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‘शांति’ का मार्ग ही ‘समृद्धि’ का उत्तम मार्ग है

जो लोग शांति से प्रेम करते हैं, उन्हे भी उतने ही प्रभावी ढंग से संगठित होना सीखना चाहिए, जितना कि युद्ध से प्रेम करने वाले होते हैं। - मार्टिन लूथर किंग जूनियर।
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2026-03-28 15:04:04

ईरान, इजराइल और अमेरिका पिछले करीब 4-5 हफ्ते से युद्ध में उलझे हुए हैं जिसमें कई बार समझौते की घोषणा भी हुई है। दादागिरि की मानसिकता के तहत ट्रम्प स्वयंभू बनकर घोषणा कर देते हैं कि ईरान के साथ, अमेरिका की शर्तों पर युद्ध समाप्त किया जा रहा है या अमेरिका के सहयोगी इजराइल भी ऐसे ही बयान देते हैं कि हमने ईरान के सभी सैन्य ठिकानों को ध्वस्त कर दिया है। ऐसे अहंकारी बयानवीरों से न कोई समझौता हो सकता है और न वे शांति स्थापित कर सकते हैं। चूंकि इन घोषणाओं में छिपा है इन नेताओं का बड़-बोलापन और अहंकार। अहंकार और बड़-बोलापन किसी भी तरफ से हो वह आग में घी डालने का ही काम करता है, जो शांति नहीं ला सकता। अमेरिका ने पाकिस्तान के जरिये ईरान तक 15 सूत्रीय युद्ध विराम प्रस्ताव भेजा जो ईरान को मंजूर नहीं हुआ। अमेरिका के समझौते के प्रस्ताव में ईरान को अपने परमाणु और बैलिस्टिक मिसाइल प्रोग्राम बंद करने और होरर्मुज स्टेट को पूरी तरह खोलने जैसी मांगे हैं। ईरान ने प्रस्ताव को देखकर अपनी मांगे भी रखी जिनमें सबसे अहम है कि अमेरिका को पश्चिमी एशिया में अपने सभी सैन्य ठिकाने बंद करने होंगे। दोनों देश अपनी-अपनी शर्तों पर टिके हुए हैं, कोई भी अपनी शर्तों से पीछे हटने को तैयार नहीं। समझौते हमेशा एक कॉमन ग्राउंड तैयार करके, सभी के हितों को ध्यान में रखकर आगे बढ़ाये जाते हैं, तो समझौते की उम्मीद आगे बढ़ती हुई नजर आती है। लेकिन यहाँ पर ऐसा लगता है कि अमेरिका अपनी दादागिरि और अहंकार के तहत, कॉमन ग्राउंड तैयार करना नहीं चाहता, वह अमेरिका के पक्ष में एक तरफा समझौता चाहता है, जो ईरान को मंजूर होना असंभव है। याद रखना होगा कि ईरान ने अपने धर्म के सर्वोच्च नेता आयतुल्लाह अली खामेनेई को खोया है, जिसके कारण ईरान की आम जनता में बेहद रोष और आक्रामकता है।

इसके अलावा वैश्विक जनता देख रही है कि ट्रम्प का व्यवहार दादागिरि वाला है लोकतांत्रिक नहीं। ईरान से पहले वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और उनकी पत्नी सिलिया फ्लोरेस को रात के अंधेरे में उनके राजभवन से उठाकर अमेरिका लाकर जेल में डाल दिया गया। अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रम्प द्वारा की गई यह कार्यवाही अंतर्राष्ट्रीय नियमों के विरुद्ध थी। जिसे अमेरिका और विश्व की अधिकांश जागरूक जनता ने इसे अधिनायकवादी करार देते हुए गलत बताया। ऐसी हरकतों को देखकर विश्व की जनता को ट्रम्प के अंदर अहंकार और दादागिरि की झलक साफ दिख रही है और वह नहीं चाहती कि किसी भी देश का शासक दूसरे देश के शासक के साथ ऐसा अनैतिक व्यवहार करे। ट्रम्प ने वेनेजुएला के राष्ट्रपति के साथ किए गए व्यवहार से प्रेरित होकर इजराइल के माध्यम से ईरान पर हमला कराया और अपनी खुफिया एजंसियों के जरिये ईरान के सर्वोच्च धार्मिक नेता का सटीक पता लगाकर मिसाइल से हमला करके उन्हें खत्म कर दिया। ट्रम्प का यह अमानवीय व्यवहार विश्व में किसी को भी पसंद नहीं आया। इसी के कारण दुनियाभर के सभी देश आज अमेरिका के साथ खड़े नहीं दिख रहे हैं। यहाँ तक कि यूरोप और नाटो के देश भी अमेरिका का समर्थन नहीं कर रहे हैं। अमेरिका की अधिकांश आम जनता भी ट्रम्प की ऐसी अहंकारी नीतियों से न खुश है और न उसके साथ है। आज ईरान जो इराजराइल और अमेरिका को जवाब दे रहा है वह विश्व के बहुत सारे शांति प्रिय नेताओं को पसंद आ रहा है और वे सभी ईरान के साथ है। सिर्फ भारत के मनुवादियों-संघियों व मोदी को छोड़कर भारत की आम जनता भी ईरान की आम जनता के साथ है। जिसका कारण भारत और ईरान के ऐतिहासिक और सांस्कृतिक संबंध हैं जो हजारों वर्षों से चले आ रहे हैं।

ताकत समाधान नहीं: अमेरिका और इजराइल को शायद अपनी ताकत पर अहंकार हो गया था जिसके तहत अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रम्प जिसको भी चाहे वे धमका रहे थे, और अपने पास बुलाकर आत्म समर्पण करा रहे थे, वेनेजुएला के साथ भी उनका यही प्रयास रहा था। किसी भी समझौते की स्थिति में दोनों पक्षों को बराबर की दिशा में झुकना होता है और दोनों के हितों को सम्मानपूर्वक देखना होता है। लेकिन, ट्रम्प ईरान के साथ ऐसा नहीं कर रहे थे, एक तरफ वे बयान दे रहे थे कि ईरान समझौते के लिए तैयार हो गया है और दूसरी तरफ वे पश्चिमी एशिया में अपने सैनिकों की संख्या बढ़ा रहे थे। यहाँ यह तो सच है कि जब कोई भी समझौते की बात करता है तो दूसरा पक्ष भी समझौते के लिए तभी तैयार हो सकता है, जब दोनों बराबर के पलड़े पर आकर बात करे। मगर इस युद्ध में ट्रम्प समझौते का बयान दे रहे थे और दूसरी तरफ अपने दोस्त इजराइल से ईरान पर हमले भी करा रहे थे। ट्रम्प का ऐसा व्यवहार इसलिए था कि यूरोप और नाटो के सभी देश उसके साथ ईरान पर युद्ध करने के लिए तैयार हो जाएँगे, लेकिन ऐसा नहीं हुआ, और न ऐसा होना कभी संभव हो सकता है। चूंकि सभी के अपने हित और प्रतिष्ठा है, जिसे वे सभी कायम रखना चाहेंगे।

विस्तार की चाहत: अगर किसी देश में विस्तार और अपना दबदबा बनाने की चाहत है तो उसकी वह चाहत न शांति होने देगी और न दूसरों को शांति से रहने देगी। विस्तार की चाहत का मतलब है कि दूसरों पर अपनी ताकत का प्रभुत्व स्थापित करना या दिखाना। 1949 में जब अल्बर्ट आइंस्टीन से पूछा गया कि तीसरा विश्व युद्ध किन हथियारों से लड़ा जाएगा तो उन्होंने जवाब दिया कि तीसरे का तो उन्हें पता नहीं, लेकिन चौथा युद्ध सिर्फ पत्थरों से लड़ा जाएगा, क्योंकि तीसरे युद्ध में सारे अस्त्र-शस्त्र नष्ट हो जायंगे।

द्वितीय विश्व युद्ध से तबाही: द्वितीय विश्व युद्ध से पूरी दुनिया तबाह हो चुकी थी जिसमें करीब 6-8 करोड़ लोग मारे गए थे और इससे भी अधिक घायल हुए थे। इसके अलावा बड़ी संख्या में लोगों के विस्थापन से स्पेनिस फ्लू फैला जिसमें 5-10 करोड़ मौतें हुई। इसके बाद 10 जनवरी 1920 में लीग आॅफ नेशंस (राष्ट्र संघ) की स्थापना हुई ताकि भविष्य में कोई लड़ाई न हो, लेकिन उसके बाद भी भयानक लड़ाइयाँ हुई।

यू.एन. की असफलता: द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान लीग आॅफ नेशंस के मुख्यालय पर ताला लगा रहा। उसकी असफलता के बाद 1945 में संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना हुई लेकिन वह भी एक तमाशा बनकर रह गया चूंकि वह भी कोई युद्ध नहीं रोक पाया, उसकी संरचना दोषपूर्ण थी, समता और समानता का आधार उसमें नहीं था, पाँच देशों ने सारी शक्ति अपने हाथों में ली हुई थी। उनके पास ‘वीटो’ का अधिकार है और परमाणु बम रखने का भी। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की अनुमति के बिना अमेरिका ने 2003 में इराक पर हमला किया और 2022 में रूस ने यूक्रेन पर हमला किया। ईरान पर ताजा हमले के लिए भी मंजूरी नहीं ली गई, इस तरह की अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था समता और समानता के अधिकारों के बिना कारगर नहीं हो सकती। शक्तिशाली देश समानता के अधिकार को मानने के लिए तैयार नहीं होंगे, चूंकि वे अहंकारी हो चुके हंै। उनके पास जो सामरिक और आर्थिक समृद्धि है वह उनमें समानता के भाव को नष्ट करती है और अहंकार व विस्तार को बढ़ाने की बात करती है, इसलिए कोई भी शांति समझौता बिना समानता और सभी के हित को ध्यान में रखकर होना चाहिए, बिना इन प्रावधानों के कोई भी समझौता वैश्विक या क्षेत्रिय समझौता हो, अपने उद्देश्य में सफल नहीं हो सकता।

युद्ध की कीमत: दो या दो से अधिक देशों की जनता युद्ध की कीमत को चुकाती है लेकिन इसका प्रभाव सभी देशों की आंतरिक सुरक्षा व आर्थिक व्यवस्था पर पड़ता है। वर्तमान में चल रहे ईरान, इजराइल और अमेरिका के युद्ध को देखकर आसानी से समझ सकते हैं कि दुनिया के सभी देश इस युद्ध की रणभूमि में नहीं है। लेकिन युद्ध का असर दुनिया के सभी देशों में प्रभाव डाल रहा है। जैसे भारत में गैस और तेल का आयात मध्य एशिया या खाड़ी देशों से ही आता है जिसका असर भारत की तेल और गैस सप्लाई पर पड़ रहा है। देश की जनता गैस और तेल की जरूरत को पूरा करने के लिए लंबी-लंबी लाइनों में लगी हुई है। हालांकि देश की सरकार भी जरूरी इंतजामों में लगी हुई है लेकिन मोदी-संघी सरकारों के वायदे भी अमेरिका के राष्ट्रपति ट्रम्प के झूठे प्रचारों से मेल खाते हैं।

विश्व की असमान परमाणु नीति: परमाणु युद्ध का खतरा इसलिए बढ़ रहा है चूंकि वैश्विक परमाणु नीति में सभी देशों को समान अधिकार नहीं है। विश्व के सिर्फ पाँच देशों को परमाणु हथियार बनाने, रखने और इस्तेमाल करने का अधिकार है जिसके कारण विश्व के अधिकांश देश इस असमानता को देखकर न खुश है और न वे इन पाँच देशों की दादागिरि वाली सत्ता को मानने के लिए तैयार है। आज पूरी दुनिया में इस असमान व्यवहार के कारण इतने परमाणु हथियार बन चुके हैं कि मानवता का नामोनिशान कुछ ही मिनटों में मिट सकता है। रूस ने 30 अक्टूबर 1961 को जार, बाम्बा नाम के ऐसे घातक परमाणु हथियार का परीक्षण किया था जो हिरोशिमा पर गिराए गए ‘एटम बम’ से ज्यादा शक्तिशाली था।

युद्ध को शांति में बदलने के लिए, बुद्ध का मार्ग ही सटीक: 19वीं और 20वीं सदी का इतिहास हिंसक घटनाओं का गवाह है। दुनिया के देशों ने हिंसक घटनाओं और युद्धों को रोकने के लिए जिन वैश्विक संस्थाओं का निर्माण किया उनकी मूल संरचना में ही दोष है। चूंकि उन्होंने सभी देशों को समता और समानता का अधिकार नहीं दिया, गैर बराबरी के सिद्धान्त को लागू किया। जिसके कारण वे विश्व में हिंसक घटनाओं को रोकने में असफल रहे। मूल मतलब यह है कि बिना समता और समानता के सिद्धान्त को अपनाए बगैर क्षेत्रिय व वैश्विक स्तर पर शांति की पहल सफल नहीं हो सकती। भारतीय संविधान में बाबा साहेब ने देश की जनता के बीच विषमता और असमानता को देखते हुए समता, समानता न्याय बंधुता का रास्ता चुना जिसके फलस्वरूप देश आज 75 वर्षों के बाद भी अखंडता के साथ प्रगति पथ पर अग्रसर है।

हिन्दुत्व की वैचारिकी, देश की एकता-अखंडता के लिए खतरा: वर्तमान समय में मोदी-संघी सरकार हिन्दुत्व की वैचारिकी को बे-लगाम बढ़ा रही है। जिसके कारण देश की सामाजिक व्यवस्था में नफरत और सांप्रदायिक भाव बढ़ रहा है। एक संप्रदाय का व्यक्ति दूसरे संप्रदाय के व्यक्ति को देखकर नफरत भरा व्यवहार कर रहा है, हाल ही में ईद के मौके पर देखा गया कि हिन्दुत्व की वैचारिकी वाले कुछेक लफरझंडिस अंधभक्त उत्तम नगर के कांड को लेकर समाज में हिन्दू-मुस्लिम का जहर घोल रहे थे और इसी माध्यम से वे दंगे कराने की फिराक में थे, लेकिन उनके मंसूबे सफल नहीं हुए यह देश की जनता के लिए अच्छा संकेत है।

बुद्ध का बहुत ही व्यवहारिक और कारगर शांति का संदेश धम्मपद (यमक वग्ग) की 5वीं गाथा है कि,

न हि वेरेन वेरानि, सम्मन्तीध कुदाचनं।

अवेरेन च सम्मन्ति, एस धम्मो सनन्तनो॥

[अर्थात]

‘बैर से बैर कभी शांत नहीं होता वह अवैर (प्रेम/मैत्री) से ही शांत होता है।’

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01 जनवरी : मूलनिवासी शौर्य दिवस (भीमा कोरेगांव-पुणे) (1818)

01 जनवरी : राष्ट्रपिता ज्योतिबा फुले और राष्ट्रमाता सावित्री बाई फुले द्वारा प्रथम भारतीय पाठशाला प्रारंभ (1848)

01 जनवरी : बाबा साहेब अम्बेडकर द्वारा ‘द अनटचैबिल्स’ नामक पुस्तक का प्रकाशन (1948)

01 जनवरी : मण्डल आयोग का गठन (1979)

02 जनवरी : गुरु कबीर स्मृति दिवस (1476)

03 जनवरी : राष्ट्रमाता सावित्रीबाई फुले जयंती दिवस (1831)

06 जनवरी : बाबू हरदास एल. एन. जयंती (1904)

08 जनवरी : विश्व बौद्ध ध्वज दिवस (1891)

09 जनवरी : प्रथम मुस्लिम महिला शिक्षिका फातिमा शेख जन्म दिवस (1831)

12 जनवरी : राजमाता जिजाऊ जयंती दिवस (1598)

12 जनवरी : बाबू हरदास एल. एन. स्मृति दिवस (1939)

12 जनवरी : उस्मानिया यूनिवर्सिटी, हैदराबाद ने बाबा साहेब को डी.लिट. की उपाधि प्रदान की (1953)

12 जनवरी : चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु परिनिर्वाण दिवस (1972)

13 जनवरी : तिलका मांझी शाहदत दिवस (1785)

14 जनवरी : सर मंगूराम मंगोलिया जन्म दिवस (1886)

15 जनवरी : बहन कुमारी मायावती जयंती दिवस (1956)

18 जनवरी : अब्दुल कय्यूम अंसारी स्मृति दिवस (1973)

18 जनवरी : बाबासाहेब द्वारा राणाडे, गांधी व जिन्ना पर प्रवचन (1943)

23 जनवरी : अहमदाबाद में डॉ. अम्बेडकर ने शांतिपूर्ण मार्च निकालकर सभा को संबोधित किया (1938)

24 जनवरी : राजर्षि छत्रपति साहूजी महाराज द्वारा प्राथमिक शिक्षा को मुफ्त व अनिवार्य करने का आदेश (1917)

24 जनवरी : कर्पूरी ठाकुर जयंती दिवस (1924)

26 जनवरी : गणतंत्र दिवस (1950)

27 जनवरी : डॉ. अम्बेडकर का साउथ बरो कमीशन के सामने साक्षात्कार (1919)

29 जनवरी : महाप्राण जोगेन्द्रनाथ मण्डल जयंती दिवस (1904)

30 जनवरी : सत्यनारायण गोयनका का जन्मदिवस (1924)

31 जनवरी : डॉ. अम्बेडकर द्वारा आंदोलन के मुखपत्र ‘‘मूकनायक’’ का प्रारम्भ (1920)

2024-01-13 16:38:05