2024-12-30 11:29:11
मोदी-भाजपा की मानसिकता संघी षड्यंत्रों से निर्मित है। संघी मानसिकता चिरकाल से ही षड्यंत्रकारी रही है। संघियों के प्रेरकों ने उनकी षड्यंत्रकारी संस्कृति को समाज के लोगों की आंतरिक संरचना में बारम्बारता की विधि अपनाकर समाहित कर दिया है। बारम्बारता का अर्थ है कि अपनी किसी झूठी बात को सैंकड़ों बार लोगों में बोलों, जोर-जोर से बोलते ही रहो, समाज के लोगों में जहाँ भी बैठों वहीं पर अपनी बात को बार-बार दोहराते रहो, जनता द्वारा किये गए सवालों का जवाब भी अपनी झूठी और पाखंड भरी बातों से ही दो और उनका पीछा जब तक मत छोड़ो, तब तक सुनने वाले लोगों में कम से कम आधे लोग आपकी बात का समर्थन करते न दिखें। इसी प्रक्रिया से झूठ और पाखंड की बुनियाद समाज के भोले-भाले लोगों में आसानी से समाहित की जा सकती है। आज देश में मोदी-भाजपा का जो पाखंड भरा ब्राह्मणवाद चरम पर दिखाई दे रहा है वह संघियों की इसी प्रकिया का प्रतिफल है। भारत में चिरकाल से संघी मानसिकता के लोग मौजूद रहे हैं और उन्होंने चिरकाल से देश की भोली-भाली जनता को झूठ और पाखंड की प्रक्रिया से छला और ठगा है। समय परिवर्तनशील है और ये परिवर्तन समाज में मनुष्यों द्वारा स्वत: ही जरूरत के हिसाब से पैदा होता रहता है। वर्तमान समय संचार क्रांति का युग है, लोगों में इस संचार क्रांति के युग में अपनी बात एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुँचाने की क्षमता असीम है। आज किसी एक जगह पर बैठा हुआ व्यक्ति अपनी बात को व्यापक रूप से वैश्विक स्तर पर बिना समय गवाएँ पहुँचाने की क्षमता रखता है। आज इस सूचना क्रांति के युग में झूठ और पाखंड को पहचाने और पकड़ने की क्षमता भी बढ़ी है। जिसका फायदा आम जनता के लोगों को एक सीमा तक मिल रहा है। जिसके परिणामस्वरूप संघी-मोदी के द्वारा परोसा गया झूठ और पाखंड तुरंत पकड़ा जा रहा है। इसकी महत्वता और जरूरत इसलिए भी अधिक बढ़ गई है चूंकि मनुष्य की अपनी स्मृति की एक सीमा है और समय अंतराल के बाद उसका लोप भी हो जाता है। संचार क्रांति और उसकी सहयोगी तकनीकियों ने मनुष्य के ज्ञान और स्मृति को आज पूर्ण रूप से सुरक्षित कर दिया है। मनुष्य द्वारा अपने आचरण व वक्तव्यों से दिखाई गई और बोली गई बातों को इन तकनीकीयों द्वारा कभी भी जनता के सामने पूर्ण सत्यता के साथ रखा जा सकता है। परंतु संघी मानसकिता के लोग इतने निर्लज्ज और बेशर्म होते हैं कि अगर अतीत में उनके द्वारा किये गए शर्मनाक कृत्यों को उनके सामने रखा जाता है तो वे तब भी कुछ शर्म और लिहाज महसूस नहीं करते। अगर हम इसे आम ग्रामीण भाषा में कहे कि वे इतने निर्लज्ज व चिकने घड़े होते हैं कि उनपर कोई भी सच्चाई का पानी नहीं टिकता। वर्तमान समय में संघी मानसिकता का वर्चस्व समाज के लोगों के ऊपर धन-बल और सत्ता बल से इस कदर चढ़ा दिया गया है कि आम जनता में अच्छाई और बुराई को समझने की क्षमता सामान्य तौर पर खत्म सी हो गई है। अगर हम इसे यूँ कहें कि मोदी संघियों की बिग्रेड ने देश में अंधभक्तों की भीड़ को इस कदर बढ़ा दिया है कि देश में कोई भी वैज्ञानिक और तर्कसंगत बातें करना अपराध जैसा लगता है। जब देश की जनता में ऐसी स्थिति पैदा हो जाती है, तब वैज्ञानिक व तर्कसंगत सोच रखने वाले लोगों को समझ लेना चाहिए कि अब यहाँ पर मनुष्य उपयोगी कोई भी ज्ञान पैदा नहीं हो सकता है। उसकी सभी संभावनाएँ और क्षमता खत्म हो चुकी है। आज देश में मोदी संघी भाजपा ने देशवासियों के सामने यही स्थिति पैदा करके लोगों को दिखा दिया है कि मोदी भाजपा में सिर्फ अन्धभक्त और संघी मानसिकता के लोग ही फल-फूल सकेंगे।
संघियों की बाबा साहेब को लेकर झूठी-पाखंडी सोच: देश की पढ़ी-लिखी और जागरूक जनता यह भली-भांति जान चुकी है कि संघी और मनुवादी मानसिकता के लोग हमेशा से ही बाबा साहेब के विचारों के विरोधी रहे हैं। बाबा साहब डॉ. अम्बेडकर जब संविधान निर्माण की प्रक्रिया में व्यस्त थे तभी से संघियों ने उनके खिलाफ घृणित व्यवहार का मोर्चा खोलकर रखा हुआ था। संघी मानसिकता के लोग चाहे वे कांग्रेस पार्टी में हों या तत्कालीन जनसंघ पार्टी में रहे उन सभी में ब्राह्मणी मानसिकता का वर्चस्व था। बाल गंगाधर तिलक एक कठोर ब्राह्मणी संघी मानसिकता के व्यक्ति थे जोकि कहने के लिए कांग्रेस में थे मगर वे ब्राह्मणी संघी संस्कृति के कट्टर समर्थक भी थे। डॉ. मुंजे भी एक कट्टर ब्राह्मणी संस्कृति के व्यक्ति थे जिनमें संघी सोच गहराई तक समाहित थी। जब 1924 में गांधी कांग्रेस के अध्यक्ष बने तब गांधी ने कांग्रेस के संविधान में दो प्रावधानों को जोड़ा जिसमें एक था ‘धर्मनिपेक्षता’ और दूसरा ‘अहिंसा’। जिन्हें लेकर संघी सोच के मुंजे ने कांग्रेस को छोड़ दिया था और वे हिन्दू महासभा में चले गए थे। इसी तरह सावरकर जो बहुत ही गहराई तक संघी हिंदुत्ववादी विचारधारा से संक्रमित थे उन्होंने भी बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर के बारे में घृणित और निम्न स्तर की टिप्पणी की थी। इसलिए मोदी भाजपा के जो लोग आज अपने आपको बाबा साहेब के सम्मान में खड़ा दिखाने की चेष्टा कर रहे हैं उन्हें ये मालूम होना चाहिए कि अब बाबा साहेब के परिश्रम और कृपा से उनके अनुयायी पढ़-लिखकर इतने समझदार और सक्षम हो गए हैं कि वे अब संघियों की घृणित सोच और इतिहास को अच्छी तरह समझते हैं और इसी सोच के कारण उनसे दूरी बनाकर भी रखते हैं। बहुजन समाज की जागरूक जनता यह समझ चुकी है कि इस देश में बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर के अनुयायियों का सबसे बड़ा दुश्मन अगर कोई है तो वह सिर्फ ब्राह्मणवादी वर्चस्व और मनुवादी संस्कृति के लोग ही है। चाहे वे किसी भी धर्म, जाति व पार्टी के क्यों न हो। मनुवादी संघी सोच के व्यक्ति इस देश की आम जनता में हर राजनैतिक पार्टी में हैं अगर ऐसे संघी मानसिकता के लोग अपने आपको दूध का धुला दिखाने की कोशिश करते हैं तो वे सिर्फ अपनी अतीत की छलावामयी ब्राह्मणी संस्कृति को ही उजागर करते हैं। आज बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर के अनुयायी यह समझने में सक्षम है कि उनके लिए क्या अच्छा है और क्या बुरा है। साथ ही वर्तमान मोदी-संघी सरकार यह भी समझ ले कि जो आरक्षित सीटों से जीतकर आए अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोग मोदी-संघी समर्थक बने हुए है, उन्हें अम्बेडकरवादी लोग अपना नहीं मानते हैं, उन्हें सिर्फ मोदी का गुलाम और संघी ही समझा जाता है। बहुजन समाज ने ऐसे सभी मोदी समर्थक स्वार्थी लोगों को हराने का संकल्प लिया हुआ है। मोदी जी ये समझ लें कि जो आप कह रहे हैं कि कांग्रेस ने बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर का अपमान किया था शायद वह अपमान संघियों द्वारा किये गए अपमान से कहीं कम था। बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर के अनुयायी आज इस बात को समझकर ही आचरण कर रहे हैं।
अम्बेडकरवादियों से अनुरोध: बाबा साहब डॉ.अम्बेडकर के अथक परिश्रम के कारण आज देश की जनता पहले के मुकाबले जागरूक है, मगर हमें यह भी ध्यान में रखना है कि बहुजन समाज के सामाजिक संगठन अमित शाह के बयान को लेकर दो धड़ो में बंटते दिखाई दे रहे हैं। एक धड़ा अमित शाह के त्याग पत्र की माँग करता दिख रहा है और दूसरा धडा अमित शाह के द्वारा सिर्फ मांफी माँगने की बात कर रहा है। इन दोनों धड़ों में देश की जागरूक अम्बेडकरवादी जनता को यह भी लग रहा है कि जो सामाजिक और राजनैतिक लोग अमित शाह से सिर्फ मांफी माँगने की माँग कर रहे हैं वे सच्चे मायनों में बाबा साहेब डॉ.अम्बेडकर के समर्थक नहीं हैं। वे सिर्फ दिखावे के तौर पर अपने आपका अम्बेडकरवादी दिखाने का ढोंग कर रहे हैं। आज समाज के तथाकथित अम्बेडकरवादी संगठन संघी और मनुवादियों के धन-बल पर ही पलते हैं उन्हीं की राजनीति को अंदर से समर्थन करते हैं, ऐसे ही तथाकथित अम्बेडकरवादी संगठनों से आज देश में अम्बेडकरवाद को अधिक खतरा है। इन भाजपा संघी समर्थक अम्बेडकरवादी संगठनों से अधिक बचकर रहना ही समाज हित में है। वास्तव में ये सभी लोग अम्बेडकरवाद का चोला पहनकर संघी मानसिकता के लोगों को मजबूत करने का काम कर रहे हैं और उन्हीं के धन-बल के सहारे अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को छिपे-छिपे पूरा कर रहे हैं। आज समाज ऐसे लोगों की मानसिकता को भली-भाँति समझ चुका है। जिसका सबसे बड़ा उदाहरण आप सब इस बात से समझ सकते हैं कि बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर ने अपने जीवन काल में हमारे लिए तीन संस्थाओं का निर्माण किया। जिनमें समता सैनिक दल, दि बुद्धिस्ट सोसाइटी आॅफ इंडिया, रिपब्लिकन पार्टी आॅफ इंडिया है। जिनमें आपस में ही सिर फुट्व्वल है, सभी दर्जनों टुकड़ों में विभक्त है, सभी में व्यक्तिगत वर्चस्व और स्वार्थ सर्वोपरि है। जिसके कारण ये सभी सामाजिक व राजनैतिक संगठन अपने मूल उद्देश्यों व लक्ष्यों को पाने में विफल है और दिनोंदिन देश की जागरूक जनता का भरोसा भी इन सामाजिक संगठनों से उठता जा रहा है। देश की शासन सत्ता में अपनी संख्याबल के आधार पर शक्ति और हिस्सेदारी की बात करने के लिए सामाजिक जड़ों को सींचकर मजबूत करना पड़ेगा तभी समाज बाबा साहेब डॉ.अम्बेडकर व मान्यवर साहब कांशीराम जी के द्वारा सुझाएँ गए मार्ग पर चलकर लक्षित उद्देश्य प्राप्ति की तरफ बढ़ सकेगा।
लक्षित उद्देश्य प्राप्ति के लिए, सामाजिक प्रेरकों की नगण्यता: आज समाज पहले की अपेक्षा शिक्षित और जागरूक भी हुआ है। मगर समाज में अम्बेडकरवादी प्रेरकों की नगण्यता है। हम जिस दुश्मन का मुकाबला करने की बात जनता को बता रहे हैं उस समाज में उनके प्रेरकों की बहुत बड़ी भूमिका है। उनके समाज का हर वरिष्ठ व्यक्ति बिना किसी स्वार्थ के अपना दायित्व समझकर सुबह 4 बजे उठकर, गली-कूचों में घूम-घूमकर अपने समाज के युवकों और युवतियों को प्रेरित करके अपनी शाखाओं में बुलाने का काम करते हैं और वहीं पर वे उनमें अपनी संघी मानसिकता के वायरस को फैलाने का काम भी करते हैं। जो आज समाज में मोदी-संघी भाजपा के अंधभक्त दिखाई दे रहे हैं वह इसी प्रक्रिया का प्रतिफल है। आज के सच्चे अम्बेडकरवादियों की विडंबना यह है कि न तो उनके समाज में प्रेरक बन रहे हैं और जो तथाकथित अम्बेडकरवादी दिखाई दे रहे हैं वे अधिकांशतया कमजोर सोच, संघी मानसिकता के वायरस से संक्रमित है। तथाकथित अम्बेडकरवादी अपने छिपे राजनैतिक स्वार्थ के कारण समाज के सबसे बड़े दुश्मन संघियों की राजनैतिक शाखा मोदी-भाजपा के तलवे चाट रहे हैं और समाज के सामने झूठ बोलकर यह दर्शाने में लगे हैं कि हम अम्बेडकरवादी और संघियों के विरोधी है। मगर ऐसा सत्य नहीं है, अगर ये सत्य होता तो संघी मानसिकता की सरकारें देश के प्रेदेशों और केंद्र में नजर नहीं आती।
संघी शैली से कैसे निपटा जाये? आज देश में हजारों की संख्या में राजनैतिक और लाखों की संख्या में सामाजिक संगठन है, लेकिन इन सबके बावजूद भी देश की जनता त्रस्त और समाधान विहीन है। देश में प्रजातांत्रिक व्यवस्था है और प्रजातांत्रिक व्यवस्था में प्रजा ही सर्वोपरि होती है। लेकिन प्रजा के त्रस्त बने रहने का कारण यह है कि देश की जनता में आपसी बिखराव है, समाज में एकजुटता नहीं है, समाज में एकरूपता और समग्रता भी नहीं है। समाज का हर व्यक्ति ‘एकला चलो’ की नीति पर चलकर अपने आपको श्रेष्ठ समझ रहा है। वह समाज में रहकर आपस में कोई व्यवहार नहीं रख रहा है और समाज को किसी भी प्रकार का सहयोग भी नहीं कर रहा है। ऐसी सोच के कारण ही आज समाज दिनों-दिन कमजोर होता जा रहा है, आपस में अपनत्व की भावना खत्म हो रही है, समाज का प्रत्येक व्यक्ति अपने भाई से ही प्रतिस्पर्धा और ईर्ष्या करने में लगा हुआ है। ऐसी नीतियों के कारण ही समाज दिनों-दिन आपस में बाँटता और कमजोर होता जा रहा है। समाज को आज सबसे अधिक जरूरत एकजुट होने की है, आपस में बिना किसी भेदभाव के एकता कायम करने की है, हिंदुत्ववादी क्रमिक ऊँच-नीच के क्रत्रिम जाल में फँसने की जरूरत नहीं है। बहुजन समाज के सभी जातीय घटकों को जातिवाद की भावना से ऊपर उठकर अपनी एकता और एकजुटता को मजबूत करने के बारे में सोचना होगा। देश की अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, गैर सामंतवादी पिछड़ी जातियाँ और मुस्लिम समाज की कामगार जातियों का मूल एक ही है। ये सभी समुदाय एक ही मूल से पैदा हुए हैं इन सभी को अपने मूल को पहचानकर और जानकर देश में राजनैतिक सत्ता पाने के लिए अबाध्य रूप से एक होना होगा।
मोदी-संघियों की मानसिकता का खुला प्रदर्शन: मोदी-संघी सरकार ने 3 जून 2024 को पुरानी संसद भवन के प्रागंण से बाबा साहेब की प्रतिमा को बिना किसी पूर्व सूचना के चुपचाप रात के अंधेरे में हटा दिया था। जो यह दर्शाता है कि मोदी-संघी सरकार के दिल और दिमाग में अपने पूर्ववर्ती संघी नायकों की तरह ही बाबा साहेब के प्रति कितनी घृणा मौजूद है। इस मुद्दे पर बाबा साहेब के अनुयायियों ने विरोध के साथ-साथ सरकार के मंत्री व अधिकारियों से मिलकर ज्ञापन भी दिये और उनसे आग्रह भी किया कि प्रतिमा को उसी स्थान पर पुन: लगाया जाये लेकिन सरकार ने आज तक इसपर कोई जवाब नहीं दिया। तो मोदी कांग्रेस को दोष देने से पहले अपने गरेंवां में झांके और लागों को उल्लू न समझें।
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