Saturday, 6th June 2026
Follow us on
Saturday, 6th June 2026
Follow us on

साँठगांठ से उपजे पूंजीवादी आकर्षण से वैचारिक भटकाव

Ideological deviation from the capitalist allure of collusion
News

2026-06-06 18:09:36

सांठ-गांठ से उपजे पूंजीवाद से अभिप्राय एक ऐसी आर्थिक व्यवस्था से है जहाँ व्यवसाय और उद्योग केवल मुक्त बाजार की प्रतिस्पर्धा या अपनी योग्यता के बल पर आगे नहीं बढ़ते बल्कि इसमें उद्योगपतियों और राजनेताओं के बीच मिलीभगत होती है, जिससे चुनिंदा व्यापारियों को सरकारी ठेके, लाइसेंस और टैक्स में छूट जैसे अनुचित लाभ मिलते हैं। वर्तमान समय में मोदी संघी शासन में साँठ-गांठ वाला पूंजीवाद फल-फूल रहा है। मोदी शासन के 12 वर्षों के दौरान संघी मानसिकता के लोगों ने कुछ चुनिंदा व्यापरियों को आगे बढ़ाया है। बड़े-बड़े ठेके, लाइंसेंस इत्यादि भी संघी मानसिकता से जुड़े लोगों को दिये जा रहे हैं। संघी वैचारिकी की मूल सोच भी यही है कि देश में पूंजीवाद का फायदा आम लोगों तक न पहुंचे। जनता में सिर्फ 5-6 प्रतिशत लोगों ही ऐसे साँठ-गांठ वाले व्यापारियों में रहे और उन्हीं के धन-बल से संघ की गतिविधियों को आगे बढ़ाया जा सके। आज पूरा देश ऐसी शासन व्यवस्था का गवाह है। जो व्यक्ति आवाज उठाते हैं उन्हें साँठ-गांठ करके या तो खरीद लिया जाता है या फिर उन्हें किसी आर्थिक अपराध में फंसा दिया जाता है। आज देश में कहने के लिए लोकतंत्र है लेकिन मोदी-संघी शासन ने साँठ-गांठ वाला पूंजीवाद खड़ा कर दिया है।

समाज की चेतना और उसकी प्रगति इस बात से तय होती है कि उसके आदर्श और मूल्य क्या हैं? बहुजन समाज (एससी, एसटी, ओबीसी और अल्पसंख्यक) का इतिहास संघर्ष, त्याग और वैचारिक क्रांति का रहा है। राष्ट्रपिता महात्मा जोतीराव फुले, बाबासाहेब डॉ. बी.आर. आंबेडकर, पेरियार और मान्यवर साहेब कांशीराम जी जैसे महापुरुषों ने इस समाज को आत्मसम्मान, समता और सत्ता का पाठ पढ़ाया। उन्होंने सिखाया कि बहुजन समाज की ताकत उसकी एकजुटता, नैतिकता और वैचारिक चेतना में है।

वर्तमान में बहुजन समाज के भीतर एक गहरा और चिंताजनक सांस्कृतिक व वैचारिक बदलाव देखा जा रहा है। आज समाज का एक बड़ा हिस्सा ऊंचे पैसे वाले लोगों, कॉरपोरेट चमक-दमक और नव-धनाढ्य संस्कृति की तरफ तेजी से आकर्षित हो रहा है। पूंजी और भौतिकवाद के प्रति यह अंधा आकर्षण केवल एक व्यक्तिगत प्राथमिकता नहीं है, बल्कि यह एक गहरा वैचारिक भटकाव है जो अंतत: पूरे बहुजन समाज को अपूरणीय क्षति पहुँचा रहा है। आज पूरे बहुजन समाज के सामाजिक संगठनों के संचालक इसी रोग से बीमार है।

महापुरुषों के सिद्धांतों का पतन: बाबासाहेब आंबेडकर ने बहुजन समाज को ‘पे बैक टू सोसाइटी’ का सिद्धांत दिया था। उनका मानना था कि समाज के जो लोग पढ़-लिखकर सक्षम बन जाएं, वे अपने कमजोर भाईयों के उत्थान के लिए काम करें। मान्यवर कांशीराम जी ने इसी सिद्धांत पर बामसेफ नामक संस्था खड़ी की, जिसने पैसे के बजाय ‘समर्पित कैडर’ और ‘विचारधारा’ को अपनी ताकत बनाया।

आज स्थिति इसके उलट होती जा रही है। बहुजन समाज के भीतर जो युवा या मध्यवर्ग उभर रहा है, वह वैचारिक महापुरुषों के बजाय उन कॉरपोरेट घरानों, ठेकेदारों और ऊंचे पैसे वाले लोगों को अपना रोल मॉडल मान रहा है, जिनका बहुजन चेतना से कोई सरोकार नहीं है। जब समाज का आदर्श ‘त्याग और संघर्ष’ के बजाय ‘अंधा पैसा और विलासिता’ बन जाता है, तो समाज की नैतिक रीढ़ टूट जाती है। समाज को आज अधिकारों की जरूरत है, न कि केवल व्यक्तिगत अमीरी की। वर्तमान समय में बहुजन समाज के अंदर गुर्गे और चमचे अधिक हैं, ये गुर्गे और चमचे बहुजन समाज के साँठ-गांठ वाले पूंजीपतियों के इर्द-गिर्द चक्कर लगाकर अपने आपको गौरान्वित महसूस करते हैं और कुछ हद तक अपनी जीविका भी उन्हीं के सहारे चलते हैं। बहुजन समाज में पैदा हुए साँठ-गांठ वाले पूंजीवादी अपने ऐसे चमचों और गुर्गों को देखकर और समाज में दूसरे लोगों को उन्हें दिखाकर समाज को भ्रमित करते हैं कि देखो मेरे आसपास कितने लोग हैं।

पूंजीवादी सांस्कृतिक वर्चस्व: वर्तमान समय में साँठ-गांठ से पैदा हुए पूंजीवादी, संघी संस्कृति का शिकार हो रहे हैं। मशहूर विचारक अंतोनियो ग्राम्शी ने ‘सांस्कृतिक वर्चस्व’ का सिद्धांत दिया था, जिसके अनुसार शासक वर्ग समाज पर केवल शारीरिक बल से नहीं, बल्कि अपनी संस्कृति और विचारों को थोपकर राज करता है। आज बहुजन समाज इसी जाल में फंसा हुआ है।

पूंजीवादी व्यवस्था ने एक ऐसा भ्रमजाल बुना है जहां व्यक्ति की कीमत उसके विचारों, उसकी ईमानदारी या उसके सामाजिक योगदान से नहीं, बल्कि उसकी गाड़ी, उसके मकान और उसके बैंक बैलेंस से आंकी जाती है। बहुजन समाज की जनता जब इस चमक-दमक को देखती है, तो वह शोषक वर्ग की जीवनशैली की मुरीद हो जाती है। वे उन लोगों के पीछे भागने लगते हैं जो धन के बल पर अपनी सामाजिक और राजनीतिक हैसियत बनाए हुए हैं। यह आकर्षण बहुजन जनता को मानसिक गुलाम बना रहा है, जिससे वे अपने वास्तविक शोषकों को ही अपना मसीहा मान बैठते हैं। बहुजन समाज के सभी जातीय घटक इसी बीमारी से ग्रस्त हैं।

साँठ गांठ वाले पूँजीपतियों का हावी होना: बहुजन आंदोलन की सबसे बड़ी ताकत उसकी राजनीतिक चेतना थी। एक समय था जब बहुजन समाज के लोग अपनी जेब से पैसे देकर, सूखी रोटी खाकर, साइकिलों पर नीले झंडे लगाकर, रैलियों में जाते थे। वे पैसे के बल पर नहीं, बल्कि विचारधारा के बल पर चुनाव जीतते और जिताते थे। लेकिन आज ऊंचे पैसे वाले लोगों के प्रति बढ़ते आकर्षण ने बहुजन राजनीति को भी प्रदूषित कर दिया है। आज बहुजन समाज देख रहा है कि अब संघर्ष, ईमानदारी, बफादारी मायने नहीं रखती, बल्कि साँठ-गांठ करके पूंजीपतियों को धन कमवाना और ऐसे धन से कुछ हिस्सा अपने राजनैतिक कार्यक्रमों के नाम पर वापस ले लेना, यही आज के समय की राजनैतिक विचारधारा समाज को परोसी जा रही है। जिसमें समाज के नवयुवक जो किसी भी कीमत पर राजनीति में घुसना चाहते हैं वे लालचवश इसमें फंस जाते हैं।

टिकटों की खरीद-बिक्री: अब आम बहुजन कार्यकर्ता के बजाय उन धन-पशुओं को प्राथमिकता मिलने लगी है जो करोड़ों रुपये खर्च कर सकते हैं। आज का आम बहुजन कार्यकर्ता इन टिकटों की खरीद और बिक्री की दौड़ से बाहर हो चुका है जिसके लिए देश की सरकार और चुनाव आयोग बहुत हद तक जिम्मेदार है। चूंकि विधान सभा का चुनाव लड़ने के लिए चुनाव खर्च की सीमा 40 लाख रुपए हैं और लोक सभा का चुनाव लड़ने के लिए 95 करोड़ रुपए तय है। इतनी बड़ी रकम एक आम ईमानदार कार्यकर्ता के पास नहीं हो सकती, इसलिए वह चुनाव प्रतिस्पर्धा से बाहर ही रहेगा। चुनाव लड़ने के मैदान में तो सिर्फ साँठ-गांठ वाले पूंजीपति ही उतारे जाएँगे। राजनीतिक पार्टियां चुनाव लड़ने वाले प्रत्याशियों को पार्टी का टिकट लाखों-करोड़ो रुपए लेकर ही देगी। इस टिकट खरीद-फरोक्त ने आम जन को चुनाव मैदान से बाहर कर दिया है।

वोट का वस्तुकरण: जनता भी विचारधारा के बजाय इस बात से प्रभावित होने लगी है कि कौन सा उम्मीदवार कितना पैसा बांट रहा है, कितनी गाड़ियां लेकर चल रहा है या कितना बड़ा रसूख रखता है। जब जनता पैसे वाले उम्मीदवारों की तरफ आकर्षित होती है, तो यह एक सच्चे, जमीन से जुड़े और ईमानदार बहुजन नेतृत्व को खुद अपने हाथों से दफन कर देते हैं। नतीजा यह होता है कि संसद और विधानसभाओं में ऐसे लोग पहुंच जाते हैं जो पूंजीपतियों के हितैषी होते हैं, न कि बहुजन समाज के। आज देश का पूरा समाज इसी रोग से बीमार है।

आंतरिक एकजुटता का बिखराव: ऊंचे पैसे वाले लोगों की तरफ आकर्षित होने का एक दुष्परिणाम यह हुआ है कि बहुजन समाज के भीतर ही एक ‘नव-ब्राह्मणवाद’ या ‘वर्ग-विभाजन’ पैदा हो गया है। बहुजन समाज का जो हिस्सा थोड़ा अमीर या आर्थिक रूप से सक्षम हो गया है, वह खुद को अपने ही समाज के गरीब, भूमिहीन और शोषित भाइयों से अलग समझने लगा है।

सक्षम वर्ग समाज के उत्थान में योगदान देने के बजाय उच्च-जातीय संभ्रांत लोगों के साथ उठना-बैठना पसंद करता है जो आर्थिक रूप से उनके बराबर हैं। वे अपनी शादियों, त्योहारों और सामाजिक आयोजनों में अंधा पैसा बहाते हैं ताकि वे अमीरों की कतार में खड़े दिख सकें। इस दिखावे की संस्कृति के कारण बहुजन समाज की आंतरिक एकजुटता पूरी तरह बिखर रही है। गरीब बहुजन खुद को अलग-थलग महसूस करता है, और समाज की वह सामूहिक ताकत खत्म हो जाती है जो कभी शासक वर्ग को चुनौती देती थी।

युवाओं का वैचारिक भटकाव: किसी भी समाज का भविष्य उसके युवाओं पर निर्भर करता है। आज का बहुजन युवा सोशल मीडिया और रील संस्कृति के इस दौर में ‘त्वरित सफलता’ और ‘अंधा पैसा’ कमाने की होड़ में लगा है। वह देखता है कि जो लोग अनैतिक तरीकों से, बाहुबल से या व्यवस्था की चाटुकारिता करके अमीर बने हैं, समाज में उन्हीं की जय-जयकार हो रही है।

इसके कारण युवा गंभीर पढ़ाई, वैचारिक अध्ययन और सामाजिक संगठन के काम से दूर हो रहे हैं। वे उन अमीर नेताओं और ठेकेदारों के पीछे ‘जिंदाबाद-मुदार्बाद’ करने वाले लठैत या कार्यकर्ता बनकर रह जाते हैं जो उन्हें चंद रुपयों या छोटी-मोटी सुख-सुविधाओं का लालच देते हैं। युवा यह नहीं समझ पाते कि ये अमीर लोग उनका इस्तेमाल केवल अपने फायदे के लिए कर रहे हैं।

समाज को होने वाला नुकसान: जब बहुजन समाज की जनता विचारधारा को छोड़कर पूंजीपतियों और पैसे वालों के पीछे चलती है, तो इसके गंभीर परिणाम पूरे समाज को भुगतने पड़ते हैं:

अधिकारों की अनदेखी: अमीर लोग कभी भी आरक्षण, सरकारी नौकरियों, मुफ्त शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे बुनियादी मुद्दों पर बात नहीं करेंगे, क्योंकि पूंजीवाद का मूल चरित्र ही निजीकरण को बढ़ावा देना है।

जमीनी मुद्दों से दूरी: जब नेतृत्व और जनता दोनों का ध्यान पैसे पर होगा, तो दलित-पिछड़ों पर होने वाले अत्याचार, जमीन के अधिकार, मजदूरी जैसे वास्तविक मुद्दे हाशिए पर चले जाते हैं।

आंदोलन का एनजीओ-करण: कई बार समाज के पढ़े-लिखे लोग बड़े कॉरपोरेट फंड और एनजीओ के चक्कर में पड़कर आंदोलन की धार को खुद ही कुंद कर देते हैं। विद्रोह की जगह केवल ‘सद्भावना’ और ‘राहत कार्य’ ले लेते हैं।

सही समाधान, भटकाव से वापसी: यह सच है कि आर्थिक रूप से मजबूत होना किसी भी समाज के लिए जरूरी है। बाबासाहेब आंबेडकर भी चाहते थे कि बहुजन व्यापार, उद्योग आगे बढ़े और योग्य व्यक्ति उच्च पदों पर जाएं। लेकिन आर्थिक मजबूती और ‘पैसे के आगे नतमस्तक हो जाना’ दोनों में जमीन-आसमान का अंतर है। पैसा जब तक समाज के उत्थान का साधन है, तब तक वह सही है; लेकिन जब पैसा ही साध्य बन जाए और विचारधारा को निगल जाए, तो वह समाज के पतन का कारण बनता है।

जब तक बहुजन समाज की जनता पैसे की चमक के बजाय वैचारिक ज्ञान, आत्मसम्मान और संगठन की ताकत को नहीं पहचानेगी, तब तक वह केवल दूसरों के हाथों का खिलौना बनी रहेगी। समय की मांग है कि हम धनपशुओं की गुलामी छोड़कर अपनी वैचारिक विरासत को संभालें, क्योंकि इतिहास गवाह है कि लड़ाइयां पैसे से नहीं, हौसले, सही दिशा, सही नियत और ईमानदारी से जीती जाती हैं।

Post Your Comment here.
Characters allowed :


01 जनवरी : मूलनिवासी शौर्य दिवस (भीमा कोरेगांव-पुणे) (1818)

01 जनवरी : राष्ट्रपिता ज्योतिबा फुले और राष्ट्रमाता सावित्री बाई फुले द्वारा प्रथम भारतीय पाठशाला प्रारंभ (1848)

01 जनवरी : बाबा साहेब अम्बेडकर द्वारा ‘द अनटचैबिल्स’ नामक पुस्तक का प्रकाशन (1948)

01 जनवरी : मण्डल आयोग का गठन (1979)

02 जनवरी : गुरु कबीर स्मृति दिवस (1476)

03 जनवरी : राष्ट्रमाता सावित्रीबाई फुले जयंती दिवस (1831)

06 जनवरी : बाबू हरदास एल. एन. जयंती (1904)

08 जनवरी : विश्व बौद्ध ध्वज दिवस (1891)

09 जनवरी : प्रथम मुस्लिम महिला शिक्षिका फातिमा शेख जन्म दिवस (1831)

12 जनवरी : राजमाता जिजाऊ जयंती दिवस (1598)

12 जनवरी : बाबू हरदास एल. एन. स्मृति दिवस (1939)

12 जनवरी : उस्मानिया यूनिवर्सिटी, हैदराबाद ने बाबा साहेब को डी.लिट. की उपाधि प्रदान की (1953)

12 जनवरी : चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु परिनिर्वाण दिवस (1972)

13 जनवरी : तिलका मांझी शाहदत दिवस (1785)

14 जनवरी : सर मंगूराम मंगोलिया जन्म दिवस (1886)

15 जनवरी : बहन कुमारी मायावती जयंती दिवस (1956)

18 जनवरी : अब्दुल कय्यूम अंसारी स्मृति दिवस (1973)

18 जनवरी : बाबासाहेब द्वारा राणाडे, गांधी व जिन्ना पर प्रवचन (1943)

23 जनवरी : अहमदाबाद में डॉ. अम्बेडकर ने शांतिपूर्ण मार्च निकालकर सभा को संबोधित किया (1938)

24 जनवरी : राजर्षि छत्रपति साहूजी महाराज द्वारा प्राथमिक शिक्षा को मुफ्त व अनिवार्य करने का आदेश (1917)

24 जनवरी : कर्पूरी ठाकुर जयंती दिवस (1924)

26 जनवरी : गणतंत्र दिवस (1950)

27 जनवरी : डॉ. अम्बेडकर का साउथ बरो कमीशन के सामने साक्षात्कार (1919)

29 जनवरी : महाप्राण जोगेन्द्रनाथ मण्डल जयंती दिवस (1904)

30 जनवरी : सत्यनारायण गोयनका का जन्मदिवस (1924)

31 जनवरी : डॉ. अम्बेडकर द्वारा आंदोलन के मुखपत्र ‘‘मूकनायक’’ का प्रारम्भ (1920)

2024-01-13 16:38:05