




2026-01-10 14:00:54
न्यायपालिका द्वारा घोषित फैसले सिर्फ उनके न्यायाधीशों को ही ‘सही’ नहीं लगने चाहिए बल्कि आमतौर पर ये फैसले जनता को भी न्याय संगत लगने चाहिए। भारत की न्याय व्यवस्था पिछले करीब 3 हजार वर्षों से भारत में न्याय की अवधारणा न्याय शास्त्र के सिद्धांतों पर नहीं रही है। भारत की ब्राह्मणी न्याय व्यवस्था में कल्याणकारी शासन का प्रावधान कभी नहीं रहा, बल्कि अगर यूं कहे कि भारत की न्याय व्यवस्था हमेशा ब्राह्मणी संस्कृति के वर्चस्व के कारण अतार्किक व अन्यायपूर्ण रही। इस तरह की न्याय व्यवस्था का मुख्य कारण ब्राह्मणी संस्कृति के कथित धर्म शास्त्र विशेषकर ‘मनुस्मृति’ है, जिसको भारत के लोग मनु विधान मानते हैं। ब्राह्मणी संस्कृति के विधानों के अनुसार भारत का समाज चार वर्णों में विभक्त है- ब्राह्मण, क्षत्रिय वैश्य और शूद्र। भारत के पूरे समाज को 6743 जातियों में भी विभक्त करके रखा गया। शूद्र वर्ण में कुछेक समुदायों को बहिष्कृत करके अछूत बनाया गया जिनके द्वारा किसी भी व्यक्ति को छूना, सार्वजनिक रास्तों पर चलना, सार्वजनिक कुंओं से पानी भरना आदि प्रतिबंधित था। परिणामस्वरूप भारत ब्राह्मणी संस्कृति के वर्चस्व के कारण वैश्विक स्तर पर किसी भी क्षेत्र में प्रतिस्पर्धात्मक उन्नति नहीं कर पाया। चूंकि पढ़ना-लिखना, देश की रक्षा करना और देश में वाणिज्य और व्यापार संभालना क्रमश: पहले तीनों वर्णों का ही आधिपत्य रहा। इन तीनों वर्णों की जनसंख्या हमेशा ही करीब 15 प्रतिशत या उससे भी कम ही रही। जिसके कारण देश की अधिकांश जनता शिक्षा, वाणिज्य और व्यापार में सक्षम नहीं बन पायी। देश करीब 755 वर्षों तक विदेशियों का गुलाम रहा। देश की रक्षा का भार सिर्फ क्षत्रिय वर्ण को ही था जो देश की कुल जनसंख्या में मात्र 6-7 प्रतिशत है, जिनमें बच्चे, बूढ़े और महिलाएं भी शामिल है। महिलाओं को कभी मुख्यधारा में शामिल नहीं किया गया और उन्हें सभी प्रकार के मानवीय अधिकार नहीं दिये गए। इसलिए भारत की अधिकांश जनसंख्या सभी क्षेत्रों में असक्षम और अविकसित रही। देश में ज्ञान और तकनीक का स्तर हमेशा निम्नतर ही रहा। ब्राह्मणी संस्कृति की वैचारिकी ने देश में वैज्ञानिक सोच को हमेशा नकारा, उन्होंने वास्तविक तथ्यों पर आधारित किसी भी समस्या का हल नहीं ढूंढा, हमेशा काल्पनिक आडंबरों पर आधारित झूठे पाखंडवादी कथित समाधानों में जनता को फंसाकर गुमराह किया। पाखंड आधारित कार्यक्रमों का प्रतिफल यह रहा कि भारत की जनसंख्या का किसी भी क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धात्मक क्षेत्रों में प्रदर्शन सबसे निचले स्तर पर रहा है।
वर्तमान न्यायिक व्यवस्था: भारत में संविधान सत्ता है, यहाँ की न्याय प्रणाली संविधान आधारित व्यवस्था के तहत संचालित होती है। न्याय व्यवस्था में, (1) उच्चतम न्यायालय, (2) उच्च न्यायालय और (3) देश के प्रदेशों में अधीनस्थ न्यायालय आते है। ये सभी अपने-अपने क्षेत्र से जुड़े विवादों का निपटारा करते हैं। विवादों का निपटारा न्याय शास्त्र और उससे संबन्धित संहिताओं के आधार पर किया जाता है। भारत में एक उच्चतम न्यायालय है, उसके अधीन सभी प्रदेशों में 25 उच्च न्यायालय हंै, जो विभिन्न राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के लिए कार्य करते हैं, जिनमें से कुछ का अधिकार क्षेत्र एक से अधिक राज्यों पर है, जैसे गुवाहाटी उच्च न्यायालय और पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय। इनमें सबसे नया उच्च न्यायालय आंध्र प्रदेश का है, जो 1 जनवरी 2019 को स्थापित हुआ। भारत में अधीनस्थ न्यायालयों (जिला और निचली अदालतों) की कोई निश्चित संख्या नहीं है, क्योंकि ये प्रत्येक जिले में स्थापित होते हैं, और भारत में 18 हजार से अधिक ऐसी अदालतें हैं; जिनकी संख्या राज्यों और जिलों के आधार पर बदलती रहती है, जिनमें जिला एवं सत्र न्यायालय, मजिस्ट्रेट न्यायालय और सिविल न्यायाधीश न्यायालय शामिल हैं, जो उच्च न्यायालय के अधीन कार्य करते हैं। ये सभी न्यायालय अपने-अपने क्षेत्र में जनता से जुड़े विवादों का समाधान करते हैं, जिनका आधार न्याय शास्त्र के सिद्धांतों पर होना चाहिए। सभी न्यायालय अपने न्यायिक क्षेत्र में न्याय की व्याख्या करने के लिए स्वतंत्र होते हैं। सभी न्यायालय प्रदेश व अन्य किसी भी सरकार के अधीन नहीं होते। ये सभी न्यायालय प्रदेशों की सरकारों के दबाव और दखल को मानने के लिए बाध्य नहीं होते हैं। इनका कार्य सिर्फ ईमानदारी और निष्पक्षता के साथ विवाद से संबन्धित जनता को न्याय दिलाकर विवाद का निपटारा करना होता है।
न्याय व्यवस्था में ब्राह्मणी संस्कृति की मानसिकता का आधिपत्य: भारत दुनिया में अकेला देश है जहां पर ब्राह्मणी संस्कृति के लोगों की जनसंख्या 6743 जातियों में विभक्त है। जातियों में भी उपजातियाँ है, उनमें क्रमिक ऊंच-नीच की व्यवस्था है। क्रमिक ऊंच-नीच की व्यवस्था के कारण कोई भी जाति पूर्ण रूप से स्वतंत्र नहीं है, वह या तो दूसरी जाति-उपजाति से नीची है या ऊंची। न्यायालयों का पहला लक्ष्य जनता से जुड़े विवादों को न्यायसंगत तरीके से सुलझाकर देश के लोकतंत्र को मजबूत करना और उसमें जनता का विश्वास बढ़ाना होता है। समाज के सभी वर्णों व उनसे जुड़ी जातियों में अच्छी और बुरी मानसिकता के व्यक्ति हमेशा ही मौजूद रहते हैं, ब्राह्मण वर्ण में भी बहुत सारे ब्राह्मण जाति से जुड़े लोग न्यायिक मानसिकता के होते हैं लेकिन इनमें अधिकांश संख्या ऐसे व्यक्तियों की होती है जो न्याय की व्याख्या न्याय से जुड़े प्रावधानों के अनुसार नहीं करते, बल्कि वे अपनी मानसिकता में छिपे जातीय आधार पर न्याय शास्त्र के सिद्धांतों की व्याख्या करते हैं और उसी आधार पर विवाद का निपटारा कर देते हैं। ये हालात सिर्फ देश की निचली अदालतों में ही नहीं हैं बल्कि ये सभी हालात देश के उच्च व उच्चतम न्यायालयों के फैसलों में भी आज देखने को मिल रहे हैं। जिसके कारण आज जनता का न्यायपालिका से विश्वास उठता जा रहा है। मोहन भागवत देश के सभी निवासियों को जबरदस्ती हिंदू बना रहे हैं, यह अपने आप में संघियों का भारत के संविधान पर बढ़ा हमला है। इस मामले में भारत की संवैधानिक अदालतें स्वयं संज्ञान लेकर मोहन भागवत को हिदायतें दें कि ये देश संविधान से चलता है और संविधान ही सर्वोपरि है, और भारत एक धर्म-निरपेक्ष राष्ट्र है।
देश के नागरिक बिना मुकदमे के जा रहे जेल: वर्तमान समय में बिना मुकदमे के, बिना साक्ष्यों के लंबी कैद लोकतंत्र और संविधान के अस्तित्व पर सवाल खड़े करती है। आज इस तरह के मामले एक-दो नहीं ढेरों घटित हो रहे हैं जिनमें लोकतंत्र को लेकर जनता के मन में चिंता होना जायज है, ऐसे वक्त में निराश जनता के लिए न्यायालय ही आखिरी आस होती है और जब न्यायालय से भी जनता को निराशा मिलने लगे तब हताश और मन से हारी हुई जनता जाये तो जाये कहाँ? सुप्रीम कोर्ट ने छात्र नेताओं उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत देने से इनकार कर दिया, जो 2020 के दिल्ली दंगों के मामले में 5 से अधिक वर्षों से जेल में बंद है। हालांकि कोर्ट ने अन्य पाँच सह-आरोपियों- गुलफिशा फातिमा, मीरान हैदर, शिफा उर रहमान, मोहम्मद सलीम खान और शादाब अहमद को सशर्त जमानत दे दी है। पूरे देश की नजरें इस फैसले पर थी, ज्यादातर लोग उम्मीद में थे कि सभी सातों आरोपियों को जमानत मिल जाएगी, लेकिन अदालत ने ऐसा नहीं किया जो आम लोगों को किसी भी तरह न्यायिक नहीं लगा। उमर खालिद पर अभी तक मुकदमा शुरू ही नहीं हुआ है और वे बिना दोष सिद्धि के पिछले 5 वर्ष से ज्यादा समय से जेल में बंद है। ये संवैधानिक सत्ता की न्याय प्रणाली के लिए गंभीर मामला है। उमर खालिद की उम्र अब 38 वर्ष की है, जो पीएच-डी. करने के बाद अपना भविष्य संवार सकते थे। लेकिन पढ़ने के दौरान और उसके बाद भी उन्होंने वंचितों के हक में आवाज उठाना सही समझा, सरकार से सवाल पूछे, नागरिकता संशोधन के खिलाफ अपनी दलीलें पेश की, और इस कानून के विरोध में हो रहे प्रदर्शन में हिस्सा लिया, उसके बाद से वे कैद में है। सुप्रीम कोर्ट में उनकी जमानत याचिका अप्रैल 2023 से लंबित थी, जो अब खारिज हो चुकी है। अदालत ने अपने आदेश में कहा कि एक साल बाद या गवाहों की छानबीन पूरी होने के बाद उमर खालिद और शरजील इमाम फिर से अर्जी दाखिल कर सकते हैं। कानून के जानकारों का कहना है कि उमर खालिद के खिलाफ जो सबूत अदालत में पेश किए गए वे काफी कमजोर हैं, इसलिए उन्हें जमानत मिल जानी चाहिए थी। वर्तमान शासन सत्ता में इस मामले में अदालत और सरकार की मिलीभगत नजर आती है जो पूर्ण रूप से असंवैधानिक है। वर्तमान सत्ता के शासन में भाजपा से जुड़े जघन्य अपराधी, बलात्कारी, हत्या व डकैती से जुड़े मामलों में जेल से पैरोल पर बाहर आकर सालो-साल जेल से बाहर है। जिनमें राम रहीम, आशाराम, कुलदीप सिंह सेंगर आदि अनेकों लोग है। लेकिन ये सभी अपराधी भाजपा से संबंधित है इसलिए जनता में यह संदेश जा रहा है कि सरकार अदालतों पर दबाव डालकर अपने अपराधियों को बचा रही है।
प्रायोजित था दिल्ली दंगा: जनता अच्छी तरह जानती है कि 2020 में जो भी सांप्रदायिक दंगे दिल्ली में हुए थे वे पूरी तरह से भाजपा द्वारा प्रायोजित थे। आम नागरिक जो भाजपा की मानसिकता से संक्रमित थे वे हफ्ते भर पहले से अपने मकानों की छतों पर ईट-रोड़े इकट्ठे कर रहे थे, जो संकेत देता है कि दिल्ली दंगा एक गहरा षडयंत्र था। इस दंगे के दौरान पुलिस की कमान केंद्र के गृहमंत्री के हाथों में थी, दिल्ली का मुख्यमंत्री केजरीवाल था, जो मूल रूप में संघी था, दोनों के बीच कोई भी सामंजस्य नहीं था। जब यह दंगा चल रहा था, तब दिल्ली के भिन्न-भिन्न इलाकों से जनता पुलिस कंट्रोल रूम को फोन करती रही, लेकिन केंद्र शासित पुलिस ने जनता के फोन नहीं उठाए और न कोई समाधान मुहैया कराया। तीन दिन तक यह दंगा बेलगाम होकर चलता रहा, तीन दिन बाद पुलिस हरकत में आई और दंगे स्वत: ही समाप्त होते दिखे। पुलिस का ऐसा व्यवहार जनता को यह जानकरी देने के लिए पर्याप्त है कि दिल्ली दंगे संघी मानसिकता द्वारा प्रायोजित थे।
दंगा भड़काने वाले संघी-भाजपाई: दिल्ली दंगों से पहले और दंगों के दौरान भाजपा से जुड़े कई नेताओं ने भड़काऊ भाषण दिये और वे सोशल मीडिया पर काफी सक्रिय दिखे। 2025 दिल्ली में जब चुनाव हुए तो केजरीवाल की सरकार जाने के बाद, भाजपा की सरकार दिल्ली में आई। जिसमें भाजपा के दंगाई बयानवीरों को कैबिनेट स्तर का मंत्री बनाकर उन्हें पुरस्कृत किया गया। भाजपा का इस तरह का आचरण दर्शाता है कि दंगाईयों को भाजपा पाल रही थी? इन दंगाई बयानवीरों में प्रमुख नाम थे कपिल मिश्रा, नन्द किशोर गुर्जर, अनुराग ठाकुर, प्रवेश वर्मा आदि। इतना ही नहीं केंद्र की मोदी-संघी सरकार ने भाजपा से जुड़े सभी प्रकार के अपराधियों को संरक्षण देने का काम किया, जिसके कारण आज देश की जनता सरकार से पूछना चाहती है कि देश का लोकतंत्र किस हालात में है और वह जनता की रक्षा करने में सक्षम कैसे बन सकता है? जब सत्ता की बाड़ (फेंसिंग) ही लोकतंत्र रूपी खेत को उजाड़ने में लग जाये तो जनता का लोकतंत्र रूपी खेत कैसे बचेगा?
(लेखक सीएसआईआर से सेवानिवृत वरिष्ठ वैज्ञानिक हैं)





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