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भारत में बसने वाले लोग सर्वधर्मी, सर्वभाषी, सर्व क्षेत्रीय हैं। उन सभी की अलग-अलग मान्यताएँ, भाषाएँ, संस्कृति, रहन-सहन व खाना-पीना है। जाति की प्रमुखता के कारण यहाँ पर जातिवादी मानसिकता चरम पर है। भारत एक स्वतंत्र गणराज्य है, जहां पर लोकतांत्रिक व्यवस्था है तथा संविधान सत्ता है। यहाँ पर अल्पसंख्यक समुदाय ब्राह्मणी संस्कृति वालों का बहुसंख्यक समुदाय (बहुजनों) पर वर्चस्व है, देशभर में ब्राह्मणवादी व्यवस्था है जिनका मूल विधान ‘मनुस्मृति’ है, जो देश की एकता-अखंडता के लिए सबसे बड़ा खतरा है। मनुस्मृति नाम की पुस्तक ‘मनु’ द्वारा लिखित बताई जाती है परंतु ‘मनु’ कौन थे इसका कोई तथ्यात्मक संदर्भ नहीं है? परिस्थितिकी साक्ष्यों के आधार पर यही तथ्यात्मक लगता है कि जब पुष्यमित्र शुंग ने दसवें बौद्ध शासक राजा ब्रहदर्थ की छल-कपट से हत्या करके उनके शासन पर अवैध कब्जा कर लिया था, तब पुष्यमित्र शुंग ने उस समय के तीन कुटिल ब्राह्मणों की एक कमेटी बनाकर एक पुस्तक का निर्माण कराया था, जो ‘मनुस्मृति’ के नाम से जानी जाती है और उसे ही मनु विधान कहा जाता है। इसी काल में पुष्यमित्र शुंग ने रामायण की भी रचना कराई, जिसमें स्वयं पुष्यमित्र शुंग ने अपने आपको केंद्र में रखकर कथित ‘राम’ का चरित्र अदा किया था। इससे यह साबित होती है कि ‘मनुस्मृति’ नाम की पुस्तक और रामायण नाम की पुस्तक पुष्यमित्र शुंग के काल में ही निर्मित हुई थी। ब्राह्मणी संस्कृति ने छलावामयी तरीके से इन पुस्तकों को श्रेष्ठ बनाने के उद्देश्य से इन्हें ‘ईश्वरीय’ देन बताया। ये सब काल्पनिक कथाएँ हैं जिनमें पुष्यमित्र शुंग ने उच्चकोटि का पाखंड भरा और भारत के लोगों को मानसिक रूप से गुलाम बनाया। मनु विधान में ब्राह्मण वर्ण के अलावा किसी अन्य वर्ण के लोगों को पढ़ने-लिखने का अधिकार नहीं था, इसके पीछे ब्राह्मणी संस्कृति का षड्यंत्र था कि भारत की बहुजन जनता को अशिक्षित रखो, ताकि तीन-चार पीढ़ी के पश्चात यह नहीं समझ पाएंगे कि उनका अतीत कैसा और उनके पूर्वज क्या थे? ये सभी धीरे-धीरे गुलाम मानसिकता में रहकर, ब्राह्मण संस्कृति के गुलाम बन जाएंगे, उनको कोई भी अधिकार नहीं होगा, न शिक्षा का, न संपत्ति का। वे सब ब्राह्मण वर्ण की दया पर जीवन यापन करने के लिए मजबूर हो जाएँगे।
मनुस्मृति का समाज में प्रभाव: ‘मनुस्मृति’ एक ब्राह्मणवादी विधान है। जिसे ब्राह्मण संस्कृति के मानने वाले लोग अपना पवित्र विधान मानते हैं और उसी को वे देश के अन्य लोगों पर थौंपना चाहते हैं। मनुस्मृति के अनुसार ब्राह्मण को छोड़कर भारत में रहने वाले किसी भी अन्य व्यक्ति को पढ़ने-लिखने का अधिकार नहीं है। मनुस्मृति ने समाज को चार वर्णों-ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र में बांटा है। वर्ण व्यवस्था के अनुसार दूसरे और तीसरे पायदान पर आने वाले क्षत्रिय और वैश्यों को भी पढ़ने-लिखने का आंशिक अधिकार था, पूर्ण अधिकार नहीं था। चौथे पायदान पर आने वाले शूद्र वर्ण को सभी मानवीय अधिकारों से वंचित रखा गया। शूद्र वर्ण में एक और व्यवस्था की गई थी, जिसे बहिष्कृत या अछूत वर्ग बनाया। अछूत वर्ग के लोगों पर ‘मनुस्मृति’ के अनुसार इतने अमानवीय प्रतिबंध लगाए गए जिनके कारण उनका जीवन पशुओं से भी बदत्तर बनाया गया। उन्हें सिर्फ ऊपर के तीनों वर्णों की सेवा का ही अधिकार दिया गया और वो भी किसी पारितोषिक श्रम के, वे अपना पेट भरने के लिए, दूर से फेंके गए भोजन पर ही निर्भर रहकर अपना जीवन यापन करते थे। मनुस्मृति के अनुसार भारत में सभी वर्णों की महिलाओं को सभी प्रकार के अधिकारों से वंचित रखा गया। ‘मनुस्मृति’ विधान के अनुसार महिला को कभी भी स्वतंत्र नहीं किया जाना चाहिए, बालपन में पिता के अधीन, विवाह के पश्चात पति के अधीन और वरिष्ठ या विधवा हो जाने पर बड़े पुत्र के अधीन।
‘हिन्दू राष्ट्र’ संघियों की परिकल्पना: देश की शासन व्यवस्था संविधान के द्वारा ही संचालित होती है। मगर कुछेक ब्राह्मणी संस्कृति के लफंगे-गुंडे हिन्दू राष्ट्र की मांग सत्ता के इशारे पर करते रहते हैं। शायद इन संगठनों के लोगों को खुद भी यह पता नहीं है कि भारत में ‘हिन्दू’ कौन है? भारत में हिन्दू सिर्फ वे ही लोग कहे जा सकते हैं जो समता, स्वतंत्रता, न्याय, बंधुता, भाईचारे में विश्वास नहीं रखते और उनकी मानसिकता पूरी तरह से विषमतावादी, साम्प्रदायिकतावादी और देश विरोधी है। इस तरह की मानसिकता रखने वाले लोग राष्ट्रवादी नहीं, राष्ट्र भक्त भी नहीं, ये सभी लोग राष्ट्र विरोधी है। बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर ने इस देश के संविधान का निर्माण किया और उनकी संविधान सभा में 389 सदस्य थे। संविधान 2 साल 11 महीने 18 दिन में बनकर तैयार हुआ और इस दौरान संविधान सभा के सभी सदस्यों ने अपने-अपने हिसाब से सवाल उठाए व पूछे? जिनका संतोषजनक स्पष्टीकरण भी बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर ने संविधान सभा में सभी के सामने देकर संतुष्ट किया। संविधान सभा की आखिरी बैठकर 26 नवम्बर 1949 को हुई और उसपर 284 संविधान सभा के सदस्यों ने अपने हस्ताक्षर किये, इस तरह तैयार किये गए संविधान को 26 नवंबर 1949 को डॉ. राजेन्द्र प्रसाद तत्कालीन राष्ट्रपति को आगे की कार्रवाई के लिए सौंप दिया गया। संविधान की अविभाजित सभा में 389 सदस्य थे तब तक पाकिस्तान का बंटवारा नहीं हुआ था। बंटवारा होने के बाद संविधान के सदस्यों की संख्या 299 हो गयी थी। संविधान निर्माण होने के बाद जब देश को सौंपा गया और इसे अंगीकार किया गया तब देश विरोधी तत्वों ने संविधान का विरोध करना शुरू किया। विरोध करने वालों में आरएसएस, विश्व हिन्दू परिषद व देश के तत्कालीन कथित लफंगे साधु-संतों ने इसका विरोध करके बाबा साहेब के पुतले जगह-जगह जलाए और देश के लोगों से कहा कि इस संविधान में हमारा कुछ भी नहीं है। आरएसएस के महानायक बताए जाने वाले दीनदयाल उपाध्याय, सावरकर इत्यादि ने भी संविधान का विरोध किया। इनके विरोध का मूल कारण था कि हमारा महान ग्रंथ ‘मनुस्मृति’ का इस संविधान में कुछ भी जिक्र नहीं है इसलिए हम इसे नहीं मानते। तत्कालीन संघी मानसिकता के ये सभी लोग अधिकतर ब्राह्मण वर्ण के थे जो मन और मस्तिष्क से नहीं चाहते थे कि देश में समता, स्वतंत्रता, न्याय और भाईचारे के आधार पर समाज में सामाजिक न्याय, सद्भावना, बराबरी के आधार पर समृद्ध व विकासशील भारत का संविधान सर्वोपरि बने। देश में संविधान लागू हुआ तब भी और आज भी संघी ब्राह्मणवादी मानसिकता के लोग संविधान के विरोध में थे और आज भी है, इसलिए इस तरह के कुछेक राष्ट्र और मानवता विरोधी असामाजिक तत्व ‘हिन्दू राष्ट्र’ का मुद्दा जोर-शोर से उठाकर देश की भोली-भाली जनता को छलावामयी तरीके से ठगने का काम करके देश की एकता और अखंडता को खतरे में डालते हैं।
संघियों के हिन्दू राष्ट्र में अल्पसंख्यक असुरक्षित: वर्तमान समय में यह देश संविधान सत्ता से चलता है। लेकिन फिर भी कुछ लफंगे सत्ता समर्थित गुंडे आये दिन अल्पसंख्यकों पर अत्याचार करते नजर आ रहे हैं। अभी हाल में देशभर में सत्ता समर्थित गुंडे किस्म के लफंगों ने क्रिसमस के त्यौहार पर चर्चों को निशाना बनाया, वहाँ पर तोड़फोड़ की और ईसाई समुदाय के लोगों के साथ मारपीट भी की। ईसाई समुदाय के नागरिकों के साथ अभद्रता की, गाली-गलोच की। यह हाल तब देखने को मिल रहा है जब देश में संविधान सत्ता है, अगर संविधान सत्ता हट जाये और हिन्दू राष्ट्र बन जाए तब ये लफंगे किस्म के हिन्दूवादी गुंडे इस देश के अल्पसंख्यकों के साथ कैसा व्यवहार करेंगे? इसका आप स्वयं ही आंकलन कर सकते हैं। हम जानते हैं कि ‘मनुस्मृति’ आधारित ‘हिन्दू धर्म’ की परिकलना करने वाले लोग देश में कट्टर असमानता को जन्म देंगे और देश के नागरिकों के सभी मानवीय अधिकार खत्म किये जाएँगे। इस प्रकार के वातावरण को देखकर सभ्य समाज के जागरूक लोगों को ‘हिन्दू राष्ट्र’ की परिकलना मात्र से ही भय लगता है और उसे वह किसी भी कीमत पर अपनाने के लिए तैयार नहीं होंगे। मुस्लिम और दलितों के साथ प्रताडना की अमानवीय घटनाएँ मोदी-संघी राज में आए दिन देशभर में सत्ता समर्थित गुंडों से कराई जा रही हैं। जिन्हें देखकर सभी मुस्लिमों, अन्य अल्पसंख्यकों व दलितों जो एक अति विशिष्ट अल्पसंख्यक समुदाय है उन्हें समझ में आ जाना चाहिए कि हिन्दू राष्ट्र की परिकल्पना उनके लिए नरक से भी बदतर होगी।
अम्बेडकर राष्ट्र का अभिप्राय: भारत के संविधान में पूरे राष्ट्र की समता मूलक परिकल्पना, सामाजिक संरचना व न्याय व्यवस्था की अवधारणा उभरकर सभी नागरिक के सामने आ जाती है। संविधान में भारत के सभी नागरिकों को समता, स्वतंत्रता, न्याय और बंधुता के आधार पर बराबरी के अधिकार है। सभी नागरिकों को उनकी अपनी मर्जी से अपने मतानुसार धर्म या पंथ को मानने और पूजा-अर्चना की पूरी स्वतंत्रता है। देश में महिला हो या पुरुष सभी को समान अधिकार है, कोई भी महिला हो या पुरुष कोई भी व्यवसाय करने के लिए स्वतंत्र है। देश का कोई भी नागरिक महिला हो या पुरुष कहीं भी जाकर बस सकता है, व्यापार कर सकता है, शिक्षा प्राप्त कर सकता है और अपने उद्योग धंधे भी स्थापित कर सकता है। देश में अल्पसंख्यकों के लिए संविधान में उनको विशेष संरक्षण दिया गया है। देश में संविधान सर्वोपरि है, शासन व्यवस्था का संचालन संवैधानिक व्यवस्था के आधार पर होता है, सभी नागरिकों के लिए न्याय और दंड व्यवस्था भी समान है, कहीं पर किसी भी तरह का भेदभाव नहीं है। शायद यही समान व्यवस्था और अधिकारों वाला संविधान इस देश के मनुवादी-संघी तत्वों जैसे आरएसएस, विश्व हिन्दू परिषद आदि को अच्छा नहीं लगता। इसलिए ये लोग आये-दिन कुछ न कुछ राष्ट्र विरोधी कृत्यों को जन्म देते रहते हैं।
देश की प्रबुद्ध जनता तय करे: देश की प्रबुद्ध जनता स्वयं तय करे कि वे ‘हिन्दू राष्ट्र’ की परिकल्पना में ‘मनुस्मृति’ आधारित, असमानता व महिला विरोधी, शूद्र व अछूत, वर्ण व्यवस्था आधारित ब्राह्मणी संस्कृति के वर्चस्व वाला भारत बनाना चाहते हैं या समता, स्वतंत्रता, न्याय व बधुत्व पर आधारित राष्ट्र की परिकल्पना वाला ‘अम्बेडकर राष्ट्र’ चाहते हैं। भारत की प्रबुद्ध जनता ने अतीत में मनुवादी ब्राह्मणी संस्कृति के अत्याचारों को झेला है और अब वे किसी भी कीमत पर, सपने में भी उसकी पुनरावृति देखना नहीं चाहेंगे। देश में जब सभी समान होंगे, सभी के लिए समान अवसर होंगे और देश के सभी नागरिकों में वैज्ञानिक सोच और मानसिकता का प्रादुर्भाव होगा तभी भारत अपने शोध और तकनीकी ज्ञान में अग्रणीय बनकर विश्व में अपना परचम लहरा पाएगा और विश्व गुरु बनने का सपना भी साकार कर पाएगा। भारत अपने अतीत के बुद्ध काल से लेकर सम्राट अशोक और उसके वंशजों के काल तक विश्व गुरु था, उस काल में यहाँ की सामाजिक व्यवस्था ऐसी ही थी जो आज बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर ने अपनी बौद्धिक क्षमता से भारत के संविधान में सुव्यवस्थित करके भारत को संविधान सत्ता आधारित राज्य की परिकल्पना सौंपी है। इसी व्यवस्था से देश समृद्ध और शक्तिशाली बन पाएगा। मोदी, उसके अंधभक्त व लफंगे संघी मानसिकता वाले तथाकथित साधु-संत इस देश की बबार्दी के लिए सत्ता बल के सहारे आज प्रतिबद्ध दिखते हैं।
बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर ने कहा था कि, ‘‘यदि हिन्दू राज हकीकत बन जाता है, तो यह स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के लिए सबसे बड़ा खतरा होगा। यह असंगत है। हिन्दू राज को किसी भी कीमत पर रोका जाना चाहिए।’’
(लेखक सीएसआईआर से सेवानिवृत वरिष्ठ वैज्ञानिक हैं)





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