




2026-06-27 13:50:49
यहाँ के मूलनिवासियों के आधिपत्य को ब्राह्मणवादी संस्कृति के लोगों ने एक सोचे-समझें षड्यंत्र के तहत समाप्त किया। ये सभी लोग यूरेशिया और मध्य एशिया से आए कुटिल प्रवृति के आर्य कहलाए। वर्तमान समय में भी आर्य कहलाए जाने वाले ब्राह्मणों का डीएनए भारत के मूलनिवासियों से पूरी तरह मेल नहीं खाता। हाल ही में राखीगढ़ी की खुदाई में मिले पुरातात्विक आवेशों के डीएनए से साफ है कि भारत में यूरेशिया और मध्य एशिया से आए आर्यों का डीएनए यहाँ के मूलनिवासियों से भिन्न है। जिसके आधार पर कहा जा सकता है कि आर्य भारत के मूलनिवासी नहीं थे, बल्कि ये भारत में आए पहले आक्रमणकारी थे। इन्होंने यहाँ पर अपना आधिपत्य जमाने के लिए यहाँ के मूलनिवासियों को अपने षड्यंत्रकारी जाल में फँसाकर विभिन्न प्रकार की चमत्कारी बातें की, झूठ व कृत्रिम देवी-देवताओं व भगवानों का डर दिखाकर उनके अंदर अकल्पनीय डर को समाहित किया। भारत के मूलनिवासी सीधे-सादे लोग थे वे इनकी धूर्तता भरी चालों में फंस गए। आर्यों के झूठ व कृत्रिम अवधारणाओं के आधार पर उनके द्वारा प्रस्तुत किए गए देवी-देवता और भगवानों को समय अंतराल के बाद वे सच मानने लगे।
मूलनिवासी समुदाय का सहयोगात्मक: भारत के मूलनिवासी यहाँ पर पहले से ही मौजूद और सम्पन्न थे, समाज में कोई मतभेद और विभाजन नहीं था। यहाँ के सभी लोग प्रकृति के नियम के अनुसार जीवनयापन कर रहे थे, उनमें किसी भी प्रकार का डर और भय नहीं था। वर्तमान युग में अगर हम पिछले 100 साल के इतिहास पर नजर डाले तो पाते हैं कि जो व्यक्ति पहले से बसा हुआ है और आराम की जिंदगी जी रहा है उसमें और उसके सहयोगियों में छल-कपट के बल पर अधिक धन कमाने की लालसा नहीं होती है। परंतु जो व्यक्ति या समुदाय बाहर से आकर स्थापित होने की इच्छा रखता है, उसके लिए उसे और उसके सहयोगियों को अतिरिक्त परिश्रम करके अपने आपको स्थापित करने के लिए चालाकी भरे रास्तों को भी अपनाना पड़ता है। भारत में आर्यों के आगमन के समय भी ऐसा ही हुआ होगा। मूलनिवासी यहाँ पर पहले से ही थे उन्होंने कथित आर्यों को आश्रय देने के उद्देश्य से यथासंभव धन-सम्पदा मुहैया कराई। वर्तमान पीढ़ी को समझाने के लिए हम भारत और पाकिस्तान के बँटवारे की घटना पर प्रकाश डालते हैं, ताकि आज की पीढ़ी को यह समझ में आ सकें। 1947 में जब भारत-पाकिस्तान का बंटवारा हुआ तो दोनों तरफ की जनसंख्या का आदान-प्रदान भी हुआ। जो बड़ी भयानक घटना थी, प्रवासन के दौरान हिंसक घटनाएँ भी हुई। यहाँ पर हम हिंसक घटनाओं का जिक्र नहीं करेंगे बल्कि बँटवारे के समय पाकिस्तान के क्षेत्र से जो जनता भारत के क्षेत्र में आई, उस वक्त वे नंगे-भूखे और बिना किसी धन-सम्पदा के थे। वे यहाँ पर अपने साथ अपनी धन-सम्पदा व अन्य सामान लेकर नहीं आए थे। उन्हें यहाँ पर तत्कालीन सरकार ने फ्री में मकान व जमीन देकर बसाया था। उसके बाद ऐसे लोगों ने अपने जीवनयापन के लिए, अपने व्यापार और उद्योग धंधे चलाने शुरू किए। उस समय जो लोग घोडा गाड़ी, तांगा चलाकर अपना और अपने परिवार का पेट पाल रहे थे, धीरे-धीरे अधिकांशतया ये सभी लोग अच्छी-अच्छी कालोनियों में बसे। इनमें से अधिकांशतया ने बिजनेस में भी अच्छा प्रदर्शन किया। कह सकते हैं कि आज वे यहाँ पर पहले से बसे लोगों की तुलना में अधिक सक्रिय और सम्पन्न है। दुनिया भर में प्रवासन से ऐसा ही होता है कि जो लोग प्रवासी बनकर दूसरी जगह जाकर बसते हैं वहाँ पर वे अधिक क्रियाशील होकर कार्य करते हैं।
ब्राह्मणी संस्कृति के लोग, पहले आक्रमणकारी: भारत में बाहर से आकर सैंकड़ों प्रवासियों ने अपना डेरा जमाया। जिनमें हूण, शक, व अन्य कबीले भी आए। जो यहाँ आकर बसे और यहीं की मूल संस्कृति में समाहित हो गए। अलग-अलग समय पर आए प्रवासियों को आज अलग-अलग करके देखना और पहचाना संभव नहीं है। चूंकि वे सभी यहाँ की मूल संस्कृति में घुल-मिल गए है। कथित आर्य संस्कृति के लोगों ने अपनी कुत्सित मानसिकता के मुताबिक यहाँ के मूलनिवासियों को हजारों टुकड़ों में विभक्त किया और सभी धड़ों को अलग-अलग जातियों के नाम से संबोधित किया। कथित प्रवासी आर्यों ने अपने आपको सबसे श्रेष्ठ बनाया। भारत में जाति व्यवस्था इन कथित आर्यों की ही देन है, इनके सभी कथित धार्मिक ग्रंथ काव्य और महाकाव्य षड्यंत्रकारी रचना के तहत मन-गढ़ंत व काल्पनिक आधार पर लिखे गए हैं। इनके सभी कथित धार्मिक ग्रंथ-रामायण, महाभारत, मनुस्मृति इत्यादि बौद्ध शासक ब्रहदर्थ की हत्या के बाद लिखे गए, जिनमें तत्कालीन आक्रमणकारी पुष्यमित्र शुंग का बड़ा षड्यंत्रकारी हाथ रहा। उसने ही अपने काल में मनुस्मृति की रचना कराई। रामायण और महाभारत की रचना भी उसी काल में हुई। रामायण में राम का किरदार भी पुष्यमित्र शुंग ने ही किया। इन तथ्यों के आधार पर संक्षिप्त में कहा जा सकता है कि सम्राट अशोक की बौद्ध सत्ता को भारत भूमि से समाप्त करने में पुष्यमित्र शुंग नाम के ब्राह्मण ने अक्षम्य अपराध किया है। वर्तमान समय में बौद्ध धम्म के अनुयायियों को पुष्यमित्र शुंग और उसके द्वारा रचित रामायण और गीता आदि में कोई विश्वास नहीं रखना चाहिए। ये सभी कथित ग्रंथ ब्राह्मणवादी संस्कृति के छलावे और षड्यंत्र है। भारत के जागरूक दलित, पिछड़े व अल्पसंख्यक समुदायों को इनके षडयंत्रों से दूर रहना चाहिए। कथित आर्य ब्राह्मण ही इस देश के मूलनिवासियों के असली शत्रु है। अंजाने में बहुत सारी अत्यंत पिछड़ी जातियाँ अपने आपको हिन्दू बताकर गर्व महसूस कर रही है। जबकि हिन्दू शब्द की उत्पत्ति दसवीं सदी के बाद की है। भारत में रहने वाला कोई भी व्यक्ति दसवीं सदी से पहले हिन्दू धर्म से नहीं जाना जाता था। वास्तव में हिन्दू धर्म कोई धर्म नहीं है, जिसे देश की सर्वोच्च न्यायालय ने भी बता दिया है। परंतु फिर भी कुछेक अत्यंत पिछड़ी व कम जागरूक जनता अपने आपको हिन्दू मानकर गौरवान्वित हो रही है। जिसका फायदा सीधे ब्राह्मणवाद को मिल रहा है, जिसके फलस्वरूप वह सत्ता में स्थापित हो रहा है।
वाल्मीकि समाज की उत्पत्ति: वाल्मीकि नाम का समुदाय भारत का मूलनिवासी है, परंतु इसका नामकरण यहाँ के मूलनिवासियों ने नहीं किया, ब्राह्मणवादी संस्कृति के कुटिल प्रवृति के ब्राह्मणों ने 20वीं सदी के प्रारम्भ में सफाईकर्मियों के समुदायों को वाल्मीकि समाज से संबोधित किया। इस शब्द की उत्पत्ति में ब्राह्मणवादी संस्कृति का गहरा षड्यंत्र छिपा है। वाल्मीकि समुदाय अछूत वर्ग (एससी) का प्रमुख अंग है। इस समुदाय को वाल्मीकि से जोड़कर पूरे समाज को भ्रमित किया जा रहा है। वाल्मीकि नाम का व्यक्ति पुष्यमित्र शुंग के शासन काल में प्राचा ब्राह्मण का पुत्र था, जो बहुत ही उदण्ड किस्म का था। आज जिस समुदाय को ‘वाल्मीकि’ कहकर संबोधित किया जा रहा है उसका प्राचा ब्राह्मण के नाम के साथ कोई संदर्भ नहीं है। भारत में सफाई के कार्य में लगा हुआ समाज देश की जनसंख्या में करीब 10 प्रतिशत है, लड़ाकू व्यक्तित्व का धनी है, उन्हें पाखंडी कृत्रिम जाल में फंसाकर रामायण के माध्यम से उन्हें ‘राम’ से जोड़कर हिन्दुत्व की वैचारिकी को मजबूत किया जा रहा है। उन्हें ही हिंदुओं के धर्म रक्षक बनाकर लड़ने-मरने के लिए तैयार करके परोसा जा रहा है।
परिस्थितिकी साक्ष्य: देश में अछूत वर्ग के जातीय घटकों को पढ़ने-लिखने और कथित वेद इत्यादि को पढ़ने व सुनने का अधिकार नहीं था, तब आज के समय का वाल्मीकि कहे जाने वाला समुदाय कैसे पढ़ पाया? और पढ़-लिखकर रामायण जैसे कथित महाकाव्य की रचना कर डाली। यह किसी भी तथ्यात्मक और तार्किक सोच से परे हैं, इसमें कहीं न कहीं ब्राह्मणी संस्कृति का षड्यंत्रकारी घालमेल है। वाल्मीकि शब्द अगर आज के सफाईकर्मी समुदाय से जुड़ा होता तो वह वाल्मीकि कहे जाने वाला व्यक्ति अपने समाज की स्थिति के बारे में क्या एक भी शब्द नहीं लिखता? यह पूरी घटना एक मन-गढ़ंत छलावा है जिसके द्वारा एससी समुदाय को आपस में बांटकर कमजोर करने का गहरा षड्यंत्र है। परिस्थितिकी साक्ष्यों के आधार पर अछूत वर्ग के जातीय घटक अतीत में भारत के एक समृद्धशाली शासक रहे होंगे, जिनके शासन को कथित आर्य-ब्राह्मणों ने छल-कपट से ध्वस्त किया होगा और उनकी मूल संस्कृति को नष्ट करके ब्राह्मणी संस्कृति का नया आवरण चढ़ाया होगा। तमाम तर्कों के आधार पर यही सत्य लगता है कि वर्तमान में वाल्मीकि नाम से पुकारे जाने वाला समुदाय वह वाल्मीकि नहीं है जिसे ब्राह्मणी संस्कृति ने कृत्रिम रूप से गढ़ा है। आज के पढ़े-लिखे वाल्मीकि समुदाय के लोगों को ब्राह्मणों की चाल से भ्रमित नहीं होना चाहिए। चूंकि समय-समय पर मनुवादी संस्कृति के लोग ऐसे प्रयोग करते रहे हैं जिसके कारण समाज में विभाजन हो, समाज की राजनैतिक ताकत कमजोर हो और मनुवादी संघियों को फायदा हो। इसका ताजा उदाहरण अरविंद केजरीवाल (संघी) है जिसने ‘आप’ नाम से राजनीतिक पार्टी खड़ी करके जनता को भ्रमित किया जैसे वह वाल्मीकि समुदाय का बहुत बड़ा हितैषी है, उसने अपना चुनाव चिन्ह भी ‘झाड़ू’ रखा। वाल्मीकि समुदाय से आग्रह है कि वे सभी एससी समुदाय का अभिन्न अंग है, इसलिए अपनी राजनीतिक शक्ति को ऐसे छलावामयी धूर्तों के चक्कर में फँसकर कमजोर न होने दें।
मंदिरों की लूट का इतिहास: भारत में मंदिरों की लूट और विध्वंस का इतिहास मुख्य रूप से उनकी अपार धन-संपत्ति, राजनीतिक शक्ति से जुड़ा हुआ है। प्राचीन और मध्यकाल में भारत के मंदिर केवल पूजा-पाठ के केंद्र नहीं थे, बल्कि वे सोने, चांदी और रत्नों के विशाल भंडार भी थे। जिनपर मंदिर में बैठे ब्राह्मण-पुजारियों का आधिपत्य था। इसी अकूत धन और विरोधी राजा की सत्ता को कुचलने के उद्देश्य से विदेशी आक्रमणकारियों और कई बार स्थानीय शासकों ने भी मंदिरों को निशाना बनाया। अगर हम सोमनाथ के मंदिर को लें तो पाते हैं कि महमूद गजनवी ने लूट के लिए आक्रमण किया जिसकी खुफिया जानकारी देने वाले मंदिर के पुजारी ही थे और वे ही उसे लूट के लिए रास्ता भी बता रहे थे। गजनवी के साथ कुछेक सैनिक थे, मगर सोमनाथ के मंदिर में उस समय पुजारियों की संख्या 600 से अधिक थी, जो गजनवी के साथ आए सैनिकों की संख्या से अधिक थे। सोमनाथ की लूट में गजनवी के साथ मंदिर के ब्राह्मण-पुजारी भी शामिल थे।
समाधान: हाल ही में अयोध्या के राम मंदिर में चढ़ावे को लेकर चोरी का मामला जनता के सामने है उसमें भी संघियों द्वारा स्थापित किए गए ब्राह्मणी संस्कृति के संघी एजेंट लिप्त हैं। जिसे देखकर देश के बहुजन समाज के जातीय घटकों को समझ लेना चाहिए कि इस देश की सम्पदा को लूटने वाले हमेशा से ब्राह्मणवादी संस्कृति के ही लोग रहे है इसलिए वे सभी अपने आपको हिन्दू समुदाय का हिस्सा भी नहीं माने। हिन्दू मंदिरों में जाने से परहेज करें और न ही वहाँ किसी भी प्रकार का चढ़ावा और चंदा दें। दलित, शोषित व अत्यंत पिछड़ी जातियों के बच्चों का भविष्य स्कूलों में जाकर, शिक्षा ग्रहण करके ही संभव हो सकेगा। मंदिरों में जाकर और काँवड़ लाकर आप कुछ भी नहीं बन सकते। सदियों से चले आ रहे पाखंड के सबूत सबके सामने हैं।





| Monday - Saturday: 10:00 - 17:00 | |
|
Bahujan Swabhiman C-7/3, Yamuna Vihar, DELHI-110053, India |
|
|
(+91) 9958128129, (+91) 9910088048, (+91) 8448136717 |
|
| bahujanswabhimannews@gmail.com |