




2026-09-26 14:21:23
नई दिल्ली ।ग्रेटर नोएडा के यमुना एक्सप्रेसवे पर दिल्ली से महोबा जा रही एक स्लीपर बस में अचानक आग लगने से नौ यात्रियों की जिंदा जलकर दर्दनाक मौत हो गई। नब्बे प्रतिशत से अधिक जल चुके शवों की पहचान के लिए डीएनए परीक्षण का सहारा लेना पड़ रहा है। यह कोई पहली या अकेली दुर्घटना नहीं है, बल्कि देश के विभिन्न राज्यों—विशेष रूप से उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान और आंध्र प्रदेश—के राजमार्गों पर पिछले वर्षों में घटी ऐसी ही खौफनाक घटनाओं की एक लंबी श्रृंखला का हिस्सा है। आधुनिक एक्सप्रेसवे और चमचमाती सड़कों के प्रचार के बीच एक कड़वी हकीकत यह भी है कि लंबी दूरी की निजी और स्लीपर बसें यात्रियों के लिए चलता-फिरता ताबूत साबित हो रही हैं। इन त्रासदियों के पीछे केवल चालक की लापरवाही या शॉर्ट सर्किट नहीं है, बल्कि इसके पीछे अनधिकृत बॉडी निर्माण, अवैध परमिट, परिवहन विभागों में फैला भ्रष्टाचार और सुरक्षा मानकों की खुली अनदेखी जिम्मेदार है।
पिछले वर्षों की प्रमुख बस अग्निकांड घटनाएं
●इससे पहले जनवरी 2020 में उत्तर प्रदेश के कन्नौज में जीटी रोड पर छिबरामऊ के पास एक स्लीपर बस ट्रक से टकरा गई और देखते ही देखते आग का गोला बन गई, जिसमें बीस से अधिक यात्री जिंदा जल गए थे।
●जुलाई 2023 में महाराष्ट्र के समृद्धि महामार्ग पर बुलढाणा के पास एक निजी एसी स्लीपर बस डिवाइडर और खंभे से टकराकर पलट गई थी। बस बायीं तरफ पलटने के कारण उसका मुख्य निकास द्वार पूरी तरह बंद हो गया और खिड़कियों के शीशे न टूटने की वजह से पच्चीस यात्रियों की मौके पर ही जलकर मौत हो गई थी।
●अक्टूबर 2022 में महाराष्ट्र के नासिक-औरंगाबाद मार्ग पर भी एक निजी ट्रैवल्स बस की टक्कर के बाद आग भड़क उठी थी, जिसमें बारह यात्रियों की जान गई और तैंतालीस लोग गंभीर रूप से झुलस गए थे।
●इसी तरह आंध्र प्रदेश के महबूबनगर में वोल्वो बस की पुलिया से टक्कर के बाद लगी आग में पैंतालीस यात्री जिंदा जल गए थे, जिसने देश भर में लग्जरी बसों के डिजाइन पर गंभीर सवाल खड़े किए थे। वहीं नवंबर 2021 में राजस्थान के बाड़मेर-जोधपुर हाईवे पर भी बस और टैंकर की भिड़ंत के बाद बारह लोग आग की भेंट चढ़ गए थे।
आग लगने पर बसें गैस चैंबर क्यों बन जाती हैं?
जांच रिपोर्टों और विशेषज्ञों के अनुसार, इन हादसों में बड़े पैमाने पर जान जाने के पीछे कई तकनीकी और संरचनात्मक कारण होते हैं।
●पहला कारण है अनधिकृत बॉडी निर्माण और घटिया सामग्री। ज्यादातर निजी बस आॅपरेटर कंपनियों से केवल चेसिस खरीदते हैं और स्थानीय वर्कशॉप्स में सस्ती लागत पर बस का ढांचा बनवाते हैं। केबिन के अंदर सस्ता फोम, रेक्सिन, प्लास्टिक और प्लाईवुड लगाया जाता है। जब इनमें आग लगती है, तो कार्बन मोनोआॅक्साइड जैसी जहरीली गैसें निकलती हैं, जिससे यात्री लपटों की चपेट में आने से पहले ही बेहोश हो जाते हैं।
●दूसरा बड़ा कारण तारों का अनधिकृत जाल और ओवरलोडिंग है। स्लीपर बसों में यात्रियों को आकर्षित करने के लिए हर बर्थ पर चार्जिंग पॉइंट, टीवी स्क्रीन, अतिरिक्त एसी और सजावटी लाइटें लगा दी जाती हैं। इन तारों की गुणवत्ता खराब होती है और अधिक लोड व तेज गति के घर्षण के कारण शॉर्ट सर्किट हो जाता है।
●तीसरा कारण आपातकालीन निकास द्वारों का बंद होना है। मुनाफा बढ़ाने के चक्कर में आॅपरेटर आपातकालीन खिड़की या दरवाजे के सामने भी अतिरिक्त सीटें या स्लीपर बर्थ लगा देते हैं। खिड़कियां पूरी तरह पैक होती हैं और शीशा तोड़ने वाले हथौड़े गायब रहते हैं। आग लगने पर बिजली कटते ही न्यूमेटिक और हाइड्रोलिक दरवाजे अपने आप लॉक हो जाते हैं, जिससे लोगों को भागने का कोई रास्ता नहीं मिलता।
इसके अलावा, सवारी बसों की डिक्की में अवैध रूप से व्यावसायिक पार्सल, कपड़े, प्लास्टिक और कई बार रासायनिक उत्पाद तक ढोए जाते हैं, जो आग को चंद सेकंड में भड़का देते हैं।
प्रशासनिक नाकामी और आरटीओ तंत्र की मिलीभगत
हर बड़े हादसे के बाद सरकार का एक तय ढर्रा देखने को मिलता है—शोक संदेश, दो-दो लाख रुपये के मुआवजे की घोषणा, और तीन दिन का जांच अभियान। इसके बाद पूरा मामला ठंडे बस्ते में चला जाता है। हकीकत यह है कि परिवहन विभाग यानी आरटीओ और पुलिस की मिलीभगत के बिना यह खेल नहीं चल सकता। बसों को बिना किसी जमीनी जांच के फिटनेस सर्टिफिकेट थमा दिए जाते हैं। कोई अधिकारी यह नहीं देखता कि आपातकालीन दरवाजा खुला है या नहीं, या अग्निशामक यंत्र काम कर रहा है या नहीं। आॅल इंडिया टूरिस्ट परमिट का खुलेआम दुरुपयोग करके इन्हें नियमित स्टेज कैरिज की तरह चलाया जाता है, और अंतरराज्यीय सीमाओं पर केवल बंधी-बंधाई वसूली के दम पर इन्हें हरी झंडी दे दी जाती है। बस बॉडी कोड और सुरक्षा मानकों से जुड़े सरकारी नियम केवल कागजों तक ही सीमित रह जाते हैं।
स्पीड बनाम सेफ्टी: आधुनिक एक्सप्रेसवे का सच
सड़कों और एक्सप्रेसवे का नेटवर्क तो तेजी से बिछाया जा रहा है, लेकिन बुनियादी सुरक्षा तंत्र नदारद है। कंक्रीट के एक्सप्रेसवे पर लगातार तेज गति से दौड़ने के कारण पुराने टायरों का तापमान अत्यधिक बढ़ जाता है और उनके फटने से निकली चिंगारी आग का कारण बनती है। हादसों के समय आपातकालीन बचाव दल और दमकल की गाड़ियां मौके पर चालीस मिनट से एक घंटे बाद पहुंचती हैं, तब तक सब कुछ राख हो चुका होता है।
जवाबदेही किसकी?
ऐसे मामलों में केवल उस ड्राइवर पर मुकदमा दर्ज कर इतिश्री कर ली जाती है जो खुद किसी तरह जान बचाकर भागा हो। वास्तविक जिम्मेदारी उन परिवहन अधिकारियों की होनी चाहिए जिन्होंने बिना जांच फिटनेस प्रमाण पत्र जारी किए, उन बॉडी बिल्डरों की होनी चाहिए जिन्होंने जानलेवा डिजाइन बनाए, और एक्सप्रेसवे प्रबंधन की होनी चाहिए जो भारी टोल वसूलने के बाद भी सुरक्षा जांच नहीं करता।
जब तक सभी स्लीपर बसों में आॅटोमैटिक आग बुझाने की प्रणाली अनिवार्य नहीं होगी, बिजली कटने पर दरवाजे स्वत: खुलने की तकनीक लागू नहीं की जाएगी और अनधिकृत निर्माण पर आपराधिक मुकदमे दर्ज नहीं होंगे, तब तक यह सिलसिला नहीं थमेगा। आम जनता जिस टिकट के पैसे देती है, वह उसकी अंतिम यात्रा का परमिट नहीं बनना चाहिए। सड़कों की रफ्तार के साथ-साथ मुसाफिरों की जान की हिफाजत को भी प्राथमिकता बनाना अनिवार्य है।





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