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मनुवाद क्या है? मनुवाद वह प्राचीन व्यवस्था और मानसिकता है जो जन्म आधारित जातिगत श्रेष्ठता, सामाजिक असमानता और पितृसत्तात्मक नियंत्रण का समर्थन करती है; जबकि आधुनिक लोकतांत्रिक मूल्य और भारतीय संविधान इसके ठीक विपरीत समानता, मानवीय गरिमा और न्याय की स्थापना करते हैं।
समाज गवाह है कि जब सुबह सूरज निकलता है, तो गलियों और सड़कों पर तीन प्रकार के व्यक्ति नजर आते हैं। एक व्यक्ति के हाथ में झाड़ू होता है, जो अपने परिश्रम से गली-मौहल्ले और सड़कों की सफाई करता है, जिसे देखकर वहाँ से गुजरने वाले व्यक्ति खुश होते हैं। सफाई के काम से जुड़े व्यक्ति की जेब आमतौर पर खाली रहती है। वह व्यक्ति अपने इस काम के बदले एमसीडी या दूसरी स्थानीय संस्थाओं के द्वारा अपने सफाई के काम के बदले एक नियमित सैलरी पाता है, जिससे वह अपने परिवार की जीविका चलाता है। सफाई से जुड़े इस व्यक्ति को आमतौर पर लोग ‘वाल्मीकि समुदाय’ के नाम से जानते हैं। अधिसंख्या में वाल्मीकि समाज आर्थिक रूप से कमजोर है। इस समाज के अधिकांश व्यक्ति कथित ब्राह्मणी संस्कृति की अंधश्रद्धा में फंसे हुए हैं। मनुवादी सामाजिक व्यवस्था में जितने भी घृणित काम होते हैं वे सभी कार्य वाल्मीकि व अन्य निम्न समुदाय के व्यक्ति ही करते हैं। इस प्रकार देश के शहरों, कस्बों, गांवों को साफ-सुथरा रखने में वाल्मीकि समुदाय का महत्वपूर्ण योगदान है। चूंकि इसी समुदाय के श्रमिक बल के आधार पर गली-मौहल्ले, सड़क साफ-सुथरे और स्वस्थ दिखाई देते है। मनुवादी व्यवस्था के तहत इन्हें नीचा समझा जाता है। यह कितनी बड़ी विडम्बना है कि जो समुदाय समाज से गंदगी साफ करता है उसे असभ्य व नीच माना जाता है और जो समुदाय समाज में गंदगी फैलाता है उसे सभ्य और उच्च माना जाता है।
दूसरे प्रकार का व्यक्ति हाथ में पानी की बाल्टी और कंधों पर पुराने कपड़े लेकर मोहल्लों की कारों की सफाई के लिए जाते दिखाई पड़ते हैं। इसी कार्य को करके वह व्यक्ति अपने श्रम से अपने परिवार की जीविका चलाता है।
वहीं तीसरा व्यक्ति आमतौर पर सुबह केसरिया कुर्ता पहनकर, कंधे पर गमच्छा, गले में कंठी-माला, सिर पर लंबी चोटी (एंटीना) और माथे पर तिलक लगाए गली-रास्तों पर अहंकार भरे विचार से भरपूर, उसकी चाल में उच्च होने की झलक दिखाई देती है। इस व्यक्ति की मानसिकता संघी/मनुवादी होती है। वह अधिकांशतया रास्तों पर झाड़ू लगा रहे वाल्मीकि समुदाय के व्यक्ति से थोड़ी दूरी बनाकर ही चलता है, वह वाल्मीकि समुदाय के व्यक्ति से नफरत करता है और उसके सापेक्ष अपने आपको उच्च कुलीन मानता है। सड़क पर चलने वाले आम लोग भी ऐसे व्यक्ति को देखकर उसके सामने नतमस्तक होकर सम्मानपूर्वक अभिवादन करते हैं, जबकि यह व्यक्ति समाज के लिए कोई भी सकारात्मक कार्य नहीं करता। समाज से मुफ्त में भारी दान दक्षिणा पाकर दान देने वाले व्यक्ति को ही अनुग्रहित करता है। क्या ऐसी सामाजिक व्यवस्था सभ्य और न्यायपूर्ण है? शायद यही कारण है कि भारत की मनुवादी व्यवस्था ने समाज को विखंडित करके हजारों जातीय टुकड़ों में बांटकर उसे असक्त किया, देश 755 वर्षों तक गुलाम रहा। समाज के जागरूक और न्यायप्रिय लोगों को सोचना चाहिए कि क्या समाज का इस तरह की मनुवादी सामाजिक व्यवस्था और व्यवहार तर्क संगत व देशहित में था? परिस्थितिकी के आधार पर कहा जा सकता है कि भारतीय सामाजिक व्यवस्था ने देश को विश्व के सापेक्ष सभी स्तरों पर पीछे धकेलने में अहम भूमिका निभाई है। जिसका भारत की अजागरुक मनुवादी जनता ने कभी संज्ञान नहीं लिया और आज भी समझने को तैयार नहीं है।
वर्तमान समय जेन-जी का चल रहा है उसे तार्किक आधार पर इस मनुवादी व्यवस्था को समझना चाहिए और देशहित में भारत भूमि से इस मनुवादी-संघी व्यवस्था को उखाड़ फेंककर ही दम लेना चाहिए। आज की युवा पीढ़ी को संविधान में दिये गए समता, स्वतंत्रता, न्याय के आधार पर समाज को आगे बढ़ाना चाहिए। देश में कहीं पर भी मनुवादी व्यवस्था दिखाई देनी नहीं चाहिए। यही कार्य राष्ट्रहित में होगा, यदि सभी धर्मों, जातियों और क्षेत्रों के युवा पीढ़ी के लोग इस कार्य को करने में सफल हो जाते हैं तो यह देश वैज्ञानिक और तार्किक सोच के आधार पर आगे बढ़कर सभी मानवीय प्रतिस्पर्धा में शामिल होकर प्रगति के पथ पर आगे बढ़ सकेगा! जेन-जी की युवा पीढ़ी से आग्रह है कि वे भारत भूमि पर बसे हुए समाज को धार्मिक, क्षेत्रीय, जातीय आधार पर विभाजित करके न देखे, बल्कि देश की पूरी जनता को समग्र रूप में देखकर उनके कल्याण और विकास के लिए सरकार पर न्यायोचित दबाव बनाए। ताकि सरकार द्वारा बनाई गई योजनाओं का समय-समय पर जनता की जरूरत के हिसाब से निरीक्षण किया जा सके। जो सरकारें देश की सत्ता में बैठकर बेरोजगारी, महंगाई, महंगी होती शिक्षा, अवसरों की कमी, पर ध्यान नहीं देती उसे लोकतांत्रिक ढंग से सत्ता से तुरंत हटाया जाये। मोदी और संघियों की सरकारों की मानसिकता में मनुष्यों का विकास नहीं, युवाओं के लिए रोजगार नहीं, विद्यार्थियों के लिए उचित शिक्षा नहीं, जाति और धर्म के नाम पर समाज का विभक्तिकरण और समाज में नफरत का माहौल तैयार करना ही इनका मुख्य धेय है।
वाल्मीकि समुदाय में तार्किक और वैज्ञानिक सोच की कमी: वाल्मीकि समुदाय के लोग समाज में अपेक्षाकृत कम शिक्षित और विकसित है! इसलिए सरकार इस समुदाय के लिए विशेष प्रावधान करके, उनको वैज्ञानिक और तार्किकता की शिक्षा पर जोर दे, ताकि वे धार्मिक अंधश्रद्धा और पाखंड से बाहर आ सकें। वाल्मीकि समुदाय के युवा आज अधिकांशतया हिन्दुत्व की वैचारिकी के रक्षक है, इसी समुदाय के युवा बजरंग दल, गौरक्षा दल आदि में शामिल होकर उत्पाती और आताताही घटनाओं को अंजाम देते हैं। अधिकांशतया ये लोग अपने समुदाय के रक्षक न होकर मनुवादी-ब्राह्मणवादी व्यवस्था के रक्षक और संरक्षक बने हुए हैं। देश के मनुवादी, ब्राह्मणवादी और सामंतवादी लोग वाल्मीकि समुदाय के लोगों का विकास देखना नहीं चाहते फिर ये वाल्मीकि समुदाय के लोग इनके बहकावे और छलावे में फँसकर धार्मिक अंधश्रद्धा के शिकार क्यों हो रहे हैं? आज के वैज्ञानिक युग में जो लोग चाहे वे किसी भी जातीय घटक या समुदाय के हों अगर वे तार्किक और वैज्ञानिक समझ नहीं रखते तो वे अपने जीवन में किसी भी क्षेत्र में आगे नहीं बढ़ सकते। बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर ने इस हालात को देखकर बहुत पहले यह समझा दिया था और समाज के वंचित व शोषित समुदाय के लोगों से कहा था ‘शिक्षित बनो, संगठित रहो, संघर्ष करो।’ ब्राह्मणवादी-मनुवादी समुदाय ने बाबा साहेब के तीनों मंत्रों को समझकर वंचित व शोषित समाज के लोगों को अपनी मनुवादी प्रचार शक्ति से यह समझाया कि भगवान ने तुम्हें इसी काम के लिए बनाया है, बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर तुम्हें पथ भ्रष्ट कर रहे हैं। वाल्मीकि व अन्य वंचित समाज के लोगों को मनुवादी व ब्राह्मणवादी प्रचारकों की बात समझ में आ गई और उसी के अनुसार आचरण करने लगे। बाबा साहेब जैसे महामानव का संदेश उनकी समझ में नहीं आया बाबा साहेब ने ऐसा देखकर कहा था कि हमारा समाज हमारी बात न मानकर पाखंडी पंडित की बात मानता है।
अपना दीपक स्वयं बनो: भगवान बुद्ध के द्वारा सभी के कल्याण के लिए यह उपदेश दिया गया था। परंतु जिन लोगों ने इस संदेश को आत्मसात किया और उसी के अनुसार आचरण किया उनका मानसिक विकास हुआ, और वे समाज में अग्रणीय नजर आने लगे। अपना दीपक स्वयं बनो से भावार्थ है कि आप अपनी बुद्धिबल से स्वयं को श्रेष्ठ बनाओं दूसरों पर निर्भर मत रहो। विडम्बना यह है कि मनुवादी संस्कृति के कारण भारत का अधिकांशतया समाज अंधश्रद्धा में फंसा हुआ है जिसके कारण उसमें न कोई तार्किक समझ है और न उसके मस्तिष्क में वैज्ञानिकता का समावेश है। इसलिए वे पाखंडी पुजारियों के छलावे में फँसकर अपना बुद्धिबल पुजारियों के चरणों में रखकर उनसे झूठा आशीर्वाद पाकर अपने कल्याण की कामना करते हैं। भारत के अनेकों महापुरुषों ने समय-समय पर समझाया कि लोगों ने सबकुछ भगवान या अल्लाह के भरोसे छोड़कर अपना सबसे बड़ा नुकसान और अपराध किया है। जिसके कारण उनकी पीढ़ी दर पीढ़ी भरपाई भी असंभव है, और यही उनकी दुर्दशा का कारण है, जिस दिन भारत का पिछड़ा, वंचित और उपेक्षित समाज इस अंधश्रद्धा को समझ लेगा, उसी दिन से इस देश में धार्मिक अंधभक्त पैदा होने बंद हो जाएँगे और समाज में समता, समानता और भाईचारा नजर आने लगेगा।
कैसे खत्म हो अंधविश्वास? वाल्मीकि समुदाय भारतीय समाज का एक महत्वपूर्ण अंग है। इस समुदाय में बहुत ही योग्य और उच्च शिक्षित व्यक्ति पैदा हुए जैसे-भगवान दास, मातादीन भंगी, ओमप्रकाश वाल्मीकि, दीनाभाना, प्रो. तुलसीराम, प्रो. कौशल पवार, बैजवाड़ा विल्सन, कवि रमेश भंगी, सूरजपाल चौहान आदि अनेकों प्रसिद्ध हस्तियाँ हुई हैं। इन सभी ने अपने वाल्मीकि समुदाय को जागरूक करने के लिए अपने तरीके से काम किया, लेकिन अंतत: विडम्बना यह रही कि वाल्मीकि समुदाय के अंधश्रद्धा में फंसे व्यक्तियों ने अपने समाज के जागरूक और शिक्षित लोगों द्वारा बताई गई शिक्षाओं पर ध्यान नहीं दिया। बल्कि पूरा वाल्मीकि समुदाय आज भी मंदिरों के सामने जाकर हिन्दुत्व के क्रत्रिम देवी-देवताओं व भगवानों के सामने नतमस्तक होता है। समाज में यह क्रिया यथावत सैंकड़ों-हजारों सालों से चली आ रही है। लेकिन पत्थर से बनी मूर्ति रूपी भगवानों व देवी-देवताओं ने आजतक अपने किसी भी भक्त को कुछ नहीं दिया, ये सब उनकी झूठी धारणाएं, और मानसिक गुलामी के प्रतीक है। वाल्मीकि समुदाय या अन्य समुदाय के अक्ल के अंधों को यह समझ में आ जाना चाहिए कि जो पुरोहित/पुजारी मंदिर में हमेशा बैठा रहता है वह इन पत्थर से बनी देवी-देवताओं या भगवान से कुछ नहीं मांगता, चूंकि उसे पता है कि इनसे कुछ नहीं मिलने वाला है, जो भी मिलेगा वह मंदिर में आने वाले अंधभक्तों से ही मिलेगा, इसलिए वह वहाँ पर चढ़ावा चढ़वाकर अपनी झोली भरता है। मदिरों में बैठे पुरोहितों की हमेशा से संस्कृति रही है कि समाज के अंधभक्तों को धार्मिक भ्रम जाल में फंसाकर मंदिरों में समाज से भारी चढ़ावा चढ़वाओ, मंदिर में बैठे पुजारियों को आर्थिक रूप से समृद्ध बनाओं। हिन्दुत्ववादी वैचारिकी के लोग जनता को बर्गलाकर बतलाते हैं कि विदेशी आक्रमणकारियों ने बार-बार देश में आक्रमण किये और बार-बार देश की धन सम्पदा को लूटा। समाज में यह झूठा प्रचार किया विदेशी आक्रमणकारी मुसलमान या अंग्रेज थे इसलिए उन्होंने हिंदुओं के मंदिरों को लूटा और ध्वस्त किया। ये प्रचार और बातें तथ्यहीन है मंदिर के निर्माण से पहले देश में बौद्ध मंदिर व मठ थे, उन सभी को ब्राह्मण संस्कृति के विध्वंसकों ने लूटा और ध्वस्त किया कुछेक को परिवर्तित भी किया, इस तरह की सभी विध्वंसकारी घटनाओं में पुष्यमित्र शुंग का विशेष योगदान रहा जिसने भारत के 10वें बौद्ध शासक बृहदत्त का धोखे से कत्ल करके उसके शासन पर अनैतिक कब्जा किया था। उस पर कोई भी ब्राह्मणवादी संस्कृति का व्यक्ति बात नहीं करता।
इस विमर्श का निष्कर्ष है कि वाल्मीकि समुदाय के युवाओं को अधिक से अधिक शिक्षा पर जोर देना चाहिए, शिक्षा से ही उनका कल्याण होगा। अंधश्रद्धा में फँसकर, काँवड़ यात्राओं पर जाकर किसी का कल्याण होने वाला नहीं है। जब ये स्वयं अपने दिमाग की बत्ती जलाकर, बुद्ध के संदेश के अनुसार अपना दीपक स्वयं बनेंगे, तभी वे ज्ञान रूपी रोशनी पा सकेंगे, इसलिए सम्पूर्ण वाल्मीकि समुदाय व अन्य समुदाय के धार्मिक अंधभक्तों से निवेदन है कि वे अंधश्रद्धा से बाहर निकलें।





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