2025-04-04 13:46:05
यह सर्वविदित है कि भारत एक जाति प्रधान देश है, पूरे देश का समाज 6743 जातीय टुकड़ों में बंटा हुआ है और ये सभी जातीय टुकड़े ब्राह्मणवाद के चार वर्णों में वर्गीकृत हैं। इसका मलतब है कि भारत की सामाजिक व्यवस्था वर्णवाद और जातिवाद पर आधारित है। सभी जातीय घटकों में क्रमिक ऊँच-नीच की व्यवस्था है। एक जातीय घटक मनुवादी आधार पर, दूसरे जातीय घटक से या तो ऊँचा है या नीचा है। इन सभी जातीय घटकों में परस्पर मेल-मिलाप और भाईचारा नहीं है। हर जातीय घटक अपने बच्चों की शादी-विवाह अपने ही जातीय घटकों में करता है और दूसरे जातीय घटकों के साथ बेटी-रोटी का संबंध नहीं रखता है। इस तरह की सामाजिक व्यवस्था भारत में ही पाई जाती है, अन्य देशों में नहीं।
सामाजिक व्यवस्था में शूद्र वर्ण: ब्राह्मणी संस्कृति में शूद्र वर्ग को दो वर्गों में विभक्त किया गया-सछूत और अछूत। शूद्र वर्ग के सछूत वर्ग में समाज की वे सभी जातीय घटक है जो अपनी जीविका के लिए समाज की जरूरत के हिसाब से तकनीकी कार्यों से संबंधित है। जैसे जाट, गुर्जर, यादव, पटेल, कुशवाहा, मौर्य, नाई, कुम्हार, गडरिये, बढ़ई, लौहार, तेली, तमोली, कुर्मी आदि अनेक इनके समक्षक जातीय घटक सछूत वर्ग में रखे गए और दूसरे शूद्र वर्ग के लोगों को अछूत कहा गया है। अछूत वर्ग के जातीय घटकों में वे सभी जातीय घटक है। जिनको संविधान के अनुसार अनुसूचित जाति में वगीर्कृत किया गया है, पूरे भारत में इनकी संख्या 1231 है, इतनी बड़ी संख्या का कारण यह है कि एक ही जाति उसी राज्य में या अन्य राज्यों में कई-कई नामों से जानी जाती है। उदाहरण के तौर पर चमार नाम की जाति पूरे देश में 150 उपजातियों में विभाजित है। अनुसूचित जाति का गहराई तक अध्ययन करने पर पता चलता है कि मनुष्य की सभ्यता के शुरूआती दौर में भारत में पाये जाने वाले करीब 36 कबीलों से 1231 जातियों में पूरा अनुसूचित वर्ग (एससी) में विभाजित है।
वर्तमान में अनुसूचित जाति के जातीय घटक अपने आपको परस्परता के आधार पर एक-दूसरे जातीय घटक से अपनी झूठी श्रेष्ठता के भाव से अलगाववाद रखते हैं। उनमें आपस में कोई सौहार्दपूर्ण परस्परता का भाव नहीं है। इस अकेले कारण की वजह से पूरे एससी वर्ग की राजनीतिक शक्ति टुकड़ों में बंटकर कमजोर हो गई है। इसके लिए ब्राह्मणी व्यवस्था तो जिम्मेदार है, मगर इसके साथ-साथ एससी वर्ग भी कम जिम्मेदार नहीं है। चूंकि उनकी मानसिकता में गहराई तक ब्राह्मणवाद का समावेश है और वे ब्राह्मणवाद के आधार पर ही समाज में अपना आचरण करते हैं।
ग्रामीण क्षेत्रों में जातिवाद का जहर अधिक: देश की अधिसंख्यक आबादी गाँवों में बसती है। 70 के दशक तक करीब 80 प्रतिशत आबादी गाँवों में बसती थी और बची हुई 20 प्रतिशत आबादी शहरों में थी। लेकिन 70 के दशक तक पहुँचते-पहुँचते भारतीय समाज शहरों की तरफ पलायन करके बसने लगा। पलायन करने का मुख्य कारण था रोजी-रोटी के अवसर गाँव के सापेक्ष शहर में अच्छे थे। ऐसे हालात के चलते शहरों का भी विकास हुआ और शहरों में रहने वालों की जनसंख्या भी बढ़ी। जिसका आबादी के हिसाब से आज का सामाजिक ढाँचा बदला हुआ है, अब करीब 65-70 प्रतिशत लोग गाँवों में बसते हैं और 30-35 प्रतिशत लोग शहरों में बसते हैं। शहरों की तरफ गाँवों के लोगों का पलायन करने का दूसरा कारण यह था कि एससी वर्ग की अधिकतर जातियों के पास खेती योग्य जमीन व अन्य जरूरी संसाधन नगण्य थे। इसलिए वे अपने संसाधनों में वृद्धि करने की इच्छा से शहरों की तरफ आए। शहरों में बसने का सबसे अहम कारण बच्चों को अच्छी शिक्षा मुहैया कराने का भी था। ग्रामीण परिवेश में 60 के दशक तक स्कूली शिक्षा के संस्थान कम संख्या में थे। गाँवों से इन शिक्षण संस्थानों की दूरी 3-4 किमी से अधिक थी। शिक्षण संस्थानों की कमी के कारण गाँव में रहने वाले लोगों ने अपने बच्चों को जब पढ़ाना चाहा तो शिक्षण संस्थाओं की दूरी के कारण उन्होंने अपनी लड़कियों को स्कूलों में भेजना उचित नहीं समझा। लड़कियों की अपेक्षा लड़कों को प्राथमिकता के आधार पर शिक्षण संस्थानों में भर्ती कराया और इसी के कारण आजादी के बाद की पहली पीढ़ी में लड़कियों के सापेक्ष लड़के अधिक संख्या में शिक्षित हो पाये। जिसके फलस्वरूप उन्होंने सरकार में नौकरियां भी पाई और नौकरियों के बल पर वे अपने अन्य ग्रामीण लोगों के सापेक्ष अधिक सम्पन्न भी हो पाये।
वर्तमान सामाजिक व्यवस्था में जातिवाद का जहर अब सिर्फ समाज में ही नहीं रह गया है वह इससे कहीं आगे बढ़कर गाँवों के नामकरण, शहरों के नामकरण, गली व बस्तियों के नामकरण व निजी और सार्वजनिक वाहनों पर भी जाति सूचक शब्दों से जाहिर किया जा रहा है। यह हाल ही में देखने में आया है कि गाँव के नाम के साथ उस गाँव में रहने वाले अधिसंख्यक, दबंग जाति का नाम भी गाँव के नाम के साथ जोड़ा जा रहा है। यह चलन अब पूरे उत्तर भारत के हिस्से में फैलता जा रहा है। भारतीय ग्रामीण व्यवस्था के मुताबिक गाँव में सभी जातिय घटकों के लोग बसते हैं। वहाँ पर कुछ जातीय घटक संख्याबल में कम हो सकते हैं और कुछेक जातीय घटक संख्याबल में अधिक हो सकते हैं लेकिन किसी भी जातीय घटक का नाम गाँव के नाम के साथ पहले कभी भी नहीं जोड़ा जाता था। इस प्रकार का चलन उन आतताही मनुवादी व जातिवादी प्रदेशों में अधिक देखने को मिल रहा है जहाँ पर मनुवादी संघी मानसिकता वाली डबल इंजन की सरकारे हैं। हमने पश्चिमी उत्तर प्रदेश, दिल्ली, हरियाणा, मध्य प्रदेश में यह चलन पाया है कि गाँव के नाम जैसे-भगौट-गुर्जर, भैड़ापुर-गुर्जर, बंथला-जाट, इत्यादि नाम पाये हैं। दूसरी तरफ अगर हम संघी मानसिकता की डबल इंजन की सरकारों का आंकलन करे तो पाते हैं कि जहाँ-जहाँ देश में इनकी सरकारें हैं वहाँ-वहाँ पर जनकल्याण से जुड़े कार्यों पर जोर कम है, उनका सारा जोर सिर्फ शहरों, गलियों, सड़कों के नाम बदलने पर हैं। जैसे दिल्ली में मोहम्मद पुर का नाम माधवपुर, नजफगढ़ का नाम नाहरगढ़ और मुस्तफाबाद का नाम शिवपुरी रखने पर विचार हो रहा है।
संघी-मनुवादियों की जहरीली मानसिकता: गाँव या कॉलोनी के नाम के साथ जाति जोड़ना, शहरों के नाम बदलना संघियों की जहरीली मानसिकता को प्रदर्शित करता है। ब्राह्मणवादी-संघी मानसिकता के लोगों के सत्ता में आने से पहले पूरे देश में ऐसा जातिवादी, सांप्रदायिक प्रदर्शन नहीं हो रहा था। पूर्ववर्ती सरकारो के कार्यक्रमों से देश में जातिवाद की भावना भी कमजोर पड़ी थी लेकिन 2014 में मोदी-संघी सत्ता आने के बाद देश में जातिवाद की मानसिकता को शत-प्रतिशत बढ़ावा मिला है। मोदी व मोदी जैसी मानसिकता वाले सत्ता में बैठे संघी लोग खुलेआम कहते फिरते हैं कि हम देश के गली-मौहल्लों व सड़कों का हिन्दूकरण कर रहे हैं और अंतत: हमें इस देश में हिन्दू राष्ट्र स्थापित करना है। हिन्दू राष्ट्र के द्वारा इस देश में शांति व सद्भाव स्थापित नहीं किया जा सकता क्योंकि यह देश सिर्फ कथाकथित हिन्दू कहलाने वाले लोगों से मिलकर नहीं बना है। बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर ने देश की जनता को हिन्दू राष्ट्र बनने को लेकर सावधान किया था कि ‘अगर भारत हिंदू राष्ट्र बन जाता है तो बेशक इस देश के लिए एक भारी खतरा उत्पन्न हो जाएगा। हिंदू कुछ भी कहें, पर हिंदुत्व स्वतंत्रता, बराबरी और भाईचारे के लिए एक खतरा है। हिंदू राज को हर कीमत पर रोका जाना चाहिए।’ सभी देशवासियों से आग्रह है कि बाबा साहेब द्वारा कहे गये इन शब्दों को आत्मसात करें और अपने आचरण में ढालें। इस देश की संरचना में सभी धर्मो, संप्रदायों, कबीलों इत्यादि का समावेश है इसलिए भारत के संविधान की प्रस्तावना भी ‘हम भारत के लोग.....’ से शुरू होती है, किसी कथित देवी-देवता से नहीं। अगर देश के कुछेक लोग सत्ता में बैठे होने के कारण किसी एक जाति या धर्म की बात करते हैं तो उनका ऐसा कृत संविधान विरोधी है। इसलिए वर्तमान में सत्ताबल जो गाँवों, शहरों व सड़कों के नाम बदलने की परंपरा मनुवादियों ने निकली है वह देश की एकता और अखंडता के लिए खतरा पैदा करेगी। सत्ता बल से कुछेक संवैधानिक निकायों को अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करना असंवैधानिक है। हमारे देश में ब्रिटेन आधारित संसदीय प्रणाली है जो यह इंगित और निर्देशित करती है कि सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ही शासन व्यवस्था के लिए अनिवार्य है और दोनों का ही सशक्त होना एक स्वस्थ प्रजातंत्र के लिए आवश्यक है। वर्तमान में मोदी-संघी शासन इसके विरुद्ध कार्य कर रहा है, जिसके लिए उसका साथ देने वाले एनडीए के घटक दल भी जिम्मेदार है। बिहार के नीतीश कुमार व आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने मोदी को बे लगाम घोड़ा बना दिया है।
देश का अभिन्न अंग है अल्पसंख्यक समुदाय: देश की जनसांख्यिकी के मुताबिक देश में करीब 20-22 प्रतिशत (मुस्लिम, ईसाई, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी) आदि है और वे देश के कई शहरों-कस्बों व मौहल्ले आदि में बहुसंख्यक भी हैं। लेकिन उन सभी जगहों पर बहु संख्या के आधार पर उन धर्मों व संप्रदायों का नाम उन्होंने नहीं जोड़ा हैं। उदाहरण के तौर पर पश्चिमी उत्तर प्रदेश में रटौल एक अच्छा बड़ा कस्बा है जहाँ पर मुस्लिम अधिक संख्यक है परंतु वहाँ पर रटौल गाँव के नाम के साथ मुस्लिम नहीं लिखा गया है। यह दर्शाता है कि गाँव-शहर या कस्बों के नाम के साथ जाति, धर्म या संप्रदाय का नाम जोड़ना असंवैधानिक है और अगर संघी मानसिकता के लोग ऐसा करते हैं तो वे देश में जातिवाद को बढ़ावा देने का काम कर रहे हैं। जो अब देश के अलग-अलग हिस्सों में नजर आने लगा है। संघी-मनुवादियों से देश की एकता और अखंडता को खतरा बढ़ गया है।
जातिसूचक शब्दों का संवैधानिक उपचार: इसका उपचार देश की जनता बहुत आसानी से संविधान के दायरे में रहकर कर सकती है, जैसे अगर किसी गाँव, शहर या कालोनी के नाम के साथ किसी जाति या धर्म-संप्रदाय का नाम जोड़ा जा रहा है तो वहाँ पर बसने वाले अन्य जातीय घटकों के लोग यह संकल्प करें कि वहाँ से अगर किसी भी पद के लिए प्रजातांत्रिक तरीके से चुनाव होता है तो कम संख्या में बसने वाले समुदायों व जातियों के लोग इकट्ठे होकर सामूहिक रूप से उस व्यक्ति या उस व्यक्ति की पार्टी को वोट न देने का फैसला करें। अपने आसपास के सभी क्षेत्रों में सौहार्दपूर्ण वातावरण उत्पन्न करने के लिए ऐसे किसी भी व्यक्ति को वोट न देने का समर्थन करें। जो जाति, धर्म और संप्रदाय का नाम गाँव, कस्बों के साथ जोड़ने का समर्थन करता है। गाँव, कस्बों, शहरों और सड़कों के नाम बदलने की बीमारी संघी मनुवादी मानसिकता के आधार पर समाज के साथ एक गहरा षड्यंत्र है और ऐसे षड्यंत्र को कामयाब न होने देने के लिए सभी को सामूहिक रूप से इकट्ठा होकर जातिवाद, संप्रदायवाद, धार्मिकवाद पर कठोर प्रहार करना चाहिए और इसके लिए देश के हर जागरूक नागरिक को संकल्पित होकर कार्य भी करना पड़ेगा। आप सभी की जागरूकता और एकता ही मनुवादी संघियों की जातिवादी जहरीली मानसिकता को कमजोर कर सकती है।
(जागो और एक रहो, संघियों के जाल में न फंसों)
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