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संभल दंगा षड्यंत्रकारी संघियों का एक प्रयोग

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2024-11-30 06:07:45

उत्तर प्रदेश के संभल में मुगलकालीन शाही जामा मस्जिद की हिंसा में पाँच मुस्लिम युवकों की मौत हुई। इस संबंध में पुलिस ने दावा किया है कि उन्होंने भीड़ के खिलाफ किसी भी घातक हथियार का इस्तेमाल नहीं किया। दूसरी और मस्जिद की प्रबंधन समिति के अध्यक्ष का कहना है कि उन्होंने खुद पुलिस को भीड़ पर गोलियां चलते हुए देखा था और मेरी मौजूदगी में जनता ने कोई गोली नहीं चलाई। मस्जिद समिति के अध्यक्ष और वरिष्ठ वकील जफर अली ने इस घटना पर अपनी ओर से एक प्रेसवार्ता भी आयोजित की थी। वकील जफर अली ने यह भी आरोप लगाया की घटना के दौरान पुलिस के पास देशी हथियार, कट्टे आदि भी थे और उन्होंने मस्जिद के पास खड़े अपने वाहनों में खुद ही तोड़-फोड़ की और आग लगा दी थी। अली ने तार्किक सवाल भी खड़ा किया कि प्रदर्शनकारी एक-दूसरे को क्यों मारेंगे? अगर प्रदर्शनकारियों को गोली चलानी ही थी तो वे पुलिस पर गोली चलाते, जनता पर नहीं। जफर अली ने यह भी दावा किया कि वह उस समय मौके पर ही मौजूद थे, जब उन्होंने मुरादाबाद के उप-महानिरक्षक, संभल के जिला मजिस्ट्रेट को यह कहते हुए सुना कि भीड़ के खिलाफ गोली चलाने के आदेश दे दिये जायें।

खुदाई की अफवाह: मनुवादी-संघियों के अतीत को देखकर जनता आसानी से समझ सकती है कि अफवाह फैलाने और भीड़ जुटाने में मनुवादी संघियों की बड़ी महारथ है। अली ने बताया कि यह पूरी घटना अफवाह फैलने के बाद ही शुरू हुई थी कि सर्वेक्षण टीम ने मस्जिद में खुदाई शुरू कर दी है। उन्होंने आगे कहा कि माप के लिए मस्जिद में स्नान टैंक खाली करने के बाद यह अफवाह फैलाई गई जिसके कारण मुस्लिम समुदायों के लोगों को लगा कि मस्जिद में खुदाई चल रही है। इसी कारण लोगों में अफवाह आग की तरह फैल गई जिसे स्पष्ट करने के लिए एक घोषणा भी की गई थी लेकिन अफवाह पर लोगों का भरोसा कायम रहा। अली ने कहा कि भीड़ को उकसाने के लिए एसडीएम और सर्किल अधिकारी (सीओ) पुलिस संभल दोषी है। अली ने यह भी जोड़ा की यह सब संभल के एसडीएम और सीओ की साजिश के कारण हुआ। जब लोगों ने सीओ से पूछा कि क्या हो रहा है, तो उन्होंने उन्हें गालियाँ दी और लाठीचार्ज का आदेश भी दिया। उन्होंने यह भी कहा था कि सवाल पूछने वालों को गोली मार दी जाएगी। परिणामस्वरूप एसडीएम और सीओ संभल ने मौके पर दहशत पैदा करने का काम किया। हालांकि वहाँ के डीएम ने इससे साफ इनकार किया और कहा कि ऐसी किसी अफवाह का कोई आधार नहीं है। टैंक का पानी माप के लिए नहीं बल्कि फोटोग्राफी और वीडियोग्राफी के लिए खाली किया गया था। हिंसा के लिए पुलिस ने अब तक 2 महिलाओं सहित 25 मुस्लिम युवकों को गिरफ्तार किया है और सांसद (एसपी) जिया-उर-रहमान वर्क सहित 2500 से अधिक लोगों पर मामला दर्ज किया गया है। 25 नवम्बर को संसद के बाहर बोलते हुए वर्क ने आरोप लगाया कि कुछ अधिकारियों ने अपने निजी हथियारों के साथ-साथ अपने सर्विस हथियारों से भी गोलियाँ चलाई और अपनी कारों को खुद ही आग लगा दी। संभल पुलिस ने अभी तक उनके आरोप का जवाब नहीं दिया है। सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने संसद के बाहर इन सभी आरोपों को दोहराया और पुलिस अधिकारियों के खिलाफ उचित कारवाई की माँग करते हुए उनके खिलाफ हत्या का मामला दर्ज करने की माँग भी की। उन्होंने आरोप लगाया कि यह घटना योगी की भाजपा द्वारा कुंदरकी उप-चुनाव में वोटों की लूट से जनता का ध्यान हटाने के लिए है।

प्राचीन स्मारक संरक्षण अधिनियम: पुलिस ने इस मामले में कुल मिलाकर 7 एफआईआर दर्ज की है। एक एफआईआर में वर्क का नाम शामिल है, जिसमें उनपर कुछ दिन पहले दिये गए भाषण के माध्यम से भीड़ को उकसाने का आरोप लगाया गया था। पुलिस का बयान है कि पथराव और गोली-बारी में करीब 15 पुलिस कांस्टेबल, 4 पुलिस अधिकारी और एक डिप्टी कलेक्टर घायल हो गए हैं। 24 नवम्बर को मस्जिद के सर्वेक्षण का निर्देश दिया गया था। इन वादियों का नेतृत्व हिंदुत्व समर्थक वकील हरी शंकर जैन और हिन्दू तथाकथित संत महंत ऋषिराज गिरि कर रहे थे। मुख्य वादी हरी शंकर जैन के वकील और बेटे विष्णु शंकर जैन ने कहा कि 1529 में बाबर ने हरिहर मंदिर को ध्वस्त करके मस्जिद में बदलने की कोशिश की थी।

संभल मस्जिद का सर्वेक्षण करना सही? 1991 में भारत की संसद ने पूजा अधिनियम पारित किया। इस कानून में अनिवार्य रूप से यह प्रावधान था कि सभी पूजा स्थलों का धार्मिक चरित्र वैसा ही रहेगा जैसा 15 अगस्त 1947 को था और अब इसे बदला नहीं जा सकता। इस कानून के पीछे भाजपा नेताओं के नेतृत्व में हजारों कार्यकतार्ओं को अयोध्या में लाने के लिए जन-आंदोलन चला था। जिसमें ऐतिहासिक बाबरी मस्जिद के स्थल पर मंदिर बनाने की माँग की गई थी। हिंदुत्व के कथित धर्मग्रंथों के अनुसार अयोध्या भगवान राम की जन्म भूमि थी, दूर-दराज के हिन्दू कार्यकतार्ओं ने आरोप लगाया था कि मंदिर को ध्वस्त करके मस्जिद बनाई गई है।

हिंदुत्ववादी न्यायपालिका पैदा कर रही धार्मिक विवाद: जब 1991 में भारत की संसद ने पूजा स्थल अधिनियम पारित करके लागू कर दिया कि धार्मिक स्थलों का चरित्र वैसा ही रहे जैसा 15 अगस्त 1947 में मौजूद था, तो फिर ऐसे धार्मिक विवाद खड़े नहीं होने चाहिए। इसका मतलब साफ है कि भारत की न्यायिक व्यवस्था में हिंदुत्ववादी मानसिकता के न्यायधीशों की अधिकता है और वे किसी न किसी तरीके से हिंदुत्व की भावना के तहत अपने न्यायिक आदेश पारित करते रहते हैं। वे संविधान और न्यायिक प्रावधानों को ध्यान में रखकर अपने आदेश पारित नहीं करते। जिसके कारण अब हर रोज कथित धार्मिक स्थलों से जुड़े मुद्दे न्यायालयों के माध्यम से हिंदुत्ववादी जजों के द्वारा उभारे जा रहे हैं। हिंदुत्ववादी मानसिकता के जहर से ग्रसित उच्चतम न्यायालय के न्यायधीश 1992 में हिंदुत्व की भीड़ द्वारा मस्जिद को गिराने से नहीं रोक सके। लेकिन 2019 में जिस जमीन पर बाबरी मस्जिद कभी खड़ी थी उसे राम मंदिर बनाने के लिए ट्रस्ट को दे दिया गया और मस्जिद के निर्माण के लिए दूसरी जगह एक जमीन का छोटा टुकड़ा आबंटित कर दिया गया। इस फैसले का पूरा आधार तथ्यों पर आधारित न्यायिक और संवैधानिक नहीं था बल्कि वह हिंदुत्व की कथित आस्था को आधार बनाकर दिया गया फैसला था। हालांकि भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने पूजा स्थल अधिनयम 1992 को बरकरार रखा, जिससे यह साफ होता है कि भारत की अदालतें आज हिन्दू पूजा स्थलों के खिलाफ हिन्दू पूजा स्थलों से उपजे विवादों पर विचार नहीं कर सकती और न ही सर्वेक्षण के आदेश दे सकती है। लेकिन देखा यह जा रहा है कि वाराणसी में मई 2022 में मंदिर-मस्जिद का मुद्दा सुप्रीम कोर्ट पहुँचा तो तत्कालीन मुख्य न्यायधीश डी.वाई.चंद्रचूड़ ने पुरातात्विक सर्वेक्षण की अनुमति दे दी। पूर्व जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा था कि स्थान का कोई रूपांतरण नहीं हो सकता, लेकिन संरचना का मूल चरित्र हमेशा निर्धारित किया जा सकता है। क्या उनका वक्तव्य न्यायिक सिद्धांतों के अनुरूप है? इससे सिद्ध होता है कि तत्कालीन मुख्य न्यायधीश चंद्रचूड़ की मानसिकता में हिंदुत्व की मानसिकता का जहर गहराई तक व्याप्त है। मई 2022 के अंत में मथुरा की एक स्थानीय अदालत ने शहर में शाही ईदगाह मस्जिद को कथित भगवान कृष्ण के मंदिर के निर्माण के लिए हिन्दू ट्रस्ट को हस्तांत्ररित करने की माँग वाली याचिका स्वीकार कर ली। वास्तविकता के आधार पर पूर्व मुख्य न्यायधीश चंद्रचूड़ ने राम मंदिर के फैसले में उलटफेर करके ऐसी दलीलों के लिए दरवाजे खोल दिये हैं, जो भारत में मुसलमानों की स्थिति को खतरे में लगातार डालती है। तभी से ऐसे मामलों की न्यायालयों में बाढ़ सी आ गई है और हिंदुत्व की मानसिकता वाले न्यायधीश कानून और संविधान का ध्यान न रखते हुए ऐसे मामलों को प्राथमिकता के आधार पर सुन रहे हैं।

जिम्मेदार कौन?: सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील संजय हेगड़े ने कहा कि अयोध्या मामले में फैसला सुनाकर शीर्ष अदालत ने यह मान लिया था कि उसने सांप्रदायिक बहुसंख्यकवाद के जिन्न को बोतल में डाल दिया है। हालांकि, हेगड़े ने कहा कि वाराणसी मामले में चंद्रचूड़ की अनियंत्रित टिप्पणियों, जिनकी किसी भी पक्ष के वकीलों द्वारा माँग नहीं की गई थी ने देशभर में आग भड़का दी और जिन्न नए दावों के साथ फिर से बाहर आ गया। अल जजीरा की एक रिपोर्ट के अनुसार मस्जिदों का सर्वेक्षण राजनीतिक ताकत का साधन बन गया है। अल जजीरा ने कहा कि मुस्लिम समुदाय को डर है कि इन सर्वेक्षणों की वजह से उनके पूजा स्थल नष्ट हो जाएँगे। चंद्रचूड़ की टिप्पणियों की वजह से लोग अपनी जान गवां रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट ने इस भानुमती के पिटारे को खोल दिया है और हिंदुत्व की मानसिकता वालों की गुंडागर्दी के लिए रास्ता भी साफ कर दिया है। कई वकील और न्यायविद यह मानते हैं कि सुप्रीम कोर्ट ने आग को तुरंत बुझाने के बजाए अब भारत में हर जगह आग जला दी है। न्यायपालिका ने सांप्रदायिक ताकतों के कानून को अपने हाथ में लेने की एक तरह से छूट दे दी है। संभल में अपने छोटे से घर में तस्लीम अपने बड़े भाई नयीम की मौत के बाद शोक मनाने वालों से मिल रहे थे। नयीम के परिवार में उनकी पत्नी और 4 बच्चे हैं। जिनमें सबसे बड़ा बच्चा 10 साल का है, उन्होंने अल जजीरा से कहा कि मेरा भाई प्रदर्शनकारियों में शामिल नहीं था फिर भी पुलिस वालों ने उसे मार डाला। संभल दंगे के तहत मरने वालों में बिलाल अंसारी (23 वर्ष), नदीम अहमद (35 वर्ष), मौहम्मद कैफ (18 वर्ष), अयान (19 वर्ष), नदीम गाजी (35 वर्ष) इस प्रकार मरने वाले सभी 18-35 वर्ष की उम्र तक के नौजवान हैं। यह हादसा सुनने और देखने में बहुत ही भयवाह लगता है जिनके परिवार में जवान बच्चों की मौत हुई है उनके दर्द को वे ही महसूस कर सकते हैं। लोगों का प्रदर्शन मस्जिद सर्वे के खिलाफ था। पुलिस ने आँसू गैस के गोले दागे, झड़प के दौरान पत्थरबाजी और गोली-बाजी भी हुई हिंदुत्व वॉच की रिपोर्ट के अनुसार जब कोर्ट द्वारा नियुक्त सर्वेक्षण दल जामा मस्जिद में ‘जय श्रीराम’ के नारे लगाते हुए पहुँचा तो हिंसक झड़प हो गई क्योंकि वहाँ हिंदुत्व की मानसिकता वालों की दलीलों पर मंदिर होने के दावों की जाँच की जा रही थी। पुलिस ने लाठीचार्ज किया और गोलियाँ भी चलाई जिसमें कई मुस्लिम लोगों की मौत हो गई।

संभल दंगे की मीडिया रिपोर्ट से साफ है कि दंगा एक सुनियोजित षड्यंत्र के तहत कराया गया। मुस्लिम समुदाय दंगा करने के पक्ष में नहीं था वह तो सिर्फ मस्जिद के सर्वेक्षण का विरोध कर रहा था। जिसे प्रशासन द्वारा आसानी से निपटाया जा सकता था। परंतु उत्तर प्रदेश में योगी सरकार का हिंदुत्ववादी प्रशासन सांप्रदायिकता के जहर में डूबा हुआ है और वह प्रदेश की जनता पर उसी मानसिकता के आधार पर कारवाई करता है। देश की न्यायपालिका के मुखिया रहे डी.वाई.चंद्रचूड़ ने अपनी मनुवादी मानसिकता के तहत मस्जिदों के सर्वेक्षण का पिटारा खोला जिनकी वजह से देश में सांप्रदायिक दंगे बढ़े हैं। इसी मानसिकता के तहत जस्टिस चंद्रचूड़ की बेंच ने दलित जातियों के आरक्षण के अंदर आरक्षण को ठीक बताकर दलित जातियों में फूट डालकर उन्हें आपसे में लड़ने का काम किया है। इससे यह पता चलता है कि जस्टिस चंद्रचूड़ की मानसिकता पूर्णतया ब्राह्मणवादी और मनुवादी है। वे खुद भी महाराष्ट्र के चितपावन ब्राह्मण है जिनमें अपनी श्रेष्ठता का भाव अधिक दिखता है और अधिकांश चितपावन ब्राह्मणों की मानसिकता देशहित और जनहित में कार्य नहीं करती। मुस्लिम समुदायों को मस्जिद-मंदिर के झगड़े से निपटने के लिए और मनुवादियों को इस सबका सटीक जवाब देने के लिए दलित-मुस्लिम एकता को शब्दों से नहीं व्यवहारिकता में लाकर मजबूत करना चाहिए। अगर, ये दोनों समुदाय मजबूती के साथ एक साथ मिलकर, एक साथ खड़े हों, और किसी भी झगड़े की नौबत आने पर एकता के साथ लड़े तो ब्राह्मण संस्कृति के 3 प्रतिशत मनुवादी संघी लोग ऐसे अपराधिक षड्यंत्र रचने का ख्वाब सपने में भी नहीं सोच सकते।

संभल दंगा संघियों की दूरगामी सोच का प्रयोग: मनुवादी-संघियों की फितरत में अशांति, षड्यंत्र, सामाजिक उथल-पुथल हमेशा अंतर्निहित होती है। उसी कारण वे समाज में षड्यंत्रों की रचना करते रहते हैं। इस आधार पर संभल दंगा कहीं 2027 में होने वाले विधान सभा के आम चुनाव के लिए मुस्लिम समुदाय में लगातार भय कायम रखने की योजना तो नहीं है? कुंदरकी सीट का उप-चुनाव इस और इशारा करता है। यूपी की विधान सभा में करीब 100 सीटों पर मुस्लिम समुदाय 40 प्रतिशत से अधिक है। अगर इसमें 25-30 प्रतिशत मत दलित और अति पिछड़ी जातियों का मिला दें तो जीत का आंकड़ा (50 प्रतिशत से अधिक) पार हो जाता है। इसी संख्याबल को देखकर मुस्लिम-दलित वोटर्स को वोट देने से रोका जा रहा है। मुस्लिम-दलित वोटरों को यह सब देखकर सावधानी से मनुवादियों के इस षड्यंत्र को फेल करना चाहिए।

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01 जनवरी : मूलनिवासी शौर्य दिवस (भीमा कोरेगांव-पुणे) (1818)

01 जनवरी : राष्ट्रपिता ज्योतिबा फुले और राष्ट्रमाता सावित्री बाई फुले द्वारा प्रथम भारतीय पाठशाला प्रारंभ (1848)

01 जनवरी : बाबा साहेब अम्बेडकर द्वारा ‘द अनटचैबिल्स’ नामक पुस्तक का प्रकाशन (1948)

01 जनवरी : मण्डल आयोग का गठन (1979)

02 जनवरी : गुरु कबीर स्मृति दिवस (1476)

03 जनवरी : राष्ट्रमाता सावित्रीबाई फुले जयंती दिवस (1831)

06 जनवरी : बाबू हरदास एल. एन. जयंती (1904)

08 जनवरी : विश्व बौद्ध ध्वज दिवस (1891)

09 जनवरी : प्रथम मुस्लिम महिला शिक्षिका फातिमा शेख जन्म दिवस (1831)

12 जनवरी : राजमाता जिजाऊ जयंती दिवस (1598)

12 जनवरी : बाबू हरदास एल. एन. स्मृति दिवस (1939)

12 जनवरी : उस्मानिया यूनिवर्सिटी, हैदराबाद ने बाबा साहेब को डी.लिट. की उपाधि प्रदान की (1953)

12 जनवरी : चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु परिनिर्वाण दिवस (1972)

13 जनवरी : तिलका मांझी शाहदत दिवस (1785)

14 जनवरी : सर मंगूराम मंगोलिया जन्म दिवस (1886)

15 जनवरी : बहन कुमारी मायावती जयंती दिवस (1956)

18 जनवरी : अब्दुल कय्यूम अंसारी स्मृति दिवस (1973)

18 जनवरी : बाबासाहेब द्वारा राणाडे, गांधी व जिन्ना पर प्रवचन (1943)

23 जनवरी : अहमदाबाद में डॉ. अम्बेडकर ने शांतिपूर्ण मार्च निकालकर सभा को संबोधित किया (1938)

24 जनवरी : राजर्षि छत्रपति साहूजी महाराज द्वारा प्राथमिक शिक्षा को मुफ्त व अनिवार्य करने का आदेश (1917)

24 जनवरी : कर्पूरी ठाकुर जयंती दिवस (1924)

26 जनवरी : गणतंत्र दिवस (1950)

27 जनवरी : डॉ. अम्बेडकर का साउथ बरो कमीशन के सामने साक्षात्कार (1919)

29 जनवरी : महाप्राण जोगेन्द्रनाथ मण्डल जयंती दिवस (1904)

30 जनवरी : सत्यनारायण गोयनका का जन्मदिवस (1924)

31 जनवरी : डॉ. अम्बेडकर द्वारा आंदोलन के मुखपत्र ‘‘मूकनायक’’ का प्रारम्भ (1920)

2024-01-13 11:08:05