2025-03-21 13:06:20
नागों की राजधानी रहे नागपुर शहर को आततायी हिंदुत्व की वैचारिकी वाले संघियों ने सोमवार को आग में झोंक दिया, यह देश की एकता के लिए खतरनाक संकेत है। वर्तमान संघी सरकार संघी मानसिकता के आततायियों को अंदर से समर्थन व सहायता प्रदान करती है। संघी आततायियों की दोषपूर्ण व अमानवीय ब्राह्मणी संस्कृति देश को किस तरह की त्रासद स्थितियों में झोंक सकते हैं वह नागपुर की इस घटना से प्रतिबिंबित होता है। इसे देखकर देश की जागरूक जनता को इन संघी आततायियों की कार्यशैली अच्छी तरह से समझ में आ जानी चाहिए कि संघी आततायी न कभी देशभक्त रहे हैं और न कभी कठिन समय में देश के साथ खड़े रहे हैं। इनकी इस प्रकार की कार्यशैली देश के लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता, न्याय, बंधुता और जनता में शांति, सद्भाव और विकास की राह में हमेशा बाधक रही है। देशवासियों को अच्छी तरह पता है कि जब भारत अपनी आजादी के लिए संघर्ष कर रहा था, तब ये सभी संघी आततायी देशभक्तों के साथ खड़े न होकर बल्कि अंग्रेजी शासन से मिलकर उनके लिए मुकबरी कर रहे थे, उनसे मांफी माँग रहे थे, अंग्रेजी शासन से देशभक्तों की मुकबरी के बदले में पेंशन या अन्य लाभ पा रहे थे।
डबल इंजन की सरकार गैर-जिम्मेदार: शांति व्यवस्था कायम रखने की जिम्मेदारी स्थानीय पुलिस तंत्र की होती हैं, लेकिन कोई भी तंत्र इस बात से पल्ला नहीं झाड़ सकता कि यह केवल पुलिस तंत्र का काम है। चूंकि ऐसा नहीं हो सकता कि संघी आततायी समाज में आग लगाने वाले बयान देते रहें, और आग लगाने के बाद सारा दोष पुलिस प्रशासन के मत्थे मढ़ दें। महाराष्ट्र में इस समय डबल इंजन की आततायी संघियों की सरकार है। इसलिए ये सभी संघी आततायी अपने चरम पर है, वे किसी भी असामाजिक घटना को अंजाम देने में कानून व्यवस्था का ध्यान नहीं रख रहे हैं। नागपुर में आततायी संघियों के बयानों ने जो माहौल गरम किया, उससे निपटने के लिए शासन तंत्र की जो तैयारी होनी चाहिए थी, वह जाहिर तौर पर नहीं थी शायद यह लचर व्यवस्था संघी सरकार ने जानबूझ कर रखी थी। नागपुर में जिस बड़े पैमाने पर कानून व्यवस्था को ध्वस्त किया गया उससे वहाँ का सत्ता पक्ष पल्ला नहीं झाड़ सकता चूंकि यह वर्तमान मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडणवीस के बयानों से समझा जा सकता है। फड़नवीस की सरकार नागपुर के दंगे कराने में पूरी तरह से शामिल रही है।
संघियों की आंतरिक संरचना में है साम्प्रदायिक भाव: देश का शासन प्रशासन संवैधानिक कानून व देश के अन्य अधिनियमों से प्रशासित होता है। लेकिन संघी मानसिकता के लोग देश की आजादी के भी विरोधी थे और देश में जब बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर संविधान का निर्माण कर रहे थे तब अनेकों संघियों ने संविधान के प्रावधानों को लेकर उनकी आलोचना और विरोध किया था। चूंकि ब्राह्मणी संस्कृति के संघी लोग देश के संविधान में अल्पसंख्यकों के प्रावधानों से जुड़े अनुच्छेदों के विरोधी थे। यहाँ यह संदर्भ देना सही होगा कि जब 1924 में गांधी कांग्रेस के अध्यक्ष बने, तब उन्होंने कांग्रेस के संविधान में दो बातें जोड़ी, पहली धर्मनिपेक्षता और दूसरी अहिंसा। तब कांग्रेस के सदस्य रहे आतातायी बालकृष्ण शिवराम मुंजे (ब्राह्मण) ने गांधी द्वारा जोड़े गए प्रावधानों का विरोध करते हुए कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया था। इस्तीफा देने के बाद मुंजे की मानसिकता में आततायी प्रवृति के छिपे तत्वों ने उन्हें शांत नहीं रहने दिया और वे इटली के तानाशाह मुसोलिनी से मिलने गए, कुछ दिन वहीं पर रहे, उनसे विचार-विमर्श किया। रोमन साम्राज्य के बारे में भी बात की, इस बातचीत और विचार-विमर्श के दौरान मुसोलिनी ने मुंजे से कहा कि इटली के लोग मन और स्वभाव से अच्छे हैं, वे सभी आपस में मिलकर रहते हैं और एक-दूसरे की परस्पर मदद भी करते हैं लेकिन उनमें अपने वैभवशाली रोमन साम्राज्य पर गर्व करने का भाव नहीं है। यही बात डॉ. मुंजे के मस्तिस्क में बैठ गई और उन्होंने वहाँ से लौटने के बाद भारत में आकर बलिराम हेडगावर से मुलाकात की और अपने इटली दौरे के दौरान मुसोलिनी से जो बातचीत हुई थी उसका पूरा वर्णन उनको बताया। बलिराम हेडगावर को उनकी यह बात, ‘इटली के लोग अपने वैभवशाली रोमन साम्राज्य पर गर्व नहीं करते’, मस्तिष्क में बैठ गई और इसी को सूत्र वाक्य मानकर डॉ. बलीराम हेडगावर ने भारत में ब्राह्मण संस्कृति के आधार पर 27 सितम्बर 1925 को राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) की स्थापना की। तभी से आरएसएस के सदस्य पूरे देश में साम्प्रदायिक नफरत के बीज बोते आ रहे हैं। उनका देश की एकता और अखंडता से कोई मतलब नहीं है वे अशांति व साम्प्रदायिक तनाव को यहाँ पर हमेशा बनाए रखना चाहते हैं। मोदी जब से देश के प्रधानमंत्री बने हैं तब से संघी मानसिकता के लोगों के अधिक पंख बढ़ गये हैं। सन 2002 और 2014 के बाद से देश के विभिन्न हिस्सों में संघियों द्वारा साम्प्रदायिक हिंसा को जन्म दिया गया। देश की भोली-भाली जनता को यह समझ में नहीं आ रहा है कि संघियों द्वारा फैलाये जा रहे साम्प्रदायिक जहर से कैसे निपटा जाये? संघी मानसिकता के लोगों का इलाज प्रजातंत्र में सिर्फ दो तरीके से ही संभव हो सकता है। पहला संघी मानसिकता के लोगों को सत्ता में न आने दिया जाये, दूसरा संघी मानसिकता के लोगों की देशवासियों द्वारा सामूहिक रूप से लठ पूजा की जाये।
औरंगजेब देश के महान व ईमानदार शासक: औरंगजेब को लेकर आज संघी मानसिकता के लोग देश की जनता में गलत प्रचार करके भड़का रहे हैं। औरंगजेब का वास्तविक चरित्र, ईमानदारी, राष्ट्रभक्ति और देशवासियों के लिए कल्याणकारी रहा है। कथित हिन्दू राष्ट्रवादी अपने अतीत के गिरेवां में झाँक कर देखें तो वे पायेंगे कि इनकी संघी मानसिकता के कथित राजा राणा सांगा ने बाबर को निमंत्रण देकर इब्राहिम लोदी को हराने के लिए आक्रमण के लिए भारत बुलाया था और बाबर ने पानीपत के प्रथम युद्ध में इब्राहिम लोदी को हराया था। देश की प्रबुद्ध जनता इस तथ्य व तर्क के आधार पर स्वयं सोचे कि गद्दार कौन था?
जनता को हम सत्य आधारित तथ्यों से अवगत कराना चाहते हैं कि औरंगजेब बहुत ही ईमानदार, साहसी, देशभक्त शासक था। औरंगजेब देश का वह शासक था जो अपने शाही खजाने से एक भी पैसा अपने परिवार से जुड़े लोगों पर खर्च नहीं करता था। औरंगजेब को फिजूलखर्ची और बनावटी शान-ओ-शौकत पसंद नहीं थी। औरंगजेब एक बड़े साम्राज्य का शासक होने के बाद भी अपनी रसोई खर्च के लिए खुद अपने हाथ से टोपी सिलकर और उन्हें बाजार में बेचकर रसोई का खर्च चलता था। क्या वर्तमान भारत में कथित हिन्दुत्व की वैचारिकी का ऐसा कोई ईमानदार और साहसी शासक है? बुद्ध शासकों को छोड़कर कोई भी नहीं है। वर्तमान संघी शासन में बैठे मनुवादी मानसिकता के लोग अपने बारे में सोचें और जनता को बतायें कि वे कितने ईमानदार हैं, जनता के प्रति कितने निष्ठावान हैं, जनता की नजर में सभी संघी संदिग्द्ध हैं। आज संघी मानसिकता के दलाल हर जगह स्थापित कर दिये गए हैं। उन्हीं के माध्यम से संस्थानों से अवैध धन की वसूली कर रहे हैं। संघी सरकारों में भ्रष्टाचार जनता के शोषण का छिपा हुआ जरिया बन चुका है। लोगों का मानना है कि पूर्ववर्ती सरकारों के मुकाबले भ्रष्टाचार और बेरोजगारी डबल इंजन की सरकारों में 3 से 5 गुना तक बढ़ चुकी है।
मोदी-संघी शासन संविधान के लिए खतरा: मोदी-संघी शासन में न धर्मनिरपेक्षता है, न समानता है, और न बराबरी के मौके हैं। शासन सत्ता बल के सहारे देश में धर्मांध को बढ़ाया जा रहा है। मोदी ने अपने हाल ही बयान में कहा है कि प्रयागराज कुंभ आयोजन सफल रहा। लेकिन मोदी ने इस देश का प्रधानमंत्री होने के नाते भी कुंभ में मरने वालों का जिक्र तक नहीं किया जो उनकी गंदी मानसिकता को प्रतिबिंबित करता है। प्रयागराज कुंभ मेले की व्यवस्था, सुरक्षा और रख-रखाव पूरी तरह से ध्वस्त था। मोदी और उत्तर प्रदेश की संघी सरकार का ध्यान केवल देश की जनता को वहाँ बुलाकर भीड़ जुटाकर दिखाने व उसके प्रचार-प्रसार पर रहा। जिसके कारण वहाँ पर कई बार भगदड़ हुई। प्रयागराज कुंभ में हजारों निर्दोष अंधभक्त मारे गए। इन मारे गए अंधभक्तों की संख्या आजतक न प्रदेश और न केंद्र की सरकार जनता को बता पा रही है। इसे देखकर लगता है कि डबल इंजन की सरकारों का जनता को अंधभक्त बनाने पर जोर हैं, पाखंड और अंधविश्वास फैलाने पर जोर हैं। बहुजन समाज के जातीय घटकों के लोगों ने ही कुंभ में अपनी जान गँवाई है, किसी भाजपाई-संघी ने नहीं। विडंबना यह है कि बहुजन समाज के अज्ञानी व अंधभक्त लोग संघियों के जाल में अधिक फंस रहे हैं और वे लोग अपने और अपनी आने वाली पीढ़ियों के भविष्य को बर्बाद कर रहे हैं।
हिंदुत्व की वैचारिकी देश के लिए खतरा: मनुवादी संघी मानसिकता के लोगों की छिपी रणनीति यही रही है कि पूरे समाज को छोटे-छोटे जातीय टुकड़ों में बाँटों, उनमें एकता मत होने दो, उनसे मुफ्त में सेवा कराओ, देश में अवैध मंदिरों का निर्माण कराओ, देश की जनता में अंधविश्वास फैलाकर कथावचकों, सत्संगकतार्ओं, बाबाओं, पुजारियों आदि की संख्या बढ़ाकर मंदिरों में ब्राह्मण पुजारियों को स्थापित करो। जिसके बल पर मनुवादी संघी ताकतें आर्थिक रूप से मजबूत हों। एक आंकलन के अनुसार देश में करीब छोटे-बड़े 40 लाख मंदिर है। इनमें वे बड़े मंदिर भी है जहाँ हर रोज कई करोड़ों रुपए का चढ़ावा आता है। वहाँ पर बैठे सैंकड़ों ब्राह्मण-पुजारी उससे पलते हैं। सभी मंदिर अधिकांशत: जनता व सरकारी जमीनों पर अवैध रूप से बनाये गए हैं। एक साधारण गणना के मुताबिक देश में करीब ब्राह्मणों की आबादी तीन प्रतिशत है इस हिसाब से अगर देश की वर्तमान आबादी एक करोड़ चालीस लाख मान ली जाये तो ब्राह्मणों की कुल संख्या तीन करोड़ बारह लाख के लगभग ही होगी। 40 लाख मंदिरों में अगर औसतन पाँच पुजारी है तो एक करोड़ छत्तीस हजार ब्राह्मण पुजारियों को बिना श्रम किये अच्छा रोजगार मिल रहा है। इसके अलावा मोदी संघी सरकार ने 10 प्रतिशत का सुदामा आरक्षण देकर गरीबी के नाम पर ब्राह्मणों का आरक्षण सुरक्षित कर दिया। समाज में वर्तमान स्थिति यह है कि देश के ब्राह्मण समुदाय में एक भी व्यक्ति बेरोजगार नहीं है। अगर समाज में बेरोजगारी है तो वह बहुजन समाज (एससी,एसटी,ओबीसी,अल्पसंख्यक) समुदाय के युवक-युवतियों में ही अधिक है। मगर विडंबना यह है कि बेरोजगारी भुगत रहे बहुजन समाज के जातीय घटक इन सब बातों का संज्ञान लेने में असक्षम है, और न वे इस बेरोजगारी नामक बीमारी का कोई निदान खोज पा रहे हैं।
समाज को जागरूकता के लिए प्रेरक चाहिए: अंधविश्वास में फँसे समाज को जागरूकता की घुट्टी पिलाने के लिए आज समाज में निस्वार्थ, निष्ठावान व कर्मक प्रेरकों की भारी कमी है। समाज को ऐसे व्यक्तियों की खोज करके उन्हें समाज में पनपती बीमारी से अवगत कराना होगा और फिर उनके द्वारा बड़े पैमाने पर समाज में कैडर कैंप लगाने के कार्य भी करने होंगे तभी समाज ब्राह्मणी संघी संस्कृति से मुक्ति पाने में सक्षम हो पाएगा। पाखंड की पराकाष्ठा का ताजा उदाहरण-अंतरिक्ष से लौटी सुनीता विलियम का है। गुजरात में उनकी भाभी से कहलवाया गया कि सुनीता ने अंतरिक्ष से महाकुंभ की तस्वीर भेजी थी और वे अपने साथ भगवान गणेश की तस्वीर लेकर गयीं थी। यह ब्राह्मणी संस्कृति की सोची-समझी षड्यंत्रकारी रचना लगती है।
देश की आम जनता को मनुवादी संघियों के द्वारा प्रचारित किये जा रहे पाखंड से दूर रहना होगा। हर मनुष्य को अपना दीपक स्वयं बनना पड़ेगा और अपने परिवारों की समृद्धि के लिए परिवार का नेतृत्व सक्षम महिलाओं के हाथ में सौपना होगा तभी देश प्रगति पथ पर अग्रसर हो सकेगा। बाबा साहेब डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने भी कहा था कि-‘मैं किसी भी समाज की प्रगति उस समाज में रह रही महिलाओं की प्रगति से मापता हूँ’।
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