




2026-10-24 16:05:19
बहुजन समाज एससी, एसटी, ओबीसी व अल्पसंख्यक समुदायों से मिलकर बना है। ये सभी जातीय घटक तकनीकी कामगार और कृषक गतिविधियों से जुड़े हुए हैं। दुनिया में तकनीकी और कृषक संबन्धित कार्य करने वाले लोग अधिकांशतया श्रेष्ठ और समृद्ध पाये जाते है, परंतु भारत शायद ऐसा अकेला देश है जहां पर इन समुदायों के लोग कम शिक्षित हैं और समृद्ध नहीं हैं। तार्किक और तथ्यों के आधार पर देखा जाये तो इसी समाज के जातीय घटकों से जुड़े लोग वास्तविकता के आधार पर तकनीकी और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से परिपूर्ण पाये गए हैं। तकनीकी व कृषक समाज से जुड़े व्यक्तियों के कारण देश में जितने भी तकनीकी विकास संभव हुए हैं, वे सब इन्हीं जातीय घटकों की देन हैं। जैसे-व्यक्ति को सभ्य और साफ-सुथरा दिखने के लिए एक अच्छी पोशाक की जरूरत होती है, उस पोशाक का ताना-माना बनाने के लिए कच्चे माल की जरूरत होती है, कच्चा माल का उत्पादन अनुसूचित जाति के घटक, कोली, बुनकर, जुलाहा आदि नाम से जाना जाता है। मनुष्य की बुनियादी जरूरत यह भी है कि वह अपने पैरों की रक्षा के लिए जूते या जूतियाँ पहने और अपने पैरों को कील-काँटों से बचा सके। इस काम के लिए चर्मकार जातीय घटक जूते या जूती आदि का निर्माण करते हैं। साथ ही खेती के काम में आने वाले लकड़ी व लोहे के औजारों का निर्माण बढ़ई व लौहार जातीय घटक के लोग ही करते हैं। इन्हीं समुदायों ने देश और समाज के विकास की दौड़ को आगे बढ़ाया है। वास्तविकता के आधार पर सही मायने में यही लोग वैज्ञानिकता के जनक है। उनमें वैज्ञानिक सोच और समझ सवर्ण समाज के मुकाबले पहले विकसित हुई और उसका फायदा पूरे समाज को समान रूप से मिला। भारत में जो आज सवर्ण समाज कहलाता है वह दूसरों पर हमेशा परजीवी बना रहा है। श्रमिक और तकनीकी समाज को इन्हें अपने से श्रेष्ठ नहीं मानना चाहिए। चूंकि मनुष्य की श्रेष्ठता का आधार बुद्धि के आधार पर होना चाहिए न कि विरासत में मिली जमीन व जायजाद के आधार पर या ब्राह्मणी वर्गीकरण के आधार पर।
श्रमिक-तकनीकी समाज की मानसिकता: मानसिक तौर पर श्रमिक तकनीकी समाज उन्नत किस्म का है। यही समाज नयी-नयी तकनीकों की खोज करता है और उन्हें समाज उपयोगी बनाता है। भारतीय तकनीकी श्रमिक समाज के लोग वास्तविकता के आधार पर एक ही वर्ग के लोग है, परंतु ब्राह्मणी संस्कृति ने इन्हें अलग-अलग जातीय टुकड़ों में विभाजित करके उनमें एकता के भाव को खत्म किया है। इनमें आपस में न कोई भाईचारा है, न एक-दूसरे के प्रति लगाव है। भारतीय समाज में अंतर्निहित की गई यह बीमारी उन्हें एकता के सूत्र में नहीं बांधने देती। भारतीय समाज की विडम्बना यह है कि समाज के जो जातीय घटक वैज्ञानिक और तकनीकी क्षेत्र में सजग और उन्नत है उन्हें ब्राह्मणी संस्कृति के कथाकथित सवर्ण समाज के लोग अपने से नीचा मानते हैं। उनसे किसी भी प्रकार का रोटी-बेटी का रिश्ता भी नहीं रखते। ऐतिहासिक तथ्यों के आधार पर भारतीय समाज में जाति का निर्माण ब्राह्मण वर्ण के लोगों ने किया है। ऐसा ही आरएसएस के प्रमुख मोहन भागवत भी मानते हैं। परंतु समाज में प्रचलित व्यवस्था और मान्यताओं के आधार पर यह माना जा सकता है कि जातियों का निर्माण ब्राह्मणों ने ही किया है चूंकि ब्राह्मण वर्ण के लोग ही अपने आपको सबसे श्रेष्ठ बताते हैं।
बहुजन समाज का संगठनात्मक चरित्र: देश में आज बहुजन समाज के लाखों की संख्या में संगठन हैं, फिर भी बहुजन समाज सभी सामाजिक क्षेत्रों में हाशिये पर क्यों है? इसका मूल कारण है कि भारतीय समाज की जातीय संरचना में क्रमिक ऊंच-नीच विद्यमान है। बहुजन समाज संख्याबल के आधार पर देश का 80 प्रतिशत भाग है। भारत में लोकतांत्रिक व्यवस्था है, लोकतंत्र में जिसकी संख्या अधिक होती है शासन सत्ता भी उसी की होती है। परंतु भारतीय समाज में यह देखने को नहीं मिलता, जिसके कारण बहुजन समाज सत्ता से दूर है। बहुजन समाज के जातीय घटकों में न एकता है, न आपस में सोच-विचार की कोई ठोस प्रणाली है। जिसके कारण समाज का हर जातीय घटक अपने आप में एक पूर्ण इकाई बना हुआ है। जबकि समाजशास्त्र के अनुसार मनुष्य सामाजिक प्राणी है और बिना समाज के उसका अस्तित्व नगण्य है। बहुजन समाज के जो जातीय घटक अपने को एक दूसरे से ऊंचा या नीचा मानकर अलग-थलग रहते हैं, वे समाज में एक एकल यूनिट तो बने रहते हैं परंतु उनमें कोई एकता की शक्ति, समझ और समाज को गति देने की क्रियाशीलता पैदा नहीं होती। समाज की प्रगति के लिए समाज के सभी जातीय घटकों में कार्यशीलता और गतिशीलता जरूरी है, जिसके बिना हर जातीय घटक में शून्यता बनी रहती है। गतिमान बने रहना ही मनुष्य की असली सामाजिक पहचान है।
प्राय देखा गया है कि ये सभी सामाजिक संगठन कमोवेश लंबे समय से कुछेक स्वार्थी, गैर जिम्मेदार, अनुपयोगी व्यक्तियों के कब्जे में हैं। ये सभी स्वार्थी किस्म के संगठनों के संचालक अपना अस्तित्व और गौरव इसी बात में समझते हैं कि वे आमुख संगठन के अध्यक्ष या सचिव है। इसी से उन्हें आत्म संतुष्टि प्राप्त होती है। परंतु समाज के हित को देखते हुए अधिकाशतया ये लोग समाज के शोषक और सौदागर हैं जो मनुवादी संघियों के साथ मिलकर समाज को गुमराह करके उसका सौदा कर रहे हैं। उदाहरण के तौर पर आज देश की संसद में 131 सांसद एससी, एसटी समुदायों से जीतकर आ रहे हैं, लेकिन पूरी संसद में एक-दो सांसदों को छोड़कर ऐसे सांसद मुश्किल से मिल पाएंगे जो समाज के मुद्दों को उठा पा रहे हैं।
किस मानसिकता के सांसद चुनकर भेजे बहुजन समाज: बहुजन समाज से ऐसे सांसद ही संसद में चुनकर आने चाहिए जिनके मस्तिष्क में बहुजन समाज के जातीय घटकों के सामाजिक धरातल का ज्ञान हो, समाज की समस्याओं का भी उन्हें पूरा ज्ञान हो और इन समस्याओं का किस प्रकार से समाधान हो सकता है उसका भी उन्हें मोटेतौर पर पूरा ज्ञान हो। उनमें बौद्धिक तार्किकता भी हो जिसके आधार पर वे सदन में अपने मुद्दों पर तार्किक बहस कर सके और संसद में बैठे अन्य सदस्यों को अपनी तार्किक बहस से प्रभावित करने की क्षमता रखते हो। वर्तमान समय में बहुजन समाज से चुनकर आए सांसदों की योग्यता और तार्किकता पर बहुजन समाज की जागरूक जनता को संशय है कि हमारे सांसद अयोग्य है और उनका बौद्धिक व तार्किक स्तर कमजोर है। जिसके कारण वे संसद की तार्किक बहसो में हिस्सा लेने से बचते हैं। बहुजन समाज को अपने तार्किक व बौद्धिक शेरों को संसद में भेजना चाहिए मनुवादी सियार या गीदड़ों को नहीं। पूर्व और वर्तमान में बहुजन समाज ने अनुसूचित जातीय घटकों से बहुत से योग्य और विद्वान सांसद संसद में चुनकर भेजे हैं, मुख्य रूप से उनकी गिनती संसद के जाने माने सांसदों में होती है, जैसे-बाबा साहब डॉ. अम्बेडकर, बुद्धप्रिय मौर्य, मान्यवर साहेब कांशीराम, बहन मायावती जी तथा अन्य ऐसे सांसद हुए हैं जो संसद में अपना तार्किक प्रभाव रखते थे और समाज से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता से उठाते थे और उनका समाधान भी कराते थे।
नेताओं में मनुवादी-संघी विचारधारा का प्रवाह अधिक: आज बहुजन समाज आमतौर पर मनुवादी संघी विचारधारा का गुलाम बनता जा रहा है जिसके कारण बहुजन समाज उन्हें न कोई भाव दे रहा है और न उन्हें समाज का नेता मान रहा है। जो सांसद आज संसद में चुनकर बैठे हैं वे अपने समाज की जनता का प्रतिनिधित्व नहीं करते क्योंकि उन्हें लगता है कि हम बहुजन समाज की ताकत से जीतकर संसद में नहीं आए हैं हम तो मनुवादियों के रहमोकर्म और इवीएम में गड़बड़ी व वोट चोरी के माध्यम से चुनाव जीतकर संसद में आए हैं। उनकी यही मानसिकता संसद में उन्हें कमजोर और अकारगर बना रही है। मनुवादी व्यवस्था का सहारा लेकर जो बहुजन समाज के सांसद संसद में बैठे है वे कभी मनुवादियों की नीतियों का प्रतिकार नहीं कर सकते। संसद में चुनकर आए सांसद जब यह महसूस करने लगेंगे कि हम अपने समाज की ताकत के आधार पर संसद में चुनकर आए हैं तभी वे बहुजन समाज के मुद्दों को संसद में अपनी पूरी शक्ति से रख सकेंगे, संसद को उस मुद्दे पर चर्चा के लिए बाध्य कर सकेंगे और समस्या का पूरा समाधान करा सकेंगे।
सामाजिक संगठनों को निस्वार्थ संचालकों की जरूरत: मान्यवर साहेब कांशीराम जी ने अपने वक्तव्यों में कहा था कि ‘बहुजन समाज की राजनीति के लिए समाज की जड़ों को अधिक मजबूत होना चाहिए। लेकिन जब मैं समाज में जड़े खोजने लगा तो मुझे समाज की जड़े नजर नहीं आई।’ ‘अगर तुम बहुजन समाज के लिए संघर्ष न कर पाओ तो विचलित मत होना बस एक काम करना बहुजन महापुरुषों के जीवन संघर्ष को पढ़ लेना और अगर उसे पढ़कर तुम्हारे शरीर के रौंगटे खड़े हो जाए तो समझ लेना कि तुम बहुजन समाज के लिए संघर्ष कर सकते हो, वरना वहीं किताब वहाँ पढ़कर फेंक देना।’ ‘चमचे कभी भी वफादार नहीं होते और वफादार कभी चमचा नहीं होता।’ ‘राजनीति चले या ना चले सरकार बने या न बने लेकिन सामाजिक परिवर्तन की गति रुकनी नहीं चाहिए।’ ‘कभी भी किसी व्यक्ति के पीछे नहीं भागना चाहिए हमेशा विचारधारा के साथ में चलना चाहिए।’ ‘जो लोग तुम्हारे हाथ का छुआ पानी नहीं पीते वे तुम्हारा वोट लेकर संसद में क्या काम करेंगे, क्या तुम्हारे लिए आवाज उठाएंगे यह सोचने वाली बात है?’ मान्यवर कहते हैं तुम्हारा मर्डर भी होगा, बलात्कार भी होगा, सरेआम पीटे भी जाओगे, कोई बचाने नहीं आएगा, तुम टोली बनाकर जमा हो जाओगे, नारेबाजी करोगे, अपने संगठन के नाम से ज्ञापन दोगे, ज्यादा से ज्यादा रास्ते पर जाकर देश या राज्य भी बंद करोगे, प्रशासन तुम्हारी बात मान लेगा गिरफ्तारी करेगा, फिर क्या न्याय मिलेगा, सवाल न्याय का नहीं है सवाल यह है कि तुम पर अन्याय होता ही क्यों हैं? वह इसलिए कि तुम लोग शासक नहीं हो, चुनाव में यही तुम्हारी जाति वाले सामाजिक संगठन और उनके नेता कांग्रेस-बीजेपी जैसी पार्टियों में बिक जाते हैं और अपना कैरियर बना लेते है और तुम लोग उनको अपना नेता मानकर हमेशा मार खाते रहते हो।
बहुजन समाज के सामाजिक व राजनीतिक नेताओं से अनुरोध है कि वे अपने आपको समाज से बड़ा न समझे, सभी में एकता की भावना को समाहित करें, सभी को एकता के साथ अपने जातीय घटकों के लठों को साथ लेकर मनुवादी संघियों के अपराधों का संज्ञान लेकर बहुजन समाज की शेरनी फूलन देवी व श्रीराम जैसी रणनीति से जवाब देनी की योग्यता हासिल करें। ऐसी कारगर कार्यवाही से मनुवादी शोषक वर्ग तुम्हारे सामने टिक नहीं पाएगा और अन्याय करने की जरूरत भी नहीं कर पाएगा। हम यहाँ पर अपराधी गतिविधि को मान्यता नहीं दे रहे हैं और न उसे सही ठरा रहे हैं। हमारा उक्त वक्तव्य से मतलब आत्मसुरक्षा से है। आत्मसुरक्षा को भारतीय संविधान और भगवान बुद्ध ने भी सही ठहराया है और सभी शोषकों और पीड़ित वर्गांे को संविधान के अनुसार इसका पालन करना चाहिए।
जय भीम, जय संविधान





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