




2026-06-13 14:27:43
नई दिल्ली। किसी भी देश और समाज में साहित्य अकादमी और सांस्कृतिक संस्थाएं स्वतंत्र और वैचारिक रूप से निष्पक्ष मानी जाती हैं। इनका मूल उद्देश्य भाषा, साहित्य और लेखकों का सम्मान करना होता है। लेकिन हाल ही में दिल्ली सरकार ने हिंदी साहित्यिक सम्मानों का नाम बदलकर हिंदुत्ववादी विचारक वी.डी. सावरकर, जनसंघ के संस्थापक दीनदयाल उपाध्याय और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के दिवंगत नेताओं के नाम पर कर दिया है। यह कदम न केवल साहित्य के क्षेत्र में सीधे तौर पर राजनीतिक हस्तक्षेप का संकेत देता है, बल्कि यह भी सवाल उठाता है कि क्या सांस्कृतिक संस्थाओं का इस्तेमाल अब सत्ताधारी दल अपनी वैचारिक वंशावली को थोपने के लिए कर रहे हैं?
राजनीतिकरण की भेंट चढ़ा श्लाका सम्मान
हिंदी अकादमी का सबसे प्रतिष्ठित और सर्वोच्च पुरस्कार श्लाका सम्मान माना जाता है, जो 1986 से हिंदी साहित्य के मूर्धन्य रचनाकारों को दिया जाता रहा है। अब इस पुरस्कार का नाम बदलकर पंडित दीनदयाल उपाध्याय श्लाका सम्मान कर दिया गया है। पुरस्कार की राशि भले ही 5 लाख से बढ़ाकर 7 लाख रुपये कर दी गई हो, लेकिन मूल प्रश्न इसकी गरिमा और पहचान का है। दीनदयाल उपाध्याय योगदान उनके समर्थकों के लिए निर्विवाद हो सकता है, लेकिन हिंदी साहित्य के क्षेत्र में विशुद्ध साहित्यिक योगदान के पैमाने पर उनका नाम श्लाका जैसे सर्वोच्च साहित्यिक सम्मान के साथ जोड़ना कितना तर्कसंगत है? साहित्यकारों का मानना है कि साहित्य के सर्वोच्च सम्मान का नामकरण मुंशी प्रेमचंद, सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, रामधारी सिंह दिनकर या महादेवी वर्मा जैसे साहित्य के शलाका पुरुषों/स्त्रियों के नाम पर होना चाहिए था, न कि किसी राजनीतिक विचारक के नाम पर।
इतिहास बदलने की कोशिश
अकादमी ने दो नई श्रेणियां भी शुरू की हैं। राष्ट्रीय चेतना के लिए वीर सावरकर सम्मान (2 लाख रुपये) और भारतीय संस्कृति तथा ज्ञान परंपरा को बढ़ावा देने के लिए पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी सम्मान (5 लाख रुपये)। इसके अलावा, हिंदी भाषा की सेवा के लिए दिए जाने वाले हिंदी सेवी सम्मान का नामकरण दिल्ली के दिवंगत भाजपा नेता डॉ. विजय कुमार मल्होत्रा के नाम पर कर दिया गया है। अटल बिहारी वाजपेयी एक सम्मानित राजनेता होने के साथ-साथ एक प्रखर कवि भी थे, इसलिए उनके नाम पर पुरस्कार का कुछ हद तक साहित्यिक औचित्य साबित किया जा सकता है। लेकिन सावरकर और विजय कुमार मल्होत्रा के नाम पर साहित्यिक पुरस्कार स्थापित करना स्पष्ट रूप से यह दर्शाता है कि सत्ता अब साहित्य के मंच से अपनी राजनीतिक विचारधारा का प्रचार-प्रसार करना चाहती है। विजय कुमार मल्होत्रा का हिंदी साहित्य में क्या रचनात्मक योगदान रहा है, यह अकादमी के कर्ताधतार्ओं को स्पष्ट करना चाहिए। यह फैसला योग्यता से अधिक राजनीतिक निष्ठा को महिमामंडित करता प्रतीत होता है।
बदले की राजनीति का शिकार हुआ सम्मान
इस नामकरण की प्रक्रिया में एक और बात जो स्पष्ट रूप से उभर कर आई है, वह है पूर्ववर्ती सरकारों के प्रतीकों को मिटाने की जल्दबाजी। पिछली आम आदमी पार्टी सरकार के दौरान महिला रचनाकारों के लिए दिया जाने वाला सम्मान भ्रष्टाचार विरोधी कार्यकर्ता संतोष कोली के नाम पर रखा गया था। अब इसका नाम बदलकर रानी अहिल्याबाई होलकर सम्मान कर दिया गया है।
दिल्ली सरकार की हिंदी अकादमी द्वारा पुरस्कारों के नामों में किया गया यह बदलाव विशुद्ध रूप से एक सांस्कृतिक और वैचारिक वर्चस्व की लड़ाई का हिस्सा है। सत्ता में बैठे लोग यह भूल जाते हैं कि राजनीति का जीवन कुछ वर्षों या दशकों का होता है, जबकि साहित्य सदियों तक जीवित रहता है। साहित्य को जब भी सत्ता की चौखट पर बांधने की कोशिश की गई है, तब-तब उसने और अधिक मुखर होकर विरोध किया है।





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