2025-02-14 13:33:58
प्रकाश चंद
भारतीय जनता में ब्राह्मणी संस्कृति की मानसिकता पुष्यमित्र शुंग द्वारा बौद्ध शासन के प्रति क्रांति से शुरू होकर अभी तक चली आ रही है। पुष्यमित्र शुंग ने ईसा पूर्व 185 में बौद्ध शासक बृहद्रथ की हत्या करके उसके शासन पर अपने आपको स्थापित किया। बौद्ध भिक्षुओं, विहारों व प्रजा का बड़े पैमाने पर कत्लेआम करके ब्राह्मणी संस्कृति को भारतभूमि पर स्थापित करने का काम किया। तभी से इस देश में ब्राह्मणी संस्कृति का वर्चस्व दिन-प्रतिदिन बढ़ता दिख रहा है। ब्राह्मणी संस्कृति के वर्चस्व ने देश के अधिकतर भव्य बौद्ध विहारों को ध्वस्त करके अपने तथाकथित काल्पनिक भगवानों व देवी-देवताओं के मंदिरों में परिवर्तित किया है। आज ब्राह्मणी संस्कृति के जो लोग देश की हर मस्जिद में शिवलिंग खोज रहे हैं उन्हें ज्ञात होना चाहिए कि प्राचीन काल में बौद्ध विहारों को ध्वस्त करने का श्रेय उनके ब्राह्मणवादी पूर्वजों को ही जाता है। न्यायिक व मानवीय दृष्टि से अगर इन वर्चस्वकारियों में कुछ नैतिकता के अंश शेष हैं तो उन्हें शिवलिंग ढूँढने से पहले देशवासियों को यह बताना चाहिए कि उन्होंने यहाँ भारत में कितने बौद्ध विहारों को ध्वस्त करके मंदिरों में परिवर्तित किया था। इतिहास इस बात का गवाह है कि देश में जितना विध्वंस और अमानवीय अत्याचार ब्राह्मणी संस्कृति के लोगों ने धार्मिक अंधश्रद्धा के तहत किया है उतना किसी दूसरी संस्कृति के लोगों ने यहाँ नहीं किया है। आज देश के अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति व अतिपिछड़ी जातियों के लोगों को हिन्दू कहकर संबोधित किया जा रहा है जो अतार्किक और असत्य है। ‘हिन्दू’ शब्द की उत्पत्ति दसवीं शताब्दी के बाद की है। देश में बसने वाली बहुजन जनता को 1911 की जनगणना के समय तक अब्राह्मण कहा जाता था जिसके सबूत तत्कालीन सरकारी दस्तावेजों में मौजूद है। सभी सरकारी दस्तावेजों में आजादी के समय तक ब्राह्मण जाति के लोगों का धर्म ‘ब्राह्मण’ लिखा जाता था और अन्य सभी लोगों का ‘अब्राह्मण’ लिखा जाता था। आज मनुवादी मानसिकता की सरकार है, जिसका मुख्य लक्ष्य देश में मनुस्मृति आधारित सामाजिक व्यवस्था को स्थापित करना है। इसी मानसिकता के कारण आज ब्राह्मण जाति के लोग जो पहले कांग्रेस पार्टी को वोट करते थे वे आज मनुवादी संघी मानसिकता वाली भाजपा को वोट कर रहे हैं और जनता में खुलेआम उसका प्रचार कर रहे हैं कि ब्राह्मणों ने जब तक कांग्रेस का साथ दिया वह सत्ता में रही और ब्राह्मणों ने जब से कांग्रेस को छोड़कर मनुवादी भाजपा का साथ दिया है तब से वह निरंतरता के साथ सत्ता में है, इसलिए यहाँ पर ब्राह्मण ही श्रेष्ठ है। ब्राह्मणों का आंतरिक चरित्र व मानसिकता में छिपे नीति निर्धारक अवयवों के आधार पर वे दूसरों से अलग है। उनका हर व्यक्ति बूढ़ा हो या जवान, एकमत के आधार पर कार्य करते हैं जबकि अन्य समाज के लोग ऐसा व्यवहार नहीं करते। बहुजन समाज के व्यवहार में बिखराव है चूंकि उनके नीति निर्धारक तात्विक अवयवों (जींस) में विखंडता है और एकरूपता का अभाव है। जिसके कारण वे देश या प्रदेश के चुनाव में बिखराव के साथ मतदान करता है। देश में ब्राह्मणों की जनसंख्या तीन प्रतिशत होने के बावजूद भी उनका देश की सत्ता, शासन-प्रशासन में वर्चस्व है, जिसका कारण उनमें एकता और सत्ता में बने रहने का अटूट लक्ष्य है। ब्राह्मण समुदाय में एकरूपता का कारक उनकी मानसिकता की आंतरिक संरचना व सामाजिक परिवेश में छिपे नीति निर्धारक तात्विक अवयवों का होना है। देश की बाकी जनसंख्या को ब्राह्मणों ने अपने आपको सुरक्षित और अबाध्य सत्ता में बनाए रखने के उद्देश्य से 6743 जातियों में विभक्त करके उनमें क्रमिक ऊँच-नीच की व्यवस्था देकर वहाँ पर एकता न होने देने का पुख्ता इंतजाम कर रखा है। जिसके कारण आज देश का बहुसंख्यक समाज एकता के सूत्र में बंध नहीं पा रहा है। चुनाव में वह अपने जातीय बिखराव के साथ मतदान करता है और बहुसंख्यक होकर भी सत्ता से दूर हो जाता है।
बहुजन समाज के महापुरुषों ने समय-समय पर समाज को जगाने का काम किया। लेकिन समाज आजतक अपने महापुरुषों की शिक्षा को समझने में असफल है। जागरूकता का कार्य इस देश में सबसे पहले भगवान बुद्ध ने ज्ञान प्राप्ति के बाद अपने प्रथम उपदेश ‘बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय लोकानुकंपाय’ पालि भाषा के एक सूत्र वाक्य से किया, जिसका शाब्दिक अर्थ है कि बहुसंख्यक लोगों का हित हो, बहुसंख्यक लोग सुखी रहे और सबके लिए मंगलकामना करें। जबकि ब्राह्मण संस्कृति इसके उलट है वह ब्राह्मणों को ही श्रेष्ठ मानकर उन्हीं के कल्याण की बात करती है और बाकी सभी को नीच मानती है। इसी आधार पर पुष्यमित्र शुंग ने अपने समय में तीन शातिर ब्राह्मणों की कमेटी बनाकर मनुस्मृति की रचना करायी थी। ब्राह्मणी मानसिकता से संक्रमित यहाँ की अधिसंख्यक बहुजन जनता आज उसी मनुस्मृति को अपना सर्वश्रेष्ठ धार्मिक ग्रंथ मानती है।
मध्यकालीन संत शिरोमणि गुरु रविदास जी ने अपनी वाणी में कहा है कि ‘‘ऐसा चाहूँ राज में, जहाँ मिलै सबन को अन्न, छोटे-बड़े सब सम बसे, रैदास रहे प्रसन्न’’ इसी वाणी को सिख समुदाय के गुरुओं ने अपने गुरु ग्रंथ साहिब में स्थान दिया। चूंकि वे सभी समतावादी विचारधारा के गुरु थे। ब्राह्मणी संस्कृति के लोग जो समतावादी विचारधारा को देश में स्थापित नही होने देना चाहते थे उन्होंने संत शिरोमणि गुरु रविदास जी को ब्राह्मणों का शत्रु मानकर जोधपुर में छल से उनकी हत्या कर दी थी। इसके बाद ब्राह्मणों ने अपनी षड्यंत्रकारी नीति में बदलाव किये और इस बदलाव में मुख्य बात यह थी कि बहुजन समाज के महापुरुषों को समाप्त करने के लिए उनके ही समुदाय से लालची और भ्रष्ट व्यक्ति को चुनकर ब्राह्मणी संस्कृति के छिपे कार्यकलापों को अंजाम दिया जाए। जिसका उदाहरण है महात्मा जोतिबा फुले की हत्या के लिए ब्राह्मणों ने बहुजन समाज के ही एक लालची और कम समझ व्यक्ति को उनकी हत्या की सुपारी देकर उन्हें मारने के लिए भेजा था। इसी तरह जब बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर भंडारा से चुनाव लड़ रहे थे तब ब्राह्मणी संस्कृति के लोगों ने उन्हीं के समुदाय के एक कम समझ व अनपढ़ व्यक्ति को उनके विरुद्ध खड़ा करके चुनाव में हरवाया था। यह सर्वविदित है कि बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर का विश्व के विद्वानों में पाँचवाँ स्थान है लेकिन ब्राह्मणी संस्कृति के षड्यंत्र के तहत उनके राजनैतिक कद को छोटा करने के उद्देश्य से उन्हें चुनाव में हरवाया गया था। भारतीय समाज में यह एक बड़ी विडंबना है कि बहुजन समाज आज तक ब्राह्मणी संस्कृति के लोगों के ऐसे षड्यंत्रों को देखकर भी सावधान व एकजुटता का प्रयास नहीं कर रहा है। जिसके कारण बहुजन समाज ब्राह्मणी संस्कृति के मुकाबले में हर सामाजिक व राजनीतिक मोर्चे पर विफल हो रहा है।
ब्राह्मणी संस्कृति के पाखण्डों द्वारा काल्पनिक व अवैज्ञानिक कार्यक्रमों जैसे-धार्मिक मेलों, सत्संगों, कथाओं, सुंदर पाठ, हनुमान चालीसा आदि का समागम करके उसमें जनता की भारी भीड़ जुटाकर और प्रशासनिक अव्यवस्था फैलाकर जनता को मौत के घाट उतारा जा रहा है। मरने वालों में अधिसंख्यक बहुजन समाज के ही लोग होते हैं, लेकिन यह सब देखकर भी बहुजन समाज के ये लोग पीढ़ी-दर-पीढ़ी अपने समाज की कथित धार्मिक पाखंड में आहुती देने से बाज नहीं आते और इसके पीछे छिपे तथ्यात्मक कारणों को समझने में असफल हैं। ब्राह्मणी संस्कृति के लोग जनता में फैला रहे है कि कुंभ में स्नान करके मौक्ष मिलेगा और स्वर्ग में जाएँगे। ऐसी प्रथा को देखकर भगवान बुद्ध ने अपने समय में जनता को जागरूक करने के लिए चेताया था कि नदी में अंधश्रद्धा के तहत नहाने से न पाप धुलते हैं और न मोक्ष मिलता है, ये सब प्रपंच जनता को निरंतरता के साथ अपने अतार्किक तथाकथित धार्मिक सरोकारों में फंसाए रखने व लूट का साधन है। भगवान बुद्ध ने साथ में यह भी कहा था कि नदी के पानी में मछली, मेंढक, कछुआ आदि जीव-जन्तु हर वक्त नहाते रहते हैं, क्या वे आजतक तरे (मोक्ष मिला) हैं?
कुंभ में भगदड़ों का लंबा इतिहास: ब्राह्मणी संस्कृति के लोग कुंभ में जनता को इकट्ठा करने के लिए सालों पहले अपना प्रचार प्रसार शुरू कर देते हैं। जनता को वहाँ पहुँचाने के लिए भिन्न-भिन्न प्रकार के प्रपंच रचते हैं। ब्राह्मणी संस्कृति के पंडे-पुजारी, सत्संगकर्ता, कथावाचक और मुसटंडे सत्ता के धन-बल से जुटाये जाते हैं। इन सभी प्रपंचकारियों का पाखंडियों की भीड़ जुटाने पर फोकस रहता है, कुंभ की व्यवस्था पर उनका कोई ध्यान नहीं होता है। महाकुंभ में भगदड़ों का लंबा इतिहास है इससे पहले 1840, 1906, 1954, 1986, 2003, 2010 और 2013 के कुंभ में भी भगदड़ों का इतिहास उपलब्ध है। इन भगदड़ों में मरने वाले असंख्य लोग होते हैं जिनकी संख्या आधिकारिक तौर पर हमेशा कम से कम दिखाने की ही रहती है। हिंदुत्व की वैचारिकी के संरक्षक जनता से अपने अतर्किक तथ्यों को छिपाने का काम करते हैं जिनके अतीत से लेकर आजतक के साक्ष्य मौजूद है। कोरोना काल में उत्तर प्रदेश जैसे राज्य में असंख्य लोगों की मौत हुई थी जिसके तथ्यों को मोदी-योगी सरकार ने छिपाया और मोदी ने स्वयं योगी के कोरोना प्रबंधन की सराहना की थी। जबकि ‘विश्व स्वथ्य संगठन’ ने कोरोना से मरने वाले की संख्या उत्तर प्रदेश में करीब 5 लाख बताई थी। जिसका मोदी संघी शासन ने खंडन किया था और कहा था कि यह हमारे देश को बदमान करने की साजिश है। परंतु देश व दुनिया के लोगों ने कोरोना से मरने वालों के शव हरिद्वार से लेकर पटना तक गंगा नदी में बहते व गंगा किनारे रेत में पड़े देखे थे। 1954 के इलाहाबाद कुंभ की भगदड़ में मरने वालों की संख्या के कई आंकलन सामने आए थे किसी ने 350 तो किसी ने 800 तक की संख्या का आंकलन किया था। 1910 में हरिद्वार के कुंभ हादसे में सरकार ने किसी के भी हताहत होने से इनकार किया था केवल सात लोगों को हताहत बताया था लेकिन कुंभ के बाद गंगा नदी के बैराज पर तीन दर्जन से अधिक शव लटके मिले थे। हाल के प्रयागराज के कुंभ में हताहत हुए लोगों की आधिकारिक संख्या 30 बताई गई है जबकि सोशल मीडिया की रिपोर्टों के अनुसार हजारों लोग हताहत हुए हंै मगर योगी सरकार 30 लोगों की संख्या पर ही अडिग है और जनता के सामने डींगे मार रही है। योगी सरकार द्वारा धार्मिक आयोजनों में अधिक से अधिक भीड़ जुटाकर श्रेय लेने की होड़ अधिक रहती है। योगी सरकार का फोकस ऐसे ही अतार्किक आयोजनों पर अधिक रहता है, वे हमेशा तथाकथित पाखंडी धार्मिक आयोजनों को बढ़ावा देते हैं। ऐसे अतार्किक कार्यों में सरकारी शासन-प्रशासन का बेजा इस्तेमाल करके सरकार को राजस्व की हानि पहुंचाई जाती है। योगी अपने आपको पाखंडी धार्मिक सत्ता में सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी दिखाने के लिए कांवड़ियों व कुंभ के तीर्थ यात्रियों के ऊपर हेलीकोप्टर से पुष्प वर्षा कराके सरकारी शासन-प्रशासन व धन का दुरुपयोग खुलेआम करते हैं। यह सब यहाँ की अतार्किक और मूर्ख जनता के कारण होता है।
ऐसे अन्धश्रद्धा के आयोजनों से कब सबक लेगा बहुजन समाज? अनुसूचित जाति के जातीय घटक वर्तमान समय में ऐसे अन्ध श्रद्धा के कार्यक्रमों में अधिक लिप्त है और उनका बौद्धिक विकास न होने का कारण भी यही है कि वे अन्ध श्रद्धा में फँसे है, वे अपने महापुरुषों व गुरुओं की बात न मानकर पाखंडी पुजारियों सत्संगकर्ताओं व कथावाचकों की बातों पर अधिक विश्वास व भरोसा कर रहे हैं। प्रयाग महाकुंभ में भी जाने वाले और मरने वालों में इन्हीं की अधिक संख्या रही होगी। लेकिन ये अपने अन्धश्रद्धा के वशीभूत कोई भी तार्किक बात मानने को तैयार नहीं है। जिसके कारण ब्राह्मणी संस्कृति के द्वारा इनका हमेशा शोषण होता है। वास्तविकता के आधार पर भारत में पाखंडी संस्कृति के वाहक बहुजन समाज के लोग ही बने हुए हैं जबकि इन्हें उससे कोई लाभ नहीं है। ऐसी अन्ध श्रद्धा वाली जनता देश के विकास में हमेशा हाशिये पर ही रहती है।
भीड़ इकट्ठी करने में संघियों की महारथ: देश में अनेक मौकों पर देखा गया है कि कोई भी आयोजन हो वहाँ पर भीड़ इकट्ठा करने का कार्य पाखंडी संस्कृति के मनुवादी संघियों का ही होता है। इन सभी पाखंडियों की संस्कृति में शांति, समभाव और भाई चारा नहीं है, ये हमेशा समाज में उथल-पुथल व अस्थिरता रखने का कार्य करते हैं इनकी संस्कृति में अथाह झूठ, पाखंड बारम्बारता के साथ विद्यमान रहता है इनमें कोई लोक लिहाज व नैतिकता नहीं होती है। ये अपने उद्देश्य प्राप्ति के लिए किसी भी हद तक गिर सकते हैं जैसा कि आज संवैधानिक संप्रभुता के देश में हिन्दू राष्ट्र की बात व वर्तमान संघी सरकार अपने तथाकथित पंडे-पुजारियों, कथावाचकों द्वारा प्रयागराज में कुंभ के मौके पर हिन्दू राष्ट्र बनाने का संविधान बनाकर उन्होंने असंवैधानिक काम किया है। जिसे सुनकर और देखकर मोदी सरकार व देश का राष्ट्रपति मौन हंै ऐसा कृत्य देश विरोधी अपराध होना चाहिए मगर मोदी सरकार का मौन रहना उसकी मौन और अदृश्य स्वीकृति को उजागर करता है। बहुजन समाज के सभी जातीय घटकों को ऐसा देखकर सजग व सावधान हो जाना चाहिए। इनके जातीय घटकों के कुछेक लालची लोग जो मोदी भाजपा के समर्थन में है उन्हें शर्म व लज्जा आनी चाहिए।
समाज को जागरूक करने के उद्देश्य से मान्यवर साहेब कांशीराम जी ने कुंभ को बंद करके देश में महापुरुषों के नाम पर मेले लगाने की शुरूआत की थी, जैसे- शाहू जी महाराज मेला, पेरियार मेला, अम्बेडकर मेला, संत गाडगे महाराज मेला आदि-आदि। लेकिन गैर मनुवादी सरकार जाने के बाद ब्राह्मणी संस्कृति की सत्ता ने उन्हें बंद कर दिया और फिर से मनुवादी पाखंडी मेले शुरू कर दिये। यह देश का दुर्भाग्य है कि जनता ब्राह्मणवादी पाखण्डों के कारण हर रोज मर रही है। इन आयोजनों में धीरेन्द्र शास्त्री जैसे पाखंडी को भीड़ जुटाने में लगाकर योगी सरकार भीड़ जुटाने का श्रेय ले रही है तो कुंभ में बदइंतजामी के चलते लोगों के मारे जाने का श्रेय भी उसे ही लेना चाहिए और योगी, धीरेन्द्र शास्त्री और मोदी, शाह, राजनाथ सिंह जैसे पाखंडियों को दोषी मानकर कानून सम्मत कड़ी से कड़ी सजा देनी चाहिए। ये सभी नेता कुंभ में जनता को जाने के लिए प्रेरित कर रहे थे। जनता अमूमन अपने नेताओं के आचरण को देखकर उसका अनुशरण करने का प्रयास करती है। प्रयागराज कुंभ में ऐसा ही हुआ है।
देश के नेताओं, सरकार व बुद्धिजीवियों को संविधान के अनुच्छेद 13 के द्वारा प्रतिबंधित की गई सभी अतार्किक प्रथाओं, रीति-रिवाजों व अंधभक्तों द्वारा परिचालित किये जा रहे धार्मिक कुंभ जैसे मेलों को पूर्ण रूप से प्रतिबंधित किया जाये। देश के सामाजिक ताने-बाने व व्यवस्था में वैज्ञानिकता को शीघ्र-अति-शीघ्र प्रतिपादित करके संविधान के अनुच्छेद 51 में दी गई व्यवस्था को पूरा किया जाये इसके साथ ही देश की जनता में वैज्ञानिक सोच और समझ को बढ़ावा देने के लिए वैज्ञानिक मेलों जैसे-कृषि मेला, विज्ञान मेला, पुरातात्विक मेला, भूगोल मेला, महापुरुषों की शिक्षाओं पर आधारित मेलों और तकनीकी विकास आधारित मेलों का समय-समय पर आयोजन किया जाना चाहिए जिससे देश के ताने-बाने में वैज्ञानिक सोच और समझ का उदय हो पाएगा और लोगों के मानसिक विकास में मानवीय दृष्टिकोण व तार्किकता भी बढ़ेगी।
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