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मृत्यु एक ऐसा अटल सत्य है, जिसे दुनिया का कोई भी दर्शन या विज्ञान झुठला नहीं सका है। जहां विभिन्न धर्मों में मृत्यु के बाद शरीर को सहेजने, कब्र में कयामत के दिन तक सुरक्षित रखने या आत्मा की शांति के लिए जटिल कर्मकांड करने का विधान है, वहीं बौद्ध धर्म का दृष्टिकोण इसके बिल्कुल विपरीत और अत्यंत व्यावहारिक है। बौद्ध परंपरा में अंत्येष्टि (दाह संस्कार या अन्य अंतिम विदाई) केवल एक सामाजिक औपचारिकता नहीं, बल्कि जीवन की क्षणभंगुरता (अनित्यता) को प्रत्यक्ष रूप से देखने और अनुभव करने का सबसे बड़ा माध्यम है। बौद्ध दर्शन के केंद्र में अनित्यता का सिद्धांत है। इसके अनुसार संसार में कुछ भी स्थायी नहीं है; जो उत्पन्न हुआ है, उसका क्षय निश्चित है। बौद्ध धर्म आत्मा की किसी अपरिवर्तनीय, अमर अवधारणा (अनात्मन) को नहीं मानता, बल्कि चेतना को एक निरंतर प्रवाह मानता है जो कर्मों के अनुसार नया रूप धारण करती है। अत: मृत्यु के क्षण शरीर केवल एक छूटा हुआ वस्त्र या खाली पात्र बन जाता है। जहां अन्य संस्कृतियों में मृत देह के प्रति गहरा मोह या पवित्रता का जटिल भाव होता है, वहीं बौद्ध दर्शन सिखाता है कि देह से मोह समाप्त होना ही मुक्ति की पहली सीढ़ी है।
भगवान बुद्ध का महापरिनिर्वाण और दाह संस्कार: बौद्ध परंपरा में दाह संस्कार का मूल स्वयं भगवान बुद्ध के महापरिनिर्वाण में निहित है। महापरिनिर्वाण सूत्र के अनुसार, जब तथागत बुद्ध ने कुशीनगर में अपना शरीर त्यागा, तब उनके प्रिय शिष्य आनंद के मार्गदर्शन में मल्ल गणराज्य के लोगों ने उनका अंतिम संस्कार किया। बुद्ध के पार्थिव शरीर को सुगंधित वस्त्रों में लपेटकर चंदन और सुगंधित लकड़ियों की चिता पर अग्नि को समर्पित किया गया। दाह संस्कार के उपरांत उनके पवित्र धातु-अवशेष (अस्थियां और दांत) एकत्र किए गए और उन अवशेषों पर आठ अलग-अलग राज्यों में स्तूपों का निर्माण कराया गया। इसी ऐतिहासिक घटना के कारण भारत, थाईलैंड, म्यांमार, श्रीलंका, जापान और वियतनाम जैसे देशों में बौद्ध मतावलंबियों के बीच दाह संस्कार ही सबसे मान्य और प्राथमिक विधि मानी गई है।
अंतिम संस्कार की मुख्य विधियां
बौद्ध धर्म किसी एक भौगोलिक क्षेत्र में बंधा नहीं रहा। यह जिस देश में गया, वहां की जलवायु, भूगोल और स्थानीय प्राथमिकताओं को अपने दर्शन में ढाल लिया:
1. दाह संस्कार (अग्नि संस्कार): थेरवाद और पूर्वी एशियाई महायान देशों (चीन, जापान, कोरिया) में दाह संस्कार ही सर्वाधिक प्रचलित है।
●मृत्यु के बाद भिक्षुओं को आमंत्रित किया जाता है, जो सतिपट्ठान और अणिच्चा वत संखारा (सभी संस्कार अनित्य हैं) जैसे सूत्रों का सस्वर पाठ करते हैं।
●देह को अग्नि को समर्पित करने के बाद, कई देशों (विशेषकर जापान) में परिवार के सदस्य चॉपस्टिक या विशेष चिमटों से अस्थियों को चुनते हैं।
●इन अस्थि अवशेषों को या तो किसी स्तूप/समाधि में सुरक्षित रखा जाता है अथवा नदियों/समुद्र में विसर्जित कर दिया जाता है।
2. आकाशीय अंत्येष्टि: तिब्बत, लद्दाख, मंगोलिया और भूटान के कुछ हिस्सों में अपनाई जाने वाली यह विश्व की सबसे अनोखी अंत्येष्टि प्रथा है।
●भौगोलिक कारण: तिब्बती पठार पर जमीन अत्यधिक पथरीली और सालों-साल बर्फ से जमी रहती है, जिससे कब्र खोदना लगभग असंभव होता है। इसके अलावा, अत्यधिक ऊंचाई पर पेड़ नहीं उगते, जिससे चिता जलाने के लिए लकड़ी दुर्लभ होती है।
●धार्मिक कारण (दान पारमिता): जातक कथाओं में उल्लेख है कि बुद्ध ने अपने एक पूर्व जन्म (राजकुमार सत्व के रूप में) में एक भूखी बाघिन और उसके बच्चों को बचाने के लिए अपने जीवित शरीर का दान कर दिया था। तिब्बती बौद्ध मानते हैं कि मृत शरीर को गिद्धों और पक्षियों को भोजन के रूप में अर्पित करना इस जीवन का अंतिम दान है।
●प्रक्रिया: शव को 3 से 5 दिनों तक भिक्षुओं की प्रार्थनाओं (तिब्बती बुक आॅफ द डेड के पाठ) के बीच रखा जाता है। इसके बाद पर्वतों पर स्थित निश्चित स्थानों पर रोग्यापा (शरीर विच्छेदक विशेषज्ञ) द्वारा शरीर के टुकड़े किए जाते हैं, हड्डियों को पीसकर जौ के आटे (साम्पा) में मिलाया जाता है और गिद्धों को समर्पित कर दिया जाता है।
3. भू-समाधि (दफनाना): कई समाजों में जहां स्थानीय कानून दाह संस्कार की अनुमति नहीं देते, अथवा नव-बौद्ध (आंबेडकरवादी बौद्ध समुदाय) या कुछ विशिष्ट भौगोलिक क्षेत्रों में, मृत शरीर को सादगीपूर्ण तरीके से भूमि में दफनाया भी जाता है। इसमें किसी अंधविश्वास या पुनरुत्थान की धारणा के तहत नहीं, बल्कि शरीर को सहजता से प्रकृति के हवाले करने के व्यावहारिक रूप में इसे स्वीकार किया जाता है।
4. जल समाष्टि : तिब्बत और हिमालयी क्षेत्रों में अति-गरीब व्यक्तियों, भिक्षुकों या बच्चों की मृत्यु पर शव को पवित्र नदियों में मछलियों के भोजन के रूप में भी समर्पित किया जाता है, जो करुणा और दान की उसी भावना से प्रेरित है।
भारत में 1956 में डॉ. भीमराव आंबेडकर के नेतृत्व में हुए बौद्ध धम्म दीक्षा आंदोलन के बाद, भारत के करोड़ों नव-बौद्धों ने ब्राह्मणवादी और जटिल कर्मकांडी अंत्येष्टि विधियों को त्याग दिया। भारत में बौद्ध समाज मुख्य रूप से विद्युत शवदाह गृहों या पारंपरिक चिता के माध्यम से दाह संस्कार करता है, जिसमें पंडितों, श्राद्ध या पिंडदान की जगह सफेद वस्त्र पहनकर त्रिशरण, पंचशील और बुद्ध वंदना का पाठ किया जाता है। मृत्यु के तीसरे या सातवें दिन संघदान और स्मरण सभा आयोजित कर अनित्यता का चिंतन किया जाता है। बौद्ध धर्म में अंत्येष्टि की विविधता यह दशार्ती है कि यह धर्म बा कर्मकांडों की जकड़न से मुक्त है। शरीर को जलाया जाए, दफनाया जाए, पक्षियों को अर्पित किया जाए या जल में प्रवाहित किया जाए—मूल बात यह है कि मृत्यु के क्षण शोक और प्रलाप के बजाय शांति और प्रज्ञा का माहौल हो। मृतक की देह यह याद दिलाती है कि जो आज अस्तित्व में है, वह कल विलीन हो जाएगा; इसलिए जब तक जीवन है, करुणा, प्रज्ञा और सदाचार के साथ जिया जाए।





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