




2026-06-12 20:06:38
विधायिका, कार्यपालिका, न्यायपालिका और मीडिया लोकतांत्रिक व्यवस्था के चार प्रमुख स्तम्भ माने जाते हैं। स्वस्थ और जीवंत लोकतंत्र में मीडिया एक आवश्यक स्तम्भ है। इसका मुख्य कार्य सत्ता में बैठे लोगों से तीखे सवाल पूछना, हाशिए पर पड़े लोगों की आवाज बनना और समाज के सामने बिना किसी भेदभाव के सत्य को प्रस्तुत करना होता है। लेकिन मोदी शासन में मुख्यधारा के मीडिया का चरित्र, उसकी कार्यप्रणाली और संरचना में जो भयानक गिरावट आई है, उसने इसे लोकतंत्र के रक्षक के बजाय सत्ता का प्रचारक और भोंपू बनाकर रख दिया है। मीडिया पर जो सबसे गंभीर आरोप लगे हैं, वे हैं-सत्ता की मानसिक गुलामी, संस्थागत भ्रष्टाचार और ब्राह्मणवादी-सवर्ण वर्चस्व।
गोदी मीडिया: गोदी मीडिया शब्द अब भारतीय राजनीतिक और सामाजिक विमर्श का एक स्थायी हिस्सा बन चुका है। यह उस मीडिया को संदर्भित करता है जो सत्ता की गोद में बैठ गया है और जिसने सरकार से सवाल पूछने की अपनी बुनियादी जिम्मेदारी को पूरी तरह से त्याग दिया है। पत्रकारिता का नियम है कि सवाल हमेशा उससे पूछे जाते हैं जिसके पास सत्ता होती है। लेकिन भारतीय टीवी चैनलों के प्राइम टाइम ने इस नियम को पलट दिया है। आज का मीडिया सरकार की विफलताओं-जैसे महंगाई, बेरोजगारी, स्वास्थ्य समस्या, शिक्षा के क्षेत्र में भारी गिरावट, पेपर लीक, आर्थिक विषमता आदि पर सवाल पूछने के बजाय, विपक्ष, सामाजिक कार्यकतार्ओं और आम जनता से ही सवाल पूछता नजर आता है।
एजेंडा-संचालित विमर्श: नोम चॉम्स्की के मैन्युफैक्चरिंग कंसेंट के सिद्धांत को भारतीय मीडिया ने पूरी तरह अपना लिया है। मीडिया सत्ताधारी दल के राजनीतिक एजेंडे को स्थापित करने के लिए एक ईको-चैंबर की तरह काम कर रहा है। जब भी देश में मोदी सरकार की नीतियों के खिलाफ विपक्ष जनता की बात सदन में रखता है तो, मोदी का गोदी मीडिया तुरंत जनता का ध्यान भटकाने के लिए सांप्रदायिक (हिंदू-मुस्लिम) मुद्दों, छद्म राष्ट्रवाद, या किसी बॉलीवुड विवाद को राष्ट्रीय बहस का विषय बनाकर भ्रमित कर देता है। यह मानसिक गुलामी का चरमोत्कर्ष है, जहां पत्रकार अपनी स्वतंत्र सोच को मोदी-संघी सरकार के सामने गिरवी रखकर केवल स्क्रिप्ट रीडर बन गया है।
मीडिया पर ब्राह्मणवादी वर्चस्व: भारतीय मीडिया की आलोचना केवल उसकी सत्ता-भक्ति तक सीमित नहीं है बल्कि इसका एक बहुत बड़ा समाजशास्त्रीय कारण भी है, जिसे अक्सर ब्राह्मणवादी मीडिया या सवर्ण वर्चस्व कहा जाता है। आॅक्सफैम इंडिया और न्यूजलॉन्ड्री की कई प्रतिष्ठित और विस्तृत रिपोर्ट्स बार-बार यह साबित कर चुकी हैं कि भारतीय मीडिया घरानों के नेतृत्व, संपादक स्तर और प्राइम-टाइम एंकरिंग में दलित, आदिवासी और पिछड़े वर्गों का प्रतिनिधित्व नगण्य है। 90 प्रतिशत से अधिक प्रमुख पदों पर केवल ब्राह्मणवादी मानसिकता का कब्जा है। जब न्यूजरूम में बहुजन समाज (एससी, एससी, ओबीसी, अल्पसंख्यक) जो देश की आबादी का 80-85 प्रतिशत हिस्सा है, का प्रतिनिधित्व ही नहीं होगा, तो उनकी खबरें भी राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा नहीं बन पाएँगी। देश के दूर-दराज इलाकों में दलितों और आदिवासियों पर होने वाले अत्याचारों को मोदी-संघी सरकारें उन्हें अक्सर लोकल क्राइम मानकर छोटी सी जगह देती है, जबकि किसी बड़े शहर की मामूली घटना हफ्तों तक प्राइम टाइम पर छाई रहती है। हाल ही में जब देशभर में जातीय जनगणना की मांग उठी, तो मुख्यधारा के संघी मीडिया ने इसे समाज को बांटने वाली चाल के रूप में पेश किया। आरक्षण के मुद्दे पर होने वाली टीवी बहसों में अक्सर सवर्ण मानसिकता हावी रहती है, चूंकि ऐसी बहसों में हिस्सा लेने वाले कठोर सवर्ण मानसिकता के लोग ही अधिक रखे जाते हैं, जहां सामाजिक न्याय को मेरिट के खिलाफ बताकर एकतरफा बनावटी नैरेटिव गढ़ा जाता है। यही वैचारिक आधिपत्य और सामाजिक विविधता का अभाव इस मीडिया को ब्राह्मणवादी या जातिवादी स्वरूप प्रदान करता है।
संस्थागत भ्रष्टाचार और कॉपोर्रेट-सत्ता का गठजोड़: भारतीय मीडिया की मानसिक गुलामी रातों-रात पैदा नहीं हुई है; इसके पीछे एक गहरा वित्तीय भ्रष्टाचार और कॉपोर्रेट अधिग्रहण है। आज देश के सबसे बड़े समाचार नेटवर्क उन चंद कॉपोर्रेट घरानों के स्वामित्व में हैं, जिनके व्यापारिक हित सीधे तौर पर सरकार की नीतियों और ठेकों पर निर्भर करते हैं। जब मीडिया का मालिक वहीं व्यक्ति हो जिसे सरकार से खदानों, हवाई अड्डों, बंदरगाहों या बुनियादी ढांचे के ठेके चाहिए, तो उसका न्यूज चैनल कभी भी सरकार की नीतियों की निष्पक्ष आलोचना नहीं कर सकता। मीडिया घरानों का रेवेन्यू मॉडल पूरी तरह से सरकारी विज्ञापनों पर निर्भर हो गया है। वर्तमान समय में मोदी संघी सरकारें करोड़ों रुपये के सरकारी विज्ञापन केवल उन चैनलों और अखबारों को देती हैं जो उनके पक्ष में खबरें दिखाते और छापते हैं। जो संस्थान थोड़ी भी स्वतंत्रता दिखाने की कोशिश करते हैं, उनका विज्ञापन रोककर उनकी आर्थिक कमर तोड़ दी जाती है। अधिक दर्शक जुटाने के लिए नफरत फैलाना और चीखने-चिल्लाने वाली बहसें करवाना संघियों का एक बिजनेस मॉडल बन गया है। टीआरपी के भ्रष्टाचार ने पत्रकारिता की नैतिकता को पूरी तरह नष्ट कर दिया है। इसके अतिरिक्त, चुनाव के समय पेड न्यूज (पैसे लेकर खबर छापना) अब इतने परिष्कृत रूप में आ गई है कि आम पाठक खबर और विज्ञापन के बीच का अंतर ही नहीं समझ पाता।
मीडिया के पतन के प्रमाण: मोदी-संघी शासन में, विशेषकर 2024 के चुनावों और उसके बाद के घटनाक्रमों में भारतीय मीडिया का यह घिनौना रूप कई बार सामने आया है। लोकसभा और विभिन्न राज्यों के चुनावों के दौरान, मीडिया ने एक निष्पक्ष अंपायर की भूमिका निभाने के बजाय एक चीयरलीडर की भूमिका निभाई है। बेरोजगारी दर एक ऐतिहासिक स्तर पर होने, चुनावी बॉन्ड के रूप में सामने आए सबसे बड़े संस्थागत भ्रष्टाचार और महंगाई जैसे वास्तविक मुद्दों पर चर्चा करने के बजाय, मीडिया ने चुनाव को केवल हिंदू-मुस्लिम, मंगलसूत्र, और भावनात्मक ध्रुवीकरण के मुद्दों तक सीमित कर दिया। एग्जिट पोल्स में शेयर बाजार के निवेशकों को भ्रमित करने वाले आंकड़े पेश किए गए, जिस पर बाद में गंभीर सवाल भी उठे। जब भी देश का कोई वर्ग अपने अधिकारों के लिए सड़क पर उतरता है, तो गोदी मीडिया सबसे पहले उसे बदनाम करने का काम करना शुरू कर देता है। चाहे वह एमएसपी की कानूनी गारंटी मांग रहे किसान हों या रोजगार की मांग कर रहे युवा। सरकारी मीडिया तुरंत उन्हें टूलकिट गैंग, खालिस्तानी या राष्ट्र-विरोधी घोषित करने का एजेंडा चलाने लगता है। सत्ता की जवाबदेही तय करने के बजाय, शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों का ही मीडिया ट्रायल शुरू कर देता है। जब ईडी या सीबीआई विपक्षी नेताओं या स्वतंत्र पत्रकारों पर छापेमारी करती है, तो गोदी मीडिया बिना अदालत के फैसले के ही उन्हें अपराधी घोषित कर देता है। लेकिन जब वही दागी नेता सत्ताधारी दल में शामिल हो जाते हैं और उनकी फाइलें बंद हो जाती हैं, तो यह तथाकथित जागरूक मीडिया पूरी तरह से रहस्यमयी चुप्पी साध लेता है। जब संसद या सड़कों पर सामाजिक न्याय, वंचित वर्गों के अधिकारों और संविधान बचाने की बात उठती है, तो मुख्यधारा का मीडिया उस बहस को गायब कर देता है। बहुजन समाज के नेताओं के बयानों को अक्सर तोड़-मरोड़ कर पेश किया जाता है, जबकि सत्ता पक्ष के नफरती भाषणों को मास्टरस्ट्रोक या राष्ट्रवाद का नाम देकर महिमामंडित किया जाता है।
समाज और लोकतंत्र पर इसका विनाशकारी प्रभाव: मीडिया के इस पतन ने भारतीय समाज और लोकतांत्रिक ढांचे को गहरी और अपूरणीय क्षति पहुंचाई हैं। टीवी स्टूडियो आज नफरत की फैक्टरियां बन चुके हैं। हर समय फैलाई जाने वाली सांप्रदायिक नफरत का सीधा असर समाज पर दिख रहा है। अल्पसंख्यकों व वंचित-शोषित वर्गों के खिलाफ बढ़ती हिंसा और असहिष्णुता में इस संघी गोदी मीडिया की सबसे बड़ी भूमिका है। जब मीडिया खुद सत्ता का हिस्सा बन जाता है, तो चुनाव आयोग, न्यायपालिका और जांच एजेंसियों जैसी अन्य लोकतांत्रिक व संवैधानिक संस्थाओं पर जनता का दबाव और विश्वास खत्म हो जाता है। मीडिया की चुप्पी इन संस्थाओं को मनमानी करने की खुली छूट देती है। जनता को लगातार झूठे तथ्य और व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी का ज्ञान परोसकर, नागरिकों की सोचने, समझने और तर्क करने की क्षमता को कुंद कर दिया जाता है।
वैकल्पिक मीडिया (सोशल मीडिया) का उदय: यह सच है कि मुख्यधारा का मीडिया पूरी तरह से सड़ चुका है, लेकिन उम्मीद अभी खत्म नहीं हुई है। इस अंधकारमय दौर में सोशल मीडिया एक नई किरण बनकर उभरा है। जिन वंचित वर्गों (दलित, पिछड़े, आदिवासी) को मुख्यधारा के मीडिया ने जगह नहीं दी, उन्होंने यू-ट्यूब और डिजिटल पोर्टल्स के माध्यम से अपना खुद का मीडिया खड़ा कर लिया है। आज कई स्वतंत्र पत्रकार, बिना किसी भारी भरकम बजट के, मोबाइल फोन और जनता के चंदे के दम पर सत्ता की आंखों में आंखें डालकर सवाल पूछ रहे हैं। अब जिम्मेदारी देश के जागरूक नागरिकों पर है। उन्हें यह समझना होगा कि जो सूचना मुफ्त में दी जा रही है, वह खबर नहीं बल्कि मनुवादी और ब्राह्मणवादी प्रोपेगैंडा है। सच्ची और निष्पक्ष पत्रकारिता को जीवित रखने के लिए पाठकों और दर्शकों को स्वतंत्र मीडिया संस्थानों को आर्थिक रूप से समर्थन देना चाहिए। जब तक देश के न्यूजरूम में भारत की वास्तविक सामाजिक विविधता नहीं दिखेगी, तब तक वहां से निकलने वाली खबरें भी एकांगी और सवर्ण-वर्चस्व वाली ही होंगी। मीडिया घरानों में समावेशिता और प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना अत्यंत आवश्यक है।
भारतीय मीडिया का वर्तमान स्वरूप लोकतंत्र के लिए खतरा बन चुका है। सत्ता की चाटुकारिता (गोदी मीडिया), बेतहाशा संस्थागत भ्रष्टाचार और मनुवादी वर्ग का वैचारिक वर्चस्व (ब्राह्मणवादी व्यवस्था) ने इसे एक खतरनाक हथियार में बदल दिया है जो आम जनता के ही खिलाफ इस्तेमाल हो रहा है। विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में भारत की लगातार दयनीय स्थिति इसी वास्तविकता का अंतरराष्ट्रीय प्रमाण है। लोकतंत्र तभी जीवित रह सकता है जब उसका चौथा स्तंभ स्वतंत्र, निष्पक्ष, और हर तरह के पूर्वाग्रहों से मुक्त हो। भारत को एक ऐसे मीडिया की आवश्यकता है जो कॉपोर्रेट दफ्तरों से नहीं, बल्कि आम आदमी की चौखट से अपनी खबरें तय करे।
मीडिया की वर्तमान स्थिति को देखकर वंचित व शोषित समाज की जनता को सोशल मीडिया के माध्यम से वंचित व शोषित वर्ग के ऊपर घट रही घटनाओं को व्यापक रूप से प्रसारित करके जनता को जागरूक करना होगा। इसी के साथ वंचित व शोषित समाज को यह प्रण भी करना होगा कि वर्तमान में मुख्यधारा के संस्थानों द्वारा चलाये जा रहे टीवी न्यूज प्लेटफॉर्म आदि को देखना बंद करना होगा और संघी व ब्राह्मणवादी मानसिकता के द्वारा चलाये जा रहे समाचार पत्रों को खरीदना व पढ़ना बंद करना होगा। वंचित व शोषित समाज के जागरूक लोगों को अपने समाचार पत्र व न्यूजचैनल स्थापित करने होंगे और उन्हीं पर विश्वास करना होगा। लोगों को इस कार्य के लिए सशक्त प्रेरक पैदा करके समाज में जागरूकता फैलानी होगी। इस प्रक्रिया के द्वारा बहुजन समाज देश में एक सशक्त मीडिया और जागरूक जनता का निर्माण कर सकता है। सभी को इस कार्य को कार्यरूप देने के लिए समाज में जगह-जगह वैचारिक संगोष्ठियाँ व जागरूकता कार्यक्रम विधिवत रूप से लगातार चलाने होंगे।





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