




2026-02-07 17:30:42
नई दिल्ली। बहुजन समाज पार्टी की राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने फिर से ब्राह्मणों के अपमान पर चिंता जताते हुए घूसखोर पंडित फिल्म पर प्रतिबंध लगाने की मांग की है। बसपा सुप्रीमो ने शुक्रवार को कहा कि यह दुख व चिंता की बात है कि पिछले कुछ समय से अकेले यूपी में ही नहीं, बल्कि अब फिल्मों में भी पंडित को घूसखोर बताकर पूरे देश में इनका अपमान और अनादर किया जा रहा है। बसपा इसकी कड़े शब्दों में निंदा करती है।
वहीं इससे पहले 15 जनवरी 2026 को अपने जन्मदिन पर पत्रकारों को संबोधित करते हुए बसपा सुप्रीमो मायावती ने कहा था कि बसपा ने ब्राह्मण को भागीदारी दी। ब्राह्मणों को किसी का चोखा बाटी नहीं चाहिए। ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य समाज का बसपा सरकार पूरा ध्यान रखेगी। बसपा ने हमेशा ही उनका सम्मान किया है। बसपा ऐसी पार्टी है जिसने सभी जातियों और धर्मो का सम्मान किया है। मायावती ने लखनऊ में भाजपा ब्राह्मण विधायकों की बैठक को लेकर कहा था कि योगी आदित्यनाथ सरकार में ब्राह्मणों की स्थिति अच्छी नहीं है। हमारी सरकार में ब्राह्मणों का सम्मान किया गया।
डर या राजनीति: सीबीआई और ईडी के डर से अब भाजपा बहनजी को जैसे चाहती है नचाती है। या बहनजी सत्ता की कमी के कारण अब तुष्टीकरण की राजनीति अपना रही है? बहुजन समाज को चाहिए कि कोई नया नेता बसपा के लिए चुन लिया जाए। मायावती ने बाबा साहब का मिशन मनुवादियों को गिरवी रख दिया है सत्ता के लिए, जब की ब्राह्मणवादी 15% हैं। राज पाठ के लिए 51% वोटों की जरूरत है और बहुजन समाज 85% है, तो फिर मायावती ने जो बात ब्राह्मणों के लिए कही वही बात दलितों, पिछड़ों, मुसलमानों के उत्थान के लिए कहनी चाहिए थी। अगर, 85% बहुजनों को मायावती ने हिस्सेदारी दी होती तो उन्हें आज सत्ता से दूर नहीं होना पड़ता। आज बहनजी शून्य पर हैं।
बहनजी की ऐसी बयानबाजी से लगता है कि वे ईडी, आईटी और सीबीआई आदि के डर से ब्राह्मणवादियों की शरण में जा रही हैं। उन्होंने अपने शासनकाल में अपने व अपने से संंबंधित परिवार वालों के लिए जो वैध और अवैध सम्पत्ति एकत्र की है उसे खाने का खतरा उन्हें सता रहा है। जिसके कारण वे अपने ही समाज के विरूद्ध अर्नगल बयान दे रहीं है, और यह शायद उन्हें भी ज्ञात हो गया है अब बहुजन समाज उनके साथ नहीं है। ऐसी बयानबाजी से बहुजन समाज बहन जी को अभी तक जो कुछ वोट दे रहा था अब उतनी वोट भी देने में असमर्थ रहेगा। बहुजन समाज जानता है और वो पूर्ण रूप से सजग व जागरूक भी है कि जब वह अपने माननीय नेता बी.पी. मौर्या, संघप्रिय गौतम, रामधन, चौधरी चांदराम व ऐसे अनेकों अति सक्रिय नेताओं का त्याग कर सकता है तो बहन जी उनके सामने कुछ भी नहीं हैं। समाज यह भी जानता है कि समाज के ये सभी नेता अंतिम समय में भाजपा में जाकर ही मरते हैं।
साहेब कांशीराम जी की गलती: कांसीराम जी द्वारा बहन जी को पार्टी का सुप्रीमो बनाना अब पूरे बहुजन समाज की राजनीति पर भारी पड़ रहा है। मान्यवर साहेब ने बहन जी को बसपा का अध्यक्ष व सुप्रीमो बनाया, शायद यह उन्होंने समाज के हित में ही किया होगा, जो उनके जाने के बाद समाज की राजनीति में गलत सिद्ध हो रहा है। अच्छा होता अगर वे पार्टी और समाज के हित को ध्यान में रखकर पूरे देश से करीब 100 अच्छे सामाजिक व अम्बेडकरवादी सोच वाले व्यक्तियों को छाँटकर एक बहुआयामी परिषद का निर्माण करते और जो भी समाज व पार्टी हित में अहम फैसले होते वे सभी मामले इसी अहम परिषद के द्वारा विचार-विमर्श के माध्यम से लिए जाते, जिन्हें लागू करने का काम बहन जी या किसी अन्य सर्वमान्य सदस्य को दिया जाता। इस संदर्भ में हमें भगवान बुद्ध के परिनिर्वाण से पहले हुई घटनाओं को अपने मस्तिष्क में रखकर सोचना चाहिए कि जब भगवान बुद्ध का परिनिर्वाण होने का समय नजदीक आया, तब उनके पास उनके सबसे प्रिय शिष्य भंते आनंद ने उनसे पूछा था कि अब आपका परिनिर्वाण का समय नजदीक है तो आप हमें बताइये कि क्या करना है? तब भगवान बुद्ध ने भंते आनंद को समझाते हुए कहा था कि मैंने संघ का भी निर्माण किया है इसलिए समय और जरूरत के हिसाब से संघ ही फैसले लेगा। अंग्रेजी में भी कहा जाता है कि ‘टू ब्रेनस आर आॅलवेज बेटर’ (दो दिमागों से ली गई राय एक दिमाग से ज्यादा अच्छी होते हैं) इस संदर्भ को देखते हुए मान्यवर साहेब ने सारी शक्ति (राजनैतिक व सामाजिक) बहन जी के पास गिरवी रख दी जो बहुजन समाज के राजनैतिक इतिहास की सबसे बड़ी भूल सिद्ध हो रही है। ‘स्टुअर्ट मिल कहते थे, लोकतंत्र के रख रखाव में सावधानी रखना बहुत आवश्यक है, किसी भी महान व्यक्ति के पैरों में अपनी आजादी गिरवी न रखें और न ही उस पर इतना विश्वास करें, जो उसे आपके संस्थानों को नष्ट करने में सक्षम बनाता हो।
वहीं बाबा साहब डॉ. अम्बेडकर ने कहा, कि महान पुरुषों के लिए, जिन्होंने जिंदगी भर सेवाएँ दी हैं, आभारी होना खराब बात नहीं है। लेकिन कृतज्ञता की सीमाएं होनी चाहिए। कोई भी व्यक्ति अपने सम्मान के मूल्य पर, कोई भी स्त्री अपनी पवित्रता के मूल्य पर, कोई भी राष्ट्र अपनी स्वतंत्रता के मूल्य पर कृतज्ञ नहीं हो सकता। यह सावधानी अन्य राष्ट्रों के मुकाबले भारत में अधिक आवश्यक है।’
गलती को सुधारा कैसे जाये? गलती सुधार में समय लगता है चूंकि आज समाज के सभी जातीय घटकों में शून्यता आ चुकी है और शून्यता को ऊजार्वान बनाने में अधिक शक्ति की जरूरत होती है। न्यूटन का लॉ भी इसी और इशारा करता है, बताता है कि ‘जो वस्तु या आंदोलन चल रहा है उसको आगे चलाते रहने में कम ऊर्जा की आवश्यकता होती है, लेकिन रुक जाने पर उसे दोबारा संचालित करने के लिए अधिक ऊर्जा और संसाधन की जरूरत होती है।’ बसपा एक राजनैतिक आंदोलन नहीं है बल्कि बहुजन समाज का एक सामाजिक आंदोलन भी है। अब इस ठहरी हुई सामाजिक आंदोलन की मशीन को सुव्यवस्थित करके दोबारा से संचालित करना पड़ेगा जिसके लिए देशभर से अच्छे करीब 100 अम्बेडकरवादियों का सम्मेलन करके और उसकी कम से कम 3-4 बार पुनरावर्ती करके, सच्चे अम्बेडकरवादियों व बहुजन समाज के हितैषी लोगों को पहचाना और चुनना होगा। ऐसे चुने गए व्यक्तियों की एक राष्ट्रीय परिषद का निर्माण करना होगा। यह राष्ट्रीय परिषद ही क्षेत्रीय स्तर के जागरूक व ऊजार्वान लोगों का चुनाव करके उन्हें बहुजन समाज के राजनीतिक क्षेत्र में उतारने का काम करेगी, साथ ही परिषद के संचालन के लिए आर्थिक व अन्य जरूरी संसाधनों को जनता से चन्दा के माध्यम से उनका आवश्यक खर्च व निर्माण करेगी, जिसका मालिकाना हक भी जनता के पास ही होगा किसी व्यक्ति विशेष के पास नहीं।





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