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भारत का दलित, वंचित व शोषित समाज मुख्यधारा से हमेशा बाहर रहा है, इसलिए वह सदियों से लुटता, पिटता और प्रताड़ित होता आ रहा है। ऐतिहासिक सत्य यह भी है कि इतने बड़े समाज के हिस्से को सभी मानवीय अधिकारों से भी वंचित रखा गया था। जिसके कारण इस पूरे समाज को नैतिक और आत्मबल को सार्थक रूप में प्रदर्शित करने का मौका ही नहीं मिला। इस समाज के लोगों को इस हद तक प्रताड़ित किया गया कि वह यह भी समझने में विफल रहे थे कि हम मनुष्य हैं या जानवर। इस प्रताड़ित समाज की पीड़ा को समझकर समाज के अनेकों महापुरुषों ने यथासंभव संघर्ष भी किया और उन्हें मानवीयता के आधार पर अधिकार दिलाने के लिए प्रयास भी किये, परंतु ऐसे सभी प्रयास ब्राह्मणवाद के वर्चस्व के कारण विफल रहे। बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर ने आजादी से पहले यह महसूस कर लिया था कि देश में वंचित और शोषित समाज की एक राजनीतिक पार्टी भी होनी चाहिए। डॉ. अम्बेडकर ने दलितों, श्रमिकों और वंचित वर्गों के राजनीतिक अधिकारों की रक्षा के लिए मुख्य रूप से तीन राजनीतिक दलों की स्थापना की थी। स्वतंत्र लेबर पार्टी की स्थापना बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर ने अगस्त 1936 में की। यह पार्टी श्रमिकों और दलितों के मुद्दों को उठाने के लिए बनाई गई थी; आॅल इंडिया शेड्यूल्ड कास्ट्स फेडरेशन की स्थापना बाबा साहेब ने 1942 में की। यह पार्टी विशेष रूप से दलित समुदाय के अधिकारों के लिए गठित एक राजनीतिक दल था; रिपब्लिकन पार्टी आॅफ इंडिया की स्थापना बाबा साहेब डॉ अम्बेडकर ने 1956 में की। उन्होंने शेड्यूल्ड कास्ट्स फेडरेशन को भंग करके आरपीआई की नींव रखी, जो अधिक समावेशी और धर्मनिरपेक्ष पार्टी थी।
शोषित, वंचित समाज में इन राजनीतिक गतिविधियों के बाद, करीब 10 साल तक शून्यता रही और फिर 1965-66 में मान्यवर साहेब कांशीराम जी का राजनीतिक संघर्ष का अवतरण हुआ। उन्होंने बामसेफ के माध्यम से नौकरी-पेशा दलितों, शोषितों व वंचितों को संगठित व एकजुट करके समाज में जागरूकता का अभियान चलाया। बामसेफ आॅल इंडिया बैकवर्ड एंड माइनोरिटी कम्युनिटीज एम्प्लाईज फेडरेशन का औपचारिक गठन 6 दिसंबर 1978 को मान्यवर साहेब कांशीराम जी द्वारा किया गया था। हालांकि, इसकी वैचारिक अवधारणा और प्रारंभिक कार्य 1973 में ही शुरू हो गए थे। बाबा साहेब के परिनिर्वाण दिवस पर यह स्थापित एक गैर राजनीतिक कर्मचारी संगठन था। मान्यवर साहेब कांशीराम जी ने आरपीआई में काम करने के दौरान देखा कि आरपीआई से जुड़े महाराष्ट्र के नेता वैचारिक रूप से कहने के लिए तो अम्बेडकरवादी थे, लेकिन अन्तर्मन से वे सभी अपने स्वार्थ के लिए ब्राह्मणवादी कांग्रेसियों से छिपे ढंग से मिले हुए थे। अंदर ही अंदर वे अपने लिए कांग्रेसी खेमे में राजनीतिक लाभ लेने की चेष्ठा भी कर रहे थे। ऐसे हालात को देखकर मान्यवर साहेब कांशीराम जी ने आरपीआई के साथ काम करना छोड़ दिया। उसके बाद मान्यवर साहेब ने दलित शोषित समाज संघर्ष समिति (डीएस-4) की स्थापना 6 दिसंबर 1981 को की। यह संगठन बहुजन समाज को राजनीतिक और सामाजिक रूप से जागरूक व संगठित करने के लिए बनाया गया था और इसी के माध्यम से दलित, पिछड़े व वंचित समाज के लोगों को राजनीतिक प्रशिक्षण भी दिया गया। इसी संगठन के तहत दिल्ली समेत कई प्रदेशों में दलित व वंचित वर्ग के लोगों को चुनाव में भी उतारा गया। बाद में यही संगठन 14 अप्रैल 1984 को ‘बहुजन समाज पार्टी’ के रूप में विकसित हुआ।
राजनीतिक पार्टियों के बाद भी वंचित समाज हाशिये पर? महात्मा ज्योतिबा फुले से लेकर बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर के सपने को देखकर, मान्यवर साहेब कांशीराम जी के अथाह संघर्ष से आज दलित शोषित व वंचित समाज को अपनी राजनीतिक पार्टियों से कुछ हासिल होता नजर नहीं आ रहा है। आज समाज को अपनी राजनीतिक गतिविधियों की विफलताओं को देखकर मंथन करना चाहिए कि हमारे महापुरुषों द्वारा दिये गए राजनीतिक व सामाजिक प्लेटफार्म विफल क्यों हैं? क्या अब हम सब अपनी इन विफलताओं से सबक लेकर उनको सही दिशा में ले जाने का प्रयास करें या नहीं? आज के राजनीतिक परिवेश को देखकर लगता है कि समाज में राजनीतिक प्रयोग काफी हो चुके हैं, समाज को उनसे आशातीत सफलता नहीं मिली। इसके मुख्य कारण क्या रहे? पिछले 75 वर्षों के दौरान समाज ने जो राजनीतिक उथल-पुथल देखी है उसे देखकर अब समाज को अपना रास्ता अलग से तय करना चाहिए और यह रास्ता ऐसा होना चाहिए जिसमें फिसलने और विफलता की कोई गुंजाइस न हो। अगर रास्ते में बाधाएं व विफलताएं देखने को मिलें तो जनता उन्हें स्वयं ही बिना समय गँवाए सुधारने का काम करे, बिना किसी राजनीतिक हस्तक्षेप और बाहरी प्रभाव के।
समाज में राजनीतिक आधार होना आवश्यक: बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर ने स्वयं ही कहा था कि राजनीति वह मास्टर चाबी है, जिससे आप अपनी तरक्की, समानता, सम्मान और प्रगति के सभी दरवाजें खोल सकते हैं। इसलिए समाज में राजनीति का प्लेटफॉर्म होना आवश्यक है। लेकिन समाज के पिछले अनुभवों को देखकर लग रहा है कि समाज के सामाजिक व राजनीतिक संगठन अपने आपको चमकाने, अपना घर चलाने के लिए काम कर रहे हैं। समाज का व्यक्ति आज भी वहीं खड़ा है जहां 75 साल पहले खड़ा था। बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर की यह बात एकदम सही है, राजनीतिक चाबी के बल पर समाज की हर समस्या का समाधान किया जा सकता है लेकिन जब यह राजनीतिक चाबी किसी ऐसे व्यक्ति के पास आ जाये, जो राजनीतिक चाबी का सर्वे-सर्वा बनकर उसके लोकतांत्रिक ढांचे को ध्वस्त कर दे तो फिर समाज के हाशिये पर पड़े व्यक्ति कहाँ जायें? समाज ने अपनी आँखों से देखा है कि बाबा साहेब द्वारा बनाई गई ‘रिपब्लिकन पार्टी और इंडिया’ और साहेब कांशीराम जी और बहुजन समाज के संघर्ष से पैदा हुई ‘बहुजन समाज पार्टी’ का आज राजनीतिक प्रभाव किस मुहाने पर खड़ा है, समाज इसे देखकर बहुत व्यथित और चिंतित हैं।
शोषित समाज को राजनीतिक पार्टियों की जरूरत नहीं: यह सर्वमान्य सत्य है कि समाज में अधिकांश लोग स्वार्थी, बिकाऊ और अपनी वोट किसी भी लालच में बेचने के लिए तैयार दिखते हैं। ऐसे हालात में शोषित, वंचित समाज ब्राह्मणवाद के साम, दाम, दंड, भेद से कैसे पार पाने में सफल हो? हालांकि यह चिंता का विषय है, मगर फिर भी समाज को हताश होने की जरूरत नहीं है। शोषित समाज के सभी जातीय घटकों को इकट्ठा बैठकर इस मुद्दे पर मंथन करना होगा और सही रास्ता भी खोजना होगा। हमारा आंकलन है कि आज वंचित, शोषित समाज को किसी राजनीतिक पार्टी के पिछलग्गू न बनकर समाज से ऐसे व्यक्तियों का चयन करना होगा जो कर्म और वचन से अम्बेडकरवादी हो, स्वार्थी न हो, बिकने वाले न हो, झुकने वाले भी न हों और अपने महापुरुषों द्वारा बताए गए रास्तों पर चलने के लिए स्वत: तैयार हों। समाज ऐसे व्यक्तियों को ही अपना नेतृत्व सौंपे। हाल ही में देश और दुनिया की जनता ने देखा कि नेपाल में हुए चुनाव में बालेन्द्र शाह नाम के व्यक्ति ने जीत हासिल की और नेपाल के प्रधानमंत्री बने। बालेन्द्र शाह ने प्रधानमंत्री पदभार संभालते ही प्रशासनिक और सामाजिक ढांचे में आमूल-चूल बदलाव के लिए 100-सूत्रीय एजेंडा लागू किया। मुख्य नीतियों में वीआईपी संस्कृति पर रोक, शिक्षण संस्थानों में राजनीतिक दलों के प्रभाव का खत्मा, सरकारी कामकाज में पारदर्शिता और दलित समुदाय के साथ हुए ऐतिहासिक अन्याय के लिए माफी मांगना शामिल है।
सरकारी विभागों में सुधार: सरकारी निकायों में दलीय ट्रेड यूनियनों पर प्रतिबंध और शिक्षकों/सार्वजनिक सेवकों के लिए प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से राजनीतिक संबद्धता पर रोक।
विदेश नीति में बदलाव: कूटनीतिक रूप से भारत, चीन और अमेरिका के राजदूतों के साथ बैठक करके एक साथ कूटनीतिक संकेत दिए हैं।
वंचित, शोषित समाज के नेताओं का त्याग करना जरूरी: वर्तमान समय में समाज के बहुत सारे राजनैतिक आकांक्षा पाले हुए लोग ब्राह्मणवादी राजनीतिक पार्टियों में राजनीतिक कैरियर सँवारने की फिराक में लगे हुए हैं, जिनमें प्रमुख नाम है राजेन्द्र पाल गौतम, जिनमें न कोई राजनैतिक परिपक्वता है और न समाज के लिए त्याग की भावना है। उनमें सिर्फ अपना स्वार्थ ही सर्वोपरि है जिसके कारण वे ‘आम आदमी पार्टी’ से निकलकर कांग्रेस की चाटुकारिता करते हुए नजर आ रहे हैं और इस जुगत में हैं कि कहीं से उन्हें राजनीतिक मलाई चाटने को मिल जाये। ऐसे ही दूसरे व्यक्ति का नाम है प्रो. रतन लाल जो दिल्ली विश्वविद्यालय के हिन्दू कॉलेज में इतिहास के प्रोफेसर हैं, वे सोचते हैं कि शायद समाज उन्हें प्रो. के पद पर देखकर ही आत्ममुग्घ हो जाएगा और कांग्रेस जैसे राजनीतिक दल को समाज में अपनी प्रतिष्ठा और पकड़ दिखाकर कोई सम्मानजनक राजनीतिक आश्रय मिल जाएगा। हालांकि ये दोनों व्यक्ति ही अपने-आपको अम्बेडकरवादी कहते हैं लेकिन आज का दलित, शोषित व वंचित समाज सिर्फ दिखाने और बताने मात्र से ही प्रभावित नहीं होता वह व्यक्ति के द्वारा किये जा रहे कार्यों की भी समीक्षा करता है। आज के शोषित व वंचित समाज को बाबा साहेब का वह कथन भी मालूम है जो उन्होंने कांग्रेस को लेकर कहा था कि-‘कांग्रेस एक जलता हुआ महल है, हमें इसमें नहीं जाना चाहिए’ साथ ही बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर कांग्रेस के कभी सदस्य भी नहीं रहे और न वे कांग्रेस की नीतियों से सहमत थे। चूंकि कांग्रेस के अंदर ब्राह्मणवाद का वर्चस्व था। कांग्रेस के द्वारा बनाए गए महात्मा मोहनदास करमचंद गांधी स्वयं समाज में जाति व्यवस्था को हिन्दुत्व का एक अभिन्न अंग मानते थे। इसलिए बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर का कांग्रेस के साथ बुनियादी मतभेद था।
समाज हित में संविधान प्रारूप समिति के अध्यक्ष बने बाबा साहेब: बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर ने समाज के हितों को सर्वोपरि रखते हुए भारत के संविधान में आवश्यक प्रावधान करने के उद्देश्य से संविधान प्रारूप समिति के अध्यक्ष बने थे। उन्होंने अपनी बौद्धिक क्षमता के आधार पर संविधान प्रारूप कमेटी का नेतृत्व और निर्देशन किया। संविधान के अंदर वंचितों, शोषितों व अल्पसंख्यकों के मौलिक अधिकारों के लिए सम्राट अशोक की शासन व्यवस्था को संविधान के अंदर समाहित किया। उन्होंने दलितों, शोषितों व अल्पसंख्यक समाज के हितों को लेकर ब्राह्मणवाद के साथ कोई समझौता नहीं किया। महिलाओं के अधिकारों के लिए ‘हिन्दू कोड बिल’ के मुद्दे पर तत्कालीन कांग्रेसी सरकार के वायदे, रवैयों व अनदेखी से आहत होकर नेहरू के मंत्रीमण्डल से इस्तीफा दे दिया था। आज की शिक्षित महिलाओं ने कभी भी बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर के योगदान की न तो मन से सराहना की है और न उन्हें अपना नायक माना। शायद यह सभी महिलाओं में मनुस्मृति का गहराई तक समावेश होने को दर्शाता है।
जय भीम, जय संविधान





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