लगाना था। अगर झंडा है, तो झंडे के बीच में धम्म चक्र भी है। छाप लो नोट... छापो कितने नोट छापोगे? जहाँ भी नोट छापोगे, उसके ऊपर कहीं न कहीं अशोक का लाट भी है। अगर ये काम बाबा साहब 30 में कर जाते (क्योंकि बात तो बाबा साहब ने 30 में कह दी थी कि मैं हिंदू धर्म में पैदा तो हुआ हूँ, मरूंगा नहीं), लेकिन बाबा साहब ने कहा कि नहीं, इनके हाथ में ऐसी व्यवस्था नहीं सौंपूंगा। आपको मालूम है? हमारे जीवन में जो भी परिवर्तन आया, वो एजुकेशन है। और जब इस देश की शिक्षा नीति मैकाले तय कर रहा था न 1830 में, आज यूट्यूब पे जाकर के चेक करना, मैकाले क्या बोल रहा है जब उसने वो स्पीच लिखा है, जब उसने स्पीच दिया है। उसने कहा कि इस देश की व्यवस्था में संस्कृत भाषा-वासा छोड़ो, ये मंदिरों की भाषा है, ये ज्ञान की भाषा कभी नहीं हो सकती। और इस देश की व्यवस्था को करा। बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर जी 1832 का एक उदाहरण देते हैं। 1832 में मुंबई प्रेसिडेंसी के अहमदनगर के दलित ये कहते हैं, अंग्रेजों को बाकायदा चिट्ठी लिखते हैं कि हमको अंग्रेजी शिक्षा दी जाए। अरे जिसके पास बोलने के लिए पैसे भी न होंगे, न उन पे हिंदी आती होगी, लेकिन उसने अपने आपके लिए अंग्रेजी की कहीं न कहीं व्यवस्था तय करी। 30 में भारत के लिए अंग्रेजी की बात हो रही थी और 32 में दलित... कहाँ से पैसे इकट्ठे करे होंगे? किस-किस को बनाया होगा? और उन्होंने आपके लिए क्या लिख दिया? आपको चिट्ठी लिख दी। आपके लिए चिट्ठी लिख दी। ये आपका दलित मूवमेंट है, ये आपके पूर्वज हैं।
उन्होंने आगे कहा कि भारत में जनगणना के जो आंकड़े हैं, वो 31 की जनगणना है। और भारत में ओबीसी के जो भी आंकड़े हैं, वो 31 के आधार पर हैं। और बनिस्पत दलितों से कहीं न कहीं जो पिछड़ी जातियां थी, उनकी स्थिति में कहीं न कहीं थोड़ा सा एक उभार था (हालाँकि वो भी सामाजिक रूप से कमजोर थे)। और आपकी जनगणना के आंकड़े कब के हैं? 1907 में द ग्रुप आॅफ द पीपल लोगों का एक समूह 1907 में, शौकत अली को पकड़ता है। एक मुस्लिम व्यक्ति है। मुस्लिम को इसलिए पकड़ता है कि ये अंग्रेजों के ज्यादा करीब होगा और जाकर के उसको एक चिट्ठी मारता है- कि साहब सुनिए, हमको हिंदुओं से अलग करो। 1911 की जनगणना में इस देश का दलित की अलग से गणना हुई। दस मानकों के आधार पर। और क्योंकि इस देश के दलितों को ये बात पता था कि देश आजाद तो होगा, आंकड़े भी कहीं न कहीं काम आएंगे। तो आपके लोग क्या-क्या कर रहे थे, क्या-क्या सोच रहे थे, ऐसा नहीं है। भारत में धर्म परिवर्तन हुआ। धर्म परिवर्तन किसको करना चाहिए था? जो पीड़ित था। जो जातीय व्यवस्था से पीड़ित था उसको धर्म परिवर्तन करना चाहिए था। लेकिन आपको ये बात पता होनी चाहिए कि मुसलमान में एक भी जाति कोई दलितों की नहीं है। क्योंकि उनके सवाल मुस्लिम से भी थे। उन्होंने सवाल उनसे भी कहा कि जातीय व्यवस्था खत्म कर दो, लेकिन किसी मुस्लिम शासक ने कभी भी जातीय व्यवस्था को छोड़ा नहीं, जातीय व्यवस्था को कहीं न कहीं बना के रखा। और अकबर के दरबार में... मैं नाचने नहीं गया था। न मेरी मां-मजदूर नाचने गई थी। क्योंकि हम दलितों की औलाद हैं। हम किसी चौराहे पे खड़े होकर के 500 रुपये की भीख नहीं मांगेंगे। हम 300 रुपये की मजदूरी पसंद करेंगे। ये हम दलित हैं, ये हमारे खून में है। हमने धर्म परिवर्तन नहीं किया। मुसलमान धर्म में सारी जातियां उपस्थित हैं, एक भी दलितों की जाति अगर आप बता दें तो आप मुझसे कहीं न कहीं सवाल पूछ सकते हैं। हम खुद्दार लोग हैं, हमने खुद्दारी की है। बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर जी ने, किसको राइट नहीं दिया भाई? आप बताओ तो सही। जो महिलाओं के पास जो राइट है, कौन राइट दे रहा था? 1776 में अमेरिका आजाद हुआ। वोट का अधिकार वहाँ महिलाओं को नहीं था। 1920 में जाकर के अमेरिका की महिलाओं को वोट डालने का अधिकार मिला। क्योंकि इससे पहले वोट का अधिकार या तो पैसा तय करता था और उसको क्या, पुरुष तय करता था, पैसे के आधार पर होता था। बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर जी ने सीधा-सीधा कहा, तीसरे गोलमेज सम्मेलन में, बाकायदा अंग्रेजों की गोल मेज के सामने खड़े होकर के, कि मैं एक वोट का अधिकार हर व्यक्ति को दूंगा। चाहे वो अमीर है, चाहे वो गरीब है, चाहे वो ऊंचा है, चाहे वो नीचा है, चाहे वो पिछड़ा है। इस देश के दलितों को आरक्षण कब मिला? इस देश का दलित आरक्षण अधिनियम 1935 है। जब ये देश आजाद नहीं हुआ है, उससे पहले इस देश का दलित आरक्षण के दायरे में है। मैं कहता हूँ इस बात को दावे के साथ, कि इस देश के दलितों को तीसरी आजादी की लड़ाई लड़नी चाहिए। 1857 पहली आजादी की लड़ाई, दूसरी आजादी की लड़ाई में देश आजाद हुआ, लेकिन देश सिर्फ राजनीतिक रूप से आजाद हुआ, सामाजिक रूप से आज भी गुलाम है। गोरे अंग्रेज चले गए और काले अंग्रेज आज भी विद्यमान हैं। 70 में जब पढ़-लिख कर के दलित आता है (सरकार चाहे किसी की भी रही हो, मेरा दलों से मतलब नहीं है), 70 में जब इस देश का दलित आता है, अवेलेबल है, तब लिखते हैं कि नॉट सूटेबल। पहले अवेलेबल नहीं और बाद में क्या है, सूटेबल नहीं। इस देश के दलितों ने आरक्षण मांगा था कहाँ? कौन कहता है कि बाबा साहब डॉ. भीमराव अंबेडकर जी ने आरक्षण मांगा? हमने तो दो वोट का अधिकार मिला था। वो तो गांधी जी के प्राण बचाने के लिए, वो मर न जाएं (भाई देश को आजाद भी कराना था, लोग हमें ये न कहें कि भाई इन्होंने गद्दारी कर दी), तो कहीं न कहीं गांधी जी के प्राणों को बचाने के लिए हमने कहीं न कहीं वो व्यवस्था तय करी। एहसानमंद उनको रहना चाहिए, एहसानमंद हम नहीं हैं।
उन्होंने आगे कहा कि सुनो, ये मैं आपको दावे के साथ कह सकता हूँ। मेरा स्पष्ट मानना है कि पतझड़ों की बात सुनाकर, यूं मुझे न उदास कर। पतझड़ों की बात सुनाकर यूं मुझे न उदास कर। मुझे नए मौसमों का पता बता, मुझे नए मौसमों का पता बता। जाना तो हमें है ही है, आज नहीं, अगले 20 साल में, अगले 30 साल में, इस देश की व्यवस्था, इस देश का राजा एक दलित को बनना ही पड़ेगा। बनेगा, लिख लो। माने नहीं वो। उसको आप तरका तो सकते हैं, लेकिन उसको रोक नहीं सकते, ये दावा है इस बात का। और जिस एजुकेशन पॉलिसी की बात कह रहे हैं। न्यू एजुकेशन पॉलिसी के नाम पर इस देश के दलितों के साथ सबसे बड़ा छलावा है। एडमिशन वहाँ खत्म हो गए। टीचर कौन-कौन है? इंटर कॉलेज में टीजीटी-पीजीटी? उसका एक कॉम्बिनेशन होता है। बीएससी में मैथमेटिक्स है, बायोलॉजी है, केमिस्ट्री है। अगर आपको ह्यूमैनिटीज का बनना है, तो इंग्लिश के साथ क्या सब्जेक्ट होगा? हिस्ट्री के साथ क्या सब्जेक्ट होगा? लेकिन एनईपी क्या पढ़ा रही है? फिजिक्स ले लो, उर्दू ले लो, संस्कृत ले लो। बन जाओ टीचर? बनो टीचर? बनाएगा वो टीचर? मेरा मानना ये है सर, देखिए गलतियां-वलतियां सबसे होती हैं। आप अपने आपको ऊजार्वान बना के रखो, आप नई चीजों को रखो। दो लाइनें हैं, जो मैं कहना चाहता था, दो लाइनों के साथ अपनी बात खत्म करूंगा।
कि कोशिश कर हल निकलेगा, आज नहीं तो कल निकलेगा।
मरुस्थल से भी जल निकलेगा, मेहनत कर पौधों को पानी दे, बंजर में भी एक दिन फल निकलेगा।
ताकत जुटा, हिम्मत को आग दे, फौलाद सा भी बल निकलेगा।
सीने में उम्मीदों को जिंदा रख, समंदर में कभी-कभी जल निकलेगा।
कोशिश जारी रख कुछ कर गुजरने की, और जो कुछ थमा-थमा सा है... थमो मत! थमो मत!
कि जो कुछ थमा-थमा सा है, चल निकलेगा। कोशिश कर हल निकलेगा, आज नहीं तो कल निकलेगा।
कि अगर चल सकते हो तो चलो। और अगर चल भी नहीं सकते, दौड़ो और दौड़ नहीं सकते, तो चलो। और अगर चल भी नहीं सकते तो कहीं न रेंगो। फिर भी रुको मत बिल्कुल भी।
बहुत-बहुत धन्यवाद। भीम, नमो बुद्धाय





| Monday - Saturday: 10:00 - 17:00 | |
|
Bahujan Swabhiman C-7/3, Yamuna Vihar, DELHI-110053, India |
|
|
(+91) 9958128129, (+91) 9910088048, (+91) 8448136717 |
|
| bahujanswabhimannews@gmail.com |