




2026-02-07 16:59:29
देश में मनुवाद और ब्राह्मणवाद की गहरी घुसपैठ हो चुकी है जो यहाँ पर करीब तीन हजार साल से भारतीय समाज में समाहित है। यह ऐतिहासिक तथ्य है कि देश में बुद्धवाद और ब्राह्मणवाद के बीच घोर संघर्ष रहा है। ब्राह्मणवाद मनुवादी व्यवस्था को सर्वोपरि मानता है और उसी के आधार पर काल्पनिक कथित देवी-देवताओं व भगवानों की रचना करके समाज में परोसता है। इन काल्पनिक मन-गढ़ंत रचनाओं के आधार पर बुद्ध के समता, समानता, स्वतंत्रता और भाईचारे को नष्ट किया है। यह सबकुछ इस तरह से बनाया गया कि जो समाज इससे प्रभावित हुआ है उसे यह पता ही नहीं लग पाये कि तुम्हारा मूल इतिहास क्या है? उन्हें यह भी पता नहीं लग पाये कि तुम्हारा नुकसान है या फायदा? वे सिर्फ मनुवादी संघियों के मानसिक गुलाम बनकर रहें, और मुफ्त की रेवड़ियों के तहत 5 किलो अनाज या 500-1000 रुपए लेकर अपना अमूल्य वोट भाजपा संघियों की झोली में डालते रहें, ताकि मनुवादी संघी सत्ता देश में निरंतरता के साथ कायम रह सके।
01 फरवरी 2026 को राष्ट्रीय बजट संसद में पेश किया गया, जिसे देखकर कोई भी साधारण से साधारण व्यक्ति आसानी से अंदाजा लगा सकता है कि बजट में संघी मानसिकता के अलावा कुछ नहीं है। चूंकि संघियों/ब्राह्मणवादियों की बुनियादी सोच हमेशा से ऐसी रही है कि देश की केवल 5-7 प्रतिशत जनता ही शिक्षित, स्वस्थ और धनवान रहे, बाकी सभी लोग गरीब और असहाय स्थिति में जीने को मजबूर रहें। मोदी-संघियों का यह बजट इस बात को पूर्णतया परिलक्षित करता है कि देश में शिक्षा का बजट पिछले 10 सालों से या तो उसी स्तर पर है या मामूली बढ़ोत्तरी की गयी है। स्वास्थ्य के क्षेत्र में भी कोई खास बजट नहीं दिया गया है, सिर्फ एम्स को कुछ बजट दिया गया है। देश की जनता को यह भी समझना होगा कि एम्स में इलाज सिर्फ राजनीतिक नेताओं, धनाढ्य व्यापारियों व सत्ता से जुड़े संघी लोगों का ही होता है। आम जनता तो एम्स के चक्कर लगा-लगाकर परेशान होकर या तो वहाँ जाना छोड़ देती है, या फिर मरीज ही चल बसता है। डॉ. राम मनोहर लोहिया अस्पताल, पूर्व में स्नातकोत्तर चिकित्सा शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान (पीजीआईएमईआर), नई दिल्ली, भारत में स्थित एक चिकित्सा प्रशिक्षण एवं अनुसंधान संस्थान है। डॉ. राम मनोहर लोहिया अस्पताल का नाम पूर्व में विलिंगडन अस्पताल था, जो एक बहुत ही प्रतिष्ठित सरकारी अस्पताल था, यहाँ के डॉक्टर बहुत ही दक्ष और प्रशिक्षित थे, जनता का इस संस्थान में बहुत विश्वास था। मोदी संघी सरकार जो घोषणाओं और वायदें करने वाली सरकार के रूप में जानी जाती है उसने अपने शीर्ष नेता अटल बिहारी वाजपेयी के नाम पर इस संस्थान की घोषणा तो की लेकिन उसे 2024 तक (यानि पाँच साल तक) इस संस्थान को सुप्तावस्था में रखा। अब अचानक न जाने क्यों संघियों को याद आ गया कि हमने अटल बिहारी वाजपेयी के नाम पर जो संस्थान बनाने की घोषणा की हुई है वह सुप्तावस्था में पड़ी हुई है। इसलिए अब मोदी संघी सरकार ने उसे कुछ फंड मुहैया कराये हैं। देश के शैक्षणिक व औद्योगिक संस्थानों का बजट में कोई खास ध्यान नहीं रखा गया है। शोध व तकनीकी ज्ञान के क्षेत्र में भी बजट अच्छा आबंटित नहीं किया गया है। शायद यही कारण है कि देश में शोध व तकनीकी ज्ञान विश्व के अन्य देशों के सापेक्ष निरंतरता के साथ घट रहा है।
आम जनता खाली हाथ: मोदी-संघियों ने जनता के लिए कोई भी कल्याणकारी योजनाएँ न बनाई है, न उसकी घोषणा की है और न ही बजट में उसके लिए कोई प्रावधान किया है। उन्हें सिर्फ मुफ्त की रेवड़ियों और 5 किलो अनाज पर ही छोड़ दिया गया है। जनता के लिए रोजगार सर्जन करने को कोई महत्व नहीं दिया है। देश में बढ़ती महंगाई और बढ़ती बेरोजगारी को नजरअंदाज किया गया है। मोदी संघी सरकार ने सिर्फ नेशनल हाई-वे और नेशनल कॉरीडोर बनाने पर ध्यान दिया है। जिससे फायदा सिर्फ मोदी के व्यापारी मित्रों को ही पहुँच सकता है, आम जनता को उससे क्या लेना-देना है? आम जनता को तो सिर्फ रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, महंगाई आदि को सुलभ बनाकर राहत देना ही जनहित में माना जाता है जो मोदी संघी सरकारों की मानसिकता में है ही नहीं।
आम आदमी की जेब पर डांका: सरकार की कुल आय में आयकर (व्यक्तिगत कर) की हिस्सेदारी 21 प्रतिशत हो गई है, जो कॉरपोरेट कर (18 प्रतिशत) से अधिक है। यह पिछले एक दशक के उस रुझान को दर्शाता है, जिसमें भारत की कर व्यवस्था का झुकाव कॉरपोरेट्स और अप्रत्यक्ष करों के पक्ष में रहा है। 2019 में सरकार ने कॉरपोरेट टैक्स की दरों में कटौती करते हुए मौजूदा घरेलू कंपनियों के लिए इसे 22 प्रतिशत और नई मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों के लिए 15 प्रतिशत कर दिया था।
‘बजट एट अ ग्लांस’ दस्तावेज के मुताबिक, 2026-27 के लिए कॉरपोरेट टैक्स का बजट अनुमान 12,31,000 करोड़ रुपये है, जबकि आयकर से प्राप्ति का अनुमान 14,66,000 करोड़ रुपये रखा गया है। इसके मुकाबले, साल 2025-26 में कॉरपोरेट टैक्स का बजट अनुमान 10,82,000 करोड़ रुपये था, जबकि आयकर का अनुमान 14,38,000 करोड़ रुपये रहा। उसी साल कॉरपोरेट टैक्स का संशोधित अनुमान 11,09,000 करोड़ रुपये और आयकर का 13,12,000 करोड़ रुपये था।
पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च के अनुसार, 2000-01 से 2023-24 के बीच कॉरपोरेट टैक्स में औसतन 15 प्रतिशत और व्यक्तिगत आयकर में 16 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि हुई। इस अवधि में कुल प्रत्यक्ष करों में आयकर का योगदान बढ़ा है। साल 2023-24 में यह कुल प्रत्यक्ष करों का 53 प्रतिशत रहा, जो 2000-01 में 47 प्रतिशत था। 2026-27 के केंद्रीय बजट के प्रमुख बिंदुओं के अनुसार, सरकार की आय में सबसे बड़ा हिस्सा उधार और देनदारियों का है, जो 24 प्रतिशत है। इसके बाद आयकर (21 प्रतिशत) का स्थान आता है। कॉरपोरेट टैक्स का योगदान 18 प्रतिशत, जीएसटी और अन्य करों का 15 प्रतिशत, गैर-कर राजस्व 10 प्रतिशत, केंद्रीय उत्पाद शुल्क 6 प्रतिशत, सीमा शुल्क 4 प्रतिशत और गैर-ऋण पूंजीगत प्राप्तियां 2 प्रतिशत हैं।
वहीं, सरकार के खर्च की संरचना में राज्यों की करों में हिस्सेदारी (22 प्रतिशत) सबसे अधिक है। इसके बाद ब्याज भुगतान (20 प्रतिशत), केंद्रीय क्षेत्र की योजनाएं (17 प्रतिशत), रक्षा (11 प्रतिशत), अन्य खर्च तथा वित्त आयोग व अन्य ट्रांसफर (दोनों 7 प्रतिशत), और प्रमुख सब्सिडी (6 प्रतिशत) शामिल हैं।
पिछले एक दशक में भारत की कर व्यवस्था ने कॉरपोरेट्स और अप्रत्यक्ष करों को प्राथमिकता दी है। घरेलू कंपनियों के लिए कॉरपोरेट टैक्स 30 प्रतिशत से घटाकर 22 प्रतिशत और नई मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों के लिए 15 प्रतिशत कर दिया गया, लेकिन इसके बावजूद इनसे कर वसूली जीडीपी के 3.5 प्रतिशत से घटकर 2.8 प्रतिशत रह गया। दूसरी ओर, पिछले पांच वर्षों में जीएसटी से होने वाली आय 4.4 लाख करोड़ रुपये से बढ़कर 22.08 लाख करोड़ रुपये हो गई है, जिसमें साल-दर-साल 9.4 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। इस असंतुलित कर व्यवस्था के चलते आर्थिक असमानता बढ़ी है। वर्ल्ड इनइक्वैलिटी रिपोर्ट 2026 के अनुसार, भारत दुनिया के सबसे अधिक असमान देशों में शामिल हो गया है।
रिपोर्ट कहती है, देश की कुल आय का लगभग 58 प्रतिशत शीर्ष 10 प्रतिशत लोगों के पास जाता है, जबकि निचले 50 प्रतिशत लोगों को केवल 15 प्रतिशत ही मिलता है। संपत्ति की असमानता इससे भी अधिक है, सबसे अमीर 10 प्रतिशत के पास कुल संपत्ति का लगभग 65 प्रतिशत और शीर्ष 1 प्रतिशत के पास करीब 40 प्रतिशत संपत्ति है।
क्या कर रही है वित्तमंत्री? वह देश की वित्तमंत्री नहीं है, वे संघ की कठपुतली है और उसी के अनुसार वे देश के वित्त को संभाल रही है क्योंकि संघियों की मूल धारणा है कि देश की अधिकांश जनता को गरीब रखो, वे 10 साल से वित्तमंत्री है लेकिन इन 10 सालों के दौरान वित्तमंत्री और नरेंद्र मोदी के पास देश की जनता को बताने के लिए ऐसे 5 काम नहीं है जिनसे भारत के हालात अच्छे बने हो। अभी हाल में अमेरिका के साथ हुई डील में भारत को बहुत बड़ा नुकसान है। मोदी-संघी मानसिकता के लोग यूएस के साथ हुई डील को ऐसे बजा-बजाकर दिखा रहे हैं कि जैसे देश ने बहुत बड़ी उपलब्धि हासिल कर ली है जबकि हकीकत यह है कि जब भारत का उत्पादित सामान अमेरिका जाएगा तो मोदी सरकार उस पर कोई टैरिफ न लगाएगी और न लेगी लेकिन जो सामान अमेरिका से भारत आएगा उसपर 18 प्रतिशत टैरिफ लगेगा। ऐसी डील को देखकर देश के मूर्खों को भी समझ आता है कि भारत का इसमें कोई फायदा नहीं है, और इस डील से अगर फायदा होगा तो वह अमेरिकन कंपनियों को ही होगा। मोदी की कठपुतली वित्तमंत्री वह पीयूष गोयल वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री इस डील को देश हित में बताकर ऐसे प्रचारित कर रहे हैं, जैसे उन्होंने विश्व युद्ध जीत लिया है। देश की जनता को यह मालूम है कि जबसे मोदी-संघी सरकार सत्ता में हैं तब से साल-दर-साल विश्व बैंक से कर्ज की संख्या बढ़ती ही जा रही है। अंधभक्त और ज्ञान रहित लोग, जनता को यह बताए कि यह कैसा विकास है? जिसमें जनता के ऊपर कर्जा बढ़ता ही जा रहा है और संघी मानसिकता के मंत्री और अंधभक्त यह प्रचार करते हुए नहीं थक रहे हैं कि मोदी के नेतृत्व में देश विकसित हो रहा है?
विकास या विनाश? निश्चित ही जब किसी देश पर आर्थिक बोझ ऋण के रूप में बढ़ता है तो वह विकास को नहीं, विनाश को ही इंगित करता है। मोदी संघी शासन में सिर्फ घोषणाएँ हो रही है काम जमीन पर नहीं है। संघियों की कार्यशैली ऐसी है कि या तो अतीत की बात करो या 50 साल आगे की बात करो। वर्तमान में जब उनकी सरकार है उस पर कोई चर्चा मत करो। देश की शिक्षा और स्वास्थ्य नीति को बर्बाद कर दो। मंत्रियों और संघियों का जोर ज्यादातर इस बात पर रहे कि देश विकास की ओर बढ़ रहा है, 2047 तक देश मोदी के नेतृत्व में विकास की ओर बढ़ जाएगा यह एक कोरा जुमला है। मोदी ने जो काम पिछले 12 साल में नहीं किए उसके लिए जिम्मेदार कौन है? जिन लोगों को मोदी काल में नौकरियाँ नहीं मिल पाई वे स्थायी रूप से बेरोजगार बना दिये गए हैं उनके परिवार और जीवन का क्या होगा?
एससी/एसटी/पिछड़ा समुदाय व अल्पसंख्यक अपने आपको मोदी और संघियों के छलावों से बचाए और इनके छलावे में न फंसे। उसे अपने समाज (जातीय घटक) के राजनैतिक नेताओं से अधिक सावधान रहने की जरूरत है। चूंकि ये ही वे लोग है जो समाज की भोली-भाली जनता को मनुवादी संघियों की कथाओं में, सत्संगों में आदि में ले जाने का कार्य छिपे ढंग से कर रहे हैं। इस भोली-भाली जनता का वोट संघी मानसिकता के लोगों को अदृश्य रूप से दिलवा रहे हैं। ये समाज के राजनेता नहीं, बल्कि ये मनुवादियों के दलाल हैं इनसे बचोगे तो सुरक्षित भी रहोगे और अपने परिवार व बच्चों को तरक्की के रास्ते पर अग्रसर कर सकोगे! मोदी हटाओ, देश बचाओ





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