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मौत का कुआं बनते जा रहे ‘सेप्टिक टैंक ’

दिल्ली के मुंडका में तीन श्रमिकों की जहरीली गैस से मौत
News

2026-06-27 14:23:45

संवाददाता

नई दिल्ली। बाहरी दिल्ली के औद्योगिक इलाके मुंडका से एक बार फिर दिल दहला देने वाली खबर सामने आई है। एक प्लास्टिक फैक्ट्री के परिसर में बने सेप्टिक टैंक की सफाई करने उतरे तीन श्रमिकों की जहरीली गैस की चपेट में आने से दम घुटने के कारण दर्दनाक मौत हो गई। प्रारंभिक सूचना के अनुसार, फैक्ट्री प्रबंधन ने बिना किसी सुरक्षा उपकरण, गैस मास्क या आॅक्सीजन सिलेंडर के इन श्रमिकों को टैंक के भीतर उतार दिया था। टैंक के अंदर उतरते ही जहरीली कार्बन मोनोआॅक्साइड, हाइड्रोजन सल्फाइड और मीथेन गैस के मिश्रण ने श्रमिकों को संभलने का मौका भी नहीं दिया। जब काफी देर तक अंदर से कोई हलचल नहीं हुई, तो फैक्ट्री के अन्य कर्मचारियों ने शोर मचाया। सूचना मिलने पर पहुंची दमकल विभाग और आपदा प्रबंधन की टीमों ने कड़े मशक्कत के बाद तीनों शवों को बाहर निकाला। मरने वालों की पहचान अरुण (38), संदीप (32) और चांद (42) के रूप में हुई है। तीनों सुल्तानपुरी के रहने वाले थे। पुलिस ने फैक्ट्री मालिक और संबंधित ठेकेदार के खिलाफ लापरवाही के कारण मौत (धारा 304ए) और हाथ से मैला उठाने वाले कर्मियों के नियोजन का प्रतिषेध अधिनियम, 2013 (एमएस एक्ट, 2013) के तहत मामला दर्ज कर लिया है। परंतु सवाल वही पुराना है: आखिर कब तक देश की राजधानी में कानून की धज्जियां उड़ाते हुए इंसानों को मौत के इन गटरों में धकेला जाता रहेगा?

मुंडका की यह घटना कोई पहली या इकलौती दुर्घटना नहीं है। पिछले 12 वर्षों का इतिहास गवाह है कि दिल्ली और उसके आस-पास के औद्योगिक क्षेत्रों में सीवर और सेप्टिक टैंक इंसानी वधशालाएं बन चुके हैं। सरकारी दावों और अदालती पाबंदियों के बावजूद, निजी फैक्ट्रियों से लेकर आलीशान रिहायशी सोसायटियों तक में यह जानलेवा खेल बदस्तूर जारी है।

लाजपत नगर (अगस्त 2017): दक्षिण दिल्ली के लाजपत नगर में दिल्ली जल बोर्ड के एक सीवर लाइन को साफ करने उतरे तीन सफाई कर्मचारियों की जहरीली गैस से दम घुटने के कारण मौत हो गई थी। इस घटना में भी श्रमिकों के पास कोई सुरक्षा गियर नहीं था।

आनंद विहार (अगस्त 2017): लाजपत नगर की घटना के महज एक हफ्ते के भीतर, आनंद विहार के एक मॉल के सीवर टैंक में उतरे दो सगे भाइयों की मौत जहरीली गैस के कारण हो गई थी। इस दोहरे हत्याकांड ने दिल्ली के ड्रेनेज सिस्टम और ठेकेदारी प्रथा की कलई खोलकर रख दी थी।

मोती नगर (सितंबर 2018): पश्चिमी दिल्ली के मोती नगर स्थित डीएलएफ कैपिटल ग्रीन्स सोसायटी के सीवर ट्रीटमेंट प्लांट की सफाई करने उतरे 5 श्रमिकों की एक साथ मौत हो गई थी। यह दिल्ली के इतिहास की सबसे बड़ी त्रासदियों में से एक थी। जांच में पाया गया कि इन श्रमिकों को जबरन बिना किसी ट्रेनिंग और सुरक्षा उपकरणों के गहरे टैंक में उतारा गया था।

ख्याला (2019): एक स्थानीय आवासीय घर के सेप्टिक टैंक को साफ करने बुलाए गए दो दिहाड़ी मजदूरों की टैंक के भीतर दम घुटने से मौत हो गई। मकान मालिक ने सक्शन मशीन मंगाने के पैसे बचाने के लिए मजदूरों को अंदर उतारा था। वहीं बवाना की एक केमिकल फैक्ट्री के कचरा टैंक को साफ करते समय 6 मजदूर काल के गाल में समा गए थे।

ट्रांसपोर्ट नगर (मार्च 2021): एमटीएनएल के एक भूमिगत केबल डक्ट की सफाई और मरम्मत के दौरान तीन संविदा कर्मचारियों और उन्हें बचाने उतरे एक आॅटो ड्राइवर की जहरीली गैस की चपेट में आने से मौत हो गई। इस घटना ने साबित किया कि केवल सीवर ही नहीं, बल्कि बंद पड़े किसी भी भूमिगत डक्ट में यह जानलेवा गैस बन सकती है।

रोहिणी सेक्टर-16 (2022): सीवर लाइन में फंसे तीन निजी श्रमिकों को बचाने के प्रयास में कुल 4 लोगों की जान चली गई थी। इसी वर्ष अक्षरधाम के पास एक प्रमुख ड्रेनेज पंपिंग स्टेशन के पास बिना अनुमति के सीवर में उतरे दो सफाई कर्मियों की मौत हो गई, जिसके बाद दिल्ली सरकार को कड़े कदम उठाने के निर्देश दिए गए थे।

पिछले तीन वर्षों में नरेला, बवाना, नजफगढ़ और मुंडका की छोटी व अवैध रूप से चल रही प्लास्टिक, केमिकल और जींस वॉशिंग फैक्ट्रियों में कम से कम 12 से अधिक श्रमिकों की जान इसी प्रकार के सेप्टिक टैंकों में गई है। इन मामलों में अधिकांशत: फैक्ट्री मालिक एफआईआर दर्ज होने से पहले ही फरार हो जाते हैं और पीड़ित परिवारों को मुआवजा तक नहीं मिलता। राष्ट्रीय सफाई कर्मचारी आयोग और सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय द्वारा समय-समय पर जारी आंकड़ों के अनुसार, भारत में सीवर और सेप्टिक टैंक की सफाई के दौरान होने वाली मौतों के मामले में दिल्ली शीर्ष राज्यों/केंद्र शासित प्रदेशों में शामिल रही है।

क्या कहता है कानून?

भारत में हाथ से मैला उठाना और बिना सुरक्षा उपकरणों के किसी भी इंसान को सीवर या सेप्टिक टैंक में उतारना पूरी तरह से प्रतिबंधित और एक संज्ञेय अपराध है।

=The MS Act, 2013: Employment as Manual Scavengers and their Rehabilitation Act, 2013 के तहत किसी भी व्यक्ति को मैन्युअल रूप से सीवर में उतारना प्रतिबंधित है। ऐसा करने पर 5 वर्ष तक की कैद और 5 लाख रुपये तक के जुमार्ने का प्रावधान है।

=सर्वोच्च न्यायालय का ऐतिहासिक आदेश (2014): सफाई कर्मचारी आंदोलन बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट आदेश दिया था कि 2013 के बाद सीवर में होने वाली प्रत्येक मौत के लिए पीड़ित परिवार को 10 लाख रुपये का मुआवजा दिया जाना अनिवार्य है।

=2023 का संसोधित आदेश: उच्चतम न्यायालय ने अक्टूबर 2023 में एक और सख्त रुख अपनाते हुए सीवर मौतों के मुआवजे को 10 लाख से बढ़ाकर 30 लाख रुपये करने का आदेश दिया, ताकि अधिकारियों और नियोक्ताओं पर वित्तीय दबाव बने और वे इस प्रथा को रोकें।

जमीनी हकीकत: कानून कागजों पर बेहद सख्त है, लेकिन मुंडका की घटना यह दर्शाती है कि जमीन पर इसकी धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। दिल्ली जल बोर्ड भले ही अपनी मुख्य लाइनों के लिए रोबोटिक स्कैवेंजर्स (जैसे बांदीकूट) और सक्शन मशीनों का दावा करता हो, लेकिन मुंडका जैसे औद्योगिक क्षेत्रों की निजी फैक्ट्रियों के आंतरिक सेप्टिक टैंकों तक इन मशीनों की पहुंच या तो है नहीं, या फैक्ट्री मालिक लागत बचाने के लिए जानबूझकर गरीब मजदूरों को 500 या 1000 रुपये की दिहाड़ी पर बुलाकर अंदर उतार देते हैं। मुख्य नियोक्ता हमेशा काम को किसी छोटे सब-कॉन्ट्रैक्टर को सौंप देता है। जब कोई हादसा होता है, तो फैक्ट्री मालिक यह कहकर पल्ला झाड़ लेता है कि मजदूर उसके नहीं, बल्कि ठेकेदार के थे।

मुंडका की यह घटना केवल एक दुर्घटना नहीं, बल्कि हमारी सामाजिक संवेदनहीनता और प्रशासनिक नपुंसकता का सामूहिक परिणाम है। जब तक हम तकनीक के इस दौर में इंसानों को गटर और रासायनिक टैंकों में उतारने की अनुमति देते रहेंगे, तब तक हम खुद को एक आधुनिक समाज कहने के हकदार नहीं हैं। सरकारों को अब केवल मुआवजे की राशि बांटकर अपनी जिम्मेदारी से इतिश्री कर लेने की आदत को छोड़ना होगा। मुंडका के दोषियों को हत्या (गैर-इरादतन हत्या की जगह सख्त धाराओं) के तहत ऐसी सजा मिलनी चाहिए जो पूरे देश के उद्योगपतियों और ठेकेदारों के लिए एक खौफनाक नजीर बने। वरना, आज मुंडका की फैक्ट्री में तीन चिराग बुझे हैं, कल किसी और ड्रेनेज या गटर से फिर किसी मां के लाल का शव बाहर निकाला जा रहा होगा और हमारी व्यवस्था फाइलों पर एक और आंकड़ा दर्ज कर सो जाएगी।

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01 जनवरी : मूलनिवासी शौर्य दिवस (भीमा कोरेगांव-पुणे) (1818)

01 जनवरी : राष्ट्रपिता ज्योतिबा फुले और राष्ट्रमाता सावित्री बाई फुले द्वारा प्रथम भारतीय पाठशाला प्रारंभ (1848)

01 जनवरी : बाबा साहेब अम्बेडकर द्वारा ‘द अनटचैबिल्स’ नामक पुस्तक का प्रकाशन (1948)

01 जनवरी : मण्डल आयोग का गठन (1979)

02 जनवरी : गुरु कबीर स्मृति दिवस (1476)

03 जनवरी : राष्ट्रमाता सावित्रीबाई फुले जयंती दिवस (1831)

06 जनवरी : बाबू हरदास एल. एन. जयंती (1904)

08 जनवरी : विश्व बौद्ध ध्वज दिवस (1891)

09 जनवरी : प्रथम मुस्लिम महिला शिक्षिका फातिमा शेख जन्म दिवस (1831)

12 जनवरी : राजमाता जिजाऊ जयंती दिवस (1598)

12 जनवरी : बाबू हरदास एल. एन. स्मृति दिवस (1939)

12 जनवरी : उस्मानिया यूनिवर्सिटी, हैदराबाद ने बाबा साहेब को डी.लिट. की उपाधि प्रदान की (1953)

12 जनवरी : चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु परिनिर्वाण दिवस (1972)

13 जनवरी : तिलका मांझी शाहदत दिवस (1785)

14 जनवरी : सर मंगूराम मंगोलिया जन्म दिवस (1886)

15 जनवरी : बहन कुमारी मायावती जयंती दिवस (1956)

18 जनवरी : अब्दुल कय्यूम अंसारी स्मृति दिवस (1973)

18 जनवरी : बाबासाहेब द्वारा राणाडे, गांधी व जिन्ना पर प्रवचन (1943)

23 जनवरी : अहमदाबाद में डॉ. अम्बेडकर ने शांतिपूर्ण मार्च निकालकर सभा को संबोधित किया (1938)

24 जनवरी : राजर्षि छत्रपति साहूजी महाराज द्वारा प्राथमिक शिक्षा को मुफ्त व अनिवार्य करने का आदेश (1917)

24 जनवरी : कर्पूरी ठाकुर जयंती दिवस (1924)

26 जनवरी : गणतंत्र दिवस (1950)

27 जनवरी : डॉ. अम्बेडकर का साउथ बरो कमीशन के सामने साक्षात्कार (1919)

29 जनवरी : महाप्राण जोगेन्द्रनाथ मण्डल जयंती दिवस (1904)

30 जनवरी : सत्यनारायण गोयनका का जन्मदिवस (1924)

31 जनवरी : डॉ. अम्बेडकर द्वारा आंदोलन के मुखपत्र ‘‘मूकनायक’’ का प्रारम्भ (1920)

2024-01-13 16:38:05