




2026-06-01 15:46:50
भारत में जातिवाद की जड़े गहराई तक समाहित है, पूरे देश का सामाजिक धरातल 6743 जातियों में बंटा हुआ है। ये सभी जातीय घटक परस्पर क्रमिक ऊंच-नीच की व्यवस्था के कारण एक-दूसरे को अपने से ऊंचा या नीचा मानते हैं। जिसके कारण इनकी एकता की आवाज कमजोर है। शूद्रों के जो जातीय घटक झूठी मान्यताओं के आधार पर अपने आपको हिन्दू मान रहे हैं वास्तव में वे हिन्दू नहीं है। शूद्र वर्ग के सभी जातीय घटक अपने पूर्वजों के इतिहास को पढेÞ और समझें कि वे कैसे हिन्दू हैं? विडम्बना यह है कि शूद्र जातीय घटकों के लोग पढ़ने और जानने में कम विश्वास रखते हैं। समाज में कुछेक मनुवादी समूहों के द्वारा चलाये जा रहे पाखंडी तंत्र के तहत सबको हिन्दू बताया जा रहा है। बताने वाले धूर्त इस कमसमझ जनता को यह नहीं बताते कि हम तुम्हें हिन्दू क्यों कह रहे हैं? धूर्त मनुवादियों के बताने मात्र से शूद्र समाज के कमसमझ अपने आपको हिन्दू कहकर पुकारने लगते हैं। वे यह जानने की कोशिश नहीं करते कि हम हिन्दू कैसे हैं? अनुसूचित जाति व अति पिछड़ी जातियों के सभी घटकों को मनुवादी प्रचारकों के द्वारा इस पूरे वर्ग को हिन्दू कहकर पुकारा जा रहा है। इन वर्गों को विश्वास दिलाने के पीछे पाखंडी धूर्तों का एक छिपा षड्यंत्र है। मनुवादी धूर्तों को पता है कि उनकी संख्या इस देश में 3-4 प्रतिशत है, अगर वे अपनी जनसंख्या के आधार पर सत्ता में आने का प्रयास करेंगे तो वे कभी भी एक पार्षद तक की सीट नहीं जीत सकते। सत्ता में आने के लिए धूर्त किस्म के पाखंडियों ने अनुसूचित जाति के जातीय घटकों और अति-पिछड़ी जाति के जातीय घटकों को हिन्दू बताकर भ्रमित कर रखा है। पाखंडी तो अपने आपको हमेशा सत्ता में रहने के लिए ऐसा कर रहे हैं, मगर अज्ञान अनुसूचित जाति व अति पिछड़े घटकों को हिन्दू बनने से क्या लाभ है? बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर ने 1930-31 में लंदन में चली गोलमेज सभा के दौरान धूर्त ब्राह्मणों की मौजूदगी में और भारत से शामिल हुए प्रतिनिधियों, ब्रिटेन के शासक और उसकी पार्लियामेंट के सदस्यों की मौजूदगी में यह तथ्यात्मक रूप से साबित कर दिया था कि अनुसूचित जाति के जातीय घटक व अत्यंत पिछड़ी जातियों के जातीय घटक हिन्दू नहीं है। जिस सत्यता के आधार पर ब्रिटिश पार्लियामेंट ने अनुसूचित जाति व अत्यंत पिछड़ी जाति के घटकों के लिए ब्रिटिश शासन ने 16 अगस्त 1932 को कम्यूनल अवार्ड घोषित किया था। जिसके तहत इन जातीय घटकों के लोगों को दो वोट देने का अधिकार मिला था। लेकिन षड्यंत्रकारी मानसिकता के गांधी (बनिया) के द्वारा इन जातीय घटकों को कुछ भी अधिकार न देने की नियत के तहत उन्होंने आमरण अनशन करने की घोषणा कर दी थी। जिसकी वजह से बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर को इन जातीय घटकों के समाजहित और देशहित में ब्रिटिश शासन द्वारा स्वीकृत किया गया कम्यूनल अवार्ड छोड़ना पड़ा था।
वर्तमान समय में ब्राह्मणवाद और अम्बेडकरवाद आमने-समाने: ब्राह्मणवाद का अर्थ है- समाज में विषमतावाद और पाखंडवाद को कायम रखना जबकि अम्बेडकरवाद का अर्थ है- देश की सामाजिक व्यवस्था में समता, समानता, न्याय, बंधुता, धर्म निरपेक्षता व भाईचारे को स्थापित करना। विषमतावाद से फायदा सिर्फ सवर्ण जातीय घटकों को है चूंकि ब्राह्मणवाद की व्यवस्था में देश का सामाजिक धरातल टुकड़ों में बंटकर अलग-अलग रहता है। सभी घटकों में कोई पारस्परिक तालमेल और सामाजिकता भी नहीं होगी। जिसके कारण समाज की कुछेक जातियाँ जिनको सवर्ण समाज की जातियाँ कहा जाता है उन्हें ही सामाजिक स्तर के हिसाब से ऊंचा माना जाएगा और बाकी सभी जातीय घटकों का स्तर नीचा होगा। वर्ण-व्यवस्था के आधार पर वे सभी शूद्र कहलाएंगे और शूद्रों का काम अपने ऊपर के तीनों वर्णों की सेवा करना होगा।
विषमतावादी व्यवस्था क्यों? वास्तविकता के आधार पर ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य समाज के अधिकांशतया लोग यूरेशिया और मध्य एशिया से भारत में आए थे। यहाँ पर पहले से मौजूद मूलनिवासी राजाओं से उन्होंने आश्रय पाया। उन्होंने पहले यहां की मूलनिवासी जनता को समझा और अपने आपको श्रेष्ठ बताकर यहाँ पर स्थापित किया। प्रारम्भिक वर्षों में उन्होंने सामाजिक व्यवस्था को पूरी तरह से समझकर पाया कि यहाँ की अधिकांशतया जनता भोली-भाली है, उन्हें जो कुछ भी परोसा जाएगा वे उसी को सत्य मान लेंगे और जैसा उन्हें बारंबारता से बताया जाएगा वे उसका वैसा ही अभ्यास करके उसे अपने अंदर समाहित कर लेंगे। अपनी इसी रणनीति के अनुसार यूरेशिया और मध्य एशिया से आये तथाकथित आर्यों ने भारत के मूलनिवासियों की मानसिकता पर सबसे पहले अपना प्रभुत्व जमाया, उसके बाद उन्होंने अपनी पाखंड से भरी छलावामयी प्रवृति को यहाँ के मूलनिवासियों में समाहित किया। जिसके उपरांत भारत के अनुसूचित जातीय घटकों, अनुसूचित जनजातीय घटकों व अत्यंत पिछड़ी जातीय घटकों के अंदर मनगढ़ंत कहानियों के आधार पर झूठी देवी-देवताओं की तस्वीर सभी के मन में समाहित कर दी गई। यूरेशिया और मध्य एशिया से आए आर्यों (ब्राह्मण) ने पाखंड आधारित जैसा सामाजिक ताना-बाना बुनना चाहा वैसा ही यहाँ के मूलनिवासियों में समाहित कर दिया।
क्यों नहीं मिट रही हिन्दुत्व की वैचारिकी? मनुवादी जनता के मन में गहराई तक भ्रम और पाखंड समाहित है जिसके कारण उन्हें अब कोई भी सत्य झूठा ही लगता है। पहले से ही उनके मन और मस्तिष्क में समाहित हो चुके पाखंड को ही वे सत्य मानते हैं और उसी के अनुसार आचरण करते हैं। दूसरा कारण है कि पाखंडी प्रचारकों द्वारा अपनी इस अवैज्ञानिक व असत्यता को समाज में निरंतरता के साथ बनाए रखने के लिए मनुवादियों ने अपने प्रचारकों, कथावाचकों, सत्संग कत्तार्ओं व पाखंडी मेलों द्वारा जनता के मन और मस्तिष्क में निरंतरता के साथ उसे हमेशा ताजा रखा जा रहा है ताकि वह इस देश की जनता के मन और मस्तिष्क से कभी मिट न पाये। विडम्बना यह है कि इस ब्राह्मणवादी पाखंडी व्यवस्था को ढोने के लिए उन वर्गों का ही इस्तेमाल किया जा रहा है जिनको आजतक इस पाखंडी व्यवस्था से लाभ नहीं हुआ, बल्कि उलटा उन्हें नुकसान ही हुआ है। इसलिए आज की सबसे प्रमुख जरूरत यह है कि इन जातीय समूहों अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति व अत्यंत पिछड़ी जातीय घटकों में इतनी अज्ञानता है कि वे अपना फायदा और नुकसान समझने में भी विफल है।
भूमिहीन जातीय घटकों के मन और मस्तिष्क में ऊंच-नीच का जहर: ब्राह्मणवादी व्यवस्था के कारण एससी, एसटी व अत्यंत पिछड़ी जातिय घटकों के मन और मस्तिष्क में क्रमिक ऊंच-नीच का इतना जहर भर दिया गया है कि वे आपस में एक-दूसरे के साथ उठना बैठना भी पसंद नहीं करते। जिसके कारण समाज में देखने को मिल रहा है कि किसी एक जातीय घटक के ऊपर अगर कोई सवर्ण समाज का व्यक्ति उसे प्रताड़ित कर रहा है तो दूसरा जातीय घटक का व्यक्ति उसकी सहायता के लिए सामने आकर खड़ा नहीं होता। इसलिए आज समाज में आए दिन ऐसी घटनाएं अखबारों में सुर्खियां बटोर रही है जिन्हें पढ़कर किसी भी सभ्य समाज के व्यक्ति का मन और मस्तिष्क पूरी तरह से हिल जाएगा। साथ ही उनकी महिलाओं के साथ अत्यंत वीभत्स घटनाओं को पढ़कर समाज के जागरूक लोगों को अभद्र तो लगता है, लेकिन वे इस प्रकार के अत्याचार के निदान के लिए कोई सटीक इलाज नहीं खोज पाते। जिसका कारण है कि जिस समाज की महिलाओं के ऊपर अमानवीय अत्याचार हो रहा है, उसी समाज के लोग हिन्दू बनकर अत्याचार करने वाले हिन्दू समुदाय के साथ खड़े हो जाते हैं। अगर इस तरह के अमानवीय अत्याचारों से छुटकारा पाना है तो शूद्र वर्ग-दलितों सहित सभी वर्गों के जातीय घटकों को एक साथ एकत्र होकर अत्याचारियों के खिलाफ खड़ा होना होगा और अत्याचारियों को यह एहसास करना होगा कि हम सब एक है और हम किसी भी अमानवीय अत्याचार के खिलाफ एक होकर लड़ेंगे।
राजनैतिक दलालों की उग रही फसल: मनुवादियों द्वारा एससी/एसटी व अत्यंत पिछड़ी जातियों जैसे नाई कुम्हार लौहार, बढ़ई, बघेल, गड़रिये आदि तबकों में राजनैतिक महत्वाकांक्षा की फसल उगाई जा रही है। राजनैतिक स्तर पर उत्तर प्रदेश विधान सभा का चुनाव करीब एक वर्ष दूर है, परंतु अभी से उत्तर प्रदेश के राजनीतिक धरातल पर पानी और खाद छिड़का जा रहा है। जिसका मतलब है कि राजनीतिक फसल उगाने की तैयारी चल रही है। शूद्रों के कुछेक सामंतवादी जातीय घटकों, विशेषकर कृषक समाज की जातियों में हिन्दुत्व के बीज उगाये जा रहे हैं। उदाहरण के तौर पर राजकुमार भाटी जो समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता हैं। उनके बयानों को हिन्दू विरोधी बताकर समाज में बंटवारा किया जा रहा है। राजकुमार भाटी गुर्जर जाति से संबन्धित है। गुर्जर समुदाय के युवकों में उच्च शिक्षा को महत्व कम और राजनीति को अधिक महत्व दिया जाता है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कुछ जिलों में गुर्जर समुदाय की अच्छी संख्या है और यह क्षेत्र दूसरे क्षेत्रों की अपेक्षा में आर्थिक रूप में सम्पन्न भी है। गुर्जर और दलित समुदायों में एक कॉमन बात यह है कि इनके नवयुवक जो शिक्षा के क्षेत्र में अपेक्षाकृत कमजोर हैं और आर्थिक रूप में अन्य के सापेक्ष समृद्ध है, वे अधिकांशतया राजनीतिक दलों के दरवाजे खटखटाकर अपना भाग्य राजनीति में आजमाना चाहते हैं। हाल ही में समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव ने अपने वक्तव्य में कहा कि भारत में सिर्फ भारत का एक ही संविधान है, ‘रामचरितमानस’ को एक सांस्कृतिक संविधान माना जा सकता है! अखिलेश यादव जी का यह बयान निहायत ही बेहूदा और असंवैधानिक है। अखिलेश यादव जी को शायद यह पता नहीं है कि समाज की सांस्कृतिक पहचान का क्या अर्थ होता है? अखिलेश यादव का यह बयान तथ्यों के विपरीत तो है ही लेकिन उन्होंने शायद अपना यह वक्तव्य ब्राह्मण समुदाय का चुनाव में वोट लेने की नियत से दिया होगा! परंतु हम यहाँ पर अखिलेश यादव जी को स्पष्ट रूप से बता देना चाहते हैं कि अगर पूरे प्रदेश के ‘यादव’ ‘ब्राह्मणों’ की गुलामी के लिए सिर के बल भी खड़े हो जाये तब भी ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य समुदाय का वोट दलित-पिछड़े समुदाय के राजनीतिक दलों को मिलने वाला नहीं है। इसलिए अम्बेडकरवादी समाज ऐसे राजनैतिक दलों को आगाह करना चाहता है कि वे वोट लेने के लालच में अपने अंदर इस प्रकार का भ्रम पालकर न चलें। भ्रम की स्थिति में दलितों, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों को धोखा ही मिलेगा।
पिछड़े व दलित राजनैतिक दलों में बोये जा रहे बँटवारे के बीज: मनुवादी संघियों ने अपने प्रेरक, पिछड़े व दलित वर्गों के जागरूक समाज के बीच उतार दिये हैं। जिनका मकसद सिर्फ भ्रमित करना है कि आप अपना वोट बहन जी को दें, दूसरे मनुवादी ग्रुप के प्रेरक दलित समाज के जागरूक लोगों के बीच जाकर कह रहे हैं कि आप अपना वोट आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) के चंद्रशेखर भाई को दे, तीसरा मनुवादी ग्रुप समाज के प्रभावशील लोगों के बीच जाकर कह रहा है कि आप अपने समाज के लोगों का वोट अखिलेश यादव को देकर पीडीए को मजबूत करें। इसका सीधा अर्थ है कि शूद्र वर्ण के लोगों में वर्तमान समय में तीन राजनीतिक धडेÞ मजबूत है, इसलिए पूरे समुदाय की वोटों को एक तरफ न जाने दो, बल्कि इनके वोटों को तीन से अधिक धड़ों में बंटवा दो, ताकि इनमें से कोई भी राजनीतिक शक्ति के रूप में मजबूत न बन पाये।
दलित, पिछड़े व अल्पसंख्यकों से आग्रह है कि मनुवादी-संघियों की षड्यंत्रकारी चालो को समझो और आने वाले किसी भी चुनाव में ऐसे लोगों को वोट ना दो जो अम्बेडकरवादी ना हो।





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