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बहुजन समाज के राजनीतिक दलों का बने अलग चुनावी गठबंधन

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2024-12-20 08:41:43

आज पूरे भारत में सामाजिक सौहार्द दिनों-दिन खराब होता जा रहा है। समाज के अंदर मनुवादी शक्तियों द्वारा नफरत के बीच उगाये जा रहे हैं, जिसके फलस्वरूप देशभर में नफरती माहौल बन रहा है। नफरती माहौल बनाने में संघी और ब्राह्मणी संस्कृति की राजनैतिक पार्टियाँ अधिक सक्रिय होकर काम कर रही है। सन 2002 के गुजरात दंगों के बाद से देश के माहौल को संघियों द्वारा अपने संघी षड्यंत्र से नफरती बनाया जा रहा है। प्रत्यक्ष रूप से ‘राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ’ की इसमें अग्रणीय भूमिका है। इस नफरती प्रक्रिया के द्वारा संघी लोग देश में हिन्दू राष्ट्र स्थापित करने का सपना देख रहे है। देश के जागरूक और प्रबुद्धजनों को अच्छी तरह से मालूम है कि भारत किसी एक धर्म और जाति का नहीं है। यहाँ की जनसंख्या में सभी धर्मों, जातियों के लोगों का मिश्रण है जिसके आधार पर भारत एक बहुलतावादी संस्कृति का देश है। जो लोग बाहर से समय-समय पर आए और यहीं बसकर यहीं के हो गए। यहाँ पर हजारों की संख्या में हूण, शक व अन्य कबीलों के रूप में आये। वे सभी अपनी संस्कृति के आधार पर अलग पहचान बनाने में भी यहाँ सफल रहे। इसलिए आज के भारत का इतिहास किसी एक जाति, धर्म व संप्रदाय का नहीं है, जो सिरफिरे आतंकवादी प्रवृति के संघी लोग यहाँ पर हिन्दू धर्म को स्थापित करने की बात करते हैं। वे लोग देश की जनता के दोस्त व शुभचिंतक नहीं हो सकते बल्कि ऐसे लोग यहाँ पर अस्थिरता का माहौल पैदा करके समाज की एकता और अखंडता को पहले से बर्बाद करना चाहते हैं। इस मानसिकता के सभी संघी संस्कृति के लोग देश के दुश्मन हैं, दोस्त नहीं। देश को आज एकता और अखंडता की अधिक आवश्यकता है, विखंडता की नहीं। जबकि ब्राह्मणी संस्कृति के सभी संघी लोग देश में नफरत फैलाकर देश की एकता और अखंडता को छिन्न-भिन्न करने का काम कर रहे हैं।

संघियों से देश के लोकतंत्र को खतरा: भारत एक लोकतांत्रिक देश है और देश के संविधान के अनुसार सभी संप्रदायों, जाति व धर्मों को यहाँ रहने का समान अधिकार है। भारत का कोई भी नागरिक स्वतंत्र रूप से देश में कहीं भी जाकर रह सकता है, बस सकता है और अपनी जीविका के लिए कुछ भी काम-धंधा कर सकता है। इन सब बातों के लिए यहाँ किसी धर्म संप्रदाय या जाति का होना जरूरी नहीं है। भारत के संविधान में पुरुष हो या महिला सबको समान अधिकार ब्राह्मणी संस्कृति के लोगों को पसंद नहीं है। चूंकि ब्राह्मणी संघी मानसिकता के लोग देश में मनुस्मृति आधारित सामाजिक व्यवस्था स्थापित करना चाहते हैं जिसके आधार पर वे यहाँ की सामाजिक व्यवस्था में विभेदकारी नीति स्थापित कर रहे हैं। मनुस्मृति में दी गई सामाजिक व्यवस्था के तहत यहाँ पर शूद्र वर्ण और सभी वर्णों की महिलाओं को सभी प्रकार के मानवीय अधिकारों से वंचित रखा गया है। मनुस्मृति में अति शूद्र्रों के साथ पशुओं से भी बदत्तर व्यवहार करने की प्राकाष्ठा रही है। जिसके कारण यहाँ की अधिकांश कामगार जातियाँ दूसरे धर्मों में परिवर्तित होने के लिए मजबूर हुई थी। उनमें से अधिकांश ने इस्लाम धर्म को अपनाया, जिसमें सभी को समता का अधिकार मिला, सब एक साथ बैठकर आपस में खाना-पीना व बातचीत कर सकते थे, योजना बना सकते थे और पढ़ने-लिखने पर भी कोई प्रतिबंध नहीं था। इस्लाम में परिवर्तित होने से पहले सम्राट अशोक के समय पूरा देश बौद्धमय था। देश का पूरा क्षेत्रफल आज के भारत से तीन गुना बड़ा था उसपर बसने वाले सभी जनमानस बौद्ध धम्म का अनुसरण करके खुशहाल जीवन व्यतीत कर रहे थे। ब्राह्मणी लोगों को जनता की संपन्नता और आपसी सौहार्द अच्छा नहीं लग रहा था, इसलिए ब्राह्मणी संस्कृति के लोगों ने बौद्ध धम्म को भारत भूमि से समाप्त करने के लिए अपने षड्यंत्रों को रचा। षड्यंत्र को सफल बनाने के लिए उन्होंने पुष्पमित्र शुंग नामक ब्राह्मण को उपयुक्त पाया। बौद्ध धम्म को यहाँ से खत्म करने के लिए पुष्यमित्र शुंग ने अपने छलावामयी षड्यंत्र के तहत अपनी बेटी की शादी दसवें बौद्ध शासक ब्रहदत्त से की थी। ब्रहदत्त ने पुष्यमित्र शुंग को अच्छा और वफादार व्यक्ति मानकर बदले में उसे अपने शासन का मुख्य सेनापति बना दिया था। पुष्यमित्र ने मौका पाकर अपने शासक ब्रहदत्त को बहला-फुसलाकर शिकार के लिए जंगल में ले जाकर धोखे से कत्ल कर दिया और ब्रहदत्त के शासन का खुद राजा बन बैठा। इस घटनाक्रम के दृश्य आज 2002 में गुजरात के सांप्रदायिक दंगे की याद दिलाते हैं। इन गुजरात दंगों में कई सौ लोग मारे गए थे, भयंकर सांप्रदायिक दंगा हुआ था और उस समय गुजरात के मुख्यमंत्री संघी प्रचारक नरेंद्र मोदी ही थे। दंगों की वजह से प्रदेश और देश की जनता ने मोदी सरकार पर कई सवाल खड़े किए थे। उस समय केंद्र में संघी मानसिकता के अटलबिहारी वाजपेयी की सरकार थी। मगर फिर भी वाजपेयी जी ने बतौर प्रधानमंत्री गुजरात की मोदी सरकार को राज-धर्म का पालन करने की नसीहत दी थी। उस समय देश के राष्ट्रपति माननीय श्री के.आर. नारायण जी थे, वे गुजरात की इस सांप्रदायिक घटना को देखकर इतने आक्रोशित हुए थे कि उन्होंने गुजरात में सेना तैनात करने का मन बना लिया था। वाजपेयी जी ने भी अपने अन्तर्मन से उपजे आक्रोश पर कहा था कि लोकतंत्र लोक लिहाज से चलता है। मगर संघी मानसिकता के नरेंद्र मोदी में लोक लिहाज का कोई अंश नहीं था। इसलिए मोदी सरकार ने गुजरात में लोकतंत्र की सभी सरहदों को पार कर मानवता को शर्मसार किया था।

आज देश की केंद्र सरकार में मोदी सत्ता है और कई प्रदेशों में भाजपा संघियों की डबल इंजन की सरकारें हैं। जिनके फलस्वरूप देश के सांप्रदायिक सद्भाव को हर रोज विखंडित किया जा रहा है। देश की हर मस्जिद के नीचे शिवलिंग तलाशे जा रहे हैं और देश के सामाजिक सद्भाव को तनावपूर्ण बनाया जा रहा है। हिन्दू-मुस्लिम समुदायों में नफरती भाव बढ़ाया जा रहा है। जिसके फलस्वरूप आज न मुस्लिम हिंदुओं पर विश्वास कर रहे हैं और न ही हिन्दू मुस्लिमों पर विश्वास कर रहे हैं। देश का सामाजिक ताना-बाना तनावग्रस्त है। इस षड्यंत्र में संघी मानसिकता के चालाक लोग शूद्र वर्ग की अछूत कही जाने वाली जातियों के नौजवानों और अति पिछड़ी जातियों जैसे-नाई, कुम्हार, बढ़ई, लौहार, धोबी, तेली-तमोली आदि को हिन्दू बताकर और कुछ अन्य लालच देकर इन जातियों के नौजवानों को ‘हिन्दू रक्षक दल’ के रूप में लड़ने-मरने के लिए उतारा जा रहा है। इस योजना में उनका छिपा मकसद है कि अगर कोई भयंकर सांप्रदायिक दंगा होता है तो उन झगड़ों में हिन्दू रक्षक बने वंचित समाज के नौजवान ही मारे जायेंगे और षड्यंत्रकारी मानसिकता के मनुवादी सवर्ण व वैश्य सुरक्षित रहेंगे। इतना ही नहीं इन अति पिछड़ी व वंचित जाति के नौजवानों को इस कदर अन्धभक्त बना दिया है कि उन्हें यह भी समझ में नहीं आ रहा कि तुम हिन्दू रक्षक बनकर किसकी रक्षा कर रहे हो? जबकि सरकार में बैठे संघी मानसिकता के कर्णधार व संचालक अपनी बेटियों की शादी मुसलमानों से करने में जरा भी परहेज नहीं कर रहे हैं और मरने के लिए दलितों व अति पिछड़ी, वंचित जाति के नौजवानों को निशाना बना रहे हैं। इस प्रकार के सामाजिक दृश्य दर्शाते हैं कि नरेंद्र मोदी आज के समय के पुष्यमित्र शुंग हंै जो अपने कृत्यों से मानवता को हर प्रकार से रौंद रहा है।

वंचित समाज को चाहिए अलग गठबंधन: उपरोक्त इतिहास और राजनीतिक परिदृश्य को देखते हुए वंचित समाज-एससी/एसटी/अति पिछड़ी जातियाँ व मुसलमानों को देश में राजनैतिक सफलता के लिए आपस में मिलकर अलग गठबंधन बनाने की जरूरत है। आज बहुजन समाज मोदी के ‘एनडीए’ और कांग्रेस के ‘इंडिया गठबंधन’ में भाग-भागकर शामिल होने का प्रयास कर रहा है। जहाँ पर उनकी कोई ‘वक्त’ व ‘हिस्सेदारी’ नहीं है क्योंकि ये दोनों ही गठबंधन ब्राह्मणी संघी संस्कृति के अवयव से ही निर्मित हैं। इन दोनों के कर्णधार और सर्वेसर्वा मनुवादी और संघी संस्कृति के लोग ही हैं। उनकी आंतरिक भावना नहीं चाहती कि देश का वंचित समाज आगे आकर राजनीति में हिस्सेदार बने और वंचित समाज के लोग किसी भी प्रकार से समृद्ध और शक्तिशाली बने। इस तथ्य को देखते हुए आज देश के वंचित समाज को निसंदेह एकजुट होकर अपना अलग एक राजनैतिक गठबंधन देश में खड़ा करना चाहिए।

बहुजन समाज के सभी जातीय घटकों व मुस्लिम समुदाय के नौजवानों में चुनाव लड़ने की लालसा अन्य समाज की अपेक्षा अधिक दिखाई दे रही है। जिसका फायदा ब्राह्मणवादी संस्कृति के नेता फायदे के लिए इस्तेमाल करते हैं और बहुजन समाज को बाँटने और काटने का काम करते हैं। भाजपा, कांग्रेस, आम आदमी पार्टी आज सत्ता में है। ये सभी पार्टियाँ बहुजन समाज के सभी जातीय घटकों को उनके छोटे-छोटे जातीय टुकड़ों में तोड़कर, कुछ लालच देकर उन्हें बाँट रहे हैं। बहुजन समाज के महापुरुष मान्यवर साहेब कांशीराम जी ने अपने त्याग और संघर्ष के बल पर सभी जातीय घटकों को इकट्ठा करके सामाजिक और राजनीतिक ताकत में बदला था। जिसे अब मोदी-शाह की संघी भाजपा ने जातीय टुकड़ों में बाँटकर उन्हें राजनैतिक रूप से शक्तिहीन कर दिया है। भाजपा अब इन छोटे-छोटे बहुजन समाज के जातीय घटकों का वोट लेकर सत्ता में निरंतरता के साथ आ रही है। बहुजन समाज के इन जातीय घटकों को इस बात का एहसास ही नहीं हो रहा है कि उनकी राजनीतिक शक्ति जो महापुरुषों के त्याग, संघर्ष और शिक्षा से निर्मित हुई थी वह अब बिखर रही है। बहुजन समाज के सभी जातीय घटकों में बिखराव का दौर है जिसके पीछे ब्राह्मणी और संघी सरकारें अपने धन-बल के साथ लगी हुई है। जनता को लुभाने के लिए संघी मानसिकता की भाजपा ने सत्ता हासिल करने के लिए एनडीए (41) पार्टियों का गठबंधन का निर्माण किया है और कांग्रेस निहित संस्कृति वालों ने अपने जैसी विचारधारा वालों को साथ लेकर इंडिया गठबंधन (37) पार्टियों के गठबंधन का निर्माण किया है।

आज के इस राजनीतिक परिदृश्य को देखते हुए बहुजन समाज जब देश के संख्याबल में अधिसंख्यक है तो मनुवादी/संघियों को उपयुक्त जवाब देने के लिए बहुजन समाज के सभी राजनैतिक दलों का एक मजबूत राष्ट्रीय परिवर्तन गठबंधन (एनटीए) बनाना चाहिए जिसकी मजबूती के लिए समाज में जितने भी राजनैतिक दल उभर रहे हैं या पहले से मौजूद हंै और चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे हैं उन सभी को आपस में विचार-विमर्श के साथ अपना अहम त्यागकर एक ही छतरी के नीचे आकर चुनाव लड़ने के कार्यक्रम को आगे बढ़ाने चाहिए।

अपने जन-धन-बल की शक्ति से लड़ें चुनाव: आज के राजनैतिक परिवेश में धन-बल का बोलबाला है। चारों ओर पैसे वाले लोग ही लोकतांत्रिक चुनाव प्रक्रिया को प्रदूषित कर रहे हैं। मतदाताओं को खुलेआम 500 से 1000 रुपए देकर उनके मतों को खरीदा जा रहा है। बहुजन समाज की बस्तियों में खुलेआम शराब व अन्य मादक पदार्थों का वितरण किया जा रहा है ताकि बहुजन समाज के सीधे-सादे मतदाता लालच में फँसकर अपना कीमती वोट ब्राह्मणी संस्कृति के धन्नासेठों को देकर उन्हें जीता पायें। लोकतंत्र में इस तरह का मनुवाद लोकतंत्र को प्रदूषित कर रहा है और बहुजन समाज की गरीब जनता को लालच में फंसाकर उनके मतों को छीना जा रहा है। अंतत: इस प्रदूषित प्रक्रिया से धन्नासेठों की मनुवादी सरकारों का निर्माण हो रहा है। देश के बहुसंख्यक बहुजन समाज के लिए धन्नासेठों का अपने धन-बल का खेल स्वच्छ प्रजातंत्र के लिए खतरा बन गया है। जिसके कारण देश में मनुवादी/संघी ताकतें मजबूत हो रही है। इस समस्या का सही समाधान यही होगा कि बहुजन समाज के चुनावी प्रत्याशी अपने समाज के धन-बल से चुनाव लड़कर विधायिका में पहुँचें तभी वे विधायिका में अपने समाज की बात मजबूती से रख पायेंगे और उनके लिए कल्याणकारी योजनाओं का निर्माण करवा पायेंगे।

मान्यवर साहेब कांशीराम जी ने इस संबंध में कहा था कि ‘आप मुझे एक वोट और एक नोट दो’ तो मैं बहुजन समाज की सत्ता इस देश में स्थापित कर पाऊँगा। उनका यह कथन आज के प्रदूषित राजनीतिक परिदृश्य को देखते हुए बहुत ही तर्कसंगत है। आज हमारा समाज अपने बहुजन प्रत्याशी को अपना वोट और एक नोट देने का संकल्प करता है तो आपका बहुजन प्रत्याशी अवश्य ही जीतकर विधायिका में पहुँचेगा, जो मनुवादी धन्नासेठों के हाथों न बिकेगा, न झुकेगा, हमेशा सीना तानकर विधायिका से बहुजन समाज के लिए हितकारी योजनाओं का निर्माण कराने में सक्षम रहेगा। आज बहुजन समाज को न बिकने वाले समाज की अधिक आवश्यकता है और हमारे महापुरुष मान्यवर साहेब कांशीराम, बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर, महात्मा ज्योतिबा फुले, संत गाडगे महाराज व मान्यवर पेरियार जी ऐसे ही समाज का निर्माण करना चाहते थे, पूरे बहुजन समाज को उन्हीं का अनुसरण करना चाहिए।

अहम त्यागकर गठबंधन का हिस्सा बने बसपा: बसपा आज मृतप्राय है। परंतु फिर भी समाज के लोगों में उसके नाम का आकर्षण है। अच्छा यही होगा कि बहुजन समाज के सभी राजनैतिक आकांक्षा पाले हुए लोगों को आपस में बैठकर इस मुद्दे पर गहराई से विचार-विमर्श करना चाहिए और बसपा को भी उसमें शामिल करना चाहिए। साथ ही समाज के सभी राजनैतिक घटकों को कुछ न कुछ हिस्सेदारी देकर उनको सम्मानजनक तरीके से संतुष्ट करना चाहिए। बहुजन समाज को अपनी राजनीति का एक मजबूत विकल्प देकर समाज की राजनैतिक आकांक्षाओं को एक सशक्त राजनैतिक शक्ति में बदलना चाहिए। एक होकर, साथ रहकर, सभी को समाज के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए काम करना चाहिए। व्यक्तिगत स्वार्थ का त्याग समाज की मजबूती और एकता के लिए मील का पत्थर साबित होगा।

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01 जनवरी : मूलनिवासी शौर्य दिवस (भीमा कोरेगांव-पुणे) (1818)

01 जनवरी : राष्ट्रपिता ज्योतिबा फुले और राष्ट्रमाता सावित्री बाई फुले द्वारा प्रथम भारतीय पाठशाला प्रारंभ (1848)

01 जनवरी : बाबा साहेब अम्बेडकर द्वारा ‘द अनटचैबिल्स’ नामक पुस्तक का प्रकाशन (1948)

01 जनवरी : मण्डल आयोग का गठन (1979)

02 जनवरी : गुरु कबीर स्मृति दिवस (1476)

03 जनवरी : राष्ट्रमाता सावित्रीबाई फुले जयंती दिवस (1831)

06 जनवरी : बाबू हरदास एल. एन. जयंती (1904)

08 जनवरी : विश्व बौद्ध ध्वज दिवस (1891)

09 जनवरी : प्रथम मुस्लिम महिला शिक्षिका फातिमा शेख जन्म दिवस (1831)

12 जनवरी : राजमाता जिजाऊ जयंती दिवस (1598)

12 जनवरी : बाबू हरदास एल. एन. स्मृति दिवस (1939)

12 जनवरी : उस्मानिया यूनिवर्सिटी, हैदराबाद ने बाबा साहेब को डी.लिट. की उपाधि प्रदान की (1953)

12 जनवरी : चंद्रिका प्रसाद जिज्ञासु परिनिर्वाण दिवस (1972)

13 जनवरी : तिलका मांझी शाहदत दिवस (1785)

14 जनवरी : सर मंगूराम मंगोलिया जन्म दिवस (1886)

15 जनवरी : बहन कुमारी मायावती जयंती दिवस (1956)

18 जनवरी : अब्दुल कय्यूम अंसारी स्मृति दिवस (1973)

18 जनवरी : बाबासाहेब द्वारा राणाडे, गांधी व जिन्ना पर प्रवचन (1943)

23 जनवरी : अहमदाबाद में डॉ. अम्बेडकर ने शांतिपूर्ण मार्च निकालकर सभा को संबोधित किया (1938)

24 जनवरी : राजर्षि छत्रपति साहूजी महाराज द्वारा प्राथमिक शिक्षा को मुफ्त व अनिवार्य करने का आदेश (1917)

24 जनवरी : कर्पूरी ठाकुर जयंती दिवस (1924)

26 जनवरी : गणतंत्र दिवस (1950)

27 जनवरी : डॉ. अम्बेडकर का साउथ बरो कमीशन के सामने साक्षात्कार (1919)

29 जनवरी : महाप्राण जोगेन्द्रनाथ मण्डल जयंती दिवस (1904)

30 जनवरी : सत्यनारायण गोयनका का जन्मदिवस (1924)

31 जनवरी : डॉ. अम्बेडकर द्वारा आंदोलन के मुखपत्र ‘‘मूकनायक’’ का प्रारम्भ (1920)

2024-01-13 11:08:05