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बार काउंसिल आॅफ दिल्ली में ब्राह्मणवादी मानसिकता हावी

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2026-02-07 17:26:49

दिल्ली बार काउंसिल का चुनाव 20 फरवरी 2026 को होना तय है। इस चुनाव में जो प्रत्याशी चुनाव के मैदान में नजर आ रहे हैं, उनमें अधिकतर मनुवादी और जातिवादी मानसिकता से ओत-प्रोत हैं। चुनाव लड़ने वाले अधिकांश प्रत्याशी कथित उच्च जातियों से ही संबंधित है, जो इस चुनाव में करोड़ों से अधिक धन खर्च कर रहे हैं, इतने अधिक धन का खर्च अपने आप में बहुत कुछ बोलता है?

भ्रष्टाचार: इतने बड़े खर्च का होना साफतौर पर इंगित करता है, कि दिल्ली बार काउंसिल का चुनाव अस्पष्ट और अपारदर्शी तरीके से हो रहा है। बार काउंसिल में 25 सदस्यों का चुनाव होना है इन 25 स्थानों के लिए प्रत्याशी अधिकांशतया सवर्ण जातियों से ही होंगे। बार काउंसिल के सदस्यों की संख्या लगभग 90000-100000 के करीब है जिनमें लगभग 35-40 प्रतिशत दलित/पिछड़े व अल्पसंख्यक समाज के मतदाता भी होंगे। मगर यह बहुत ही शर्म की बात है कि 35-40 हजार की संख्या में होने के बावजूद भी एससी/एसटी/ओबीसी व अल्पसंख्यक समुदाय के लोग अपने समुदाय से 10 लोग भी जीताकर नहीं भेज पा रहे हैं। इसका मुख्य कारण हो सकता है कि एससी/एसटी/ओबीसी व अल्पसंख्यक समुदाय के वकीलों की मानसिकता में गहराई तक मनुवादी/संघी सोच की घुसपैठ समाहित है। साथ ही ये ही वे लोग हैं जो रेस्टोरेंट में बैठकर, चाय पीकर, खाना खाकर व शराब पीकर अपनी वोट और अस्मिता को बेच रहे हैं।

बहुजन जातीय (शूद्रों) घटकों में एकता का अभाव: भारतीय समाज चार वर्णों-ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र और 6743 जातियों में विभाजित है। इन सभी जातियों में आपस में क्रमिक ऊंच-नीच की भावना भी है। यह क्रमिक ऊंच-नीच की व्यवस्था बहुजन समाज के जातीय घटकों को न इकट्ठा होने देती है और न उन्हें किसी अहम मुद्दे पर एकत्र होने देती है। क्रमिक ऊंच-नीच की भावना के कारण एक ही वर्ण में वर्गित लोग अपने आपको दूसरे से ऊंचा या नीचा मानते है। ऊंच-नीच की यही भावना सामाजिक एकता को कमजोर करती है और उन्हें कई नागरिक अधिकारों से भी वंचित करती है। देश के अधिवक्ता (वकील) एक पढ़े-लिखे सभ्य समाज का हिस्सा है लेकिन फिर भी उनमें क्रमिक ऊंच-नीच के कारण एकता का गहरा अभाव है। बार काउंसिल में इनकी संख्या 35-40 प्रतिशत होने के बावजूद भी ये अपने 10 योग्य वकीलों को बार काउंसिल में भेजने में अक्षम है। हमें सूत्रों से यह भी पता चला है कि दलित/पिछड़े व अल्पसंख्यक समुदाय के प्रत्याशी को चुनाव में 1000 मत भी प्राप्त नहीं हो पाते। इन सबके पीछे प्रमुख कारण दो ही हैं, पहला इनकी मानसिकता में मनुवादी व्यवस्था की गहरी पेठ और दूसरा कारण है भ्रष्टाचार का खुला खेल। इस तरह की व्यवस्था से यह भी संकेत मिलता है कि शूद्र वर्ग से आने वाले वकील भ्रष्टाचार के पीछे नहीं दौड़ रहे हैं जबकि इनके सापेक्ष कथित सवर्ण समाज के वकील भ्रष्टाचार में अधिक लिप्त होने का संकेत देते हैं।

भष्टाचार व दलाली का संभावित स्रोत: भ्रष्टाचार और दलाली के संभावित स्रोत है देश में लॉ कॉलेजों की बढ़ती संख्या, जिनके अधिकतर मालिक सवर्ण जातियों या राजनैतिक पार्टियों से हैं। इस तरह के कॉलेजों के मालिक लॉ की डिग्री को मान्यता दिलाने के लिए कई-कई करोड़ रुपए चुपचाप पिछले दरवाजे से साक्ष्य रहित तरीके से लेते हैं और फिर उस कॉलेज को मान्यता दिला देते हैं। इसलिए देशभर में कानून के स्नातकों की संख्या कुकुरमुत्तों की तरह बढ़ रही है। जिनको न कानून और कानून से संबंधित अन्य चीजों का ज्ञान है। फिर भी वे कोर्ट परिसर में बैठकर अपने मुवक्किलो से अच्छा धन लूट रहे हैं। इसलिए समाज से आग्रह है कि वे ऐसी घिनौनी प्रतिस्पर्धाओं से बचे और कानून की पढ़ाई के लिए अच्छे कॉलेज और विश्वविद्यालयों का ही चुनाव करें। दलालों के माध्यम से कहीं न जाये। हाल ही के वर्षों में अदालतों में नकली वकीलों को भी पकड़ा गया, जिनकी खबर अखबारों में छपी थी। ये सब खेल देश में भ्रष्टाचार के माध्यम से फल फूल रहा है।

इसी पैमाने के साथ, संसद में बैठ 131 एससी/एसटी सांसदों का चरित्र भी पहचाना जा सकता है आज संसद में 131 एससी/एसटी समुदाय के सांसद है, इसके साथ ही अगर हम अल्पसंख्यक व पिछले समुदाय को भी लें तो इनकी संख्या 200 से अधिक हो सकती है। लेकिन जब एससी/एसटी/ओबीसी समुदाय के हितों के विपरीत कोई बिल संसद के सामने आता है तो ये सभी मनुवादी संस्कृति के सांसद ब्राह्मणवाद को ही समर्थन देते नजर आते हैं। यही कारण है कि आज मोदी संघी शासन में कोई भी बिल दलित/पिछड़े व अल्पसंख्यक समुदाय के हितों के विपरीत धड़ल्ले से पास हो रहे हैं और इन सांसदों की संसद में कोई आवाज सुनाई नहीं पड़ती है। इसका मुख्य कारण है कि इन सभी सांसदों में मनुवादी संस्कृति की घुसपैठ गहराई तक हो चुकी है और ये सभी सांसद अब अपने शूद्र समुदाय के लिए किसी भी तरह से उपयुक्त नहीं रह गए है। अगर इसे हम यूं कहे कि ये सभी सांसद बहुजन समाज का कचरा है तो गलत नहीं होगा, और न इनमें कोई सुधार की गुंजाइश है।

समाधान बहुजन समाज से आने वाले वकीलों में एकता का जन-जागरण नियमित रूप से चले। सभी वकीलों को शूद्र समाज में पैदा हुए महापुरुषों के संघर्ष और उनकी शिक्षाओं का अच्छा ज्ञान हो। जिन वकीलों को महात्मा ज्योतिबा फुले और बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर के जीवन और राजनैतिक संघर्ष का ज्ञान नहीं है, वे उसे पढे और अपने आपको सक्षम व श्रेष्ठ बनाए। मनुष्य की श्रेष्ठता उसके ज्ञान से मापी जाती है, जाति से नहीं। मनुवाद और जातिवाद का त्याग करके सक्षम व सौहार्दपूर्ण भारतीय समाज का निर्माण करे। आने वाली पीढ़ियाँ आपको आपके सामाजिक योगदान से जान और पहचान पाएगी। आप सबकी निर्बाध एकता ही, सभी प्रकार की सामाजिक बीमारियों का एकमात्र इलाज है।

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01 जनवरी : मूलनिवासी शौर्य दिवस (भीमा कोरेगांव-पुणे) (1818)

01 जनवरी : राष्ट्रपिता ज्योतिबा फुले और राष्ट्रमाता सावित्री बाई फुले द्वारा प्रथम भारतीय पाठशाला प्रारंभ (1848)

01 जनवरी : बाबा साहेब अम्बेडकर द्वारा ‘द अनटचैबिल्स’ नामक पुस्तक का प्रकाशन (1948)

01 जनवरी : मण्डल आयोग का गठन (1979)

02 जनवरी : गुरु कबीर स्मृति दिवस (1476)

03 जनवरी : राष्ट्रमाता सावित्रीबाई फुले जयंती दिवस (1831)

06 जनवरी : बाबू हरदास एल. एन. जयंती (1904)

08 जनवरी : विश्व बौद्ध ध्वज दिवस (1891)

09 जनवरी : प्रथम मुस्लिम महिला शिक्षिका फातिमा शेख जन्म दिवस (1831)

12 जनवरी : राजमाता जिजाऊ जयंती दिवस (1598)

12 जनवरी : बाबू हरदास एल. एन. स्मृति दिवस (1939)

12 जनवरी : उस्मानिया यूनिवर्सिटी, हैदराबाद ने बाबा साहेब को डी.लिट. की उपाधि प्रदान की (1953)

12 जनवरी : चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु परिनिर्वाण दिवस (1972)

13 जनवरी : तिलका मांझी शाहदत दिवस (1785)

14 जनवरी : सर मंगूराम मंगोलिया जन्म दिवस (1886)

15 जनवरी : बहन कुमारी मायावती जयंती दिवस (1956)

18 जनवरी : अब्दुल कय्यूम अंसारी स्मृति दिवस (1973)

18 जनवरी : बाबासाहेब द्वारा राणाडे, गांधी व जिन्ना पर प्रवचन (1943)

23 जनवरी : अहमदाबाद में डॉ. अम्बेडकर ने शांतिपूर्ण मार्च निकालकर सभा को संबोधित किया (1938)

24 जनवरी : राजर्षि छत्रपति साहूजी महाराज द्वारा प्राथमिक शिक्षा को मुफ्त व अनिवार्य करने का आदेश (1917)

24 जनवरी : कर्पूरी ठाकुर जयंती दिवस (1924)

26 जनवरी : गणतंत्र दिवस (1950)

27 जनवरी : डॉ. अम्बेडकर का साउथ बरो कमीशन के सामने साक्षात्कार (1919)

29 जनवरी : महाप्राण जोगेन्द्रनाथ मण्डल जयंती दिवस (1904)

30 जनवरी : सत्यनारायण गोयनका का जन्मदिवस (1924)

31 जनवरी : डॉ. अम्बेडकर द्वारा आंदोलन के मुखपत्र ‘‘मूकनायक’’ का प्रारम्भ (1920)

2024-01-13 16:38:05