




2026-08-01 18:21:09
कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के बैनर तले 20 जून 2026 से शुरू हुआ आंदोलन 25 जुलाई 2026 को समाप्त हुआ। इस छात्र आंदोलन के दौरान सोनम वांगचुक, नेहा बोरा और अन्य साथियों ने 20 दिनों से अधिक भूख हड़ताल पर बैठे। इस आंदोलन में सभी उम्र के छात्र-छात्राओं ने भरपूर समर्थन दिया और सरकार की शिक्षा व्यवस्था के खिलाफ संघर्ष के साथ डटे रहे। छात्रों का आंदोलन मुख्य रूप से ध्वस्त होती शिक्षा व्यवस्था और पेपर लीक के मामले को लेकर हुआ था। इस छात्र आंदोलन की मुख्य विशेषता यह रही कि सभी जातीय घटकों, धार्मिक घटकों के छात्र अपने एक ही मुद्दे पर एकजुट रहे। आरएसएस और मनुवादी सरकार के छलावों के चलते हुए भी छात्र अपने रास्ते से भटके नहीं, अपने तय उद्देश्य के लिए वे अडिग रहे। संघी मानसिकता की सरकार ने छात्रों के आंदोलन को कमजोर करने और उसे समाप्त करने के उद्देश्य से उनपर बल प्रयोग भी किया। आरएसएस की मानसिकता वाले पुलिस और प्रशासन में तैनात अधिकारियों को आंदोलन के बीच उतारकर आंदोलन को बदनाम करने की नियत से छिपकर आरएसएस के गुंडों को आंदोलनकारी छात्रों के बीच घुसाकर षड्यंत्रकारी अपराधिक कृत्यों को जनता में दिखाकर उनका छात्रों से मोहभंग करने का प्रयास भी किया। परंतु आरएसएस व संघी मानसिकता के अंधभक्तों की सभी चाले इस छात्र आंदोलन में विफल रही।
आरएसएस की रणनीतिक विफलता का कारण: मोदी के 12 वर्षों के आरएसएस काल में कई आंदोलन हुए जैसे किसानों का आंदोलन, महिला पहलवानों का आंदोलन, सीएए विरोधी आंदोलन, ईवीएम आंदोलन, संसद भवन से बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर की प्रतिमा विस्थापन का आंदोलन, व अन्य सभी छोटे-बड़े आंदोलन आरएसएस की छलावामयी रणनीति के कारण विफल ही रहे। इनमें से कोई भी आंदोलन अपने निर्णायक गंतव्य स्थान तक नहीं पहुँच पाया क्योंकि आंदोलन कर्ता समाज में एकजुटता और त्याग की कमी देखी गई। आंदोलन में शामिल राजनैतिक कार्यकर्ता अपने राजनीतिक फायदे के लिए आंदोलन कर्ताओं के बीच घुसकर अपना राजनैतिक फायदा तलाशने की कोशिश में लगे हुए देखे गए। जिसके कारण जनता को साफ संदेश मिला कि आंदोलन का गंतव्य बिन्दु सबके लिए एक नहीं है। आंदोलन में सारे शामिल लोग अपने-अपने उद्देश्य प्राप्ति के लिए अलग-अलग दिशा में काम कर रहे थे। जिसके कारण आंदोलन की ऊर्जा बटी हुई दिशाओं में भटकती रही। किसी भी कार्य को सफल करने के लिए ऊर्जा एक ही दिशा में लगनी चाहिए तभी संघर्ष अपने गंतव्य स्थान तक पहुँच सकेगा। अगर संघर्ष की ऊर्जा विभिन्न धाराओं और रास्तों पर भटकेगी तो उसका परिणाम असफल ही होगा। किसान आंदोलन और महिला पहलवानों का आंदोलन की दिशाएँ भी अलग-अलग दिशाओं में दिख रही थी। इन आंदोलनों में कुछेक राजनैतिक स्वार्थ के नेता राजनीतिक लाभ प्रत्यक्ष और प्ररोक्ष रूप से पाने की कोशिश कर रहे थे। जिसके कारण आंदोलन पूरी शक्ति के साथ एक दिशा में बढ़ता हुआ नहीं दिखा और अंतत: वह विफल हो गया। अन्य आंदोलनों का भी हश्र कमोवेश ऐसा ही हुआ। बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर की प्रतिमा विस्थापन का मुद्दा इस देश के बहुजनों के लिए एक विशिष्ट और प्रमुख मुद्दा था, परंतु उसमें भी कई अलग-अलग धाराओं और राजनैतिक महत्वाकांक्षाओं के लोग अपने-अपने मस्तिष्क में छिपे हुए राजनैतिक मुद्दों को साकार करने के लिए आंदोलन की शक्ति का उपयोग करके लाभ लेने की फिराक में थे जिसके कारण आंदोलन असफल हुआ। बहुजन समाज अपने ऐसे हश्र को देखकर निराश हुआ और सोचने लगा कि समाज ने जिन सामाजिक नेताओं पर भरोसा किया, वे गद्दार निकले और उन्होंने समाज की भावनाओं के साथ गद्दारी की। किसी भी आंदोलन को अगर सफल करना है तो सबको मिलकर एक ही दिशा में आगे बढ़ना होगा, सभी का लक्ष्य एक ही होना चाहिए, प्रलोभनों में फंसे अति महत्वाकांक्षी लोगों को पहचानकर आंदोलन से बाहर रखना होगा तथा आंदोलन को किसी भी कीमत पर सफल बनाना होगा।
छात्र आंदोलन की सफलता: छात्र आंदोलन की सफलता का मुख्य कारण आंदोलनकारियों में राजनीतिक स्वार्थ और सोच का न होना था। सभी छात्र अलग-अलग अपनी अपनी मान्यताओं और संप्रदायों से संबन्धित थे। देश के सभी प्रदेश व शहरों के छात्रों ने इस आंदोलन में हिस्सा लिया। उनमें किसी भी प्रकार का पृथकवाद नहीं था, सभी का एक ही लक्ष्य था कि हमें देश की सड़ती हुई शिक्षा व्यवस्था को और युवाओं के जीवन को शिक्षा के द्वारा सार्थक करने का संकल्प था। सभी छात्र जाति, धर्म और क्षेत्र के नाम पर बंटे नहीं थे, छात्रों के अंदर हिन्दू-मुसलमान, गाय-गोबर का भी भाव नहीं था। सभी छात्रों के अंदर सिर्फ एक ही लक्ष्य था कि हमें एक अच्छी शिक्षा व्यवस्था चाहिए ताकि देश का हर छात्र अपनी क्षमता के अनुसार विकसित हो सके। आरएसएस और संघी सरकार ने छात्रों को विभिन्न ओछे किस्म के मुद्दों पर विभाजित करने की कोशिश की, मगर देश के सभी छात्र आरएसएस की भ्रामक चालों में फंसे बिना अपने शांतिपूर्ण आंदोलन को अंतिम सीढ़ी तक ले गए। आरएसएस की सरकार ने पहली बार देश की जनता (छात्र) के सामने घुटने टेके और छात्रों की सभी मांगे मंजूर कर ली गई। आंदोलन के कारण मोदी के शिक्षा मंत्री को इस्तीफा देना पड़ा जो छात्रों की प्रमुख मांग थी।
आरएसएस की मानसिकता वाली सरकार के पास न कोई शर्म होती है और न कोई हया होती है वे अपनी पूर्ण बेशर्मी के साथ सरकार में बने रहने का हर संभव प्रयास करते हैं। मोदी की सरकार में अपने आपको वरिष्ठ मंत्री बताने वाले राजनाथ सिंह ने जून 2015 में कहा था कि भाजपा में इस्तीफे नहीं होते। राजनाथ सिंह जी को अब हम यह बताना चाहते हैं कि क्या आप अपने बेशर्मी के साथ अपने वक्तव्य पर अडिंग है? देश में लोकतंत्र है और लोकतंत्र की सरकार में जनता ही मालिक होती है, सरकार में बैठे लोगों को भी जनता की भावना के अनुरूप कार्य करना पड़ता है। राजनाथ सिंह और उस जैसी मानसिकता वाले भाजपा सरकार में बैठे मंत्री अपने मस्तिष्क में यह बात बैठा लें कि आप इस देश के शासक नहीं है, आप इस देश की जनता द्वारा चुने हुए प्रतिनिधि है। आप अपना जातिवादी अहंकार और आरएसएस की चासनी में पके हुए बेशर्म किस्म की चमड़ी को उतारकर, अगर सरकार में बने रहना चाहते है तो जनता की इच्छा के अनुरूप कार्य करने के लिए बाध्य होना पड़ेगा। आप जैसे झूठे और भ्रामकता के बल पर सक्षम बने शासक/नेताओं ने इस महान देश को 755 वर्षों तक विदेशी शक्तियों का गुलाम रखा और आप जैसे क्षत्रिय कहलाने वाले लोगों ने इस देश को गुलामी सहने के लिए मजबूर किया।
जनता की मांग, ‘मोदी हटाओ देश बचाओ’: देश की जनता ने अपनी नग्न आँखों से देखा कि किस प्रकार मोदी-संघी सरकार लड़कियों व महिलाओं पर बर्बरतापूर्ण व्यवहार कर रही थी। दिल्ली के जंतर-मंतर पर छोटी बच्चियों के साथ-साथ महिलाओं के गुप्तांगों पर कील लगी लाठी का इस्तेमाल कर रही थी। दिल्ली के जंतर-मंतर पर छात्र आन्दोलन इस बात को लेकर था कि प्रतिस्पर्धात्मक परीक्षाओं के पेपर बार-बार लीक हो रहे थे। 12 वर्षों के मोदी संघी सरकार में अभी तक 100 बार से अधिक पेपर लीक हो चुके हैं। अगर हम दूसरे शब्दों में यूं कहें कि मोदी सरकार ने पेपर लीक के मामले में सेंचुरी लगा ली है तो गलत नहीं होगा। इसलिए देश के नागरिकों को अपने बच्चों के भविष्य और देश की सुरक्षा के लिए मोदी संघी सरकार को देश से भागना होगा, तभी देश सुरक्षित रह पाएगा।
7 अगस्त 1990 का दिन आधुनिक भारत के सामाजिक, राजनीतिक और संवैधानिक इतिहास में एक नया मोड़ लेकर आया। इसी दिन तत्कालीन प्रधानमंत्री वी.पी. सिंह ने संसद के दोनों सदनों में राष्ट्रीय मोर्चा सरकार द्वारा मण्डल आयोग की सिफारिशों को स्वीकार करते हुए केंद्र सरकार की नौकरियों में ‘अन्य पिछड़ा वर्ग’ के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण लागू करने की ऐतिहासिक घोषणा की। इस निर्णय ने भारत के सामाजिक ताने-बाने और राजनीतिक परिदृश्य को हमेशा के लिए बदल दिया। सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े और उपेक्षित बहुजन समाज के लिए यह निर्णय शासन-प्रशासन में उनकी भागीदारी सुनिश्चित करने वाला एक क्रांतिकारी कदम साबित हुआ। भारत का संविधान लागू होने के बाद अनुच्छेद 340 के तहत सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों की स्थिति की पहचान और उनके कल्याण हेतु आयोग गठित करने का प्रावधान था।
प्रथम पिछड़ा वर्ग आयोग (काका कालेलकर आयोग): 1953 में काका कालेलकर की अध्यक्षता में गठित किया गया था, परंतु इसकी सिफारिशों को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया।
द्वितीय पिछड़ा वर्ग आयोग (मण्डल आयोग): 1 जनवरी 1979 को जनता पार्टी की मोरारजी देसाई की सरकार ने बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री बिंदेश्वरी प्रसाद मंडल की अध्यक्षता में ‘द्वितीय पिछड़ा वर्ग आयोग’ का गठन किया गया।
मण्डल आयोग की प्रमुख सिफारिशें: 1980 में मण्डल आयोग ने अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंप दी। आयोग ने वैज्ञानिक डेटा, सामाजिक सर्वेक्षणों और साक्षरता-रोजगार के आंकड़ों के आधार पर निम्नलिखित निष्कर्ष निकाले:
1. आबादी का आंकलन: आयोग के अनुसार भारत की कुल जनसंख्या में लगभग 52% आबादी अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) की थी।
2. आरक्षण का प्रस्ताव: हालाँकि आबादी 52% थी, लेकिन सर्वोच्च न्यायालय द्वारा तय की गई 50% की आरक्षण सीमा को ध्यान में रखते हुए आयोग ने सरकारी नौकरियों और केंद्रीय शैक्षणिक संस्थानों में ओबीसी वर्ग के लिए 27% आरक्षण की सिफारिश की।
3. अन्य सिफारिशें: इसमें भूमि सुधार, शैक्षणिक प्रोत्साहन और आर्थिक सहायता से जुड़े कई बिंदु भी शामिल थे।
1980 से 1990 तक मण्डल आयोग की रिपोर्ट धूल फांकती रही। कांग्रेस सरकारों के दौरान इसे लागू नहीं किया गया। 1989 के चुनाव में जनता दल और राष्ट्रीय मोर्चा के चुनावी घोषणापत्र में इसे लागू करने का वादा किया गया था।
सवर्णांे को आरक्षण से चिड़ क्यों? चिड़ का कारण साफ है कि वे इस अत्यंत पिछड़े जातीय समुदाय को कोई भी मानवीय अधिकार देना नहीं चाहते, बल्कि वे इन्हें अपना सेवक ही बनाकर रखना चाहते हैं, वह भी बिना किसी मानदेय के। इस प्रकार की सामाजिक मानसिकता से निपटने के लिए इन अत्यंत पिछड़ी जातीय समुदायों को ही आगे आकार अपने ऊपर हो रहे सामाजिक अत्याचार, उपेक्षा और अपने अधिकारों के लिए स्वयं ही खड़ा होना पड़ेगा। रास्ते में आ रहे ब्राह्मणवादी वर्चस्व को सभी को एक साथ मिलकर ध्वस्त करना पड़ेगा। बिना इस प्रकार की सामाजिक जागरूकता लाये कथित सवर्ण समाज के अलंबरदार इस समुदाय के आरक्षण से घृणा ही करते रहेंगे जबकि इस प्रकार की सामाजिक हिस्सेदारी सभी का संवैधानिक अधिकार होना चाहिए।
जय भीम, जय संविधान





| Monday - Saturday: 10:00 - 17:00 | |
|
Bahujan Swabhiman C-7/3, Yamuna Vihar, DELHI-110053, India |
|
|
(+91) 9958128129, (+91) 9910088048, (+91) 8448136717 |
|
| bahujanswabhimannews@gmail.com |