2024-12-05 13:20:37
वर्तमान समय में दलित सामाजिक संगठनों के निर्माण में तेजी से बढ़ोत्तरी हुई है। ये सभी सामाजिक संगठन अपने-अपने जातीय घटकों के आधार पर कुकरमुत्तों की तरह पैदा हो रहे हैं। लेकिन इन सभी सामाजिक संगठनों में प्रेरकों की भारी कमी है। अगर हम यूँ कहें कि ये सभी एससी, एसटी, ओबीसी व अल्पसंख्यक समाज के सामाजिक संगठन प्रेरक व सिद्धांत विहीन है, तो गलत नहीं होगा। पिछले 10-12 वर्षों में दलित समाज में सामाजिक संगठनों की भारी वृद्धि हुई है। पूरे देश में दलित समाज के लाखों सामाजिक संगठन आज मौजूद हैं, फिर भी दलित समाज के सभी सामाजिक व राजनीतिक मुद्दे दिन-प्रतिदिन उनकी कमजोर कार्यशैली के कारण फेल हो रहे हैं। इस तथ्य पर गंभीर विचार-विमर्श करने पर पता चलता है कि ये सामाजिक संगठन नामात्र के लिए 4-5 की संख्या में इकट्ठा होकर व्यक्ति विशेष को चमकाने के लिए बनाए हुए हैं। ऐसा लगता है कि ऐसे सामाजिक संगठन अपने अंदर के एक-दो व्यक्तियों के अहम को संतुष्ट करने के लिए बनाए गए हैं। जिनका अंतिम उद्देश्य सामाजिक न होकर व्यक्तिगत स्वार्थ पर टिका होता है और उसी की उद्देश्य प्राप्ति के लिए ऐसे संगठन समाज में अपने आपको सामाजिक कार्यकर्ता बताकर प्रचारित करते हैं। उनके प्रचार में न कोई सामाजिक मुद्दा होता है और न कोई धार होती है। उनकी सभी बातें व्यक्तिगत स्वार्थ के इर्द-गिर्द ही घूमती दिखाई पड़ती है।
आज समाज के सामने मूलभूत समस्याएँ जैसे-बेरोजगारी, महँगाई, स्वास्थ्य, शिक्षा, भ्रष्टाचार आदि मुंहबाहे खड़ी है। जिन पर वर्तमान सरकारों व सामाजिक संगठनों का कोई ध्यान नहीं हैं और न वे अपने माध्यम से सरकार के सामने इन मुद्दों को सही तरह से रख पा रहे हैं। इन सब समस्याओं को सरकार के सामने कारगर रूप से रखने के मूल में सामाजिक प्रेरकों की कमी नजर आती है। चूंकि बिना सामाजिक प्रेरकों के समाज को जागरूक करना, संगठित करना, एकत्रित करना पहले के मुकाबले आज अधिक मुश्किल हो रहा है। प्राय: यह देखा जा रहा है कि आज के सामाजिक संगठन यदि अपने 100 सदस्यों को सूचना देकर एकत्रित होने के लिए आमंत्रित करते हैं तो वहाँ पर मुश्किल से 15-20 लोग ही उपस्थित होते है। इसका सीधा मलतब है कि आज के सामाजिक संगठनों के नेता कहीं न कहीं जनता से निरंतर संवाद रखने में विफल है। जिसके कारण उनका सामाजिक उद्देश्य जिसके लिए संगठन बनाया गया वह भी कहीं न कहीं आंशिक या पूर्ण रूप से विफल ही है।
संगठनों की कार्यशैली चिंता का विषय: देश में एससी, एसटी, ओबीसी, अल्पसंख्यक समाज के लाखों संगठन होने का अनुमान है। परंतु वे सभी वर्तमान समय में सामर्थ्य और शक्तिहीन है। उदाहरण के तौर पर अगर हम यहाँ पर बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर के द्वारा स्थापित तीन संगठनों ‘समता सैनिक दल’; ‘ दि बुद्धिस्ट सोसाइटी आॅफ इंडिया’; ‘रिपब्लिकन पार्टी आॅफ इंडिया’ और मान्यवर साहेब कांशीराम जी द्वारा स्थापित ‘बहुजन समाज पार्टी’ को देखें तो उनमें सक्षमता और शक्ति आज कहीं भी नजर नहीं आती। जिसका कारण इन सभी संगठनों के संचालकों में स्वार्थी और सुप्रीमो बनने की लालसा अधिक है। जिसके चलते इनके सभी कार्यक्रम कारगर स्तर के नजर नहीं आते। इन संगठनों में कुछेक व्यक्ति लंबे समय से सर्वे-सर्वा बने हुए हैं, उनकी कार्यशैली भ्रामकता और अदृश्य भ्रष्टाचार की चपेट में हैं। जिसके कारण समाज का भरोसा दिन-प्रतिदिन इन संगठनों से टूटता जा रहा हैं। इन संगठनों में कुछेक लोग ऐसे भी घुस गए हैं जो समाज में नकारात्मकता का भाव फैलाने का काम बड़े पैमाने पर करते हैं। ऐसे व्यक्तियों को नकारात्मक उत्प्रेरक भी कहा जा सकता है? आमतौर पर ये सभी नकारात्मक उत्प्रेरक न तो किसी भी सामाजिक संगठनों को किसी भी प्रकार का योगदान करते हैं और समाज के अन्य लोगों में भी नकारात्मक प्रचार करके उनको हतोत्साहित करने का काम करते हैं। आज दलित समाज में ऐसे नकारात्मक उत्प्रेरक दिन-प्रतिदिन बढ़ते जा रहे हैं जिसके कारण सामाजिक संगठनों के आंदोलन दिन-प्रतिदिन कमजोर पड़ते जा रहे हैं। ऐसे नकारात्मक उत्प्रेरकों से समाज को सावधान रहना चाहिए और इन नकारामक उत्प्रेरकों को सामाजिक संगठनों में सामाजिक दायित्व के काम नहीं सौंपने चाहिए। चूंकि ये सभी नकारात्मक उत्प्रेरक संगठनों के अंदर घुसकर, संगठनों को नुकसान पहुँचाने का काम करते हैं। समाज को ऐसा भी संदेह है कि ये नकारात्मक उत्प्रेरक मनुवादी लोगों ने दलित संगठनों में घुसाये हंै। ताकि दलित समाज के संगठनों में वैचारिक बिखराव हो और अंतत: संगठन कमजोर होकर अक्रियशील हो जायें। आज ऐसी ही स्थिति समाज में सबको नजर आ रही है।
आवश्यकता आविष्कार की जननी है: यह वाक्य मानवीय जरूरत और वैज्ञानिकता के आधार पर कार्य करने का प्रतीक है। दलित समाज के महापुरुषों द्वारा बनाए गए सामाजिक संगठन आज अपने मूल चरित्र से कुछ हद तक विस्थापित होकर अपनी लक्ष्य प्रति में कमजोर पड़े है। सामाजिक परिवर्तन समाज में एक सतत: प्रक्रिया है, यह प्रक्रिया जरूरत के हिसाब से अपने अंदर समय-समय पर स्वत: बदलाव करती रहती है और अंतत: यह बदलाव ही सामाजिक परिवर्तन में समाज को नजर आने लगते हैं। सामाजिक प्रक्रिया स्थायी और ठहरी हुई प्रक्रिया नहीं है, यह स्वत: ही परिस्थितियों से ऊजार्वान होकर सामाजिक बदलावों को जन्म देती है। अगर सामाजिक संगठनों के कथित नेता इन सामाजिक प्रक्रियाओं को परखने की परख रखते है और उसके अनुसार ही अपने सामाजिक संगठन को प्रेरित करके उस ओर काम करने की योग्यता रखते हैं तो सामाजिक संगठनों में अधिक गतिशीलता उत्पन्न हो सकती है। यह गतिशीलता ही सामाजिक परिवर्तन के रूप में उभरकर समाज के समाने आती है। इसलिए सामाजिक संगठनों में सामाजिक प्रेरकों का दायित्व होता है कि समाज में अपनी वैचारिकी को निरंतरता के साथ गतिशील रखे और लोगों को अपने संगठन की शिक्षाओं के द्वारा उसे आकर्षित करते रहे, जिससे समाज में आवश्यक ज्ञान की धारा अबाध्य बनी रहे और सामाजिक संगठन अपने उद्देश्य में सफल हो पायेें।
सामाजिक प्रेरकों की कमी का कारण: वर्तमान समय में कथित दलित समाज के संगठनों में सकारात्मक उत्प्रेरकों की नगण्यता है और स्वार्थ व राजनैतिक भावना से प्रेरित लोगों की अधिकता है। इन स्वार्थी सामाजिक कार्यकत्तार्ओं, नेताओं को देखकर और पहचानकर ही समाज में सकारात्मक उत्प्रेरक इन संगठनों से दिन-प्रतिदिन दूर होते जा रहे हैं। समाज में हम हर रोज यह अनुभव कर रहे हैं कि सामाजिक संगठनों के कथित नेता अपने विचार को जनता पर थौंपने की बात करते हैं। उनके साथ विचार-विमर्श और नवचेतना पैदा करने की बात नहीं करते और न स्पष्ट व ईमानदार प्रवृति के नौजवानों को अपने संगठन के अंदर आने देते, और न ही उन्हें कोई सामाजिक दायित्व का काम देते। अधिकांश कथित नेता इन ऊजार्वान नौजवानों को अपने चमचों के रूप में इस्तेमाल करने का मंसूबा रखते हैं। सामाजिक संगठनों की विफलता इसी कारण दिन-प्रतिदिन बढ़ती जा रही है। समाज में नवचेतना पैदा करने के लिए स्पष्टवादी, निर्भीक व ईमानदार प्रवृति के नौजवानों को सामाजिक संगठनों का दायित्व सौंपना होगा तभी सामाजिक संगठन ऊर्जावान होकर अपने लक्ष्य में सफल हो सकते हैं?
संगठनों में चमचे पालने की प्रवृति: आज सामाजिक संगठनों के संचालक अधिकांशत: इस फिराक में रहते हैं कि सामाजिक संगठन के बल पर अपने इर्द-गिर्द प्रसंशकों की भीड़ कैसे पैदा की जाये? मनुष्य की यह प्रवृति अचानक नहीं बनी है। यह सदियों से समाज में फलती-फूलती रही है। फर्क सिर्फ इतना है कि पहले ये प्रसंशक राजा-महाराजाओं के आसपास हुआ करते थे जो राजा-महाराजाओं की स्तुति करके अपना जीवनयापन करते थे। तत्कालीन राजा-महाराजा भी ऐसे स्तुति करने वालों से खुश होकर उन्हें ईनाम या बकशीश देते थे। वर्तमान समय में देश में प्रजातंत्र है राजा-महाराजाओं का कोई अस्तित्व नहीं है, तो ऐसी प्रवृति के लोगों ने सामाजिक और राजनैतिक संगठनों के संचालकों की चमचागिरि करना ही विकल्प मान लिया है। समाज के कुछेक संचालक भी ऐसे मानसिक गुलामों को अपने साथ रखकर समय और जरूरत के हिसाब से इस्तेमाल करते रहते हैं। बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर द्वारा स्थापित सामाजिक व राजनैतिक संगठनों में भी चमचागिरि और गुलामी करने वाले व्यक्तियों की अधिकता है। ऐसे व्यक्ति किसी भी हद तक जाकर अपने स्वार्थ हेतु सामाजिक संगठनों का बड़े पैमाने पर अदृश्य तरीके से नुकसान भी करते हैं। उनका उद्देश्य सिर्फ अपने आंकाओं को खुश करने का होता है। समाज की लाभ-हानि से उनका कोई सरोकार नहीं होता।
आधिपत्य और सुप्रीमो संस्कृति को बढ़ावा: संगठनों के संचालकों में यह भाव प्रबलता के साथ देखा जा रहा है कि संचालक प्रबंधकों में एकाधिकार और वर्चस्व के आधिपत्य में बढ़ोत्तरी हुई है। उनके कर्म और वक्तव्यों से सब जाहिर है। जिसके कारण समाज उनकी तरफ आकर्षित होने के बजाए उनसे दूरी रखने को अच्छा समझ रहा है। मनोवैज्ञानिक स्तर पर समाज का हर व्यक्ति सम्मान पाने की भावना रखता है और उसे जहाँ सम्मान नहीं मिलता वहाँ से वह व्यक्ति किनारा कर लेता हैं। संचालक प्रबंधकों की यही प्रवृति लोगों को संगठनों से दूर करती जा रही है। चूंकि समाज के व्यक्ति अपने सामाजिक संगठनों के साथ जुड़ने से निराश है और उनमें सामाजिक संगठनों के प्रति कुछ भी सकारात्मक व प्रेरक भाव नहीं मिल रहा है। इसलिए अगर सामाजिक संगठनों को मजबूत करना है तो उनमें सामाजिक उत्प्रेरकों को समाज के अनुकूल शिक्षित और दीक्षित करके संगठनों में स्थापित करना होगा। व्यक्तिगत आधिपत्य की भावना और सम्मान पाने की लालसा रखने वाले संचालकों को प्रबंधक मंडल से दूर रखना होगा। चूंकि इनके कारण ही समाज के आम नागरिकों में आकर्षण का भाव पैदा नहीं हो पाता। इनके व्यवहारिक वक्तव्यों से समाज के नागरिकों में निराशा ही पैदा होती है। सामाजिक संगठनों के द्वारा समाज में जागरूकता, समनव्य और सौहार्द बढ़ाने के लिए सामाजिक प्रेरकों को अपना अहम छोड़कर समाज के गली-मौहल्लों में जाकर लोगों से मिलते रहना होगा, उनके साथ सौहार्द और समनव्य बढ़ाना होगा। उनकी समस्याओं को भी सुनना होगा और यथा संभव समस्याओं का समाधान भी सुझाना होगा। आज के एससी/एसटी/ओबीसी समाज के लोगों में आपसी मेल-मिलाप घट रहा है। समाज के हर व्यक्ति में जरूरत से ज्यादा अहम परिलक्षित हो रहा है जिसके कारण समाज का प्रत्येक व्यक्ति अपने समाज के दूसरे व्यक्ति से ईर्ष्या और नफरत रखता है। इसके विपरीत हिंदुत्व की विचारधारा वाले संघियों में यह अधिक मजबूती के साथ दिखाई दे रहा है। उनके सामाजिक संगठनों के कार्यकर्ता निरंतरता के साथ गली-मौहल्लों में घूमकर वहाँ के लोगों से मेल-मिलाप बढ़ा रहे हैं और यही मेल-मिलाप हिंदुत्व की विचारधारा वालों को दलित/पिछड़े/अल्पसंख्यकों में स्थापित कर रहा है। जिसके कारण चुनाव दर चुनाव हिंदुत्व की विचारधारा वालों का मत प्रतिशत भी बढ़ता जा रहा है। लोकतंत्र में जनता के साथ मेल-मिलाप रखना, समाज में चल रही समस्याओं को सुनना और यथासंभव समाधान सुझाना विपरीत विचारधारा वालों को भी दोस्तों में बदल देता है और इसी दोस्ती का परिणाम लोकतंत्र में उनकी जीत का माध्यम बन जाता है। इसलिए दलितों के सामाजिक संगठनों को अपने दुश्मनों से निपटने के लिए उन्हीं की सामाजिक रणनीति पर चलकर समाज के लोगों को अपनी तरफ आकर्षित करना होगा। तभी यह समाज एकजुट होकर अपनी सामाजिक शक्ति में परिवर्तित हो सकता है?
वर्तमान स्थिति को देखते हुए दलित/पिछड़े समाज के हर व्यक्ति को अपना अहम और वर्चस्व छोड़कर अपने समाज में यथासंभव उठना-बैठना बढ़ाना होगा। दलित/पिछड़े समाज के सम्पन्न व अग्रणीय लोगों में अपनी श्रेष्ठता का भाव जो समय के साथ उभरा है। उनकी यह कृत्रिम श्रेष्ठता उनको अपना सामाजिक धरातल देखने नहीं देती इसलिए ऐसे लोग अपने आप को समाज से अलग मानने लगते हैं, उनसे कोई सामाजिक सरोकार भी नहीं रखते। अपने समाज से सामाजिक सरोकार रखने में वे हीन भावना का शिकार रहते हैं। यहीं हीन भावना ऐसे व्यक्तियों को समाज से अलग कर देती है और समाज भी उन्हें कोई भाव नहीं देता है। आज समाज में हजारों की संख्या में वरिष्ठ सरकारी पदाधिकारी व शिक्षण क्षेत्र के वरिष्ठ प्राध्यापक अपना व्यवहार अपने समाज के अनुरूप नहीं मानते और यथासंभव समाज के व्यक्तियों से दूरी बनाकर चलते हैं, बदले में समाज भी ऐसे व्यक्तियों को कोई भाव नहीं देता। दोनों में अहम और व्यक्तिगत अस्मिता का टकराव है। जिससे नुकसान समाज का ही हो रहा है। इसके समाधान के लिए दोनों पक्षों को अपने-अपने अहम और अस्मिता के सवाल को छोड़कर सामाजिक धरातल पर उतरकर समानता के भाव के साथ आपस में संवाद और मेल-मिलाप को बढ़ावा देना होगा। यह बदलाव आवश्यक है मगर इसकी सफलता ऊपर के स्तर के सम्पन्न व समृद्ध लोगों की है। निचले स्तर पर जीवन यापन करने वाले लोग इसे खुशी-खुशी मानकर अपने आचरण में बदलाव कर लेंगे।
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