




2026-03-14 16:20:59
भारत एक जातिवादी देश है, जहां पर पूरा समाज कई हजार जातीय टुकड़ों में बंटा हुआ है। यहाँ पर जातीय आधार पर ही भारत में मनुष्य का शोषण होता रहा है। जातिवादी व्यवस्था के कारण और जातीय आधार पर उत्पीड़न को महसूस करते हुए भारत में बहुत सारे महापुरुषों और समाज सुधारकों ने जन्म लिया। अपने समयानुकूल सभी महापुरुषों और समाज सुधारकों ने समाज को जागरूक करने के लिए निरंतर संघर्ष किया। भारत की जाति व्यवस्था में क्रमिक ऊंच-नीच की व्यवस्था भी विद्यमान है जिसकी वजह से देश के सभी जातीय घटक अपने आपको दूसरे जातीय घटक से या तो ऊंचा या फिर नीचा मानते हैं। भारत में जहां-जहां पर जातीयता के आधार पर शोषण व उत्पीड़न की घटनाएँ अधिक हुई, वहाँ-वहाँ पर समाज सुधारकों व महापुरुषों ने अधिक संख्या में जन्म लिया। यह बात इस सिद्धान्त को भी प्रतिपादित करती है कि ‘आवश्यकता ही आविष्कार की जननी होती है।’ देश की भौगोलिक स्थिति को देखते हुए मौटे तौर पर कहा जा सकता है कि महाराष्ट्र और उसके आसपास के क्षेत्रों में अपेक्षाकृत अधिक महापुरुष पैदा हुए। उन्होंने अपने जीवन में आसपास के क्षेत्रों को जागरूक किया और समाज में फैली रूढ़ियों व सड़ी-गली मान्यताओं के खिलाफ संघर्ष का विगुल बजाया। इसी परिपेक्ष्य में तथ्यात्मक साक्ष्यों के आधार पर नि:संदेह यह कहा जा सकता है कि समाज में जातीय उत्पीड़न का मुख्य कारण जातीय व्यवस्था और उसके अंदर क्रमिक ऊंच-नीच की भावना थी। हिन्दुत्व की वैचारिकी के पीछे उस समय के तथाकथित धार्मिक व सामाजिक नेताओं की मुख्य भूमिका थी। वर्तमान समय को देखकर अंदाजा लगा सकते हैं कि गांधी जैसे ‘महात्मा’ कहे जाने वाले व्यक्ति भी जाति को हिन्दू धर्म का अभिन्न अंग मानते थे। गांधी ने देश के गरीब, बहुजन समाज के अशिक्षित, उपेक्षित वर्गों के लिए क्या काम किए? उसके सकारात्मक व तथ्यात्मक साक्ष्य नहीं है। गांधी की मानसिकता आधारित कृत्यों को देखकर कहा जा सकता है कि गांधी एक मनुवादी व ब्राह्मणवादी मानसिकता के व्यक्ति थे, उन्होंने हमेशा हिन्दुत्ववादी मानसिकता को आगे बढ़ाने का कार्य किया। गांधी के पास गरीबों व अशिक्षित लोगों के लिए कोई परियोजना नहीं थी। बाबा साहेब ने उनके कृत्यों व मानसिकता के आधार पर ही उनको ‘महात्मा’ मानने से इंकार किया था। वैसे भी गांधी जी वैश्य समाज से संबन्धित थे, इसलिए भी उनमें गहराई तक हिन्दुत्व की वैचारिकी मौजूद थी, वे ऊपरी तौर पर यहाँ के वंचित व दलित समाज को हरिजन कहकर बेइज्जत करने का षड्यंत्रकारी काम कर रहे थे।
गांधी अपने आपको कांग्रेसी रणनीति के मुताबिक देश के स्वतंत्रता आंदोलन का नायक बता रहे थे, लेकिन देश की आजादी के नायकों को बचाने और उनकी रक्षा करने के लिए उनके पास कोई योजना नहीं थी। न जाने क्यों उस समय का उपेक्षित वर्ग (एससी/एसटी/ओबीसी) गांधी के हिंदुत्ववादी छलावे में फँसकर गांधी को अपना नेता मान रहे थे! इसी मुद्दे को लेकर गांधी ने बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर और दलित समाज के सामने यह दावा भी किया था कि भारत के पूरे उपेक्षित वर्ग का मैं ही एक मात्र नेता हूँ। बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर ने उनके इस तरह के दावे का खंडन करते हुए कहा था कि ‘मि. गांधी मैं अछूत वर्ग के लोगों की माँ हूँ और आप अछूत वर्गों की एक धाय बन सकते हैं, लेकिन माँ नहीं।’ बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर ने इसी तरह की व्यवस्था को देखते हुए विदेशों से उच्च से उच्च शिक्षा प्राप्त की और अपनी इसी शिक्षा के बल पर वे विश्व के श्रेष्ठतम विद्वानों में गिने गए।
बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर ने 32 डिग्रियाँ और 9 भाषाओं का ज्ञान प्राप्त करने के बाद भी उन्होंने स्वयं के ऐशों-आराम के लिए न धन अर्जित किया और न ही अपने लिए संपत्ति संग्रह करके श्रेष्ठतम धनी बनने का काम किया। उनका जीवनभर सिर्फ एक ही संघर्ष रहा कि मैं जिस समाज के लोगों के बीच पैदा हुआ हूँ, मैं उस समाज को मनुवादी-व्यवस्था से मुक्त करा कर ही दम लूँगा और उन्होंने अपने इसी संकल्प के लिए अनेकों कष्ट उठाकर भी अपनी प्रतिज्ञा पूरी की। बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर ने अपने तीन गुरुओं, पहले गुरु भगवान बुद्ध, दूसरे संत कबीरदास और तीसरे महात्मा ज्योतिबा फुले जो ही मान्यता दी। बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर का परिनिर्वाण 6 दिसम्बर 1956 को हुआ, उसके करीब एक दशक तक बहुजन समाज नेता विहीन रहा। लेकिन बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर के जीवन काल में ही उत्तर भारत में माननीय बुद्धप्रिय मौर्य जी एक सशक्त अम्बेडकरवादी नेता के रूप में उभरे, उनकी भाषण शैली और वाक्पटुता को देखकर समाज के सभी जागरूक लोगों ने यह महसूस किया था कि बाबा साहेब के जाने के बाद अब बहुजन समाज बुद्ध प्रिय मौर्य के रूप में नेता मिल गया है। इसी परिपेक्ष्य में समाज भी उन्हें छोटा अम्बेडकर कहकर पुकारने लगा था। यूं तो बुद्ध प्रिय मौर्य जी बाबा साहेब के जीवन काल में ही सक्रिय भूमिका में थे, लेकिन उनका संघर्ष मुख्यत: उत्तर भारत में रहा। रिपब्लिकन पार्टी आॅफ इंडिया को बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर ने स्वयं ही निर्मित किया था। लेकिन बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर भी बी.पी. मौर्य की कार्य कुशलता, भाषण शैली आदि को देखकर उन्हें अपने सामाजिक संघर्ष को आगे बढ़ाने के कार्य में लगाया, लेकिन महाराष्ट्र के ‘रिपब्लिकन पार्टी’ के नेताओं को यह रास नहीं आ रहा था और वे बुद्ध प्रिय मौर्य को कोई मुख्य पद देने के पक्षधर नहीं थे। जिसका मुख्य कारण इन नेताओं का व्यक्तिगत स्वार्थ और महत्वाकांक्षा थी।
व्यक्तिगत कमजोरी ही मनुष्य के पतन का कारण: बीपी मौर्य ने रिपब्लिकन पार्टी आॅफ इंडिया के उम्मीदवार के रूप में अपना पहला चुनाव 1962 में उत्तर प्रदेश की अलीगढ़ लोकसभा सीट से जीता था। लेकिन बीपी मौर्य जी अपनी ही पार्टी के स्वार्थी और अति महत्वाकांक्षी लोगों की वजह से अपने आपको रिपब्लिकन पार्टी में उपेक्षित महसूस कर रहे थे। साथ ही उनके ऊपर उनकी चारित्रिक कमजोरियाँ भी हावी हो गई थी, जो अंतत: उनके पतन का कारण बनी। इसके उपरांत करीब 10 वर्षों तक शोषित समाज की राजनीति अक्रियशील रही और 1965 के दशक में मान्यवर साहेब कांसीराम जी का सामाजिक संघर्ष के लिए पदार्पण हुआ। उन्होंने अपने सामाजिक संघर्ष के दौरान तीन सामाजिक व राजनीतिक सस्थाओं का निर्माण किया- बामसेफ, डीएस-4 एवं बहुजन समाज पार्टी। मान्यवर साहेब कांसीराम जी की मुख्य विशेषता और योग्यताएं जो अद्वितीय थी वह है उनका अम्बेडकरवादी विचारधारा के प्रति ईमानदारी, समर्पण, त्याग, संघर्ष और संगठनात्मक कार्यकुशलता। कांशीराम जी ने पुणे के किरकी स्थित डिफेंस एक्सप्लोसिव रिसर्च एंड डेवलपमेंट लेबोरेटरी (डीईआरएल-गोला-बारूद अनुसंधान और विकास प्रतिष्ठान) में रिसर्च असिस्टेंट के रूप में नौकरी की थी, जो डीआरडीओ के तहत आती है। उन्होंने 1960 के दशक में यहाँ काम किया था। वहीं से उन्होंने अपनी नौकरी से त्यागपत्र देकर बहुजन समाज के उत्थान के लिए अपने आपको आवश्यक संघर्ष में झोंक दिया और फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा। बहुजन समाज के लिए संघर्ष में उतरने के पीछे उनका मुख्य कारण था कि उनके अनुसंधानिक लैब में बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर की जयंती के उपलक्ष्य में छुट्टी नहीं दी गई थी, जिसे लेकर उनके साथ चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी माननीय दीनाभाना जी उनके पास आए और उनसे कहा कि साहेब बाबा साहेब की जयंती के अवसर पर हमारी लैब ने छुट्टी क्यों नहीं घोषित की है? इस मुद्दे को लेकर दोनों के बीच काफी वार्तालाप हुआ और मान्यवर साहेब को भी यह संस्था का रवैया सही नहीं लगा था। इस मुद्दे को लेकर सारे संस्थान में चर्चा हुई और आरक्षित वर्ग के लोगों में आक्रोश भी जागृत हुआ। जिसके उपरांत संस्थान को बाबा साहेब की जयंती के अवसर पर छुट्टी का प्रावधान सुनिश्चित करना पड़ा। मान्यवर साहेब कांसीराम जी एक उत्कृष्ट श्रेणी के समर्पित कार्यकर्त्ता थे जिसका सबसे उत्कृष्ट उदाहरण यह है कि तीन-तीन संस्थाओं का निर्माण करने के बाद भी, देशभर में सैंकड़ों बड़ी-बड़ी रैलियाँ करने के बाद भी और उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में बहुजन समाज पार्टी की बहन मायावती को मुख्यमंत्री बनाने के बाद भी और स्वयं दो बार सांसद सदस्य रहे उनके उपरांत भी उनका अपना कोई व्यक्तिगत बैंक अकाउंट नहीं था। जो यह दर्शाता है कि मान्यवर साहेब कांसीराम जी एक उत्कृष्ट श्रेणी के पारदर्शी और ईमानदार नेता थे। उनका समाज के प्रति त्याग, तपस्या और समर्पण हमेशा इस बात को इंगित करता रहेगा कि उन्होंने बहुजन समाज की पिछड़ी जातियों के बीच जाकर, तालमेल बैठाकर, उन्हें एक मंच पर लाने का आवाहन किया। उनकी संगठनात्मक कार्यशैली के कारण ही बहुजन समाज की अति पिछड़ी जातियों जैसे- नाई, कुम्हार, गड़रिये, मल्लाह, निषाद आदि से अनेकों विधायक भी चुनकर आये थे।
आज ढलान की ओर साहेब का संघर्ष? नि:संदेह साहेब का संघर्ष अद्वितीय और असीम है, पूरे समाज ने उनकी तपस्या और संगठनात्मक काबलियत के बल पर ही सत्ता का सुख भोगा। परंतु अब बड़े विस्मय के साथ कहना पड़ता है कि उनका संघर्ष विफल होता दिखता है। साहेब कांसीराम जी का संघर्ष विफल नहीं होना चाहिए था। उनके संघर्ष और निष्ठा में कोई व्यक्तिगत स्वार्थ और कमी नहीं थी। उनका संघर्ष बहुजन समाज के हितों के लिए हमेशा ही सम्पूर्ण व निष्ठावान था। मनुष्य के जीवन में कभी कुछ ऐसी गलतियाँ हो जाती है जिनका परिणाम समाज सदियों तक भुगतता है। हालांकि यह व्यक्तिगत मत है, हो सकता है कि यह पूरी तरह सही न भी हो, मगर आज जो दशा समाज के सामने है, उसका प्रतिफल यह है कि बागडोर की पूरी कमान किसी एक व्यक्ति को सौंपकर, और उस व्यक्ति पर समाज हित से अधिक भरोसा करके, एक अपूर्णीय क्षति हुई है। समाज हित के विचार से साहेब को देशभर से कम से कम 500 विद्वान व जागरूक व्यक्तियों को छाँटकर एक सामाजिक परिषद का निर्माण करना चाहिए था। सामाजिक हितों के कार्यक्रमों को संयुक्त रूप से इसी परिषद को सौंपना चाहिए था, किसी एक व्यक्ति को नहीं। इस संदर्भ में हमें यहाँ भगवान बुद्ध का निर्णय अधिक उपयुक्त लगता है, भगवान बुद्ध के परिनिर्वाण का समय जब नजदीक आया, तब भगवान बुद्ध के सबसे प्रिय शिष्य भंते आनंद उनके पास आए और उनसे प्रार्थना की कि भगवान अब आपका परिनिर्वाण नजदीक है, हमें आदेश दे कि हमें अब क्या करना है? तो भगवान बुद्ध ने उन्हें प्यार के साथ यह बताया था कि मैंने संघ की स्थापना भी की है और मेरे परिनिर्वाण के बाद संघ ही सर्वोपरि होगा, विचार-विमर्श करके संघ जो फैसले लेगा वहीं सर्वमान्य होने चाहिए। मान्यवर साहेब ने यही महानतम गलती की कि उन्होंने अपने संघर्षों के प्रतिफल से पैदा हुई शक्ति का भार और उत्तरदायित्व बहन मायावती जी को सौंप दिया, जो अब पूरे बहुजन समाज की राजनीति पर भारी पड़ रहा है और समाज के किसी भी व्यक्ति के पास कोई विकल्प नहीं रह गया है। आज बहुजन समाज चौहराहे पर है, और बहन जी मनुवादी-संघियों की छाया में छिपकर संघी सरकारों को पिछले दरवाजे से फायदा पहुँचाती दिख रही है।
बहुजन समाज के सभी समर्पित कार्यकत्तार्ओं से निवेदन है की जागरूक बनो अंधभक्त नहीं, व्यक्ति हित से समाज हित को सर्वथा सर्वोपरि रखने का संकल्प लो।





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