2024-12-13 12:09:05
इलाहाबाद हाईकोर्ट के जज शेखर कुमार यादव ने विश्व हिन्दू परिषद के कार्यक्रम में जाकर और वहाँ दिये भाषण में बोला कि कानून बहुमत के अनुसार हो, इस बात पर भाजपा को छोड़कर देश की अन्य सभी राजनीतिक पार्टियाँ हमलावर हो रही है। अखबारों और सोशल मीडिया की छपी रिपोर्टों के आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को हाईकोट से जस्टिस शेखर के बयान पर जानकारी मांगी है। देश की कई राजनीतिक पार्टियों ने जस्टिस शेखर के ऊपर महाभियोग चलाने की तैयारी शुरु कर दी है। देश में हाईकोर्ट के न्यायाधीश के खिलाफ महाभियोग लाना मुमकिन है, संविधान के अनुच्छेद 124 (4) और अनुच्छेद 217 के तहत न्यायाधीशों को उनके पद से हटाने की प्रक्रिया है। वैसे तो यह प्रक्रिया थोड़ी मुश्किल है लेकिन न्यायाधीश के गलत व्यवहार जैसे आरोप लगे तो महाभियोग जैसा कदम उठाया जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने न्यायधीशों के लिए आचरण और नैतिकता से जुड़ी गाइड लाईन जारी की हुई है जिसे ‘ज्यूड़ीशियल एथिक्स’ कहते हैं। ज्यूड़ीशियल एथिक्स का सामान्य सा अर्थ है कि संबंधित न्यायधीश का संविधान सम्मत और मर्यादा पूर्ण आचरण, और वह सभी तरह से सम्यक हो। हमारे देश की आंतरिक संरचना में हिंदुत्व का जहर यहाँ के मनुष्यों की मानसिकता को विकृत किये हुए हैं। श्रेष्ठ और संवैधानिक पदों पर बैठे हुए व्यक्ति भी अपनी जिम्मेदारियाँ भूलकर हिंदुत्व की मानसिकता के भाव में बह रहे हैं। यहाँ पर शेखर कुमार यादव वैसे तो यादव जाति से संबंधित होने के कारण पिछड़े जातीय घटक से आते हैं, मगर उनका बयान और आचरण गहराई तक उनमें हिंदुत्व से अभिशप्त है। पिछड़ी जातियों में यादव समुदाय एक सशक्त और बहुसंख्यक है मगर जबसे इन लोगों की आंतरिक संरचना और मानसिकता में हिंदुत्व की धारणा ने प्रवेश किया है तबसे इस समुदाय के कुछेक लोग अपने आपको पिछड़ी जातियों में श्रेष्ठ मानकर ब्राह्मणी संस्कृति का आचरण करते दिख रहे हैं। इनकी मानसिकता में विकृति का मुख्य कारण इनके पास कृषि योग भूमि का मालिकाना हक होना है। जो मानसिक रूप से ऐसे लोगों को सामंतवादी विचारधारा का बना रहा है। भारत की बहुलतावादी सामाजिक स्थिति को देखते हुए यहाँ पर ऐसे मानसिकता वाले न्यायधीशों की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए। ब्रिटिश शासन काल में प्रीवि काउंसिल की कोलकाता की पीठ ने ब्राह्मणी संस्कृति का न्यायधीश नियुक्त करने के लिए माना किया था। उनके इस फैसले के पीछे का तर्क यहीं था कि कोई व्यक्ति ब्राह्मणी संस्कृति से संक्रमित है तो वह न्यायधीश नहीं बनाना चाहिए। चूंकि ऐसी मानसिकता के न्यायधीश जाति, वर्ण, धर्म देखकर फैसले करते हैं। न्यायधीश शेखर की बयानबाजी हिंदुत्व की मानसिकता को रास आ रही है चूंकि जिस कार्यक्रम में न्यायधीश शेखर को भाषण देने के लिए बुलाया गया था वह कार्यक्रम विश्व हिन्दू परिषद का कार्यक्रम था, जो संघियों का ही एक घटक है।
महाभियोग की प्रक्रिया: महाभियोग का प्रस्ताव संसद के किसी एक सदन में पेश किया जाता है और इस पर लोकसभा में कम से कम 100 और राज्य सभा में कम से कम 50 सांसदों के हस्ताक्षर होने चाहिए। प्रस्ताव पेश होने के बाद, 3 सदस्य समिति बनती है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट का एक जज भी होता है। अगर यह समिति आरोपों को सही पाये तो प्रस्ताव संसद के दोनों सदनों में पेश किया जाता है। प्रस्ताव का दो तिहाई बहुमत से पास होना आवश्यक है। इसके बाद राष्ट्रपति ऐसे न्यायधीश को पद से हटाने का आदेश दे सकते हैं।
न्यायधीशों द्वारा अपने निजी मौकों पर बोलने को लेकर कुछेक अलग-अलग दिशानिर्देश है, परंतु कोई आचार संहिता नहीं है। लेकिन हाईकोट या सुप्रीम कोर्ट में बैठे न्यायधीशों को उनके द्वारा बोले गए हर शब्द का मतलब पता होता है। इसलिए उनसे बिना किसी गाइड लाइन के ही उम्मीद की जाती है कि वे सार्वजनिक जीवन में, भले ही किसी निजी मौके पर जमा भीड़ के बीच हो, सोच-समझकर बोलें। इसके साथ ही अदालत में चल रहे मामलों पर भी न्यायधीश बाहर जाकर टिप्पणी नहीं कर सकते हैं और न अपना कोई बयान दे सकते, जिससे अदालत का कोई फैसला प्रभावित हो। संवेदनशील मामलों पर भी न्यायधीशों का बोलना प्रतिबंधित है, जबतक बात अदालत के भीतर न हो रही हो।
न्यायधीश यादव पर सुप्रीम कोर्ट क्या कर सकता है?: इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के हवाले से बताया गया है कि सुप्रीम कोर्ट ने इसका संज्ञान लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट से ब्यौरा माँगा है। इस पूरी जानकारी को समझने के लिए सुप्रीम कोर्ट अपने कुछेक जजों की कमेटी बना सकता है और उसके बाद रिपोर्ट संसद को भेज दी जाती है। सुप्रीम कोर्ट ऐसे मामलों पर खुद कोई सीधा एक्शन नहीं ले सकता। महाभियोग पास हो जाने के बाद राष्ट्रपति संबंधित न्यायधीश को पद से हटाने का आदेश जारी करेंगे, इसके बाद न्यायधीश सरकारी सेवाएं नहीं ले सकते।
न्यायधीशों को अभिव्यक्ति की आजादी नहीं है: न्यायधीशों को अभिव्यक्ति की आजादी अन्य सामान्य नागरिकों की तरह ही है लेकिन पद की जिम्मेदारियाँ और गरिमा उनपर कुछ बंदिशे लगाती है। अनुच्छेद 19 (1) के तहत अभिव्यक्ति की आजादी सभी के लिए है, वहीं अनुच्छेद 19 (2) इस पर सही प्रतिबंध लगाने की बात करता हैं। इसका मतलब है कि जब एक बार कोई मामला कोर्ट तक पहुँच जाये तो उसपर सार्वजनिक टिप्पणियाँ नहीं की जा सकती।
महाभियोग प्रस्ताव पहले कब-कब लाया गया: 90 के दशक की शुरूआत में सुप्रीम कोर्ट के न्यायधीश वी.रामास्वामी के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों को लेकर महाभियोग का प्रस्ताव लाया गया था। लेकिन यह लोक सभा में पास नहीं हो सका।
कोलकत्ता हाईकोर्ट के जज सोमित्र सैन के खिलाफ पैसों को लेकर महाभियोग का यह प्रस्ताव आया लेकिन इन्होंने पहले ही इस्तीफा दे दिया था।
वर्ष 2018 में विपक्षी राजनैतिक दलों ने दुर्व्यवहार का आरोप लगते हुए तत्कालीन मुख्य न्यायधीश दीपक मिश्रा पर महाभियोग का प्रस्ताव लगाना चाहा लेकिन तत्कालीन राज्य सभापति ने उसे मंजूर नहीं किया।
इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायधीश शेखर कुमार यादव के बयान को बहुसंख्यकवादी और मुस्लिम विरोधी देखा जा रहा है क्योंकि उनका यह बयान को संविधान पर हमला और न्यायिक मर्यादा का उल्लंघन है। उनका बयान मुस्लिम समुदाय के खिलाफ है तथा उनकी धार्मिक प्रथाओं पर सवाल उठाएँ हैं और उन्होंने कुछेक सदस्यों को राष्ट्र प्रगति के लिए खतरा भी बताया है। जो एक वर्तमान न्यायधीश स्तर के अनुरूप नहीं है। उनके ये बयान न्यायपालिका की स्वतंत्रता और निष्पक्षता पर सवाल खड़े करता है। उनकी इस बयानबाजी ने न्यायपालिका को संदिग्घ बना दिया है। देश और समाज की वास्तविकता के आधार पर ऐसी मानसिकता वाले जजों को न्यायपालिका का हिस्सा नहीं होना चाहिए। भारत वर्ष एक बड़ा देश है जहाँ अच्छे और बुरे लोगों की कमी नहीं है। देश की न्यायपालिका को बुरे लोगों से संरक्षण देना चाहिए। देश में बुरी मानसिकता के लोग अल्पमत में है परंतु फिर भी वे लोग सरकारी तंत्र की सहायता से सरकार के अहम पदों पर स्थापित है। ये अपने आकाओं की मानसिकता के आधार पर कार्य करते हैं इस तरह की प्रवृति पिछले करीब 12 वर्षों के मोदी-संघी राज में अधिक बढ़ी है जो देश की एकता और अखंडता के लिए घातक है।
वर्तमान समय के न्यायधीशों ने जनता का विश्वास कम किया है। न्यायपालिका की कुछेक टिप्पणियों को अक्षम्य और अविवेकपूर्ण करार दिया है जो उन्हें न केवल उनके पद को शर्मसार करती है बल्कि संविधान के अनुच्छेद 12, 21, 25 और 26 सहित प्रस्तावना का उल्लंघन भी करती है, जो धर्मनिरपेक्षता, समानता और न्याय की गारंटी देती है।
न्यायधीश शेखर कुमार यादव के बयान को लेकर सामाजिक और राजनैतिक नेताओं ने अपनी अलग-अलग टिप्पणियाँ की है-
पोलित ब्यूरो सदस्य वृंदा करात ने भी न्यायमूर्ति यादव की टिप्पणियों की निंदा की और उनके भाषण को घृणास्पद तथा उनकी संवैधानिक शपथ के साथ विश्वासघात बताया। मुख्य न्यायधीश को लिखे पत्र में उन्होंने कहा कि एक सिटिंग न्यायधीश द्वारा दिये गए ऐसे बयान भारत के धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक मूल्यों का अपमान करते है। अल्पसंख्यक समुदाय का कोई भी वादी ऐसे न्यायधीश और न्यायालय से निष्पक्ष व्यवहार की उम्मीद कैसे कर सकता है। उन्होंने जोर देकर कहा कि बेंच में उनकी मौजूदगी न्यायपालिका और संविधान के प्रति उनकी प्रतिबधता का अपमान है। करात ने न्यायधीश यादव के बयान को धर्मनिरपेक्ष देश की और लोकतांत्रिक भावना का अपमान भी बताया है। न्याय की अदालतों में ऐसे लोगों की कोई जगह नहीं होनी चाहिए।
अखिल भारतीय अधिवक्ता संघ ने भी इस विरोध में शामिल होते हुए न्यायधीश यादव की टिप्पणी की निंदा की और इसे धार्मिक बहुसंख्यकवाद का समर्थन बताया। साथ ही विकास रंजन भट्टाचार्य और पी.वी. सुरेन्द्रनाथ ने इस भाषण को हिंदुत्व राष्ट्र से जुड़ी विचारधारा वाला बताया।
वरिष्ठ अधिवक्ता इंद्रा जयसिंह ने न्यायमूर्ति यादव को राजनैतिक रूप से प्रेरित वीएचपी कार्यक्रम में भाग लेने को न्यायिक स्वतंत्रता का शर्मनाक उल्लंघन बताया। वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिबल ने न्यायधीश यादव के खिलाफ महाभियोग चलाने की माँग की। सिबल ने कहा कि न्यायधीश के बयान उनकी न्यायिक नैतिकता और स्वतंत्रता का गंभीर उल्लंघन है। उन्होंने चेताया कि कारवाई में विफलता उनके विभाजनकारी विचारों के लिए मौन समर्थन का संकेत देगी? सिबल ने जोर देकर कहा कि न्यायपालिका को निष्पक्ष और सांप्रदायिक विचारधाराओं के प्रभाव से मुक्त रहना चाहिए। उन्होंने राजनीतिक नेताओं से न्यायमूर्ति यादव को जवाबदेह ठहराने के लिए एकजुट होने का आग्रह किया।
सिबल ने आगे कहा कि मैं आगे चाहूँगा कि जो सत्ता पक्ष के लोग है वे हमारे साथ आकर जुड़े और हम मिलकर इस जज के खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया शुरू करें। हमारा संविधान कहता है कि न्यायपालिका स्वतंत्र होनी चाहिए। मुझे पूरा विश्वास है कि प्रधानमंत्री, ग्रहमंत्री और सत्ता पक्ष के जितने भी सांसद है वे इस तरह के अक्षम्य अपराध के लिए हमारे साथ होंगे, अगर ऐसा नहीं होता है तो हमको और देश के सभी नागरिकों को लगेगा कि सत्ता पक्ष जज के साथ है। न्यायमूर्ति यादव का भाषण यूसीसी पर तटस्थ चर्चा से कहीं अधिक सांप्रदायिक पूर्वाग्रह से भरा हुआ था। उन्होंने खुले तौर पर इस्लामिक रीति-रिवाजों की आलोचना की, मुसलमानों को कट-मुल्ला कहा। उन्होंने यह भी कहा कि उनकी मान्यताएं राष्ट्रीय प्रगति में बाधाएँ डालती है। इस तरह की टिप्पणियों से न केवल एक विशिष्ट समुदाय का अपमान हुआ है, बल्कि संविधान के धर्मनिरपेक्ष और बहुलतावादी ढांचे के साथ भी विश्वासघात है। इस तरह न्यायमूर्ति यादव के बयान की व्यापक आलोचना कहती है कि तत्काल जवाबदेही की आवश्यकता है। उनका व्यवहार न्यायपालिका की निष्पक्षता और संवैधानिक मूल्यों की आस्था को संकट में डाल चुका है।
सपा नेता रामगोपाल यादव ने न्यायमूर्ति शेखर कुमार यादव की विवादास्पद टिप्पणी की आलोचना करते हुए राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ का जिक्र किया, उन्होंने आरएसएस पर न्यायिक परिणामों को प्रभावित करने के लिए सिस्टम में हेर-फेर करने का आरोप भी लगाया। उन्होंने कहा कि आरएसएस हमेशा से ऐसा करता रहा है; वे सर्वोच्च न्यायालय तक पहुँचने के लिए कुछ भी कर सकते हैं।
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी), तृणमूल कांग्रेस, और आॅल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहाद-उल-मुस्लिमीन ने न्यायमूर्ति शेखर कुमार यादव की टिप्पणियों की कड़ी निंदा की और इसे एक सिटिंग जज के लिए विभाजनकारी तथा अनुचित बताया।
एआईएमआईएम नेता असदुद्दीन औवेसी ने विश्व हिन्दू परिषद द्वारा आयोजित कार्यक्रम में न्यायमूर्ति यादव की भागीदारी की तीखी आलोचना की। औवेसी ने बताया कि यह संगठन, जो भारतीय जनता पार्टी के वैचारिक आधार के रूप में जाना जाता है, कई बार नफरत और हिंसा से जुड़े होने के कारण प्रतिबंधित किया जा चुका है। औवेसी ने सरदार बल्लभभाई पटेल द्वारा आरएसएस पर लगाए गए प्रतिबंध का हवाला देते हुए इसे घृणा और हिंसा की शक्ति कहा और न्यायमूर्ति यादव के वीएचपी से जुड़ाव को चिंता का विषय बताया।
औवेसी ने सोशल मीडिया प्लेटफार्म एक्स पर लिखा यह दुर्भाग्य है कि एक उच्च न्यायालय के न्यायाधीश ने ऐसे संगठन के कार्यक्रम में भाग लिया। इस भाषण का आसानी से खंडन किया जा सकता है, लेकिन माननीय न्यायाधीश को यह याद दिलाना ज्यादा महत्वपूर्ण है कि भारत का संविधान न्यायिक स्वतंत्रता और निष्पक्षता की अपेक्षा करता है। उनके बयान न्यायमूर्ति यादव के सांप्रदायिक विचारधाराओं के साथ जुड़ाव पर बढ़ती बेचैनी को दर्शाया गया है, जिसमें कहा गया है कि उनके कार्यों ने न्यायपालिका की तटस्थ मध्यस्थ के रूप में भूमिका को कमजोर कर दिया है।
वर्तमान समय में देश के ईमानदार, न्याय में विश्वास रखने वाले, सांप्रदायिक सद्भाव को समाज में बढ़ाने वाले देश प्रेमी लोग दुविधा में हैं कि देश में बढ़ रही सांप्रदायिक शक्तियों से कैसे निपटा जाये? तथा ऐसे विभाजनकारी तत्वों से देश को कैसे संगठित और सुरक्षित किया जाए? देश की जनता अगर ऐसे विभाजनकारी तत्वों को अपनी वोट की ताकत से मजबूत करेंगी, तो फिर देश की एकता और अखंडता मजबूत नहीं हो पाएगी।
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