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संघी सरकारों द्वारा बढ़ाया जा रहा ‘पाखंडवाद’

संवाददाता
News

2026-03-28 18:20:27

नई दिल्ली। वर्तमान समय में पाखंडवाद का वर्चस्व सर्वोपरि है और देश व प्रदेश की सरकारें इन पाखंडों को बढ़ाने के लिए आर्थिक सहयोग भी दे रही है। सरकारों ने पाखंड के प्रचार के लिए अपने अंधभक्तों को गलियों, मौहल्लों, सड़कों पर उतार रखा है। महिलाओं को इस पाखंडवाद में इतनी गहराई तक उतार दिया गया है कि उन्हें यही पता नहीं चल रहा है, क्या सत्य है और क्या असत्य है? हाल ही में अष्टमी और नवमी पर घर-घर में ढोलक बजाई जा रही है, घर की महिलाएं सज-धजकर कन्या पूजन के नाम पर हलवा-पूरी आदि का भोग लगाकर और कुछ दान देकर यह समझ रही है कि हमने बहुत ही उत्कृष्ट धार्मिक काम किया है। हमने अपने सभी पाप कर्मों को समाप्त कर लिया है। मगर आम जनता इस मर्म की गहराई तक नहीं पहुँचती की पाप-पुण्य और कर्म क्या है। इसके लिए गौतम बुद्ध द्वारा प्रतिपादित चार आर्य सत्य (दु:ख, समुदय, निरोध, मार्ग) बौद्ध दर्शन का सार हैं, जो जीवन में दु:ख के कारण और उसके निवारण का मार्ग बताते हैं। यह सिद्धांत बताता है कि संसार दु:खमय है (दु:ख), जिसका मूल कारण तृष्णा (समुदय) है, लेकिन तृष्णा को नष्ट करके दु:ख दूर किया जा सकता है (निरोध)। इस निरोध के लिए अष्टांगिक मार्ग (मध्यम मार्ग) ही एकमात्र रास्ता है। इसलिए भगवान बुद्ध के उपदेश के अनुसार आपको अपना दीपक स्वयं बनना चाहिए। यही सबसे श्रेष्ठ सिद्धान्त है और इसी के आधार पर मनुष्य जीवन में श्रेष्ठ बन सकता है।

गमले के पौधे की तरह है, हिन्दुत्व की वैचारिकी का जीवन: जिस तरह जीवन में व्यक्ति किसी पौधे को गमले में लगाकर उसे जिंदा रखने के लिए उसमें रोज पानी डालता है तो वह हरा-भरा दिखाई देता है। अगर वही व्यक्ति गमले के उस पौधे में पानी डालना बंद कर दे तो पौधा स्वयं दो से तीन दिनों में मुरझाकर मर जाएगा। इसी तरह हिन्दुत्व की वैचारिकी वाले अपने पाखंड को जिंदा रखने के लिए और उससे निरंतरता के साथ धन की कमाई करने के लिए किसी न किसी बहाने से हर रोज किसी न किसी घर या स्थान पर पाखंड रूपी ढोलक बजाकर और उसके साथ ही कीर्तन, भजन इत्यादि करके यह समझ लेते हैं कि हमने जो देवी-देवता व भगवान के नाम का कीर्तन किया है उसी से हमारे सभी अनिष्ठ कर्म नष्ट हो जाएँगे और हमें अपने इन कर्मों का अच्छा फल मिलेगा। इस तरह की मान्यता बेमानी है जबतक मनुष्य अपने आपको श्रेष्ठ बनाने के लिए उपयुक्त कर्म नहीं करेगा वह श्रेष्ठता के मार्ग पर अग्रसर नहीं हो सकता।

दिल्ली सरकार में पाखंड के पराकाष्ठा: दिल्ली में संघी मानसिकता की रेखा गुप्ता की सरकार है उसके मंत्री मण्डल में जो भी मंत्री बनाए गए हैं वे सभी पाखंडी मानसिकता से ओत-प्रोत है। रेखा गुप्ता व उसके मंत्रियों का एक ही अहम लक्ष्य है कि दिल्ली की जनता को व्यर्थ की बातों में उलझाओ; व्यर्थ की योजनाओं की घोषणा करके उसमें फंसाए रखो, शहर में निर्माण कार्यों को अधिक महत्व दो; पुरानी योजनाओं के नाम बदल दो; योजनाओं में अपनी फोटो लगाकर अपना प्रचार-प्रसार करो; हर अच्छी-बुरी वस्तु पर नरेंद्र मोदी और रेखा गुप्ता का फोटो चिपका दो; संस्थानों के पुराने नाम बदलकर संघी मानसिकता आधारित नाम चिपका दो; योजनाओं को ऐसा बनाकर दिखाओ ताकि आम जनता को उन योजनाओं का उद्देश्य की समझ में न आए और न वे उसका लाभ उठा सकें; गली-मौहल्ले में बाबा-सत्संगकर्ताओं के कार्यक्रम ज्यादा से ज्यादा लगवाओ; दलित व अनधिकृत कालोनियों में अधिक से अधिक शराब की दुकाने खुलवा दो; दलित व पिछड़े समाज के बच्चों में नशा फैलाने के कार्यक्रम अधिक से अधिक चलाओ; इसी योजना के जमीनी धरातल को समझकर संघी मानसिकता की सरकारों ने झुग्गी-झोपड़ी कालोनियों में शराब के ठेके अधिक खुलवाए; नशे के दूसरे माध्यम भांग, गाँजा, अफीम इत्यादि नशे के समान की दुकानें भी इन्हीं कालोनियों में अधिक से अधिक लगवाई गई। आज दिल्ली में बसाई गई झुग्गी-झोपड़ियों का वास्तविक सर्वे किया जाये तो पता चलेगा कि इन कालेनियों में बसने वाले 95 प्रतिशत लोग दलित, अति पिछड़े व अल्पसंख्यक समाज के लोग हैं जिनके बच्चे अधिकांशतया (95 प्रतिशत) पूरी तरह से नशेड़ी बन चुके हैं। उनके ऐसे हालात देखकर उनका परिवार सामाजिक, आर्थिक व मानसिक रूप से हर समय तनाव में है जिसके कारण ऐसे परिवारों में समय से पहले बीमारियाँ भी अधिक लग जाती है, उनका हर तरह से दोहन होता रहता है। अब सवाल पैदा यह होता है कि अगर दलित समाज के ऐसे बच्चे आज के प्रतिस्पर्धा युग में प्रतिस्पर्धात्मक कैसे बन पाएंगे? दिल्ली की वर्तमान संघी सरकार की मानसिकता को देखकर ऐसा लगता है कि सरकार भी अपनी आंतरिक संरचना के आधार पर व दलित, पिछड़े व अल्पसंख्यक समाज को उनकी बीमारियों से छुटकारा नहीं दिलाना चाहती बल्कि उन्हें इसी में गहराई तक और धकेना चाहती है। जिसके कुछेक उदाहरण इस प्रकार हो सकते हैं, जैसे- अटल कैंटीन: अटल कैंटीन का ऊपर से दिखाया जाने वाला मकसद जनता को बताया जा रहा है कि हम गरीब जनता को पेट भरने के लिए 5 रुपए में भरपूर भोजन खिलाने की व्यवस्था कर रहे हैं। लेकिन गहराई से सोचने पर आम जनता को समझ में आ जाना चाहिए कि संघियों की यह व्यवस्था मुफ्त में खाना खिलाने की नहीं, बल्कि उन्हें अंदर से अपना मानसिक गुलाम बनाने की व्यवस्था है। अगर ऐसा नहीं होता तो सरकार उन्हें मुफ्त में खाना खिलाने के बजाय सशक्त बनाने की योजना बनाती लेकिन उससे सरकार को कम फायदा होता जबकि अटल कैंटिंन जैसी योजनाएँ चलाकर ऐसी झुग्गी-झोपड़ी कालोनियों के नशेड़ी बच्चों को मुफ्त में खाना दिलाकर उन्हें जिंदा रखना है ताकि वे मानसिक गुलाम होकर उनके पक्के वोटर बन सकें। साथ ही गली-गली, कालोनी-कालोनी घूमकर वे संघियों के हिन्दुत्व के प्रचारक भी बन सकें। जरूरत पड़ने पर बजरंग दल और गौरक्षक दल में जाकर उपद्रव भी मचा सकें, दंगाई बन सकें, और अपने जीवन को हिन्दुत्व की वैचारिकी के लिए समर्पित भी कर सकें। दिल्ली में झुग्गी-झोपड़ी कालोनियों की काफी संख्या है, झुग्गी-झोपड़ियों से बने अधिकांशतया क्षेत्र आरक्षित वर्ग के लिए सुरक्षित होते हैं, जहां से केवल अनुसूचित और अनुसूचित जनजाति के व्यक्ति ही चुनाव लड़ते हैं और चुनाव लड़ने का पूरा साजो-समान इन नशेड़ी ब्रिगेड के ही पास रहता है। देश की आम जनता इसकी गहराई को इस तथ्य से समझ सकती है कि सभी पुनर्वास कालोनियों में वहाँ के मतदाताओं की वोट लेने के लिए शराब को खुले तौर पर घर-घर में बांटा जाता है ताकि वहाँ का मतदाता अधिक शराब बांटने वाले को वोट दे सके। शराब बांटने वाले व्यक्ति भी आरक्षित वर्ग के लोग होते हैं लेकिन वे मानसिक रूप से मनुवादियों के गुलाम होते हैं, जो आरक्षित वर्गों के बीच जाकर मनुवादियों के औजार बनकर काम करते हैं और समाज के भोले-भाले कुछेक लोग वहाँ मिल भी जाते है तो उनका वोट मनुवादियों को दिलाने का काम करते हैं। दूसरी तरफ दिल्ली पॉश कालोनियों में जैसे- ग्रेटर कैलाश, साउथ एक्स व अन्य सम्भ्रांत कालोनियों के मतदाताओं को चुनाव के समय शराब का वितरण नहीं किया जाता यह अपने आप में एक इंगित करने वाला तथ्य है।

दिल्ली के बजट से एससी समाज नदारद: दिल्ली के बजट में अनुसूचित जाति के लोगों को उनकी संख्या बल के आधार पर उनके हिस्से में कुछ भी नहीं आया है। हाल ही में दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता ने विधान सभा में अपना बजट पेश किया, संघियों की आम आदत के अनुसार उन्होंने बड़ी-बड़ी बातें की; बड़ी-बड़ी ढिंगे मारी; अपनी विफलता के सारे दोष पुरानी सरकार पर मढ़ दिये; अपना और केंद्र सरकार में बैठे मोदी का पुरजोर गुणगान किया; बजट में मुख्यतया यह देखने को मिला कि रेखा गुप्ता की सरकार केंद्र सरकार की कठपुतली बनकर काम कर रही है। उनके पास दिल्ली की जनता के दुख दर्द को समझने के लिए न पर्याप्त इच्छा है और न ही वे दिल्ली की जनता का भला करने की मानसिकता रखती है। दिल्ली की विधान सभा में प्रस्तुत किया गया उनका बजट एक हवा-हवाई था, उन्होंने अपने बजट में कोई ठोस योजनाएँ दिल्ली के लिए नहीं रखी। केंद्र सरकार की मानसिकता के अनुरूप उनका जोर निर्माण कार्यों पर रहा ताकि निर्माण कार्यों के जरिये सरकारी धन का प्रवाह ठीक अपने चहेते ठेकेदारों की तरफ मोड़ा जा सके और उनसे वांछित कट भी लगातार बहकर वापिस आता रहे। दिल्ली ही नहीं देश में जहां-जहां संघी मानसिकता की सरकारें है वहाँ-वहाँ पर जनकल्याण और शिक्षा के कार्यक्रम नदारद है और निर्माण के कार्यों को प्राथमिकता दी जा रही है। दिल्ली में बैठी केंद्र सरकार भी इसी मानसिकता के अनुरूप काम करती हुई नजर आ रही है। 1930 से लेकर 2014 तक नई दिल्ली के लुटियन जोन में जो सरकारी इमारतें बनाई गई उन्हें अब सेंट्रल विस्टा के तहत ध्वस्त करके नई बिल्डिंग बनाने का कार्यक्रम चल रहा है ताकि संघी सरकार गर्व से लोगों को मूर्ख समझकर कह सके कि हमारी सरकार ने भारत में ऐसे आधुनिक भवनों का निर्माण किया है जिनके नाम भी मनुवादी संस्कृति के आधार पर रखे जा रहे हैं।

मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता का हवा-हवाई बजट: दिल्ली सरकार ने वित्तीय वर्ष 2025-26 के लिए एक लाख करोड़ से अधिक का बजट पेश किया है, जिसमें बुनियादी ढांचे, स्वास्थ्य, शिक्षा और महिला सशक्तिकरण आदि दिखावे के बिन्दु है। बजट में पेश किए गए आंकड़े इस प्रकार हैं-

बजट का आकार: कुल बजट एक लाख करोड़ से अधिक है, जो दिल्ली की तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था को दर्शाता है। यह आंकड़ा पूरी तरह से असत्य लगता है। इसकी पुष्टि तथ्यों के आधार पर होनी चाहिए।

शिक्षा: शिक्षा के लिए 19,148 करोड़ का बजट रखा गया है, जिसमें 8,777 नए स्मार्ट क्लासरूम और छात्रों के लिए लैपटॉप शामिल हैं। गरीब व अनुसूचित समाज से आने वाले बच्चों के लिए कोई विशेष योजना नहीं बनाई गयी है।

स्वास्थ्य: स्वास्थ्य क्षेत्र को 12,645 करोड़ आवंटित किए गए हैं, जिसमें 650 नए आयुष्मान केंद्र और नवजात शिशुओं के लिए अनमोल योजना शामिल है। परंतु पहले से मौजूद सरकारी अस्पतालों, सुदृढ़ करने, वहाँ पर पर्याप्त संख्या व कर्मचारियों की व्यवस्थाओं का कोई प्लान नहीं है।

परिवहन: परिवहन के लिए 8,374 करोड़ का प्रावधान, 2027 तक 7,500 बसों (5,800 इलेक्ट्रिक) का लक्ष्य। सड़कों में गड्ढे व सड़कों को धूल मुक्त करने की कोई बात नहीं है।

महिला सशक्तिकरण: महिलाओं के लिए मुफ्त बस यात्रा, लखपति बिटिया योजना, और 50,000 नए सीसीटीवी कैमरे। अच्छे स्कूलों व उनमें पर्याप्त योग्य शिक्षक कर्मचारी की बात नहीं है। 50 प्रतिशत शिक्षक व कर्मचारी ठेकेदारी प्रथा के तहत काम कर रहे हैं। स्थायी भर्ती की कोई योजना नहीं है।

बुनियादी ढांचा और अन्य: एमसीडी को 11,666 करोड़, सड़कों के लिए 1,000 करोड़, और जल बोर्ड के लिए 9,000 करोड़ का प्रावधान। भूजल 55 प्रतिशत तक दूषित हो चुका है। उसका न कोई जिक्र और ना कोई समाधान की योजना है।

आर्थिक वृद्धि: प्रति व्यक्ति आय 5.31 लाख होने का अनुमान। संघी हमेशा से ही हवा-हवाई बात करते रहे हैं, और जनता को भविष्य के सपने दिखाकर भ्रम में रखते रहे हैं।

पेश किया गया बजट सिर्फ हवा-हवाई है जो ब्राह्मण-बनिया के लिए ही आया है जिसमें बड़े-बड़े ठेके इन्हीं समुदायों के खाते में जाएँगे और दिल्ली की बहुजन जनता के हाथ कुछ नहीं आएगा। दिल्ली की संघी सरकार को सिर्फ एससी/एसटी/ओबीसी और अल्पसंख्यक का वोट चाहिए इनके लिए जन कल्याणकारी योजनाएँ बनाना संघी मानसिकता के खाते में हैं ही नहीं।

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01 जनवरी : मूलनिवासी शौर्य दिवस (भीमा कोरेगांव-पुणे) (1818)

01 जनवरी : राष्ट्रपिता ज्योतिबा फुले और राष्ट्रमाता सावित्री बाई फुले द्वारा प्रथम भारतीय पाठशाला प्रारंभ (1848)

01 जनवरी : बाबा साहेब अम्बेडकर द्वारा ‘द अनटचैबिल्स’ नामक पुस्तक का प्रकाशन (1948)

01 जनवरी : मण्डल आयोग का गठन (1979)

02 जनवरी : गुरु कबीर स्मृति दिवस (1476)

03 जनवरी : राष्ट्रमाता सावित्रीबाई फुले जयंती दिवस (1831)

06 जनवरी : बाबू हरदास एल. एन. जयंती (1904)

08 जनवरी : विश्व बौद्ध ध्वज दिवस (1891)

09 जनवरी : प्रथम मुस्लिम महिला शिक्षिका फातिमा शेख जन्म दिवस (1831)

12 जनवरी : राजमाता जिजाऊ जयंती दिवस (1598)

12 जनवरी : बाबू हरदास एल. एन. स्मृति दिवस (1939)

12 जनवरी : उस्मानिया यूनिवर्सिटी, हैदराबाद ने बाबा साहेब को डी.लिट. की उपाधि प्रदान की (1953)

12 जनवरी : चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु परिनिर्वाण दिवस (1972)

13 जनवरी : तिलका मांझी शाहदत दिवस (1785)

14 जनवरी : सर मंगूराम मंगोलिया जन्म दिवस (1886)

15 जनवरी : बहन कुमारी मायावती जयंती दिवस (1956)

18 जनवरी : अब्दुल कय्यूम अंसारी स्मृति दिवस (1973)

18 जनवरी : बाबासाहेब द्वारा राणाडे, गांधी व जिन्ना पर प्रवचन (1943)

23 जनवरी : अहमदाबाद में डॉ. अम्बेडकर ने शांतिपूर्ण मार्च निकालकर सभा को संबोधित किया (1938)

24 जनवरी : राजर्षि छत्रपति साहूजी महाराज द्वारा प्राथमिक शिक्षा को मुफ्त व अनिवार्य करने का आदेश (1917)

24 जनवरी : कर्पूरी ठाकुर जयंती दिवस (1924)

26 जनवरी : गणतंत्र दिवस (1950)

27 जनवरी : डॉ. अम्बेडकर का साउथ बरो कमीशन के सामने साक्षात्कार (1919)

29 जनवरी : महाप्राण जोगेन्द्रनाथ मण्डल जयंती दिवस (1904)

30 जनवरी : सत्यनारायण गोयनका का जन्मदिवस (1924)

31 जनवरी : डॉ. अम्बेडकर द्वारा आंदोलन के मुखपत्र ‘‘मूकनायक’’ का प्रारम्भ (1920)

2024-01-13 16:38:05